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भोपाल: पक्की क़ब्र के चलन से दफ़नाने के लिए जगह मिलना हो रहा मुश्किल
- Author, शुरैह नियाज़ी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, भोपाल से
कितना है बदनसीब 'ज़फ़र' दफ़्न के लिए
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में.
यानी दफ़्न होने के लिए दो गज़ ज़मीन भी नसीब नहीं हुई दोस्त की गली में.
शायद यही बात भोपाल के मुसलमानों के लिए आने वाले वक़्त में सही होती नज़र आ रही है.
इसकी एक वजह अतिक्रमण के कारण सिमटते जा रहे क़ब्रिस्तान हैं, तो वही दूसरी वजह ये है कि लोग पक्की क़ब्रें बना रहे हैं.
शहर के मुख्य क़ब्रिस्तान में इंताज़ामिया कमेटी की तरफ़ से बैनर लगाया गया है जिस पर लिखा है कि "क़ब्रिस्तान में जगह की कमी है. अगर किसी के रिश्तेदार की क़ब्र ग़लती से खुद जाए तो बदतमीज़ी न करें."
यह बैनर अपने आप में क़ब्रिस्तान के हालात बयान कर रहा है.
पक्की क़ब्र, मिट्टी की कमी से जूझते क़ब्रिस्तान
क़ब्रिस्तान में इस तरह के कई मामले आ चुके हैं जब कब्रों की देखभाल कर रहे लोगों को बदतमीज़ी का सामना करना पड़ा है.
वक़्फ बोर्ड के रिकॉर्ड के मुताबिक़ आज भी भोपाल शहर में 149 क़ब्रिस्तान हैं लेकिन लोगों का दावा है कि हक़ीक़त में क़ब्रिस्तानों की संख्या 40 से भी कम है.
हालात के मद्देनज़र शहर के काज़ी लोगों से गुज़ारिश कर रहे हैं कि वो शवों को दफ़नाने के लिए पक्की कब्रों का निर्माण न करें. उनका कहना है कि इस्लाम में ऐसे करने को कहा भी नहीं गया है.
इसके साथ ही क़ब्रिस्तान में मिट्टी की कमी भी महसूस की जा रही है जिसके लिए कुछ संगठन मुहिम भी चला रहे हैं.
दूसरी तरफ क़ब्रिस्तान की ज़मीन पर हो रहा अतिक्रमण भी लगातार बढ़ रहा है, जो आने वाले वक़्त में शहर के मुसलमानों को दो ग़ज़ ज़मीन से भी महरुम कर सकता है.
हालात को देखते हुए शहर काज़ी के नाम का एक परचा निकाला गया है, जिसमें वह लोगों से कह रहे हैं कि पक्की क़ब्र बनाने से बचें.
भोपाल शहर के काज़ी मौलाना सैयद मुश्ताक़ अली नदवी ने बीबीसी को बताया, "इस्लाम में पक्की क़ब्र को मना किया गया है. लोग उसके बावजूद भी वहां पर पक्की क़ब्र बनावा रहे हैं. क़ब्रिस्तान इबारत (सीख) की जगह है, ये वो जगह नहीं है जहां बड़ी-बड़ी क़ब्र बनाई जाएं और तफ़रीह (सैर-सपाटा) करने जाएं."
उन्होंने कहा कि वो जगह आख़िरी ठिकाना है इसलिए लोगों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वो उनकी मिल्कियत नहीं है.
मौलाना सैयद मुश्ताक़ अली नदवी ने कहा, "शहर की आबादी लगातार बढ़ रही है और इस तरह से अगर हर कोई पक्की क़ब्र बनाता रहे तो फिर दूसरे लोगों को तो जगह मिलनी ही नहीं है. इसलिए यही कहना चाहूंगा कि लोग इससे बचें."
अगर भोपाल की आबादी की बात की जाए तो 2011 की जनगणना के मुताबिक़, भोपाल की कुल आबादी 23.68 लाख थी, जिसमें क़रीब 5.25 लाख मुसलमान बताए जाते हैं. निश्चित तौर पर यह संख्या अब बढ़ गई होगी.
बढ़ती आबादी और कम होती जगहों की वजह से ज़्यादातर शहरों में कुछ सालों के बाद मिट्टी डाल कर क़ब्रों को बराबर कर दिया जाता है. लेकिन भोपाल जैसे शहर में पक्की क़ब्र बन जाने की वजह से इंतेज़ामिया कमेटी के लिए यह कर पाना आसान नहीं होता है.
क्यों बनाई जा रही है पक्की क़ब्रें?
अपनी मां की पक्की क़ब्र बनाने वाले भोपाल शहर के एक बाशिंदे ने बताया कि उन्होंने ऐसा इसलिए किया ताकि ये हमेशा महफूज़ रहे.
उन्होंने नाम न छापने की शर्त पर कहा, "दूसरी क़ब्रों को कई बार बराबर कर दिया जाता है या फिर उसे खोद दिया जाता है लेकिन मैं नहीं चाहता था कि मेरी मां की क़ब्र के साथ ऐसा हो. इसलिए मैंने पक्की कब्र बनाई."
वे कहते हैं, "इसे इस्लामी वजह से ग़लत बताया जाता है लेकिन मेरे जज़्बात मां के साथ जुड़े हैं इसलिए मैंने ऐसा सोचा भी नहीं."
भोपाल शहर में एक तरफ आबादी बढ़ रही है तो दूसरी तरफ क़ब्रिस्तान की संख्या कम हो रही है. इसके अलावा एक और समस्या जो यहां पैदा हो रही है वो है क़ब्रिस्तान में मिट्टी की भी कमी.
क़ब्रिस्तान से जुड़े लोगों का कहना है कि क़ब्रिस्तान में सालभर में 3000 डंपर से ज़्यादा मिट्टी की ज़रूरत पड़ती है. लेकिन इसकी भारी कमी महसूस की जा रही है.
शहर के कुछ लोग उसे बचाने की मुहिम में लगे हैं. समाज सेवी सैयद फैज़ अली ने 'एक तगाड़ी मिट्टी' अभियान भी शुरू किया है ताकि लोग कब्रों के लिए मिट्टी दे सकें.
फैज़ अली ने बीबीसी को बताया, "हम देख रहे हैं कि क़ब्रिस्तानों में अतिक्रमण व पक्की क़ब्रों के चलते मिट्टी और जगह की कमी आम हो गई है. अभी तो मामला चल ही रहा है लेकिन आने वाले वक़्त में यह समस्या इतनी बड़ी हो जाएगी कि हम कुछ नहीं कर पाएंगे."
उन्होंने कहा, "बस इसी फ़िक्र को लेकर 'एक तगाड़ी मिट्टी' की मुहिम शुरू की. सोच ये है कि भोपाल की आवाम ख़ुद जागरूक हो और मिट्टी की कमी और अतिक्रमण की वजह से जो क़ब्रिस्तान ख़त्म होते जा रहे हैं उसे हम ख़ुद देखें और आने वाले कल की फ़िक्र करें."
फैज़ अली का यह भी कहना है कि वो लगातार लोगों के बीच जागरूकता पैदा कर रहे हैं, साथ ही अतिक्रमण के लिए प्रशासन से भी शिकायत कर रहे हैं ताकि हालात बदले जा सकें.
अतिक्रमण ने भी बढ़ाई मुश्किलें
भोपाल शहर के बीचोंबीच स्थित बड़ा बाग़ क़ब्रिस्तान के चारों तरफ़ से अतिक्रमण हो रहा है जिस कारण इसकी जगह लगातार सिमटती जा रही है.
लोगों ने क़ब्रिस्तान में पार्किग तक शुरू कर दी है. वहीं क़ब्रिस्तान के भीतर बनाई गई पक्की क़ब्रों ने यहां आने वाले और ताबूतों के लिए मुश्किल पैदा कर दी है.
क़ब्रिस्तान के अंदर जो लोग पार्किंग कर रहे हैं उनसे जब बात करने की कोशिश की गई तो उन्होंने इस पर कुछ भी बोलने से मना कर दिया.
क़ब्रिस्तान वक़्फ बोर्ड के तहत आते हैं, इसन देखरेख की ज़िम्मेदारी भी उन पर ही होती है. अतिक्रमण या किसी दूसरी सूरत में वो कार्रवाई कर सकते हैं लेकिन उन्हें इसके लिए ज़िला प्रशासन की मदद की ज़रूरत पड़ती है. इनके पास खुद का बल नहीं होता है लिहाजा ज़िला कलेक्टर को इसकी जानकारी दी जाती है जो फिर कार्रवाई की जाती है.
क़ब्रिस्तानों के देखरेख करने वाले मध्य प्रदेश वक़्फ बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सैयद शाकिर अली जाफ़री ने बीबीसी को बताया कि बोर्ड की भी कोशिश यही है कि लोग पक्की क़ब्र बनाने से बचें, ताकि जगह की कमी न हो.
वे कहते हैं, "शहर काज़ी की बात का बोर्ड भी समर्थन करता है और लोगों से हम अपील कर रहे हैं कि वो पक्की क़ब्रें न बनाएं. वहीं अतिक्रमण को लेकर ज़िला कलेक्टर और कमिश्नर को पत्र लिखा गया है और जो भी वैधानिक कार्रवाई वक़्फ बोर्ड के नियम के तहत हो सकती है, होगी."
भोपाल में लंबे वक़्त तक मुसलमान शासकों का राज रहा है. यही वजह है कि दूसरे शहरों के मुक़ाबले यहां ज़्यादा क़ब्रिस्तान मिल जाएंगे. इसके बावजूद अब मुसलमानों के लिए शव दफ़नाने के लिए क़ब्रिस्तान कम पड़ते जा रहे हैं.
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