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महंत राजू दास कौन हैं और स्वामी प्रसाद मौर्य से क्यों आई मारपीट की नौबत
- Author, अमन द्विवेदी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक निजी चैनल के कार्यक्रम में समाजवादी पार्टी नेता स्वामी प्रसाद मौर्य और अयोध्या के हनुमानगढ़ी मंदिर के पुजारी राजू दास और उनके समर्थक आमने सामने हो गए.
पिछले कुछ दिनों से उत्तर प्रदेश में रामचरितमानस में लिखी चौपाइयों के कुछ अंशों के मतलब और उन्हें हटाने की मांग को लेकर स्वामी प्रसाद मौर्य काफ़ी मुखर रहे हैं.
उनका आरोप है कि इन चौपाइयों में दलित समाज और महिलाओं का अपमान हुआ है और वो तुलसीदास की लिखी रामचरितमानस के इन हिस्सों पर पाबंदी लगाने और उन्हें हटाने की मांग कर रहे हैं.
इसी मांग को लेकर उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी चिट्ठी लिखी है.
बुधवार को लखनऊ में स्वामी प्रसाद मौर्य और राजू दास आमने- सामने आ गए, जिसके चलते दोनों के बीच बहस हुई और नौबत मारपीट तक पहुँच गई.
स्वामी प्रसाद मौर्य ने लखनऊ पुलिस कमिश्नर को लिखी चिट्ठी में सुरक्षा बढ़ाने की मांग करने के साथ ही महंत राजू दास पर जान से मारने की नीयत से तलवार से हमला करने का आरोप लगाया है.
दूसरी ओर महंत राजू दास का कहना है कि हमला उन्होंने नहीं बल्कि स्वामी प्रसाद मौर्य ने उन पर किया और अभद्र भाषा का इस्तेमाल भी किया.
आख़िरकार महंत राजू दास हैं कौन और कैसे वो इस बहस का प्रमुख चेहरा बनते जा रहे हैं.
क्या राजू दास करते हैं हनुमान गढ़ी का नेतृत्व?
अयोध्या की प्रसिद्ध हनुमानगढ़ी के बारे में समझाते हुए वहाँ के वरिष्ठ पत्रकार कमलाकांत सुंदरम कहते हैं, "वह एक पंजीकृत पंचायती संस्था है. हनुमनागढ़ी अखिल भारतीय श्री पंच रामानंदीय निर्वाणी अखाड़े का मुख्यालय है, जो हिन्दू समाज के तीन प्रमुख वैष्णव अखाड़ों में से एक है."
कमलाकांत सुंदरम कहते हैं कि अयोध्या में इस अखाड़े की पंचायती व्यवस्था है, जहाँ कम से कम 500 साधु हैं और हनुमानगढ़ी की चार पट्टियों के अंतर्गत नागा साधु रहते हैं.
हनुमानगढ़ी के जो महंत हैं, उन्हें गद्दीनशीं महंत कहा जाता है और वो इस समय प्रेमदास जी हैं.
कमलाकांत सुंदरम बताते हैं, "व्यवस्था के अंतर्गत चार पट्टियों में से एक बसंतिया पट्टी है, जिसके महंत संत राम दास हैं और वो ही राजू दास के गुरु हैं. तो इसी प्रकार हनुमान गढ़ी की पंचायती व्यवस्था है."
कमलाकांत सुंदरम कहते हैं कि, "राजू दास एक पट्टी के साधु हैं."
अयोध्या के एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार बीएन दास कहते हैं, "राजू दास हनुमान गढ़ी मंदिर के महंत नहीं पुजारी हैं. महंत तो गद्दी पर बैठते हैं. यह पद काफ़ी बड़ा होता है. महंत ज़्यादातर कोई बयान नहीं देते. वह कोई विवादास्पद बात नहीं करते."
इस बारे में पत्रकार कमलाकांत सुंदरम कहते हैं, "कोई साधु जहाँ कहीं भी रहता है, उसके साथ एक मंदिर का हिस्सा उनके अधिकार क्षेत्र में रहता है. तो लोग महंत लिखने लगे. लेकिन यह अपभ्रंश हो गया कि हनुमान गढ़ी के महंत हैं."
राजनीतिक महत्वाकांक्षाएँ?
40 वर्षीय राजू दास की राजनीतिक पृष्ठभूमि के बारे में अयोध्या के पत्रकार कमलाकांत सुंदरम कहते हैं कि वो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से भी जुड़े रहे हैं.
वे पिछले कुछ चुनावों में भाजपा से टिकट भी मांगने लगे हैं. लोकसभा और विधानसभा के चुनावों में राजू दास अपनी दावेदारी कर रहे थे.
मीडिया में उनकी छवि और व्यक्तित्व के बारे में बीएन दस बताते हैं कि अयोध्या में राजू दास और परमहंस दास ऐसे दो साधु हैं, जो मीडिया में बने रहने के लिए विवादित बयान देते रहते हैं.
क्या राजू दास को भाजपा अयोध्या से चुनाव लड़वा सकती है?
इस बारे में बीएन दस कहते हैं, "पिछले चुनाव में राजू दास ने विधानसभा टिकट की दावेदारी की भी कोशिश की थी. लेकिन ऐसा हो नहीं पाया. पॉलिटिकल मंच पर और गाँव-गाँव में उनकी (राजू दास) उतनी पैठ नहीं दिखती है. अयोध्या में हो सकता है हनुमान गढ़ी और उसके आस पास के लोग जो उनके विचारों से सहमत होते हैं, उनमें उनकी पैठ हो."
अयोध्या के संत महंत धार्मिक कार्यक्रमों में और ज़रूरत पड़ने पर धर्म से जुड़े मुद्दों पर अक्सर अपनी राय देते हैं.
धार्मिक मुद्दों पर बयानबाज़ी के बारे में पत्रकार बीएन दास का कहना है, "हनुमानगढ़ी का महंत तो गद्दीनशीं होता है और वो ज़्यादातर कोई बयान नहीं देते हैं. इस तरह की बात वो नहीं करते हैं. और मेरे ख़्याल से उनका कोई इस तरह से बयान भी नहीं आता है."
बीएन दास आगे बताते हैं कि अयोध्या में जो प्रतिष्ठित धर्माचार्य हैं उन्होंने स्वामी प्रसाद मौर्य के बयानों की मौखिक तौर पर निंदा की है.
उनके मुताबिक़ रामचरितमानस एक आस्था का ग्रंथ है और लोग को उन चौपाइयों का असली मकसद समझना चाहिए.
धर्माचार्यों के मुताबिक़ लोगों को चौपाइयों को किसने कहा है, कब कहा है, और किसके संदर्भ में हैं, यह समझना चाहिए. वो स्वामी प्रसाद मौर्य की टिप्पणी को निंदनीय कहते हैं, लेकिन कोई आंदोलन या ऐसी कोई बात यहाँ पर नहीं है.
रामचरितमानस पर विवाद की ताज़ा कड़ी
बिहार के शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर ने पिछले दिनों रामचरित मानस को लेकर कहा था कि इससे समाज में नफ़रत फैल रही है.
चंद्रशेखर ने कहा था, "मनुस्मृति को जलाने का काम क्यों किया गया? मनुस्मृति में एक बड़े तबके के ख़िलाफ़ यानी 85 प्रतिशत लोगों के ख़िलाफ़ गालियां दी गई हैं. रामचरितमानस का क्यों प्रतिरोध हुआ? किस अंश का प्रतिरोध हुआ? अधम जाति मैं बिद्या पाए, भयउँ जथा अहि दूध पिआए. यानी नीच जाति के लोगों को शिक्षा हासिल करने का अधिकार नहीं था."
चंद्रशेखर ने कहा था, "इसमें कहा गया है कि नीच जाति के लोग शिक्षा ग्रहण करके ज़हरीले हो जाते हैं, जैसे कि साँप दूध पीने के बाद होता है. इसी को कोट करके बाबा साहेब आंबेडकर ने बताया था कि ये ग्रंथ नफ़रत को बोने वाले हैं. एक युग में मनुस्मृति, दूसरे युग में रामचरितमानस और तीसरे युग में गुरु गोलवलर की बंच ऑफ थॉट. ये हमारे देश और समाज को नफ़रत में बाँटती हैं."
इसी के बाद उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने रामचरित मानस को लेकर सवाल उठाए थे और इस संबंध में पीएम नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र भी लिखा था.
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