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जोशीमठ: जहां ज़मीन धंसती गई और बसेरा उजड़ता गया - ग्राउंड रिपोर्ट
- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, जोशीमठ
जोशीमठ में कड़ाके की ठंड पड़ रही है और इसी ठंड में यहां के लोग अपने पांच, छह, सात कमरों के घरों की सुविधा और आराम से महरूम किसी होटल, स्टे-होम के एक कमरे में गुज़ारा कर रहे हैं.
कभी-कभी की बूंदाबांदी ठंड को बढ़ा देती है. साथ ही ये डर भी कि कहीं इस शहर की दरारें इसे ज़मीन में और न धंसा दें.
एक तरफ़ जहां जोशीमठ के धंसने से इसके भविष्य पर प्रभाव को लेकर बहस चल रही है, तो दूसरी ओर जोशीमठ के लोगों को अपने बच्चों के भविष्य की फ़िक्र है.
पिछले कुछ वक्त से उत्तराखंड के लोग शिकायत कर रहे थे कि उनके घर ज़मीन में धंस रहे हैं, उनमें दरारें आ रही हैं.
जोशीमठ भारत के सबसे ज़्यादा भूकंप प्रभावित इलाके ज़ोन-5 में आता है. साल 2011 की जनगणना के मुताबिक़, यहां क़रीब 4,000 घरों में 17,000 लोग रहते थे, लेकिन वक्त के साथ इस शहर पर भी इंसानी बोझ बढ़ा है.
जब अक्टूबर में बीबीसी की टीम वहां पहुंची थी तो सड़कों, घरों में दरारों पर हमने रिपोर्ट की, लेकिन दो महीने बाद वही दरारें चौड़ी हो गई हैं और घरों में रहना ख़तरे से खाली नहीं रहा.
ऐसा क्या हुआ कि दरारें बढ़ीं, ये साफ़ नहीं. भूवैज्ञानिक मामले की जांच कर रहे हैं.
चमोली के ज़िला मजिस्ट्रेट हिमांशु खुराना ने बताया कि 169 परिवारों को विभिन्न होटलों में स्थानांतरित किया गया है. इन जगहों में स्थानांतरित किए जाने के बावजूद कई लोग घर में छूट गए महंगे सामान, मवेशियों को लेकर इतने फ़िक्रमंद हैं कि वो दिन में वापस घर जाते हैं और शाम या रात में होटलों और स्टे-होम में वापस आ जाते हैं.
इस आवाजाही से बच्चों की पढ़ाई बाधित हो रही है. उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि उनके जीवन में ये उथल-पुथल किस वजह से है.
कहां रुके हैं लोग?
नगर के मध्य में नगरपालिका के कमरे ऐसी ही जगह हैं जहां परिवारों को रखा गया है.
यहां ठहरे लोगों की सुविधाओं का ध्यान रखने के लिए ज़िम्मेदार अधिकारी रघुवीर सिंह के मुताबिक़, नगरपालिका के कमरों में 58 लोग रुके हैं.
ऐसे ही एक कमरे के बाहर कुर्सी पर 27 वर्षीय अंशु रावत अपनी छह महीने की बेटी ख़ुशी के साथ खेल रही थीं.
कुछ दिन पहले तक वो दो फ़्लोर के नौ कमरे और तीन किचन वाले मकान में रहती थीं. उसी मकान में आठ साल पहले वो शादी करके आई थीं, वहीं से उन्होंने बीए, एमए की पढ़ाई की. वहीं उनकी बेटी पैदा हुई.
आज वो इस नगरपालिका के एक कमरे वाले मकान में रहती हैं. कमरे के एक कोने में गैस, बर्तन और खाने का सामान रखा था. उसके सामने वाली दीवार पर ढेर सारे कपड़े लटके हुए थे. बीच में दो बिस्तर थे जिसमें वो, उनकी बेटी, सास-ससुर सोते हैं.
पति और देवर को ज़मीन पर सोना पड़ता है.
वो कहती हैं, "यहां रहना बहुत मुश्किल है. अपने यहां एक कमरा भी हो तो आप ऐडजस्ट कर लेते हैं. यहां बच्ची बार-बार बाहर जाने की कोशिश करती है. उसको उल्टी हो रही है, सर्दी-जुकाम खांसी भी है."
"अपने घर को छोड़ने का दर्द बताना नामुमकिन है. जब किसी इंसान के ऊपर से छत छिन जाती है तो उसका बहुत दुख होता है."
क्या हुआ था उस रात
बात दो जनवरी की रात के करीब साढ़े बारह से एक बजे के बीच की है जब उन्हें मकान धसकने की आवाज़ सुनाई दी. सही में उस रात क्या हुआ, ये साफ़ नहीं.
वो याद करती हैं, "ज़ोर-ज़ोर से ऐसे लगा कि मकान नीचे को धसक रहा है. सभी अगल-बगल वाले बाहर निकले. लोग अपने छोटे-छोटे बच्चों को लेकर भाग रहे थे."
अंशु के मुताबिक़, लोग कह रहे थे कि बगल का एक होटल टूट गया है, लेकिन बाद में पता चला कि होटल तो नहीं टूटा था, लेकिन उनके घर को बहुत नुक़सान पहुंचा था.
घर में दरारें थीं, बरामदा पूरा टूट गया था.
डर के मारे वो, उनकी बेटी ख़ुशी, सास-ससुर, देवर और पति के साथ घर के छत पर पहुंचीं.
वो कड़ाके सर्दी वाली रात उन्होंने छत पर गुज़ारी और दिन की रोशनी का इंतज़ार किया. बच्ची रात भर रोती रही.
वो याद करती हैं, "अंदर जाते तो डर था कि मकान टूट जाएगा. पूरी रात हम छत पर रहे. बच्ची ने एक जैकट पहन रखी थी. मैंने उसे वैसे ही जैकेट में पूरी रात रखा. हमने चप्पल पहन रखी थी. सिर पर टोपी भी नहीं थी."
लेकिन वो सड़क पर क्यों नहीं निकलीं और टूटे घर की छत पर क्यों रहने का सोचा? इस पर वो कहती हैं, "हम सड़क पर गए तो वहां थोड़ा डरावना जैसा था. तो मैंने सोचा कि बच्ची डर जाएगी. इसलिए हम वहीं छत पर खड़े रहे."
अगले दिन सुबह वो गाड़ी में सामान डालकर नगरपालिका के इस कमरे में पहुंचीं.
अंशु रावत चाहती हैं कि अगर उन्हें मकान की क़ीमत जो उनके मुताबिक 70-80 लाख होगी, वो मिल जाए तो उन्हें जहां पर भी जाना होगा वो चली जाएंगी.
चमोली के ज़िला मैजिस्ट्रेट हिमांशु खुराना के मुताबिक़, प्रशासन पुनर्वास और सहायता पैकेज पर काम कर रहा है और इसे लेकर जो समिति बनी है, उसके साथ बातचीत चल रही है.
वो कहते हैं, "हम इस पर जल्द ही सर्वसम्मति से नतीजे पर पहुंचेंगे क्योंकि लोग अलग-अलग चीज़ें चाहते हैं. कुछ मुआवज़ा चाहते हैं, कुछ पुनर्वास चाहते हैं, इसलिए हमें स्टेकहोल्डर्स (या साझेदारों) से बात करनी होगी, लेकिन हम प्रक्रिया में तेज़ी ला रहे हैं और कोशिश कर रहे हैं कि ये जल्द से जल्द पूरी हो."
लेकिन स्थानीय लोगों में पुनर्वास पैकेज को लेकर बेचैनी बढ़ रही है. उनका कहना है कि हालात इतने ख़राब हो रहे हैं कि प्रशासन को तुरंत उन्हें नुक़सान की भरपाई करनी चाहिए.
'नहीं जाएंगे घर वापस'
अंशु के बगल वाले कमरे में हेमलता रावत अपने बेटे के साथ रह रही हैं. उनकी बहू अपने दो बच्चों के साथ देहरादून जा चुकी हैं.
लेकिन जब आप 18 साल से 10 कमरों के मकान में रह रहे हों और अचानक आपको एक कमरे में भारी सामान के साथ शिफ़्ट कर दिया जाए तो ज़िंदगी आसान नहीं.
वो कहती हैं, "घर से बाहर निकल गए तो दिक़्क़त तो होनी ही है. दस कमरे से एक रूम में आ जाओ तो क्या करें? बच्चे पागल जैसे हो गए कि क्या हो रहा है."
वो अपने साथ दो बेड, दो अलमारी, टेबल, सोफ़ा, खाने के बर्तन आदि चीज़ें साथ ले आईं.
परिवार ने बड़ी मेहनत के साथ दो मंज़िला मकान को खड़ा किया था. घर बनाते वक्त जोशीमठ में घरों की दरारों के बारे में उन्होंने नहीं सोचा था.
वो कहती हैं, "जोशीमठ पूरा ही क्रैक है. जोशीमठ है ही ऐसा."
यहीं जोशीमठ में उनका जीवन बीता, यहीं उनके बच्चों ने पढ़ाई की और यहीं उनके पति ने जीवन भर की कमाई इस घर को बनाने में डाल दी.
वो याद करती हैं कि दो जनवरी की रात जब वो लेटी हुई थीं तो उन्हें बोलने की आवाज़ आई, लेकिन उनका उठने का मन नहीं किया. जब बेटे ने बाहर जा रहे एक व्यक्ति को फ़ोन किया तो उनसे कहा गया कि आवाज़ें आ रही हैं और वो भी बाहर निकलें और भी सतर्क रहें.
अगले दिन वो भी नगरपालिका के इस कमरे में आ गईं. वो चाहतीं हैं कि उन्हें सरकार उनके घर की कीमत दे दे ताकि वो कहीं और जाकर अपना घर बना लें.
वो कहती हैं, हम घर चाहे गांव में, चाहे कहीं भी बनाएंगे. हम सोच के बनाएंगे. हम ठीक से रहना चाहते हैं."
हेमलता कहती हैं उनका मकान इतनी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुआ कि वो उस घर में दोबारा नहीं जा सकती.
वो कहती हैं, "सालों पहले हमने जैसे-तैसे मकान बना लिया, अब हम वहां नहीं जाएंगे. घर की बुरी हालत है."
ठंड में रहना आसान नहीं
यहीं शरण लेने वाली मंदोदरी देवी अपनी बहू, बेटे और दो बच्चों के साथ यहीं के एक कमरे में रह रही हैं.
वो कमरे के सुविधाओं से ख़ुश नहीं. उनकी शिकायत है कि ठंड में उन्हें लकड़ी की नहीं हीटर की ज़रूरत है और उन्हें यहां पानी की समस्या है.
उनका 10 कमरे का मकान था जिसमें से सात कमरे किराए पर थे जबकि तीन कमरों में वो रह रहे थे.
वो बताती हैं, "अभी हमने मकान की मरम्मत करवाई थी. उसमें डेढ़ लाख की कांच और टाइल्स लगवाई थी."
सुविधाओं की कमी की शिकायतों पर चमोली के ज़िला मजिस्ट्रेट हिमांशु खुराना ने भरोसा दिलाया कि उनकी टीमें सभी शेल्टर की जगहों के संपर्क में हैं और किसी भी कमी की जानकारी पर वो तुरंत कार्रवाई कर रहे हैं.
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