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अरुणाचल के तवांग में झड़प: क्या हैं भारत के पास विकल्प
- Author, इक़बाल अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
नौ दिसंबर यानी बीते शुक्रवार को भारत के पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश के तवांग सेक्टर में चीन और भारत के सैनिकों के बीच हिंसक झड़पें हुई थीं. इसमें दोनों ओर के कुछ सैनिक घायल हुए थे.
12 दिसंबर को भारतीय मीडिया में इसकी ख़बर आ गई थी लेकिन इसकी आधिकारिक जानकारी तब मिली जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने चार दिनों बाद मंगलवार (13 दिसंबर) को संसद में इस पर बयान दिया.
विपक्ष की मांग है कि प्रधानमंत्री को इस मामले में बयान देना चाहिए और सदन में इस पर चर्चा होनी चाहिए. मांग पूरी नहीं होने पर पूरे विपक्ष ने सदन का बहिष्कार कर दिया.
मंगलवार को राजनाथ सिंह ने संसद में कहा था, "नौ दिसंबर 2022 को पीएलए सैनिकों ने तवांग सेक्टर के यांगत्से एरिया में लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल पर अतिक्रमण कर यथास्थिति को एकतरफ़ा बदलने का प्रयास किया. चीन के इस प्रयास का हमारी सेना ने दृढ़ता के साथ सामना किया है."
उन्होंने कहा, "इस फ़ेस-ऑफ़ (झड़प) में हाथापाई भी हुई है. भारतीय सेना ने पीएलए को उनकी पोस्ट पर वापस जाने के लिए मजबूर कर दिया."
राजनाथ सिंह ने कहा था, "इस झड़प में दोनों तरफ़ के सैनिकों को चोटें भी आई हैं. इस घटना में हमारे किसी भी सैनिक की न तो मृत्यु हुई है और न ही कोई गंभीर रूप से घायल हुआ है."
यह बात सच है कि इस ताज़ा झड़प में किसी भी सैनिक के मारे जाने की अब तक कोई ख़बर नहीं आई है लेकिन राजनाथ सिंह के बयान से विपक्ष और कुछ सैन्य विशेषज्ञ संतुष्ट नहीं हैं.
लोग सवाल कर रहे हैं कि आख़िर रक्षा मंत्री ने चार दिनों तक देश को इसकी जानकारी क्यों नहीं दी.
तवांग की घटना बेहद गंभीर: अजय शुक्ला
भारतीय सेना के पूर्व कर्नल और अब बिज़नेस स्टैंडर्ड अख़बार के सामरिक मामलों के संपादक अजय शुक्ला के अनुसार तवांग सेक्टर में हुई झड़प निश्चित तौर पर बहुत गंभीर है.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "यह घटना उतनी ही बड़ी है जितनी गलवान की घटना थी. फ़र्क़ यह है कि गलवान में 20 भारतीय सैनिकों की मौत हुई थी. यहां पर क़रीब 35 सैनिक घायल हुए हैं. उनमें से सात की हालत बहुत ही गंभीर है जिनका गोवाहाटी के सैनिक अस्पताल में इलाज करवाया जा रहा है."
अजय शुक्ला के अनुसार चीन पर नज़र रखने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ दिन पहले हुए चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के 20वें अधिवेशन (16-24 अक्टूबर) में राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इसकी योजना बनाई होगी.
हालांकि उनका कहना है कि इसका सिर्फ़ अंदाज़ा लगाया जा सकता है क्योंकि ज़मीनी हक़ीक़त के बारे में पता करने का कोई ज़रिया नहीं है.
स्थानीय फ़ैसला या शीर्ष नेतृत्व का फ़ैसला?
एक सवाल यह भी उठता है कि तवांग सेक्टर के पास एलएसी पर तैनात चीनी सैनिकों ने इसका फ़ैसला ख़ुद किया या इसका निर्देश चीन की सर्वोच्च सत्ता से आई होगी.
अजय शुक्ला कहते हैं, "यह सोचना कि चीनी सैनिकों ने ख़ुद यह फ़ैसला किया होगा बिल्कुल ग़लत है. शी जिनपिंग की इजाज़त के बग़ैर चीन में कुछ भी नहीं होता है."
चीन का इस बारे में कहना कुछ और है.
चीन की सेना के प्रवक्ता ने कहा है कि पीएलए का वेस्टर्न थिएटर कमांड वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर चीनी भूभाग में रूटीन पेट्रोलिंग कर रहा था, तभी भारतीय सैनिक चीन के हिस्से में आ गए और चीन के सैनिकों को रोकने की कोशिश की.
सिंगापुर के नेशनल यूनिवर्सिटी से जुड़े चीनी मामलों के जानकार और वरिष्ठ पत्रकार सुन शी का मानना है कि तवांग सेक्टर में हुई ताज़ा झड़प किसी योजना के तहत नहीं हुई है.
बीबीसी से बातचीत में सुन शी कहते हैं, "दोनों देशों के बीच सीमा निर्धारित नहीं है. भारत और चीन दोनों कई इलाक़ों को अपना कहते हैं. यही वजह है कि दोनों देशों के सैनिकों के बीच झड़प हो गई. लेकिन झड़प के बाद दोनों ओर के सैनिक फ़ौरन अपनी-अपनी जगहों पर वापस चले गए."
उनके अनुसार वहां तैनात सैनिकों को किसी बड़े सैन्य अधिकारी या शीर्ष नेतृत्व से कोई निर्देश नहीं दिए गए थे.
सुन शी कहते हैं कि हाल ही में बाली में हुए जी-20 सम्मेलन में शी जिनपिंग और नरेंद्र मोदी ने एकदूसरे से हाथ मिलाया था. इससे पहले उज़्बेकिस्तान के शहर समरक़ंद में इसी साल सितंबर में हुए शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन में मोदी और शी जिनपिंग की ना तो कोई मुलाक़ात हुई और ना ही दोनों ने एकदूसरे से हाथ तक मिलाया था.
सुन शी की बात को ख़ारिज कर दिया जाए और मान लिया जाए कि चीन की सर्वोच्च सत्ता के इशारे पर तवांग सेक्टर में चीनी सैनिक घुसपैठ करने की कोशिश कर रहे थे, तो फिर सवाल उठना लाज़िमी है कि चीन ने यह क्यों किया और इसके ज़रिए वो क्या हासिल करना चाहता है.
झड़प का उद्देश्य?
प्रोफ़ेसर पुष्प अधिकारी नेपाल की राजधानी काठमांडू स्थित त्रिभुवन यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हैं और भारत-चीन संबंधों के विशेषज्ञ हैं. उन्होंने दक्षिण एशिया में चीनी ख़तरा नाम (China Threat in South Asia) की एक किताब भी लिखी है.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा कि मौजूदा झड़प के दो कारण हो सकते हैं. उन्होंने कहा कि अमेरिका का एक प्रतिनिधिमंडल चीन जाने वाला है और चीन इससे ध्यान भटकाना चाहता है.
उनके अनुसार पिछले कुछ वर्षों में भारत और अमेरिका की बढ़ती निकटता दूसरा कारण हो सकता है.
लेकिन वो इसके अलावा एक और कारण बताते हैं. उनके अनुसार कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 को ख़त्म किया जाना भी एक कारण हो सकता है.
उन्होंने कहा कि 2019 में भारत सरकार ने जो यह फ़ैसला किया था उससे चीन बहुत ग़ुस्से में है. उनका कहना है कि तवांग सेक्टर में हुई झड़प को अलग करके देखने के बजाए उसको एक पूरे पैकेज की तरह देखा जाना चाहिए.
उनके अनुसार गलवान की घटना में फ़ायदा चीन को हुआ है और चीन इसी तरह का सामरिक फ़ायदा अरुणाचल में उठाना चाहता है.
तवांग सेक्टर में हुई इस ताज़ा झड़प के ज़रिए चीन भारत या अंतरराष्ट्रीय जगत को क्या संदेश देना चाहता है, इसके जवाब में अजय शुक्ला कहते हैं कि चीन शायद यह दिखाना चाहता है कि उसके सामने भारत कुछ नहीं है और चीन के पास इतनी सैन्य शक्ति है कि वो जब चाहे भारत को इस तरह का सबक़ सिखा सकता है.
हालांकि अजय शुक्ला यह भी कहना नहीं भूलते कि चीन ने अभी तक अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं की है और गलवान की घटना के बाद चीन ने कहा था कि भारत अपनी सीमा के पास इंफ़्रास्ट्रक्चर को मज़बूत कर रहा है और चीन को यह पसंद नहीं है.
घरेलू स्थिति से ध्यान भटकाने की कोशिश?
कुछ विशेषज्ञ यह भी कह रहे हैं कि शी जिनपिंग को कोविड नीति के कारण चीन के अंदर बहुत विरोध का सामना करना पड़ रहा है और अंदरूनी परेशानियों से ध्यान भटकाने के लिए चीनी सैनिकों ने भारत के साथ सीमा पर झड़प करने की कोशिश की.
लेकिन अजय शुक्ला का कहना है कि यह सिर्फ़ जानकारों का अनुमान हो सकता है क्योंकि चीन अपनी किसी भी कार्रवाई के पीछे अपने उद्देश्य के बारे में किसी को आधिकारिक तौर पर बताता नहीं है.
ऐसे में अगला सवाल यह उठता है कि भारत के पास इससे निपटने के क्या विकल्प हैं?
भारत के पास विकल्प
अजय शुक्ला कहते हैं कि भारत के पास बहुत विकल्प हैं लेकिन भारत उनका इस्तेमाल नहीं करना चाहता है.
वो कहते हैं कि भारत के पास राजनीतिक विकल्प ज़रूर कम हैं लेकिन सैन्य विकल्प चीन की तुलना में ज़्यादा कमज़ोर नहीं है.
उनके अनुसार गलवान की घटना के समय सत्तारूढ़ बीजेपी और प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस दोनों एकदूसरे पर आरोप लगा रहे थे.
उनके अनुसार चीन के ख़िलाफ़ कठोर क़दम उठाने के लिए भारत में राजनीतिक सहमति का अभाव है.
चीन से निपटने में भारत में राजनीतिक सहमति का अभाव ज़रूर हो सकता है लेकिन यह भी सच्चाई है कि दोनों देशों की सैन्य क्षमता में भी काफ़ी फ़र्क़ है.
भारत-चीन की सैन्य क्षमता
1962 में भारत और चीन की सैन्य शक्ति के बीच ज़्यादा फ़र्क़ नहीं था. उनकी सैन्य क्षमता लगभग बराबर थी. भारत को आज़ाद हुए 15 साल हुए थे और चीन की स्थापना भी 1949 में ही हुई.
भारत के पास ब्रिटिश उपकरण और हथियार थे और चीन के पास रूसी. इस मामले में दोनों देशों की सैन्य ताकत में ज़्यादा फ़ासला नहीं था. लेकिन आज इनके बीच बहुत फ़र्क़ आ गया है.
सैनिकों की संख्या, हथियारों या टैंकों वग़ैरह की बात हो या रक्षा बजट की, चीन हर मामले में भारत से आगे है. सबसे अहम बात यह है कि लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल पर तिब्बत क्षेत्र में चीन के पास जो मूलभूत सुविधाएं हैं, वे भारत के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा हैं.
भारत इस मामले में अभी काफ़ी पीछे है. भारत वाले हिस्से में इंफ़्रास्ट्रक्चर अभी विकसित ही हो रहा है. इस लिहाज़ से देखा जाए तो भारत और चीन के बीच 10 से 15 साल का फ़र्क़ है.
दरअसल भारत उप-महाद्विपीय शक्ति है जबकि चीन पिछले 10-15 सालों में ग्लोबल और अंतरमहाद्विपीय शक्ति बनकर उभर रहा है. दोनों में यह बुनियादी फ़र्क़ ही भारत को प्रतिकूल परिस्थितियों में डालता है.
चीन की सैन्य प्रतिबद्धता भारत से ज़्यादा
अजय शुक्ला भी इस बात को मानते हैं कि भारत की तुलना में चीन की सैन्य शक्ति कहीं ज़्यादा है लेकिन उनके अनुसार यह भी एक सच्चाई है कि चीन की सैन्य प्रतिबद्धता (ताइवान, हॉन्ग कॉन्ग, साउथ चाइना सी वग़ैरह) भी बहुत ज़्यादा हैं.
वो कहते हैं कि इस लिहाज़ से देखा जाए तो चीन के लिए भारत पर सैन्य कार्रवाई करना इतना आसान नहीं होगा और भारत की स्थिति उतनी ख़राब नहीं है.
जनरल पीआर शंकर (रिटायर्ड) ने अंग्रेज़ी के अख़बार इंडियन एक्सप्रेस में एक लेख लिखा है जिसमें वो कहते हैं कि नए सीडीएस की बहाली हो जाने के बाद भी सेना के इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड और सेना के नवीनीकरण के क्षेत्र में कोई ख़ास प्रगति नहीं हो सकी है. उनका कहना है कि यह समय की सबसे अहम ज़रूरत है.
लेकिन अजय शुक्ला कहते हैं कि भारत को शिक्षा और स्वास्थ के क्षेत्र में बहुत ज़्यादा ख़र्च करना पड़ता है और इसीलिए वो अपने सैन्य ख़र्चे को ज़्यादा बढ़ा नहीं पाता है.
जनरल शंकर ने अपने लेख में यह भी कहा है कि भारत के सामने इस समय चीन ज़्यादा बड़ा ख़तरा है और सरकार को चाहिए कि वह पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर को लेकर राजनीतिक बयानबाज़ी करने के बजाए चीन की तरफ़ से आने वाले ख़तरे को गंभीरता से ले.
चीन ज़्यादा बड़ा ख़तरा है या पाकिस्तान
लेकिन अजय शुक्ला इससे सहमत नहीं दिखते हैं. उनके अनुसार भारत को टू-फ़्रंट (चीन और पाकिस्तान) का सामना करना पड़ता है और अगर इसमें भारत प्रशासित कश्मीर में जारी चरमपंथ को जोड़ दिया जाए तो भारत को एक ही समय में ढाई-फ़्रंट का सामना करना पड़ता है.
अजय शुक्ला कहते हैं, "भारत के सामने पाकिस्तान और चीन की तरफ़ से जो चुनौती है वो केवल काल्पनिक नहीं है, क्योंकि चीन पाकिस्तान को हर मामले में सैन्य और आर्थिक मदद करता है. इसके जवाब में पाकिस्तान चीन को अपने नौसैनिक अड्डे, पोर्ट, और अरब सागर तक रास्ता देता है. इसलिए भारत को हमेशा इन दोनों फ़्रंट पर लड़ने की चिंता बनी रहती है."
बातचीत ही एकमात्र रास्ता
लेकिन प्रोफ़ेसर पुष्प अधिकारी और सुन शी समेत कई विश्लेषकों का मानना है कि बातचीत ही एकमात्र रास्ता है.
प्रोफ़ेसर अधिकारी के अनुसार भारत और चीन के बीच सीमा विवाद का कोई सैन्य समाधान संभव नहीं है.
भारत के दोस्तों पर आरोप लगाते हुए प्रोफ़ेसर अधिकारी कहते हैं, "भारत को सबसे पहले राजनयिक तौर पर ख़ुद को मज़बूत करना चाहिए, उसके बाद सैन्य शक्ति बढ़ाने के बारे में सोचना चाहिए. अभी जो भी देश भारत के साथ दिखाई देते हैं वो सब भारत को उकसाने वाले हैं. क्वाड के सदस्य देश भी भारत की मदद करना चाहेंगे लेकिन वो मदद कूटनीतिक हल तलाशने में होनी चाहिए, सैन्य हल तलाशने में नहीं."
सुन शी कहते हैं, "भारत जी-20 की अध्यक्षता कर रहा है और अगले साल भारत में होने वाले सम्मेलन में शी जिनपिंग और नरेंद्र मोदी आमने-सामने हो सकते हैं, ऐसे में दोनों नेता नहीं चाहेंगे कि सीमा पर कोई झड़प हो. दोनों ही देशों का शीर्ष नेतृत्व मामले को सुलझाना चाहता है. राजनयिक भी शांति बनाए रखना चाहते हैं. इसलिए सैन्य नेतृत्व को भी चाहिए कि मामले को तूल ना पकड़ने दें."
भारत के पूर्व विदेश सचिव और फ़िलहाल कार्नेजी फ़ाउंडेशन में नॉन रेज़िडेंट सीनियर फ़ेलो विजय गोखले ने 13 दिसंबर को एक लेख लिखा है जिसमें वो कहते हैं कि दोनों देशों के बीच नवंबर 2019 से स्थगित बातचीत का दोबारा शुरू किया जाना बेहद ज़रूरी है.
उनके अनुसार एक समस्या तो यह है कि चीन भारत को कभी भी अपने बराबर की शक्ति नहीं मानता है जिसका वैश्विक प्रभाव हो.
वो कहते हैं, "भारत को फ़िलहाल यह स्वीकार करना होगा कि उसकी शक्ति अभी इतनी नहीं है कि चीन को इस बात के लिए तैयार किया जा सके कि वो भारत को अपने बराबर का समझे. लेकिन चीन को भी यह समझना होगा कि एशिया-पैसिफ़िक क्षेत्र में अमेरिका और उसके सहयोगी सबसे ताक़तवर समूह है, चीन दूसरी शक्ति है लेकिन भारत भी तीसरी शक्ति है."
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