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दिल्ली एमसीडी चुनाव: आम आदमी पार्टी की जीत के मायने क्या हैं?
- Author, अभिनव गोयल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
हजारों करोड़ रुपये बजट वाली दिल्ली एमसीडी में आम आदमी पार्टी ने अपना झंडा लहरा दिया है. 15 साल से सत्ता पर काबिज बीजेपी को अरविंद केजरीवाल ने बाहर का रास्ता दिखा दिया है.
दिल्ली एमसीडी में 'आप' की यह जीत पार्टी के लिए कई संभावनाओं, उम्मीदों के रास्ते खोल रही है तो वहीं चुनौतियों को भी आमंत्रण दे रही है, लेकिन ये चुनौतियां क्या हैं और इस जीत के अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी के लिए क्या मायने हैं?
क्या अरविंद केजरीवाल को अब दिल्ली की सत्ता से हटाना मुश्किल हो गया है? क्या वे साल 2024 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी को टक्कर दे सकते हैं?
क्या वे विपक्ष को एकजुट कर सकते हैं? क्या संघर्ष, टकराव और स्थानीय मुद्दों से चुनाव जीते जा सकते हैं? इन सब सवालों के साथ बीजेपी के लिए ये हार कितनी बड़ी है इस पर भी बात करेंगे.
सबसे पहले एमसीडी चुनाव में बात नतीजों की.
दिल्ली एमसीडी के एकीकरण के बाद पहली बार चुनाव हुए. इससे पहले ये तीन हिस्से - नॉर्थ दिल्ली म्युनिसिपल कॉरपोरेशन, साउथ दिल्ली म्युनिसिपल कॉरपोरेशन और ईस्ट दिल्ली म्युनिसिपल कॉरपोरेशन में बंटे हुई थी.
इस साल मार्च महीने में केंद्रीय कैबिनेट ने दिल्ली एमसीडी के एकीकरण पर मुहर लगाई थी.
एकीकरण के बाद वार्डों की संख्या 272 से घटकर 250 कर दी गई. इसमें आम आदमी पार्टी को 134, बीजेपी को 104, कांग्रेस को 9 सीट मिली हैं.
अरविंद केजरीवाल की जीत के पांच फैक्टर
2017 के दिल्ली एमसीडी चुनाव में आम आदमी पार्टी को महज 48 सीट मिली थीं. एमसीडी चुनावों में आप पार्टी ने स्थानीय मुद्दों को चुनाव में भुनाने की कोशिश की और इसके लिए गंदगी को सबसे बड़ा मुद्दा बनाया.
बीबीसी से बातचीत में वरिष्ठ पत्रकार हेमंत कहते हैं, "चुनाव में बीजेपी ने स्थानीय मुद्दों पर बात नहीं की, जिससे उसे नुकसान हुआ. इसके बदले बीजेपी ने चुनाव में सत्येंद्र जैन को जेल के अंदर सेवाएं देने का मुद्दा बनाया, शराब घोटाले का आरोप लगाया, मनीष सिसोदिया का नाम उछाला."
"दिल्ली एमसीडी में 15 साल से बीजेपी थी, उन्होंने अपनी उपलब्धियों को नहीं बताया, उसे मुद्दा नहीं बनाया, क्योंकि उनका काम अच्छा नहीं रहा, इसका फायदा आप पार्टी को मिला."
यही बात सीनियर टीवी पत्रकार कृष्ण मोहन शर्मा भी कहते हैं. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "दिल्ली में गंदगी को आम आदमी पार्टी ने एक बड़ा मुद्दा बनाया. वे कहते हैं, "लोगों ने गंदगी को लेकर बीजेपी के खिलाफ तो वोट नहीं किया लेकिन उनके पक्ष में भी वोट नहीं करने गए, जिसका नुकसान बीजेपी को हुआ."
दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार है. वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री के मुताबिक इस बार लोगों ने इसे भी ध्यान में रखा है.
वे कहते हैं, "आम आदमी समझता है कि केजरीवाल को अगर सरकार सौंप दी है तो एमसीडी भी एक बार सौंप कर देखी जाए, ताकि स्थानीय मुद्दे जल्दी से सुलझ पाएं."
लोगों से कनेक्ट भी अरविंद केजरीवाल के लिए जीत की वजह बना है. कृष्ण मोहन शर्मा कहते हैं, "बीजेपी के सांसद प्रवेश वर्मा, रमेश बिधूड़ी, हंसराज हंस और मीनाक्षी लेखी के लोकसभा क्षेत्रों में बीजेपी को नुकसान हुआ है वहीं इन जगहों पर आप पार्टी के नेताओं और विधायकों का लोगों से कनेक्ट अच्छा है जिसकी वजह से उन्हें अच्छी बढ़त हासिल हुई."
कृष्ण मोहन शर्मा, दिल्ली एमसीडी में बीजेपी के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी और भ्रष्टाचार को भी एक बड़ी वजह मानते हैं.
'आप' की जीत के मायने क्या हैं?
दिल्ली में तीन पावर सेंटर है. एमसीडी, दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार.
वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री कहते हैं, "2017 एमसीडी चुनाव में बीजेपी को 39 प्रतिशत वोट मिले थे, पांच साल बाद भी उसमें कमी नहीं आई है, लेकिन सीटें जरूर कम हुई हैं. वहीं कांग्रेस का वोट शेयर करीब 21 प्रतिशत से घटकर करीब 11 प्रतिशत पर आ गया है, कांग्रेस का ये घटाव आम आदमी पार्टी में जाकर जुड़ा है."
दिल्ली एमसीडी में जीत ने एक बड़ा संदेश देने का काम भी किया है. हेमंत अत्री कहते हैं कि आप पार्टी ने ये करके दिखाया है कि बीजेपी को हराया जा सकता है. अगर आप शिद्दत से चुनाव लड़े तो बीजेपी को हरा सकते हैं, लेकिन उसके लिए संगठित होकर एजेंडा पर बात करनी होगी.
हेमंत अत्री कहते हैं, "केजरीवाल प्रधानमंत्री के दावेदार हो गए इस बात के कोई मायने नहीं हैं. 'आप' का लोकसभा में एक भी एमपी नहीं है. 'आप' की कैसे सरकार आ जाएगी. जहां कांग्रेस को हराने में बीजेपी सक्षम नहीं है, वहां आम आदमी पार्टी कांग्रेस को खत्म करने के लिए जाती है. लोग अति उत्साह में ऐसा कह रहे हैं, लेकिन इसका कुछ मतलब नहीं है."
ऐसी ही बात वरिष्ठ पत्रकार संदीप कहते हैं. उनका मानना है कि एमसीडी चुनाव और लोकसभा के चुनाव में जमीन आसमान का फर्क होता है. एमसीडी चुनाव गली-खड़ंजे पर लड़े जाते हैं वहीं लोकसभा चुनाव में केंद्र की सरकार और मोदी जी के प्रदर्शन को देखा जाएगा, ऐसी तुलना करना भी ठीक नहीं है."
क्या बीजेपी बना सकती है अपना मेयर
दिल्ली एमसीडी चुनाव में पूर्ण बहुमत हासिल करने के बाद भी मेयर आम आदमी पार्टी को होगा इसे लेकर अभी संशय बना हुआ है.
वरिष्ठ टीवी पत्रकार कृष्ण मोहन शर्मा के मुताबिक, "एमसीडी का मेयर वोटिंग से चुना जाएगा, इसमें 250 चुने हुए पार्षद के अलावा दिल्ली के तीन राज्यसभा और सात लोकसभा सांसद भी वोट करेंगे. इसके बाद दिल्ली के उपराज्यपाल 12 सदस्यों को नॉमिनेट करते हैं जो मेयर चुनने के लिए अपने वोट का इस्तेमाल करते हैं."
दिल्ली एमसीडी चुनाव में चुने हुए पार्षद पार्टी के मेंबर नहीं होते हैं. कृष्ण मोहन के मुताबिक, "कोई भी पार्षद किसी भी पार्टी को सपोर्ट कर सकता है, उन पर दल बदल कानून लागू नहीं होता है. ऐसा पहले भी हुआ है कि एमसीडी में बहुमत किसी पार्टी को मिला हो और मेयर किसी दूसरी पार्टी ने बनाया हो."
बीजेपी के इन नेताओं पर खतरा
दिल्ली में सभी सात लोकसभा सीटों पर बीजेपी का कब्जा है, लेकिन कुछ सीटों पर एमसीडी चुनाव में बीजेपी का प्रदर्शन काफी खराब रहा है. इनमें प्रवेश वर्मा, रमेश बिधूड़ी, हंसराज हंस और मीनाक्षी लेखी का नाम शामिल है.
वरिष्ठ पत्रकार कृष्ण मोहन शर्मा बताते हैं, "नई दिल्ली से मीनाक्षी लेखी के क्षेत्र में 25 सीटें आती हैं, जिसमें से बीजेपी को सिर्फ 5 सीटें मिली हैं, वहीं आम आदमी पार्टी ने यहां से 20 सीटों पर जीत दर्ज की है."
वेस्ट दिल्ली से प्रवेश वर्मा की सीट का भी यही हाल रहा. यहां 38 वार्ड में से 24 पर आम आदमी पार्टी को जीत मिली वहीं बीजेपी के खाते में सिर्फ 13 सीटें आईं.
इसके अलावा दक्षिणी दिल्ली से रमेश बिधूड़ी के इलाके में 37 में से बीजेपी को 13 और आप को 23 सीटें मिली हैं.
उत्तर पश्चिमी दिल्ली से बीजेपी सांसद हंसराज हंस की सीट पर एमसीडी के 43 वार्ड हैं, जिसमें बीजेपी को 14 सीट और आप को 27 सीट मिली हैं.
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