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भारत के जीडीपी में 6.3% की बढ़ोतरी, क्या है राहत और क्या हैं डर
- Author, आलोक जोशी
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
ख़बर ख़राब आएगी इसका तो अंदेशा था, लेकिन कितनी ख़राब आएगी यह देखने का इंतज़ार चल रहा था. जुलाई से सितंबर के बीच भारत की जीडीपी में 6.3% की बढ़त दर्ज हुई है.
यह पिछली तिमाही के मुक़ाबले आधे से भी कम है. उस तिमाही में भारत की अर्थव्यवस्था में 13.5% की धमाकेदार तेज़ी आई थी.
लेकिन ध्यान रखना चाहिए कि तब ग्रोथ का जो आंकड़ा आया था वो एक बेहद बुरी परिस्थिति से संभलने की कहानी कह रहा था यानी कोरोना के बाद इकोनॉमी जिस गहरे गड्ढे में थी, वहां से निकलने की कोशिश भी काफ़ी ऊंची छलांग दिख रही थी.
अर्थशास्त्रियों और रिजर्व बैंक को भी यही उम्मीद थी कि आंकड़ा क़रीब-क़रीब आधा तो होने वाला है. कुछ ही समय पहले रिज़र्व बैंक ने अनुमान दिया था कि इस तिमाही में अर्थव्यवस्था 6.1 से 6.3% की बढ़त दर्ज करवाएगी. बुधवार को आया आंकड़ा रिज़र्व बैंक के अनुमान के दायरे में एकदम ऊपर के छोर पर है.
इससे कम से कम इतना तो संतोष होता है कि रिज़र्व बैंक को अर्थव्यवस्था की नब्ज़ का अंदाज़ा है. जबकि अर्थशास्त्रियों के बीच हुए सर्वेक्षण के मुताबिक़ यह आंकड़ा 5.8% से लेकर 6.5% तक रहने का अनुमान था. यानी अब कहा जा सकता है कि रिज़र्व बैंक को हालात का बेहतर अनुमान है.
ग्रॉस वैल्यू ऐडेड का आंकड़ा अहम
लेकिन, दूसरी तरफ़ आजकल अर्थव्यवस्था के लिए ज़्यादा कारगर माना जानेवाला आंकड़ा जीवीए या ग्रॉस वैल्यू ऐडेड कुछ चिंताजनक दिख रहा है. यहां इस बार लगभग 6.3% बढ़त का अनुमान था, लेकिन आंकड़ा आया है 5.6%.
इसका मतलब हुआ कि लागत पर मुनाफ़ा कमाने या जितने का माल खरीदा उसका दाम बढ़ाकर बेचने के मामले में कमज़ोरी दिख रही है. जीवीए या मूल्य संवर्धन को समझना आसान है.
आपने बाज़ार से सूत खरीदा, उसका कपड़ा बुना, कपड़े से कमीज़ बनाई और फिर किसी तय भाव पर बेच दी. जितने का सूत खरीदा, उसका कपड़ा और फिर कमीज़ बनाने में जो सामान लगा उस सबकी लागत, कारीगरों का मेहनताना और मशीन का ख़र्च, बिजली का बिल, किराया वगैरह सब जोड़कर भी जो लागत आएगी बिक्री उससे जितनी ज़्यादा कीमत पर होगी, यह फ़र्क ही मूल्य वर्धन या वैल्यू एडिशन है.
पूरी अर्थव्यवस्था मिलकर अलग-अलग जगह जितना वैल्यू एडिशन कर रही है उसे ही जीवीए या ग्रॉस वैल्यू एडिशन कहा जाता है.
जीवीए में बढ़त का जो आंकड़ा आया है उसमें भी सबसे बड़ी हिस्सेदारी व्यापार, होटल, ट्रांसपोर्ट, संचार और ब्रॉडकास्टिंग से जुड़ी सेवाओं की है जिनमें 14.7% का ज़ोरदार उछाल आया है.
यहां कारोबार अब महामारी से पहले के हाल में ही नहीं बल्कि उससे कुछ बेहतर स्तर पर पहुंच गया है. कुल मिलाकर देखें तो सेवा क्षेत्र में ही सबसे तेज़ बढ़त है जिसका असर इस बात से समझा जा सकता है कि जीवीए में जो 5.6% की बढ़त है उसमें से 5.3% सिर्फ़ सेवा क्षेत्र यानी सर्विस सेक्टर से ही आया है.
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मैन्युफ़ैक्चरिंग में चिंता
लेकिन इसके सामने मैन्युफ़ैक्चरिंग में साफ़ चिंता दिख रही है. वहां ग्रोथ में अचानक तेज़ गिरावट आई है जिसकी वजह महंगाई को माना जा रहा है.
महंगाई एक दुधारी तलवार की तरह होती है. एक तरफ़ इसकी वजह से लोग सामान कम खरीदते हैं जिससे फ़ैक्ट्रियों का माल बिकता कम है और दूसरी तरफ़ कच्चा माल महंगा होता है जिससे मुनाफे़ की गुंजाइश कम होने लगती है.
दोनों को एक साथ रखें तो कंपनी या कारोबारी के मार्जिन पर दबाव आता है यानी फ़ायदा कम होने लगता है.
सरकारी आंकड़ों के हिसाब से खेती, मछली पालन और फ़ॉरेस्ट्री में लगातार तीसरी तिमाही में चार परसेंट से ज्यादा की जीवीए ग्रोथ देखी जा रही है, इससे थोड़ी उम्मीद बंधती है.
लेकिन जानकारों को यह आंकड़ा कुछ ज़्यादा ही ख़ुशफ़हमी जैसा दिख रहा है ख़ासकर ख़रीफ़ की बुवाई का शुरुआती हाल और मॉनसून के बाद भी देश के अनेक हिस्सों में बेमौसम बरसात की वजह से जो नुक़सान हुआ उसे देखकर.
चिंता का एक कारण यह भी है कि जीडीपी में जितनी बढ़ोतरी दिख रही है उसकी सबसे बड़ी वजह प्राइवेट कंज़ंप्शन यानी गैर सरकारी ख़र्च या आम आदमी की जेब से होने वाला ख़र्च और उसकी ख़रीदारी में बढ़त ही है.
जानकारों की राय है कि इसमें भी सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह ख़र्च भी ऐसी चीज़ों या सेवाओं पर बढ़ता ही दिख रहा है जो ज़्यादातर अमीर घरों में इस्तेमाल होती हैं.
इसका मतलब यह है कि समाज के सभी हिस्से इस ख़र्च और ख़रीदारी में शामिल नहीं हैं. मगर इससे भी बड़ी फ़िक्र इस बात से है कि इन्फ्रास्ट्रक्चर पर सरकार का ख़र्च क़रीब-क़रीब जस का तस है और उसके अलावा जो ख़र्च सरकार करती है जिसे जीएफ़सीई या गवर्नमेंट फ़ाइनल कंज़ंप्शन एक्सपेंडिचर कहा जाता है उसमें गिरावट आई है. जहां यह पिछली तिमाही में जीडीपी का 11.3% था, वहीं इस बार यह 9.2% पर सिमट गया है.
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सरकार का ख़र्च
आगे अर्थव्यवस्था में सुधार कितना और कैसे होगा उसमें इस बात की बड़ी भूमिका होगी कि सरकार अपना यह खर्च कैसे बढ़ाती है. हालांकि, इस बार भी राहत की खबर यह है कि राज्य सरकारों के खर्च में अच्छी बढ़त दिखी है, लेकिन केंद्र इस मामले में पीछे नहीं रह सकता.
दूसरी ज़रूरी बात यह है कि प्राइवेट कंज़ंप्शन या ख़ासकर घर परिवार की ख़रीदारी के आंकड़ों में उन चीज़ों की हिस्सेदारी कैसे बढ़ेगी जो सिर्फ़ अमीर नहीं बल्कि मध्य और निम्न वर्ग के लोग भी ख़रीदते हैं.
कुल मिलाकर यह आंकड़ा संतोषजनक माना जा सकता है क्योंकि इसमें कोई बुरी ख़बर नहीं है. जो डर था क़रीब-क़रीब वही दिख रहा है और अब इस बात की उम्मीद बढ़ जाती है कि रिज़र्व बैंक और सरकार दोनों ही यहां से कड़ाई बरतने के बजाय कुछ नर्मी का रुख़ अपना सकते हैं और कारोबार को कुछ सहारा या आम आदमी को कुछ राहत देने की भी सोच सकते हैं.
लेकिन घरेलू बाज़ार में मांग बढ़ने पर बहुत कुछ निर्भर करेगा और यह डर अभी बना हुआ है कि विदेशी बाज़ारों से कोई ऐसी ख़बर न आ जाए जो सारा गणित बिगाड़ कर रख दे.
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