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शी जिनपिंग तीसरी बार बने चीन के नेता, लेकिन मोदी ने बधाई क्यों नहीं दी?
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
प्रमुख बातें -
- शी जिनपिंग तीसरी बार चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव चुने गए हैं.
- शी जिनपिंग और भी शक्तिशाली होकर उभरे हैं, चीन में उन्हें चुनौती देने वाला कोई नहीं.
- भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिनपिंग को बधाई नहीं दी है. जिनपिंग जब दूसरी बार राष्ट्रपति बने थे तब मोदी ने बधाई दी थी.
- मई 2020 में गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच झड़प हुई, तब से ही रिश्तों में तनाव है.
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने पिछले महीने उज़्बेकिस्तान के ऐतिहासिक शहर समरक़ंद में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की शिखर बैठक में एक ही छत के नीचे अन्य नेताओं के साथ एक ग्रुप फोटो खिंचवाई थी.
वे एक दूसरे से चंद फ़ीट के फ़ासले पर खड़े थे लेकिन उनके बीच दूरी लंबी थी. इतने क़रीब आने के बावजूद उन्होंने न तो हाथ मिलाया और न ही एक-दूसरे की उपस्थिति का ऐसा नोटिस लिया जो सार्वजनिक तौर पर ज़ाहिर होता.
सिंगापुर स्थित चीनी मूल के पत्रकार सन शी का मानना है कि दोनों नेताओं के बीच समस्या यह है कि पहल कौन करेगा, या कहें कि किसकी आंखें पहले झपकेगी.
बीबीसी हिंदी से बात-चीत में वो कहते हैं, "2020 में गलवान घाटी में सीमा संघर्ष से पहले के समय वाली अपनी दोस्ती को फिर से शुरू करने के लिए पहला क़दम कौन उठाएगा, दोनों नेताओं के बीच यही सब से बड़ा सवाल है. जैसा कि हमने हाल ही में एससीओ शिखर सम्मलेन में देखा, यह काफ़ी निराशाजनक था कि वे एक-दूसरे से नहीं मिले."
राष्ट्रपति शी जिनपिंग अब पहले से अधिक शक्तिशाली बताए जा रहे हैं. कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि उनका क़द अब शायद चीन के महान नेता देंग शियाओपिंग से बड़ा हो चुका है.
हाल ही में उन्हें रिकॉर्ड तीसरी बार अगले पांच साल के कार्यकाल के लिए चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव के रूप में फिर से चुन लिया गया. विश्लेषकों का कहना है कि वो पहले से अधिक शक्तिशाली बन कर उभरे हैं और वो एक लंबे अरसे तक के लिए सत्ता में बने रह सकते हैं.
प्रधानमंत्री मोदी की चुप्पी
इस मौक़े पर भारत के प्रधानमंत्री ने उन्हें बधाई नहीं दी. पांच साल पहले उन्होंने शी जिनपिंग को दूसरी बार कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव चुने जाने पर बधाई दी थी. इसे चीन के सियासी गलियारों में किस तरह से देखा जा रहा है?
सिचुआन विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के प्रोफ़ेसर हुआंग युनसोंग ने बीबीसी हिंदी को दिए एक ईमेल इंटरव्यू में बताया कि प्रधानमंत्री मोदी की ख़ामोशी को चीन में अच्छी तरह से नहीं देखा जा रहा है. वो कहते हैं, "राष्ट्रपति शी के फिर से चुने जाने पर पीएम मोदी की चुप्पी ने ख़तरनाक संकेत दिया है. यह आगे दोनों देशों के बीच विवादों और टकराव को उजागर करता है और हमारे आपसी हितों की संभावनाओं को काफ़ी कमज़ोर करता है. सच कहूं तो, पीएम मोदी की चुप्पी दोनों देशों के बीच मतभेदों को दूर करने और हल करने में कोई अच्छी भूमिका नहीं निभाती है."
प्रो हुआंग युनसोंग यह भी कहते हैं, "हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि जून 2020 से द्विपक्षीय संबंधों की नींव गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो गई है. शीर्ष नेताओं ने सार्थक बातचीत में शामिल होने की इच्छा और चाहत खो दी है. शीर्ष नेतृत्व की भागीदारी के अभाव में, रिश्तों में सुधार अधिक कठिन होता जा रहा है."
दिल्ली में फ़ोर स्कूल ऑफ़ मैनेजमेंट में चीनी मामलों के विशेषज्ञ डॉक्टर फ़ैसल अहमद प्रधानमंत्री की ख़ामोशी पर कहते हैं, "दोस्ती में कुछ परेशानी भी आ सकती है. और इसे कभी-कभी कूटनीतिक तरीकों से और प्रतीकवाद के माध्यम से मैनेज करना पड़ता है. यह हक़ीक़त में मौजूदा हालात के संदर्भ में भी एक आवश्यकता है. याद रहे कि शी जिनपिंग को भी 2020 में राष्ट्रपति बाइडन को बधाई देने में दो हफ़्ते से ज्यादा का समय लगा था."
सिंगापुर में चीनी पत्रकार सन शी के मुताबिक़, "अभी शी जिनपिंग कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव चुने गए हैं. अगले साल जब वो तीसरी बार चीन के राष्ट्रपति बनेंगे तब मुझे उम्मीद है कि प्रधानमंत्री मोदी राष्ट्रपति शी को बधाई ज़रूर देंगे."
शी जिनपिंग की बढ़ती शक्ति से भारत पर क्या असर
वैसे एक अहम सवाल यह भी है कि शी जिनपिंग के बढ़ते हुए क़द और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ चीन के तीसरी बार महासचिव चुने जाने का भारत की सेहत पर क्या फ़र्क़ पड़ेगा? इसके नतीजे क्या निकल सकते हैं?
चीनी पत्रकार सन शी कहते हैं, "इसमें कोई शक़ नहीं कि शी जिनपिंग चीन के आधुनिक इतिहास के सबसे मज़बूत नेता बन जाएंगे. सत्ता पर उनका पूर्ण नियंत्रण हो जाएगा. इसलिए मुझे लगता है कि वह भारत सहित तमाम पड़ोसी देशों के साथ सीमा विवाद सहित अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अधिक सख़्त रुख़ दिखाएंगे."
लेकिन चीन में सिचुआन विश्वविद्यालय प्रोफ़ेसर हुआंग युनसोंग ने बीबीसी से कहा कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीनी सरकार भारत के प्रति अपनी नीति की निरंतरता और स्थिरता बनाए रखेगी.
वो कहते हैं, "हमें पूरा विश्वास है कि राष्ट्रपति शी द्विपक्षीय संबंधों को लगातार महत्व देते रहेंगे."
हुआंग युनसोंग इसे समझाते हुए कहते हैं, "राष्ट्रपति शी भारत और चीन की दो महान सभ्यताओं के बीच अच्छे और पड़ोसी मित्रता को क़ायम रखेंगे और चीन-भारत सहयोग के माध्यम से एशियाई सदी की प्रतिबद्धता का पालन करते रहेंगे. इस लिहाज राष्ट्रपति शी का फिर से चुनाव, द्विपक्षीय संबंधों की बहाली और निरंतर विकास में सबसे अधिक योगदान देगा."
शिव नडार विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय मामलों के विभाग के प्रोफ़ेसर जबिन टी जेकब एक अंग्रेजी अख़बार में शी जिनपिंग के पुनः चुनाव पर टिपण्णी करते हुए कहते हैं कि भारत के वर्तमान रवैये को देखते हुए ऐसा नहीं लगता है कि दोनों देशों के बीच संबंध में कोई खास फ़र्क़ आएगा.
वो लिखते हैं, "भारत-चीन संबंधों की वर्तमान स्थिति में बहुत कम बदलाव होने की संभावना है. भारत ने 2020 के चीन द्वारा सीमा पर उल्लंघनों से उत्पन्न पूर्वी लद्दाख में स्थिति के समाधान पर ज़ोर देना जारी रखा है. इसने अपने अधिकार क्षेत्र में चीनी आर्थिक हितों को टारगेट करना जारी रखा है और अमेरिका के साथ इसके राजनीतिक सुरक्षा सहयोग बढ़ते जा रहे हैं"
चीनी मामलों के विशेषज्ञ डॉक्टर फ़ैसल अहमद के मुताबिक़ राष्ट्रपति शी के फिर से चुने जाने से दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंध बेहतर होते जाएंगे. साल 2021 दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 125 अरब डॉलर से अधिक था, जो 2020 की तुलना में लगभग 40 अरब डॉलर ज़्यादा था.
डॉक्टर फ़ैसल अहमद कहते हैं, "भारत-चीन आर्थिक संबंध बेहतर होंगे और द्विपक्षीय व्यापार में वृद्धि होना तय है. 'ग्लोबल वैल्यू चेन' में पारस्परिक भागीदारी और पारस्परिक निवेश से भारत और चीन के बीच आर्थिक सहयोग को मज़बूत करने में मदद मिलेगी."
''साथ ही, भारत के नए ट्रेड डील्स और क्षेत्रीय आर्थिक साझेदारी (RCEP) में चीन का होना और ट्रांस-पैसिफ़िक पार्टनरशिप के लिए व्यापक और प्रगतिशील समझौते (सीपी-टीपीपी) में शामिल होने में चीन की दिलचस्पी दिखाना, ये सब देखते हुए ये देखना ज़रूरी होगा कि भारत और चीन लंबी अवधि में एक-दूसरे के लिए व्यापार के अवसर बनाते हैं या इसे डाइवर्ट करते हैं.''
रिश्ते सुधारने में पहल कौन करे?
प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति शी के बीच 2018 और 2019 में 'अनौपचारिक' शिखर मुलाक़ातें बड़े धूम धाम और मीडिया की ज़बरदस्त कवरेज़ के बीच हुई थीं. उन दिनों लगता था कि 2017 में डोकलाम में हुई झड़पों को दोनों देश भूल चुके हैं और अब रिश्ते ने एक नया मोड़ ले लिया है जिसमें दोनों कद्दावर नेता क़दम बढ़ा रहे हैं.
लेकिन फिर जून 2020 में लद्दाख में सीमा पर झड़पें हुईं और दोनों देशों के रिश्ते एक बार फिर से सहज नहीं रहे. भारत का कहना है कि घुसपैठ चीन ने किया था. भारत में लोग चाहते हैं कि रिश्ते में सुधार लाने के लिए पहल चीन को करनी होगी.
लेकिन चीनी विशेषज्ञ सन शी के मुताबिक़ दोनों देशों के बीच रिश्तों में पहले वाली मज़बूती लाने के लिए पहल भारत को करनी चाहिए. वो कहते हैं, "भारत को व्यावहारिक होना चाहिए और द्विपक्षीय संबंधों को बहाल करने का प्रयास करना चाहिए. मुझे नहीं लगता कि चीन सीमा पर अब भारत को उकसाएगा. चीन पहले से ही अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी अमेरिका का सामना कर रहा है. शी की प्राथमिकता भारत नहीं अमेरिका है".
वह कहते हैं, "मुझे लगता है कि अगर भारत थोड़ा सा मैत्रीपूर्ण भाव दिखाता है तो शी इसे स्वीकार करेंगे क्योंकि यह चीनी संस्कृति है. लेकिन शी को चीनी लोगों के सामने सख़्त दिखने की ज़रुरत है. इसलिए शी के लिए पहले क़दम उठाना आसान नहीं है. तो गेंद भारत के पाले में है."
दूसरी तरफ़ भारत में पिछले दो सालों में चीन की विरुद्ध बने माहौल को देखते हुए प्रधानमंत्री मोदी के लिए भी पहल करना आसान नहीं होगा. डॉक्टर फैसल अहमद की इस मुद्दे पर कहते हैं, "रणनीतिक मोर्चे पर, भारत-चीन सहयोग में सुधार होने की संभावना है. दोनों देशों ने 'अनौपचारिक शिखर सम्मेलन' के माध्यम से और डोकलाम झड़पों के बाद से एक-दूसरे को समझा है. मोदी और शी के सत्ता में रहते हुए सैन्य और कूटनीतिक रूप से एक-दूसरे को समझने में कोई मुश्किल नहीं होगी."
चीन के प्रोफ़ेसर हुआंग युनसोंग को उम्मीद है पहल दोनों तरफ़ से होगी और कुछ हद तक पहल की जा चुकी है. उन्होंने कहा, "चीन और भारत की सेना ने विवादित सीमा क्षेत्र में डिसएंगेजमेंट पूरा कर लिया है. दोनों देश, जून 2020 में हुई सीमा झड़पों के प्रतिकूल प्रभावों को दूर करने के लिए अलग-अलग दृष्टिकोणों के माध्यम से प्रयास कर रहे हैं."
प्रोफेसर युनसोंग के मुताबिक राष्ट्रपति शी के तीसरे कार्यकाल के दौरान, चीन भारत संबंधों में रणनीतिक विश्वास को बहाल करने पर ध्यान केंद्रित होना चाहिए. भारत के कुछ और ठोस क़दम उठाने की बात करते हुए वे कहते हैं, "चीन ने दोनों देशों के बीच व्यापार और व्यापार सहयोग को बढ़ावा देने के लिए सक्रिय उपाय किए हैं. दुर्भाग्य से, भारत ने 2020 में जो चीनी पूंजी, उद्य़म और कर्मियों पर पाबंदी लगाई थी, उसे हटाना बाक़ी है."
प्रो हुआंग युनसोंग के मुताबिक़ द्विपक्षीय संबंधों में ठोस सुधार लाने के लिए एकतरफ़ा कार्रवाई पर्याप्त नहीं है. "संबंधों को फिर से शुरू करने के लिए अपने तीसरे कार्यकाल में राष्ट्रपति शी के प्रयासों को पीएम मोदी की सकारात्मक प्रतिक्रिया की ज़रुरत है. यदि भारत चीन के प्रति पर्याप्त तर्कसंगतता और गुडविल दिखाता है, तो संबंधों की बहाली इतनी मुश्किल नहीं है. इस बेहद अनिश्चित और अराजक समय में चीन-भारत स्थिर संबंधों की सख़्त ज़रूरत है."
दोनों नेताओं का लंबे समय तक सत्ता में रहना फ़ायदेमंद
टिप्पणीकार कहते हैं दोनों नेता एक लंबे अरसे से सत्ता में बने चले आ रहे हैं और एक लंबे समय तक सत्ता पर बने रह सकते हैं. इन विश्लेषकों का मानना है कि अगर भारत में 20 महीने बाद होने वाले आम चुनाव में नरेंद्र मोदी की फिर से जीत हुई तो उन्हें अपने पूर्व 'चीनी दोस्त' से रिश्ते बनाने पर ध्यान देना ही पड़ेगा.
प्रो हुआंग युनसोंग कहते हैं, "वास्तव में एक राजनीतिक वास्तविकता यह है कि चीन और भारत दोनों के शीर्ष नेता तुलनात्मक रूप से लंबे समय तक सत्ता में रहेंगे. एक-दूसरे से परिचित शीर्ष नेताओं से लोगों को अधिक आशाएं होंगी. यह स्पष्ट रूप से द्विपक्षीय संबंधों में सहजता प्रदान करेगा."
वैसे अगले एक साल तक संघाई कॉरपोरेशन आर्गेनाइजेशन की अध्यक्षता भारत के पास है. अगले साल सितंबर में भारत को शिखर सम्मेलन कराना है और हर बार की तरह चीन के राष्ट्रपति भी इसमें नियमित रूप से भाग लेंगे.
अगर सम्मेलन से पहले दोनों देशों के बीच रिश्तों में सुधार नहीं होते हैं तो सम्मेलन की कामयाबी और भारत की अध्यक्षता पर प्रश्न चिन्ह लग सकते हैं.
शायद यही एक बड़ा अवसर होगा जिसके पहले दोनों देशों में रिश्ते सुधरने लगें, जैसा कि चीनी पत्रकार सन शी कहते हैं, "मुझे उम्मीद है कि जब भारत अगले साल के शिखर सम्मेलन के लिए एससीओ की अध्यक्षता ग्रहण करेगा तो शी के प्रति भारत मैत्रीपूर्ण संकेत दिखाने का प्रयास करेगा. याद रहे कि दोनों देश 'ब्रिक्स' के सदस्य भी हैं. उन्हें आपस में मेलजोल बढ़ाना पड़ेगा."
ऐसे में उम्मीद तो यही है कि 'इतने पास फिर भी इतने दूर' वाली हालात में अगले साल बदलाव आए और एशिया के दो विशाल पड़ोसी देशों के बीच दूरी कम हो.
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