कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए वोटिंग ख़त्म: खड़गे को कितनी टक्कर दे पाएंगे थरूर?

कांग्रेस का अगला अध्यक्ष कौन होगा? लंबे समय से पूछे जा रहे इस सवाल के जवाब की तस्वीर अब साफ़ होने जा रही है.

अध्यक्ष पद की दौड़ में अब दो ही उम्मीदवार हैं- शशि थरूर और मल्लिकार्जुन खड़गे.

आज देशभर में 40 केंद्रों पर कुल 68 बूथों पर हुए मतदान में नौ हज़ार से ज़्यादा मतदाताओं ने शशि थरूर और मल्लिकार्जुन खड़गे में से किसी एक को अपना मत दिया.

मतदान की प्रक्रिया सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे के बीच चली. नतीज़े का एलान बुधवार 19 अक्टूबर को दिल्ली के अकबर ​रोड स्थित पार्टी मुख्यालय में किया जाएगा.

इस चुनाव की ख़ासियत है कि पिछले 22 सालों में पहली बार अध्यक्ष पद के चुनाव में मतदान कराने की नौबत आई है.

इससे पहले साल 1998 में पार्टी ने सीताराम केसरी को अध्यक्ष पद से हटाकर से सोनिया गांधी को अध्यक्ष बना दिया था. सोनिया गांधी के बाद राहुल गांधी को भी पार्टी ने बिना चुनाव के ही अध्यक्ष बना लिया था.

कांग्रेस के अध्यक्ष पद के इस चुनाव की एक और ख़ासियत ये है कि सीताराम केसरी के बाद पहली बार गांधी-नेहरू परिवार से बाहर का कोई व्यक्ति पार्टी का अध्यक्ष बनने जा रहा है.

इस मतदान के लिए राहुल गांधी के नेतृत्व में हो रही भारत जोड़ो यात्रा में भी एक मतदान केंद्र बनाया गया.

चुनाव से पहले मल्लिकार्जुन खड़गे और शशि थरूर ने देश भर में अपना प्रचार अभियान चलाया है.

हालांकि शशि थरूर ये आरोप लगा चुके हैं कि ये मुक़ाबला बराबरी का नहीं है क्योंकि पार्टी की कई राज्य इकाइयों के प्रमुखों ने उनसे मुलाक़ात नहीं की लेकिन खड़गे का स्वागत किया.

मतदाताओं के लिए दिशा निर्देश

सोमवार को हुए चुनाव के ठीक पहले रविवार की शाम को पार्टी के केंद्रीय चुनाव प्राधिकरण के अध्यक्ष मधुसूदन मिस्त्री ने मतदाताओं को दिशानिर्देश जारी किए.

उन्होंने कहा है, "बैलेट पेपर में दो उम्मीदवारों के नाम होंगे. मतदाताओं को पसंदीदा उम्मीदवार के सामने बने बॉक्स में 'टिक' लगाने का निर्देश दिया जाता है. इसके अलावा कोई अन्य चिह्न बनाने या नंबर लिखने पर वोट अमान्य हो जाएंगे."

गांधी परिवार के भरोसेमंद मल्लिकार्जुन खड़गे

अस्सी साल के खड़गे गांधी परिवार के भरोसेमंद हैं और बहुत से लोगों का मानना है कि खड़गे अध्यक्ष पद में गांधी परिवार के ही उम्मीदवार हैं.

कर्नाटक के कलबुर्गी ज़िले के सामान्य पार्टी कार्यकर्ता से अध्यक्ष पद की दौड़ तक का खड़गे का सफर उतार चढ़ावों से भरा रहा है.

विश्लेषक मानते हैं कि दक्षिण के दलित नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को अध्यक्ष पद का दावेदार बनाकर कांग्रेस कार्यकर्ताओं को ये संदेश भी देना चाहती है कि पार्टी में क़ाबिलियत के दम पर एक साधारण कार्यकर्ता भी अध्यक्ष पद तक पहुंच सकता है.

1972 में अपना राजनीतिक करियर शुरू करने वाले खड़गे ने कर्नाटक के कलबुर्गी ज़िले की गुरमितकाल सीट से लगातार नौ बार विधायक का चुनाव जीता. इसके बाद उन्हें कन्नड़ भाषा में 'सोल इलादे सरदार' कहा जाने लगा था जिसे चुनाव में हराना असंभव हो.

खड़गे 2009 में पहली बार लोकसभा के लिए चुने गए थे और मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए की केंद्र सरकार में मंत्री बने थे. अपने इस कार्यकाल के दौरान ही उन्होंने संविधान (371 (जे)) संशोधन के लिए अभियान चलाया. इससे हैदराबाद और कर्नाटक क्षेत्र के लोगों को शिक्षा और रोज़गार में आरक्षण मिला. 2014 में वो लोकसभा में विपक्ष के नेता थे, लेकिन 2019 में वो स्वयं लोकसभा चुनाव हार गए.

खड़गे के साथ काम करने वाले प्रशासनिक अधिकारी मानते हैं कि वो एक चतुर राजनेता हैं जो विनम्रता से काम निकालना जानते हैं.

समाचार एजेंसी ​पीटीआई के अनुसार, मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा है कि यदि वे अध्यक्ष बनते हैं तो उन्हें पार्टी चलाने में गांधी परिवार की सलाह और समर्थन लेने में कोई हिचक नहीं होगी.

कैसे होगी वोटों की गिनती?

  • एआईसीसी में बैलेट बॉक्स आने के बाद रिटर्निंग ऑफिसर के मौजूदगी में वोटों की गिनती होगी शुरू
  • सबसे पहले, फ़र्स्ट प्रेफरेंस वाली वोटों की गिनती
  • जिस उम्मीदवार को 50 फ़ीसदी से ज़्यादा वोट मिलेंगे, अध्यक्ष घोषित कर दिया जाएगा
  • अगर किसी को 50 फीसदी वोट प्रथम वरीयता में नहीं मिलते हैं - तो जिसे सबसे कम वोट प्रथम वरीयता में मिलते हैं उस उम्मीदवार का नाम लिस्ट से हटा दिया जाता है.
  • इस तरह से 'एलिमिनेशन' के ज़रिए अध्यक्ष पद का चुनाव होता है.
  • अंत में जिस उम्मीदवार के पास ज़्यादा वोट बचते हैं - उसे अध्यक्ष घोषित कर दिया जाता है.

कितनी चुनौती दे पाएंगे शशि थरूर?

अपनी बातों और हरकतों से मीडिया की सुर्ख़ियों में रहने वाले शशि थरूर 'अपनी नॉलेज और चुटीलेपन' के लिए जाने जाते हैं.

शशि थरूर हैरान करना जानते हैं और जब माना जाने लगा था कि वो अध्यक्ष पद की दौड़ में आगे नहीं आएंगे तब उन्होंने नामांकन करके अपने दोस्तों और आलोचकों को ग़लत साबित कर दिया.

थरूर गांधी परिवार के भरोसेमंद मल्लिकार्जुन खड़गे को अध्यक्ष पद के चुनाव में भले ना हरा पाएं लेकिन राजनीतिक विश्लेषक ये मानते हैं कि वो अपने आप को कांग्रेस नेताओं की अग्रणी पंक्ति में शामिल करने की कोशिश कर रहे हैं.

66 साल के शशि थरूर की कांग्रेस पार्टी का नेता होने के अलावा अपनी एक अलग पहचान भी है. जो उन्होंने अंग्रेज़ी भाषा पर अपनी पकड़, फ़ैशन और विनम्र स्वभाव से बनाई है. वो एक कुशल राजनयिक और सफल लेखक भी रहे हैं.

शशि थरूर कांग्रेस के जी-23 का हिस्सा था.

सितंबर में जब राहुल गांधी ने कन्याकुमारी से भारत जोड़ो यात्रा शुरू की तो वहां भी वो आगे थे. इसके बाद वो सोनिया गांधी से मिले और अध्यक्ष पद की उम्मीदवारी की इच्छा ज़ाहिर कर दी.

खड़गे को चुनौती दे रहे थरूर कह चुके हैं कि उन्हें पार्टी नेताओं से वांछित समर्थन नहीं मिल रहा है.

केरल की तिरूवनंतपुरम सीट से लगातार तीन बार लोकसभा चुनाव जीत चुके थरूर को पार्टी की केरल यूनिट में ही भरपूर समर्थन नहीं मिल रहा है.

कांग्रेस की केरल यूनिट ने एक प्रस्ताव पारित करके कहा था कि वो उसी उम्मीदवार का समर्थन करेगी जिसे पार्टी हाई कमान का समर्थन हासिल होगा.

दिल्ली के सेंट स्टीफ़ंस कॉलेज से पढ़े थरूर देश के कुछ चुनिंदा बुद्धिजीवियों में गिने जाते हैं. उन्होंने विदेश में भी पढ़ाई की है और काफ़ी कम उम्र में वो संयुक्त राष्ट्र से जुड़ गए थे. वो यूएन के अंडर-सेक्रेटरी जनरल बने. भारत ने सेक्रेटरी जनरल के पद के लिए उनका समर्थन किया, लेकिन वो सफल नहीं हो पाए.

डिप्लोमेसी के शानदार करियर के दौरान उन्होंने किताब लिखने की अपनी आदत जारी रखी, जो उन्हें 10 साल की उम्र से थी. उन्होंने दो दर्जन से ज़्यादा किताबें लिखी हैं और कई पुरस्कार जीते हैं. फ़िक्शन, नॉन फ़िक्शन, राजनीति यहां तक धर्म पर भी किताब लिखी है.

यूएन के सर्वोच्च पद पर नहीं पहुंच पाने के बाद थरूर ने कई नामी पब्लिकेशन के लिए लिखा. कांग्रेस की विचारधारा से इत्तेफ़ाक रखते थे इसलिए उन्होंने इस पार्टी से जुड़ने का फ़ैसला किया. सोनिया गांधी ने उन्हें तिरुवनंतपुरम से पार्टी का टिकट दिया.

थरूर अपनी पत्नी की संदिग्ध हालत में मौत के बाद विवादों और सवालों में रहे. उन पर आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप लगा था, लेकिन बाद में इस मामले में कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया.

चुनाव से पहले शशि थरूर ने लखनऊ में कहा, ''खड़गे साहब वरिष्ठ नेता हैं अगर वे जीतेंगे तो हम सब उनके साथ सहयोग और काम करेंगे. पार्टी हमारा घर और परिवार है.''

राजस्थान में गहलोत-पायलट प्रतिद्वंद्विता पर होगी नज़र

वहीं अध्यक्ष पद की दौड़ से अपने आप को पीछे हटा लेने वाले गांधी परिवार के पसंदीदा चेहरा रहे राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा है, ''हम सभी अध्यक्ष पद के इस चुनाव का हिस्सा बनेंगे. इस चुनाव को लेकर सब में उत्साह है. यह एक नई शुरूआत होगी.''

गहलोत ने यह भी कहा कि गांधी परिवार से अध्यक्ष न बनने का एलान करके सोनिया और राहुल गांधी ने बहुत बड़ा त्याग किया है. उनके अनुसार ऐसा करने के लिए बड़ी हिम्मत चाहिए.

माना जा रहा है कि अध्यक्ष पद के लिए चुनाव होने के बाद राजस्थान में कांग्रेस पार्टी का अंदरूनी विवाद एक बार फिर केंद्र में आ सकता है.

राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट गुटों के बीच सरकार के गठन के समय से ही खींचातनी चल रही है. हालांकि हर बार अशोक गहलोत बाज़ी मारते रहे हैं.

अध्यक्ष पद के चुनाव के बाद एक बार फिर से राजस्थान में राजनीतिक गहमागहमी बढ़ सकती है.

कॉपी - दिलनवाज़ पाशा

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