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सऊदी अरब और अमेरिका के बीच बढ़ती दूरियों का रूसी कनेक्शन
- Author, शुभम किशोर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
ऐसा लगता है कि पिछले एक महीने में सऊदी अरब के उठाए गए कदमों ने अमेरिका को उसके विरोध में खड़ा कर दिया है.
उधर साथ ही रूस और यूक्रेन दोनों ने ही सऊदी अरब का अलग-अलग मौकों पर शुक्रिया अदा किया है.
एक ऐसे समय में जब रूस और यूक्रेन आमने-सामने हैं, और पश्चिम के देश रूस के ख़िलाफ़, सऊदी अरब दोनों ही देशों के साथ दिख रहा है.
इसकी क्या वजह है?
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बदलते रिश्तों की क्रोनोलॉजी
15 जुलाई 2022: जो बाइडन की यात्रा के दौरान कहा - सऊदी ने हमारी ज़रुरतों को समझा है और उम्मीद है कि आने वाले हफ़्तों में बेहतर संबंधों की ओर क़दम उठाए जाएंगे."
3 अक्तूबर 2022: यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने यूक्रेन के 215 लोगों को रिहा करने के लिए सऊदी अरब का आभार जताया.
5 अक्तूबर 2022: OPEC+ की बैठक ने फ़ैसला लिया गया कि तेल का उत्पादन दो मिलियन बैरल प्रतिदन कम किया जाएगा.
5 अक्तूबर 2022: इस पर अमेरिका की प्रतिक्रिया कुछ ऐसे आई, "ये साफ़ नज़र आ रहा है कि OPEC+ रूस के साथ हैं."
6 अक्तूबर 2022: बाइडन ने सऊदी अरब के फ़ैसले को निराशाजक बताया.
9 अक्तूबर 2022: रूस ने OPEC+ को सप्लाई कम करने के लिए राज़ी होने और अमेरिका की "ख़राब" नीतियों के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए शुक्रिया कहा.
सऊदी अरब की सियासत या मुनाफ़े की कोशिश
तेल उत्पादन कम करने के लिए राज़ी होने को रूस अमेरिका को दिया गया जवाब की तरह बता रहा है लेकिन कई जानकार इसे सिर्फ़ मुनाफ़े के लिए उठाया गया कदम बताते हैं.
सेंटर ऑफ़ स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज़ के सीनियर फ़ेलो बेल काहिल के मुताबिक सऊदी अरब ऐसा कर तेल की कीमतों पर अपना कंट्रोल चाहता और ये सुनिश्चित करना चाहता है देश मंदी की चपेट में न आए.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स से बात करते हुए उन्होंने कहा, "मैक्रोइकोनॉमिक्स के लिहाज़ से हाल के सालों में ये अभी तक का सबसे ख़राब साल रहा है."
"उन्हें पता है कि इससे अमेरिका नाराज़ होगा, लेकिन उन्हें मार्केट को भी मैनेज करना है."
सऊदी अरब में भारत के राजदूत रहे तलमीज़ अहमद का भी मानना है कि अमेरिका सियासी कारणों से तेल के उत्पादन में बढ़ोतरी चाहता है लेकिन सऊदी अरब शुद्ध रूप से बाज़ार के हिसाब से फ़ैसले ले रहा है.
बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, "सऊदी अरब कहता है कि ओपेक प्लस के प्रोडक्शन का लिंक मार्केट की स्थिति से हो, तो जब उन्हें लगता है डिमांड कम होगा, तो वो अपना उत्पादन कम करेंगे. वो नहीं चाहते कि उत्पादन अधिक हो और इस कारण कीमतों में गिरावट आए."
सऊदी अरब का और OPEC+ देशों का अनुमान है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था मंदी की ओर जा रही है और तेल की डिमांड कम हो सकती है.
अहमद कहते हैं, "अमेरिका चाहता है प्रोडक्शन बढ़ता रहे , उससे कीमतें कम होंगी. अमेरिका में नवंबर में मिड टर्म चुनाव होने वाले हैं, राष्ट्रपति बाइडन को लगता है कि कीमतें बढ़ीं तो उनके लिए चुनाव में मुश्किलें हो सकती हैं."
इसका सीधा असर अमेरिका के तेल रिज़र्व पर पड़ सकता है. अख़बार न्यू यॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक बाइडन ने पहले ही स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिज़र्व से काफ़ी तेल निकालने की अनुमति दे दी है, और पिछले चार दशकों में रिज़र्व में सबसे कम तेल बचा है. तूफ़ान जैसी किसी प्राकृतिक आपदा या युद्ध की स्थिति में हालात ख़राब हो सकते हैं.
क्या ये रूस की ओर झुकाव है?
अमेरिका के तरफ़ से ये लगातार कहा जा रहा है कि सऊदी अरब का झुकाव रूस की तरफ़ बढ़ गया है.
व्हाइट हाउस के प्रेस सेक्रेटरी कैरीन-जीन-पियरी ने कहा कि "ये साफ़ नज़र आ रहा है कि OPEC+ रूस के साथ हैं. उन्होंने कहा कि वो विस्तार से बाद में बाताएंगी कि इससे अमेरिका-सऊदी के रिश्तों पर क्या असर पड़ेगा."
रूस ने भी OPEC+ के फ़ैसले का स्वागत किया है. लेकिन सऊदी के मंत्री आदिल अल ज़ुबैर ने फ़ॉक्स न्यूज़ को दिए एक बयान में कहा, "सऊदी अरब तेल या तेल के फ़ैसलों का राजनीतिकरण नहीं करता."
तलमीज़ अहमद का भी मानना कि OPEC+ के फ़ैसले को सऊदी के झुकाव के तौर पर देखना ग़लत होगा.
वो कहते हैं, "जो अमेरिका की तरफ़ से बयान आ रहे हैं, वो एक तरह से धमकी की तरह हैं कि जो हम चाहते हैं, वो अगर आप नहीं करेंगे, तो हम आपका नुकसान कर सकते हैं. ये गलत अप्रोच है."
हालांकि वो कहते हैं कि इसका मतलब ये भी नहीं है कि सऊदी अरब रूस के प्रति नरम हो गया है.
अहमद कहते हैं, "1945 से लेकर पिछले साल तक सऊदी यूएस का सपोर्टर था, हर तरह से. सऊदी को मालूम था कि अमेरिका उनकी सुरक्षा की गारंटी लेता है. लेकिन ट्रंप के चार सालों में ये धारणा बदली है."
"साथ ही सऊदी अरब एक मैच्योर पावर बन गया है. पहले जैसी घबराहट अब उसमें नहीं है. विदेश नीतियों को लेकर अब उसका रुख आत्मविश्ववास से भरा है. उन्होंने अब ईरान और तुर्की के साथ भी बातचीत शुरू कर दी है. जुलाई में जब बाइडन पहुंचे थे, तो उन्हें लगा था कि वो जिस तरह से चाहते हैं, चीज़ें उसी तरह से होंगी, ये गलत रवैया था. "
बाइडन ने अपने दौरे के बाद "आने वाले हफ़्तों में कुछ कदम उठाए" जाने की उम्मीद जताई थी.
अहमद कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि वो रूस की ओर झुक रहे हैं. भारत जिस तरह से राजनीतिक स्वायत्तता से फ़ैसले लेता है, वही अब सऊदी अरब कर रहा है."
रूस और यूक्रेन जंग में किसकी तरफ़ है सऊदी अरब
रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान सऊदी अरब ने मध्यस्थता कर यूक्रेन के कैदियों को रिहा कराया जिसके लिए यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेंलेस्की ने शुक्रिया भी कहा.
अहमद मानते हैं कि ये दिखाता है कि सऊदी अरब इस जंग में किसी के साथ नहीं है.
वो कहते हैं, "सऊदी अरब के जंग में किसी का साथ देने के कुछ नहीं होगा. इसलिए वो किसी के समर्थन में नहीं है, ना ही किसी का विरोध कर रहा है. कैदियों की छुड़ाने जैसी स्थिति में ही वो मध्यस्थता में अपना रोल निभाने तक सीमित है."
जमाल खाशोज्जी का मामला
कई अमेरिकी अख़बारों में लिखा गया है कि जमाल खाशोज्जी के मामले में अमेरिका का सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का रुख रास नहीं आया.
राजनीतिक जानकार डैन एबरहर्ट ने फ़ोर्बस के लिए एक लेख में लिखा है, "बाइडन और सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिल सलमान के बीच रिश्ते ख़राब हैं, इसके अलावा व्हाइट हाउस ने ईरान के साथ परमाणु समझौते पर फिर से प्रयास शुरू किया है, ईरान सऊदी अरब का दुश्मन है. सऊदी के लिए फिलहाल रूस अमेरिका से ज़्यादा ज़रूरी है."
अहमद मानते हैं कि सऊदी अरब के लिए गए फ़ैसले उसके आर्थिक तौर पर मज़बूत होने का संकेत हैं, और इस मामले का बहुत प्रभाव नहीं पड़ा है.
अमेरिका के पास क्या है विकल्प
राजनीतिक टिप्पणीकार एबरहर्ट का मानना है कि अमेरिका के पास अब प्रोडक्शन बढ़ाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है.
द वाल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि तेल की कमी को पूरा करने के लिए अमेरिका वेनेज़ुएला से प्रतिबंध हटा सकता है.
लेकिन अमेरिकी सरकार ने इस बारे में कुछ भी नहीं कहा है. 90 के दशक में वेनेज़ुएला एक प्रमुख तेल उत्पादक था, लेकिन उसके बाद निवेश की कमी, भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन के कारण इस इंडस्ट्री की हालत ख़स्ता होती गई. ट्रंप प्रशासन के लगाए प्रतिबंधों ने हालात और ख़राब कर दिए.
हालांकि नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के प्रवक्ता एडरीन वॉस्टन ने कहा है कि जबतक वेनेजुएला की तरफ़ से सुधार के कदम नहीं उठाए जाएंगे, "अमेरिका के प्रतिबंधों की पॉलिसी में बदलाव नहीं आएगा."
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