भारत जोड़ो यात्रा का एक महीनाः अपनी छवि को कितना बदल पाए राहुल गांधी?

    • Author, दिलनवाज़ पाशा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

ऊपर दिया गया बयान राहुल गांधी का है. भारत जोड़ो यात्रा पर निकले गांधी ने यात्रा का एक महीना पूरा होने पर कर्नाटक के थुरूवेकेरे में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ये बातें कही हैं.

राहुल गांधी ने कहा कि "मुझे ग़लत और असत्य तरीके से दिखाने के प्रयास में मीडिया में हज़ारों करोड़ रुपए और बहुत अधिक ऊर्जा ख़र्च की गई है.'

"ये मशीन अपना काम करती रहेगी. ये एक बहुत व्यवस्थित और वित्तीय रूप से मज़बूत मशीन है. लेकिन मेरा सच अलग है. ये सच हमेशा से अलग ही था. और जो लोग ध्यान से देखने की फ़िक्र करते हैं वो समझ पाएंगे कि मैं कि मेरा सत्य क्या है और मैं किन मूल्यों के लिए खड़ा हूं."

राहुल गांधी ने 7 सितंबर को कन्याकुमारी से महत्वाकांक्षी भारत जोड़ो यात्रा शुरू की थी और 3750 किलोमीटर पैदल चलने के बाद वो 150 दिन बाद कश्मीर पहुंचेगे.

यूं तो भारत जोड़ो यात्रा का घोषित मक़सद 'भारत में बीजेपी की विभाजनकारी राजनीति को चुनौती देना है'.

लेकिन विश्लेषक मानते हैं कि इससे राहुल गांधी की ज़मीन से जुड़े नेता की छवि गढ़ने की कोशिश भी की जा रही है.

राहुल गांधी की इस यात्रा को एक महीना हो चुका है और अब वो केरल से होते हुए कर्नाटक में दस दिन बिता चुके हैं.

भावुक तस्वीरें

राहुल गांधी अपनी यात्रा के दौरान लोगों से सीधे संवाद कर रहे हैं, आम लोगों के साथ वक्त बिता रहे हैं. बीच-बीच में लोगों के घर भी जा रहे हैं और रह-रह कर पत्रकारों के सवालों का जवाब भी दे रहे हैं.

सोशल मीडिया पर उनकी कई भावुक तस्वीरें भी वायरल हुई हैं जिनमें वो बारिश के बीच भाषण देते हुए, मां सोनिया गांधी के जूते का फीता बांधते हुए और हिजाब पहने बच्ची को गले लगाते दिखते हैं.

कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य इमरान प्रतापगढ़ी कहते हैं, "पिछले एक महीने से भारत जोड़ो यात्रा लगातार चल रही है और पूरे देश में इस यात्रा ने एक अलग तरह का राजनीतिक और सामाजिक माहौल बनाया हुआ है."

प्रतापगढ़ी कहते हैं, "इस यात्रा की महत्वपूर्ण बातें ये हैं कि इससे ऐसी तस्वीरें निकल रही हैं, जिन्होंने मौजूदा समय में दक्षिण भारत की राजनीति को हिला कर रख दिया है और इनका संदेश उत्तर भारत और देश के अलग-अलग हिस्सों तक जा रहा है. इस यात्रा ने वो मिथक तोड़े हैं जो कांग्रेस और राहुल गांधी को लेकर बनाए गए थे.

क्या बदल रही है राहुल गांधी की छवि?

राहुल गांधी ने 2019 चुनावों में कांग्रेस की बुरी हार की ज़िम्मेदारी लेते हुए पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया था. पार्टी नेताओं के बार-बार आग्रह पर भी वो अध्यक्ष पद को नकारते रहे.

जानकारों का कहना है कि सोशल मीडिया पर राहुल गांधी को एक अपरिपक्व नेता के रूप में पेश किया जाता रहा.

ऐसे में सवाल ये है कि क्या भारत जोड़ो यात्रा से राहुल गांधी अपनी इस छवि को तोड़कर एक नई छवि गढ़ पा रहे हैं.

विश्लेषकों को लगता है कि राहुल गांधी ने बहुत हद तक अपने आप को एक गंभीर राजनेता के रूप में स्थापित कर लिया है. सत्ताधारी दल बीजेपी ने राहुल गांधी को एक कमज़ोर और मज़ाकिया नेता के तौर पर पेश करने की कोशिश की है. विश्लेषक मानते हैं कि राहुल गांधी ने इस यात्रा से इस छवि को भी तोड़ दिया है.

वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी कहते हैं, "राहुल के चरित्र को कमजोर करने की एक योजना रही होगी, उन्हें सोशल मीडिया पर अगंभीर नेता के तौर पर पेश किया जाता रहा था. उनके लिए अपशब्द इस्तेमाल किए जाते रहे थे. लेकिन इस यात्रा को अब एक महीना हो चुका है और इस तरह के शब्द उनके लिए सुनाई नहीं दे रहे हैं. एक अहम बात ये भी है कि राहुल गांधी की इस यात्रा को राजनीतिक ड्रामे के रूप में नहीं देखा जा रहा है. ये जरूर है कि बहुत से लोग ये कह रहे हैं कि राहुल जो अब कर रहे हैं उन्हें बहुत पहले ही ये करना चाहिए था."

विजय त्रिवेदी कहते हैं, "राहुल गांधी पर जो ठप्पे सोशल मीडिया में लगाए गए और छवि उनकी गढ़ी गई राहुल गांधी अब उससे निकल आए हैं. इसका सबूत यही है कि उनके लिए इस्तेमाल होने वाले आपत्तिजनक विशेषणों का इस्तेमाल अब नहीं हो रहा है."

राधिका रामाशेषन कहती हैं, "बीजेपी का ये प्रयास रहा कि वो राहुल गांधी को अंगभीर व्यक्ति और राजनीति में एक जोकर की तरह प्रोजेक्ट करे. बीजेपी बहुत हद तक इसमें कामयाब भी रही है. लेकिन ये यात्रा राहुल गांधी की छवि बदल रही है. राहुल अब गंभीर बयान दे रहे हैं."

राधिका कहती हैं, "अभी तक राहुल की यात्रा का उद्देश्य बहुत राजनीतिक नज़र नहीं आ रहा है. लेकिन जब-जब मीडिया उनसे सवाल कर रही है, राहुल गांधी हर सवाल का जवाब दे रहे हैं. वो सवालों से भाग नहीं रहे हैं. वो सोच-समझकर जवाब दे रहे हैं. और लग रहा है कि इस यात्रा से राहुल गांधी की छवि में बहुत बदलाव आ रहा है. ख़ासकर उस छवि में जो बीजेपी ने उनकी बनाई है."

वहीं वरिष्ठ पत्रकार सईद नक़वी कहते हैं, "राहुल गांधी अपने आपको गंभीर राजनेता के रूप में स्थापित कर पाते हैं या नहीं इससे बड़ा सवाल ये होगा कि वो कितनी जनता को अपनी तरफ आकर्षित कर पाते हैं. राहुल गांधी की राजनीतिक गंभीरता उनके पैदल चलने से प्रदर्षित नहीं होती है. अभी तक की यात्रा से ये लग रहा है कि राहुल लोगों का ध्यान खींचने में कामयाब रहे हैं. कांग्रेस के लिए ये अच्छा संकेत है."

अब तक कैसा रेस्पांस?

केरल में उनकी यात्रा के दौरान कांग्रेस कार्यकर्ताओं में ज़बरदस्त उत्साह देखने को मिला था. अब कर्नाटक में भी बड़ी तादाद में लोग इस यात्रा से जुड़ रहे हैं.

बैंगलुरू से बीबीसी के सहयोगी पत्रकार इमरान क़ुरैशी बताते हैं, "केरल में जब राहुल की यात्रा को लोगों की ज़बरदस्त प्रतिक्रिया मिली तो आमतौर पर ये माना गया कि वो एक ऐसे राज्य में हैं जहां उनकी पार्टी पहले से ही मज़बूत है और उसका विपक्षी दल सीपीएम है. ऐसे में हर किसी की नज़रे कर्नाटक पर थीं जो बीजेपी शासित प्रदेश है."

इमरान कहते हैं, "राहुल की यात्रा को कर्नाटक के दक्षिणी हिस्से में दस दिन हो गए हैं. ऐसा दिख रहा है कि केरल में उनकी यात्रा को जो उत्साह मिला था वो कर्नाटक में भी जारी है."

इमरान मानते हैं कि राहुल लोगों से कितना जुड़ पा रहे हैं ये तब पता चलेगा जब वो उत्तर कर्नाटक और फिर तेलुगू भाषी प्रांतों तेलंगाना और आंध्र प्रदेश से गुज़रेंगे.

राजनीतिक विश्लेषक राधिका रामाशेषन भी मानती हैं कि राहुल गांधी को यात्रा में अभी तक जबरदस्त रेस्पांस मिला है.

राधिका कहती हैं, "केरल में कांग्रेस का आधार काफी मज़बूत है. वहां वह मुख्य विपक्षी दल है. केरल में राहुल को रेस्पांस मिलना स्वभाविक था. कर्नाटक में कांग्रेस का आधार रहा है लेकिन हाल के सालों में वहां बीजेपी काफ़ी मज़बूत हुई है. बावजूद इसके राहुल को यहां भी अच्छा रेस्पांस मिल रहा है."

राहुल गांधी अपनी इस यात्रा के जरिए कांग्रेस में भी फिर से जान फूंकने की कोशिश कर रहे हैं और पार्टी के भीतर के मतभेदों को दूर करने की भी कोशिश कर रहे हैं.

राधिका कहती हैं, "कर्नाटक कांग्रेस सिद्धारमैया कैंप और डीके शिवकुमार कैंप में बंटी हुई है लेकिन इन दो अलग-अलग धड़ों के नेताओं को भी एकजुट कर लिया है. दोनों ही नेता राहुल के साथ हैं. चुनाव तक ये एकजुटता क़ायम रहेगी या नहीं, ये अभी नहीं कहा जा सकता है लेकिन डीके शिवकुमार और सिद्धारमैया दोनों ही लोगों को इस यात्रा से जोड़ रहे हैं."

राधिका कहती हैं, "कर्नाटक कांग्रेस के लिए एक कठिन प्रदेश है, यहां भी उन्हें जबरदस्त रेस्पांस मिलता दिख रहा है. ऐसा लग रहा है कि राहुल कांग्रेस को पुनर्जीवित करने के अपने कर्तव्य को निभा रहे हैं."

हालांकि विश्लेषक ये भी मानते हैं कि राहुल गांधी की असली परीक्षा यात्रा के आगे के पड़ावों में होगी जब वो ऐसे प्रदेशों में होंगे जहां कांग्रेस की स्थिति कमज़ोर है.

राधिका कहती हैं, "राहुल गांधी की असली परीक्षा महाराष्ट्र में होगी जहां कांग्रेस का आधार बहुत हद तक खो चुका है. ऐसे में ये कहा जा सकता है कि इस यात्रा में राहुल की परीक्षा का समय अब आ रहा है."

क्या बीजेपी को चुनौती दे पाएंगे राहुल गांधी?

कांग्रेस अभी अपने राजनीतिक इतिहास में सबसे कमज़ोर स्थिति में हैं वहीं उसकी विपक्षी दल बीजेपी अपने सबसे मज़बूत दौर से गुज़र रही है. बीजेपी ने बीते दो लोकसभा चुनावों में ऐतिहासिक जीत हासिल की है और देश के अधिकतर राज्यों में बीजेपी सत्ता में है.

ऐसे में सवाल ये भी उठ रहा है कि क्या राहुल गांधी अपनी इस यात्रा से बीजेपी को चुनावी चुनौती दे पाएंगे. विश्लेषक मानते हैं कि अभी ऐसा होता नहीं दिख रहा है.

विजय त्रिवेदी कहते हैं, "राहुल गांधी की ये यात्रा बीजेपी को चुनौती देने के बजाए कांग्रेस को एक्टिव करने के लिए अधिक है. बीते कुछ सालों में कांग्रेस निष्क्रिय सी थी. ये यात्रा कार्यकर्ताओं में जोश भरने के लिए है."

हालांकि त्रिवेदी ये ज़रूर मानते हैं कि राहुल की इस यात्रा ने बीजेपी को परेशान कर दिया है.

त्रिवेदी कहते हैं, "बीजेपी के लिए हो सकता है चुनाव में ये यात्रा बहुत बड़ी चुनौती ना हो लेकिन निश्चित रूप से ये बीजेपी को परेशान करने वाली यात्रा है क्योंकि बीजेपी अब कांग्रेस को कुछ समझ ही नहीं रही थी."

राहुल गांधी उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों से बचते हुए निकल रहे हैं. विश्लेषक इसे लेकर भी सवाल उठा रहा हैं.

त्रिवेदी भी कहते हैं कि उत्तर प्रदेश जैसा बड़ा राज्य गांधी ने लगभग छोड़ दिया है और ऐसा लगता है कि राहुल बीजेपी को सीधी चुनौती नहीं दे रहे हैं.

कांग्रेस के लिए क्या संकेत?

राहुल गांधी अपनी इस यात्रा के जरिए कांग्रेस पार्टी में भी नया जोश भरने की कोशिश कर रहे हैं. विश्लेषक मानते हैं कि कांग्रेस के राजनीतिक भविष्य के लिए भी ये यात्रा अहम साबित हो सकती है.

सईद नक़वी कहते हैं, "इस समय कांग्रेस में तीन चीजें हो रही हैं. पहला राजस्थान का राजनीतिक हंगामा, दूसरा अध्यक्ष पद का चुनाव और तीसरी राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा. इन तीनों में क्या रिश्ता है ये समझना होगा. अगर ये यात्रा इतनी ही कामयाब रही जितनी अभी ये शुरुआत में दिखाई दे रही है तो ये बाकी दोनों घटनाओं पर हावी हो जाएगी और फिर सवाल ये उठेगा कि कांग्रेस क्या चाह रही है?"

विश्लेषकों का मानना है कि इस यात्रा से ये संदेश भी जा रहा है कि पार्टी की कमान फ़िलहाल गांधी परिवार के ही हाथ में रहेगी.

मीडिया में कैसी प्रतिक्रया

बैंगलुरू से बीबीसी के सहयोगी पत्रकार इमरान क़ुरैशी के मुताबिक कर्नाटक में मीडिया इस समय राहुल गांधी की यात्रा को तरजीह दे रहा है और कन्नड़ मीडिया में उन्हें भरपूर जगह मिल रही है.

वहीं विश्लेषकों का कहना है कि राष्ट्रीय मीडिया ने भी राहुल गांधी की यात्रा को जगह दी है.

सईद नक़वी कहते हैं, "अभी यात्रा का एक महीना हुआ है और ये बहुत लोकप्रिय हो रही है. मीडिया इस पर ध्यान दे रहा है. लोगों तक राहुल का संदेश पहुंच रहा है."

सईद नक़वी कहते हैं, "कांग्रेस की अब तक शिकायत करती थी कि मीडिया अभी तक मोदी के अलावा किसी को जगह नहीं देती है. लेकिन अब कांग्रेस मीडिया में दिख रही है, ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मीडिया बदल गया है या कांग्रेस बदल रही है?"

नक़वी कहते हैं, "राहुल गांधी को अभी रेस्पांस मिल रहा है, राहुल कोई चमत्कार नहीं कर रहे हैं, वो चल रहे हैं और लोगों से बात कर रहे हैं. सोशल मीडिया और मीडिया इस पर ध्यान दे रहा है. राहुल आगे यात्रा में क्या इसे बरकार रख पाएंगे, अगर वो ऐसा कर पाए तो ये कांग्रेस के लिए एक बड़े परिवर्तन का संकेत हो सकता है."

वहीं राधिका रामाशेषन कहती हैं, "ये नहीं कहा जा सकता कि राहुल की यात्रा को मीडिया ने नज़रअंदाज़ किया है. राहुल ने जब ये यात्रा शुरू की थी तब मीडिया के हर धड़े ने इसे कवर किया. जिसे सरकार समर्थक मीडिया कहा जाता है उसने भी राहुल को कवर किया है. लेकिन ये बहुत बड़ी यात्रा है, इसमें मीडिया की रूची को लगातार बनाए रखना भी चुनौती है."

हालांकि कांग्रेस का मानना है कि राहुल गांधी को अभी भी भारत की मुख्यधारा का मीडिया वो जगह नहीं दे रहा है जिसके वो हक़दार हैं.

कांग्रेस के राज्यसभा सांसद इमरान प्रतापगढ़ी कहते हैं, "राहुल गांधी ने शुरुआती दौर में ही बताया था कि हम जनता के बीच क्यों जा रहे हैं. राहुल गांधी ने कहा था कि हमें मीडिया से बहुत कम उम्मीद है इसलिए ही हम लोगों के बीच जा रहे हैं. हमें अभी भी लगता है कि मीडिया इस यात्रा को उतनी जगह नहीं दे रहा है जितनी वो ऐसी ही अमित शाह या नरेंद्र मोदी की यात्रा को देता."

विजय त्रिवेदी कांग्रेस के इस आरोप को खारिज करते हैं कि मीडिया ने राहुल गांधी को जगह नहीं दी है.

त्रिवेदी कहते हैं, " कांग्रेस की ये शिकायत रहती थी कि मीडिया उन्हें जगह नहीं देता है, लेकिन अभी तक जितनी भी यात्रा हुई है उसे सोशल मीडिया और मीडिया में चर्चा मिल रही है."

त्रिवेदी का मानना है कि राहुल गांधी को और योजनाबद्ध तरीके से मीडिया से बात करनी चाहिए और अपने एजेंडे को देश के सामने रखना चाहिए.

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