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पीएफ़आई क्या है और कैसे पड़ी थी इस संगठन की नींव
- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
क्यों चर्चा में है पीएफ़आई
- केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पॉपुलर फ़्रंट ऑफ़ इंडिया परपाँच साल का बैन लगाने की अधिसूचना जारी की है.
- बीते लंबे समय से पीएफ़आई जाँच एजेंसियों के रडार पर रहा है.
- प्रतिबंध से पहले सुरक्षा एजेंसियों ने संगठन के कई ठिकानों पर छापेमारी की थी.
- केंद्र सरकार का कहना है कि पीएफ़आई का संबंध आतंकवादी संगठन जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश और प्रतिबंधित संगठन सिमी से रहा है.
- केंद्र सरकार के अनुसार पीएफ़आई देश की आतंरिक सुरक्षा के लिए एक बड़ा ख़तरा बन गया है.
केंद्र सरकार ने पॉपुलर फ़्रंट ऑफ़ इंडिया यानी पीएफ़आई पर पाँच साल के लिए पाबंदी लगा दी है. सरकार ने पीएफ़आई पर 'गुप्त एजेंडा चलाकर एक वर्ग विशेष को कट्टर बनाने' और 'आतंकवादी संगठनों से जुड़े होने' की बात कही है.
पिछले दिनों राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने पॉपुलर फ़्रंट ऑफ़ इंडिया यानी पीएफ़आई के अलग-अलग राज्यों में मौजूद ठिकानों पर कई दिनों तक छापेमारी की थी. संगठन के महासचिव अनीस अहमद सहित बड़ी संख्या में लोगों की गिरफ़्तारी भी हुई थी.
एनआईए ने भी अपने बयान में गिरफ़्तार गए लोगों पर 'आतंकवादी गतिविधियों का समर्थन' करने के आरोप लगाया था.
हालाँकि उस समय पीएफ़आई ने इन आरोपों को ख़ारिज करते हुए इसे सनसनीखेज़ और आतंक का माहौल पैदा करने वाला बताया था.
पीएफ़आई लंबे समय से जांच एजेंसियों के रडार पर रहा है.
सरकार ने क्या कहा है?
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पीएफ़आई पर बैन लगाने की अधिसूचना जारी करते हुए कहा है- पीएफ़आई और इसके सहयोगी संगठन या संबद्ध संस्थाएँ या अग्रणी संगठन एक सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक संगठन के रूप में काम करते हैं, लेकिन ये गुप्त एजेंडा के तहत समाज के एक वर्ग विशेष को कट्टर बनाकर लोकतंत्र की अवधारणा को कमज़ोर करने की दिशा में काम करते हैं.
साथ ही ये भी कहा गया है कि "पीएफआई कई आपराधिक और आतंकवादी मामलों में शामिल रहा है और ये देश के संवैधानिक प्राधिकार का अनादर करता है. साथ ही ये बाहर से फंडिंग लेकर देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक बड़ा ख़तरा बन गया है."
कैसे और कब गठन हुआ पीएफ़आई का
1980 के दशक में उग्र हिंदुत्व का प्रसार और 1992 में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद समाजशास्त्री जाविद आलम के शब्दों में 'भारतीय शासन और राजनीति के प्रति मुसलमानों की सोच में' बड़ी तब्दीलियों को जन्म दिया था.
दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम अहमद बुख़ारी की 'आदम सेना' से लेकर, बिहार की 'पसमांदा मुस्लिम महाज़' और मुंबई की 'भारतीय अल्पसंख्यक सुरक्षा महासंघ' तक इसी दौर में वजूद में आए.
केरल में 'नेशनल डेवलेपमेंट फ्रंट' (एनडीएफ़), तमिलनाडु की 'मनिथा निथि पसाराई' और 'कर्नाटक फ़ोरम फ़ॉर डिग्निटी' की स्थापना भी इसी दौर में हुई.
ये तीनों संस्थाएँ हालाँकि स्थापना के कुछ सालों बाद साल 2004 से ही तालमेल करने लगी थीं.
22 नवंबर, 2006 में केरल के कोज़िकोड में हुई एक बैठक में तीनों ने विलय कर 'पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया' (पीएफ़आई) बनाने का फ़ैसला लिया. आधिकारिक तौर पर पीएफ़आई की स्थापना 17 फ़रवरी, 2007 को हुई.
केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक के तीन संगठनों के विलय के दो सालों बाद पश्चिमी भारतीय राज्य गोवा, उत्तर के राजस्थान, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और उत्तर-पूर्वी राज्य मणिपुर के पाँच संगठन पीएफ़आई में मिल गए.
ख़ुद को 'भारत का सबसे तेज़ी से बढ़ने वाले काडर बेस्ड जन-आंदोलन बताने वाला' पीएफ़आई 23 राज्यों में फैले होने और चार लाख सदस्यता का दावा करता है.
ऑक्सफोर्ड स्कॉलर वाल्टर एमरिक ने अपनी किताब में पीएफ़आई की स्थापना को अहम बताया था, उनके अनुसार ये पहली बार था कि मुस्लिम राजनीति का संचालन दक्षिण भारत से करने की कोशिश की गई थी.
उनके अनुसार ये एक काडर-बेस्ड पार्टी थी और इसके नेतागण कामकाजी समूह से संबंध रखते थे.
पीएफ़आई अपनी वेबसाइट पर ख़ुद को एक ऐसी संस्था बताता है, जिसका उद्देश्य सामाजिक और आर्थिक बराबरी क़ायम करना है, राष्ट्रीय एकता और अखंडता की बात भी वो करता रहा है, हालाँकि भारत सरकार ऐसा नहीं सोचती थी.
संस्था के ख़िलाफ़ राजद्रोह, ग़ैर-क़ानूनी कामों में संलग्न होने, समुदायों के बीच नफ़रत फैलाने, और भारत की अखंडता को नुक़सान पहुंचाने की कोशिश और आतंकवाद फैलाने जैसे संगीन आरोप सुरक्षा एजेंसियों की ओर से एक के बाद दूसरे मुक़दमों में लगाए जाते रहे थे.
सिमी से संबंध का आरोप
राजस्थान में एक हिंदू व्यक्ति की हत्या के मामले में भी पीएफ़आई का नाम लिया गया था.
पटना में पुलिस ने इस तरह के दस्तावेज़ छापे के दौरान पाए जाने का दावा किया था, जिनमें साल 2047 तक इस्लामी राज्य के गठन का रोडमैप था.
संगठन ने तब पुलिस की ओर से ज़ब्त किए गए दस्तावेज़ को फ़र्ज़ी बताया था.
हालाँकि पीएफ़आई पर पिछले हफ़्ते भर में सैकड़ों छापे पड़े और संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, लेकिन वो साल 2007 में अपनी स्थापना के बाद से ही लगातार सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर रहा है.
साल 2008 से एनआईए ने उस पर नज़र बनाकर रखा था.
प्रोफेसर टीजे जोसफ़ का मामला मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल में ही केंद्रीय जांच एजेंसी को सौंप दिया गया था.
इस मामले में अदालत में संगठन से जुड़े कुछ लोगों को सज़ा भी हुई है.
मलयालम के प्रोफ़ेसर जोसफ़ पर हमला इस नाम पर किया गया था कि उन्होंने पैगंबर मोहम्मद के साथ बेअदबी की थी.
संगठन बनने के बाद से ही ये आरोप लगते रहे हैं कि पीएफ़आई प्रतिबंधित कट्टरपंथी इस्लामी संगठन 'स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ़ इंडिया' (सिमी) का ही दूसरा रूप है.
भारत सरकार ने जिन संगठनों को 'आतंकवादी' घोषित करते हुए प्रतिबंधित कर रखा है उनमें सिमी का नाम है. सिमी पर प्रतिबंध साल 2001 में लगाया गया.
सिमी के रिश्ते एक अन्य इस्लामी चरमपंथी संगठन 'इंडियन मुजाहिदीन' से होने की बातें भी कही जाती रही हैं. भारत सरकार ने इंडियन मुजाहिदीन पर भी ग़ैर-कानूनी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में प्रतिबंध लगा रखा है.
पीएफ़आई और सिमी के संबंध होने की बात ख़ास तौर पर इसलिए उठती रही है, क्योंकि सिमी के कई पूर्व सदस्य पीएफ़आई में सक्रिय रहे हैं.
एक आरोप ये भी है कि 'पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया' की स्थापना ही इसलिए हुई क्योंकि सरकार ने सिमी पर प्रतिबंध लगा दिया और इस कारण कुछ पूर्व सिमी सदस्यों ने दूसरे नाम से एक संस्था शुरू कर दी.
पीएफ़आई का गठन सिमी पर प्रतिबंध लगने के छह साल बाद 2007 में हुआ था.
हालांकि संस्था के संस्थापकों में से एक प्रोफेसर पी कोया ने बीबीसी से एक पुरानी बातचीत में इस संबंध को ख़ारिज करते हुए कहा था कि एनडीएफ़ 1993 में वजूद में आई जबकि सिमी से उनके संबंध साल 1981 में समाप्त हो गए थे.
एनडीएफ़ उन तीन संस्थाओं में से एक थी जिनके विलय के बाद पीएफ़आई की स्थापना हुई थी.
लंबी-चौड़ी सदस्यता और संगठन शक्ति के दावे के बावजूद संगठन को राजनीतिक तौर पर केरल और कर्नाटक के कुछ हिस्सों में मामूली सफलताएँ ही अब तक हासिल हो पाई थीं.
कर्नाटक में स्कूल में हिजाब पहनने के अधिकार मामले में सरकारी वकील ने अदालत के समक्ष दावा किया था कि हिजाब के मामले को पीएफ़आई बढ़ावा देने की कोशिश कर रही है.
कहा गया कि वो मुस्लिम महिलाओं को इस बात के लिए मानसिक तौर पर तैयार करने की कोशिश करता है कि वो हिजाब का इस्तेमाल करें.
इस मामले में कैंपस फ्रंट ऑफ़ इंडिया और नेशनल वीमेंस फ्रंट का नाम भी आया था. ये संस्थाएं भी प्रतिबंधित कर दी गई हैं.
सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ इंडिया पीएफ़आई का राजनीतिक धड़ा रहा है. हालाँकि पीएफ़आई के लोग दोनों में सीधे संबंध की बात से इनकार करते रहे हैं.
कर्नाटक में जहाँ अगले साल चुनाव होने हैं, उसके तटवर्ती क्षेत्रों में पीएफ़आई का प्रभाव बढ़ता बताया जाता रहा है.
केरल में राजनीतिक हिंसा की वारदातों में पुलिस संगठन का नाम लेती रही है.
पीएफ़आई का घोषित एजेंडा
संस्था के अनुसार उसका मिशन, एक भेदभावहीन समाज की स्थापना है, जिसमें सभी को आज़ादी, न्याय और सुरक्षा मिल सके और इसमें बदलाव के लिए वो वर्तमान सामाजिक और आर्थिक पॉलिसियों में बदलाव लाना चाहती है ताकि दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यकों को उनका हक़ मिल सके.
अपना उद्देश्य वो देश की अखंडता, सामुदायिक भाईचारा और सामाजिक सदभाव बताती है. साथ ही लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता की पॉलिसी और न्याय व्यवस्था को क़ायम रखने की बात करती है.
भारत सरकार ऐसा नहीं मानती. संस्था के विरुद्ध दाख़िल एक के बाद दूसरे मामलों में राजद्रोह, ग़ैर-क़ानूनी गतिविधियों में शामिल होने (यूएपीए), समुदायों के बीच नफ़रत फैलाने, विदेशी फंड से देश की अखंडता को नुक़सान पहुँचाने और अशांति फैलाने का आरोप लगता रहा है.
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