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मुकुल रोहतगी दोबारा अटॉर्नी जनरल, वाजपेयी के ज़माने से भरोसेमंद जेटली के दोस्त
- Author, इक़बाल अहमद और सुचित्र मोहंती
- पदनाम, बीबीसी हिंदी
भारत के अगले अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी और पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली की दोस्ती जग-ज़ाहिर है. कहा जाता है कि 2014 में केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद उस समय क़ानून मंत्री रहे अरुण जेटली की मदद से ही मुकुल रोहतगी को पहली बार अटॉर्नी जनरल बनाया गया था.
लेकिन उससे कई बरस पहले एक ऐसा मौक़ा भी आया था जब मुकुल रोहतगी ने अरुण जेटली की मदद की थी.
बात है 1989 की. 1989 के आम चुनाव में कांग्रेस की हार हुई थी और कई पार्टियों के गठबंधन से बनने वाले नेशनल फ़्रंट की सरकार का गठन हुआ था जिसकी अगुवाई कर रहे थे वीपी सिंह.
वीपी सिंह अरुण जेटली को एडिशनल सॉलिसिटर जनरल बनाना चाहते थे, लेकिन जेटली उस समय दिल्ली हाईकोर्ट में एक जूनियर वकील थे.
जब मुकुल रोहतगी को इस बात का पता चला तो उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट के कई जजों से अपील की कि जेटली को सीनियर वकील बना दिया जाए. रोहतगी के अनुसार, कुछ ही घंटों में अरुण जेटली को सीनियर वकील बना दिया गया और अगले दिन केंद्र सरकार ने उन्हें एडिशनल सॉलिसिटर जनरल बना दिया.
जेटली से अपनी दोस्ती का ज़िक्र उन्होंने कई बार मीडिया से बातचीत के दौरान किया है. न्यूज़ एक्स चैनल को दिए एक इंटरव्यू में मुकुल रोहतगी ने कहा था कि जेटली से उनकी मुलाक़ात 1978 में हुई थी. दिल्ली हाईकोर्ट में दोनों का चैंबर भी आस-पास ही था. 1978 से शुरू हुई यह दोस्ती और गाढ़ी होती गई और जेटली जब केंद्र में मंत्री बन गए तब भी दोनों की दोस्ती बरक़रार रही और उनके अनुसार उस वक़्त भी हफ़्ते में कम से कम एक बार दोनों की मुलाक़ात हो ही जाती थी.
मौजूदा अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल 30 सितंबर को रिटायर हो रहे हैं.
वेणुगोपाल का कार्यकाल इसी साल 30 जून को ख़त्म होने वाला था, लेकिन केंद्र सरकार ने उनके कार्यकाल को तीन महीने या अगले आदेश तक के लिए बढ़ा दिया था.
मुकुल रोहतगी
साल 2014 से 2017 तक रह चुके हैं भारत के अटॉर्नी जनरल
दोबारा बनने जा रहे हैं भारत के अटॉर्नी जनरल
एक अक्टूबर को संभालेंगे 16वें अटॉर्नी जनरल का कार्यभार
मुकुल रोहतगी की शख़्सियत
मुकुल रोहतगी इससे पहले 2014 से लेकर 2017 तक तीन सालों के लिए अटॉर्नी जनरल रह चुके हैं. 2017 में उन्होंने यह कहते हुए इस्तीफ़ा दे दिया था कि वो अब एक बार फिर प्राइवेट प्रैक्टिस करना चाहते हैं.
रोहतगी इस समय सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता हैं. एक अक्टूबर को रोहतगी भारत के 16वें अटॉर्नी जनरल के रूप में अपना कार्यकाल शुरू करेंगे.
देश के कई हाईप्रोफ़ाइल केस के वकील रह चुके मुकुल रोहतगी वकीलों के परिवार से आते हैं. उनके पिता भी एक वरिष्ठ वकील थे जो बाद में दिल्ली हाईकोर्ट के जज बन कर रिटायर हुए थे.
मुकुल रोहतगी का जन्म 1955 में मुंबई में हुआ था. लेकिन शुरुआती पढ़ाई दिल्ली और मुंबई में हुई.
एलएलबी तो मुंबई के गवर्नमेंट लॉ कॉलेज से किया, लेकिन वकील की हैसियत से रजिस्ट्रेशन कराया दिल्ली बार काउंसिल में.
उन्होंने दिल्ली में योगेश कुमार सभरवाल के मातहत वकालत शुरू की और बहुत जल्द ही कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ने लगे. योगेश कुमार सभरवाल भी बाद में भारत के चीफ़ जस्टिस (2005-2007) बने. मुकुल रोहतगी जस्टिस सभरवाल को ही अपना मेंटॉर मानते हैं.
महज़ 38 साल की उम्र में 1993 में रोहतगी दिल्ली हाईकोर्ट के सीनियर एडवोकेट बन गए थे.
केंद्र में जब वाजपेयी की सरकार थी तब 1999 में उन्हें एडिशनल सॉलिसीटर जनरल बनाया गया.
कभी सरकार के लॉ ऑफ़िसर तो कभी कॉरपोरेट वकील की हैसियत से वो लगातार सफलता हासिल करते रहे और जब 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार बनी तो मुकुल रोहतगी को भारत का अटॉर्नी जनरल बनाया गया.
शाहरुख़ ख़ान के बेटे भी रहे मुवक्किल
मुकुल रोहतगी ने वकालत के अपने लंबे करियर में 2002 के गुजरात दंगों से लेकर 2022 में फ़िल्म स्टार शाहरुख़ ख़ान के बेटे आर्यन ख़ान तक का केस लड़ा है.
आर्यन ख़ान को ड्रग्स के एक मामले में गिरफ़्तार किया गया था. मुकुल रोहतगी ने आर्यन ख़ान को बेल दिलवाया और फिर बाद में जांच के बाद आर्यन ख़ान को इस मामले में पूरी तरह से बेगुनाह पाया गया.
जज बीएच लोया की मौत के मामले में भी मुकुल रोहतगी ने महाराष्ट्र सरकार की तरफ़ से केस लड़ा था और महाराष्ट्र सरकार को इस मामले में क्लीन चिट दिलाने में मदद की थी.
मुकल रोहतगी के मुवक्किलों में पत्रकार राजदीप सरदेसाई और अर्नब गोस्वामी से लेकर झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा, कांग्रेस नेता शशि थरूर, अकाली नेता बिक्रम सिंह मजीठिया तक रहे हैं.
वो पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या मामले में दोषी क़रार दिए गए बलवंत सिंह राजोआना, दिल्ली के पूर्व पुलिस आयुक्त राकेश अस्थाना और मुंबई के पूर्व पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह और संजय पांडे के भी वकील रह चुके हैं.
मुकुल रोहतगी एक सफल कॉरपोरेट वकील रहे हैं और एक समय ऐसा भी था जब वो मुंबई में ही बसना चाहते थे क्योंकि मुंबई ही देश की वित्तीय राजधानी है. मुकुल का जन्म मुंबई में हुआ था और मुंबई उनकी ननिहाल भी है. आज जिस जगह पर मुकेश अंबानी का बंगला एंटिला है कभी उसके सामने उनके नाना का घर हुआ करता था और मुकुल रोहतगी के बचपन का बहुत वक़्त वहां गुज़रा है. हालांकि अंबानी परिवार उस समय वहां नहीं रहता था और एंटिला बहुत बाद में बना था.
लेकिन यह सच है कि उन्होंने रिलायंस की तरफ़ से भी केस लड़ा है.
रिलायंस के अलावा उन्होंने फ़्यूचर ग्रुप की तरफ़ से भी केस लड़ा है जिसमें उनके ख़िलाफ़ अमेज़ॉन जैसी बड़ी कंपनी थी. उन्होंने फ़ेसबुक और व्हाट्सऐप का भी दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में बचाव किया है.
इसके अलावा उन्होंने दिल्ली के रियल एस्टेट मुग़ल सुशील और गोपाल अंसल का भी केस लड़ा है.
गुजरात दंगों से जुड़े केस सबसे चुनौतीपूर्ण
लेकिन उनके करियर के सबसे चुनौतीपूर्ण केस गुजरात दंगों से जुड़े रहे हैं.
गुजरात में 2002 में सांप्रदायिक दंगे हुए थे जिसमें आधिकारिक तौर पर क़रीब 1200 लोग मारे गए थे. मरने वालों में ज़्यादा मुसलमान थे.
नरेंद्र मोदी उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री थे और यह मुद्दा ना केवल राष्ट्रीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया था.
मुकुल रोहतगी ने उस समय गुजरात सरकार और नरेंद्र मोदी की तरफ़ से केस लड़ा था.
मुकुल रोहतगी ने कई इंटरव्यू में कहा है कि यह उनके करियर का सबसे चुनौतीपूर्ण मामला था क्योंकि उनके अनुसार उस समय कोर्ट का माहौल बहुत ही 'होस्टाइल' था.
उस समय गुजरात सरकार और ख़ासकर मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का बचाव करने के लिए उन्हें कई लोगों के विरोध का भी सामना करना पड़ा, लेकिन वो ख़ुद इस बात को मानते हैं कि इससे उन्हें एक वकील के तौर पर बहुत सफलता भी मिली.
जब मुकुल को हार का मुंह देखना पड़ा
मुकुल रोहतगी ने अपने मुवक्किलों को अदालत से तो कई बार राहत दिलवाई है, लेकिन कई ऐसे मौक़े भी आए जब उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ा.
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) मामले में अटॉर्नी जनरल होने के नाते मुकुल रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार का बचाव किया. लेकिन इस मामले में मोदी सरकार को बड़ा झटका लगा क्योंकि सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने NJAC को रद्द कर दिया था.
सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले के बाद क़रीब एक साल तक केंद्र सरकार और न्यायपालिका के बीच रिश्तों में खटास आ गई थी.
इसी तरह उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाने के मामले में भी मुकुल रोहतगी की काफ़ी फ़ज़ीहत हुई थी.
केंद्र सरकार ने उत्तराखंड की कांग्रेस सरकार को भंग करते हुए वहां राष्ट्रपति शासन लगा दिया था. केंद्र सरकार की पैरवी करने मुकुल रोहतगी उत्तराखंड हाईकोर्ट में पेश हुए, लेकिन हाईकोर्ट ने राष्ट्रपति शासन लगाने के फ़ैसले को रद्द कर दिया.
बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने उस समय मुकुल रोहतगी को एजी के पद से हटाए जाने की खुलेआम मांग की थी.
महाराष्ट्र सरकार के मराठों को आरक्षण दिए जाने के फ़ैसले का भी रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट में बचाव किया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक क़रार दिया था.
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