लिंगायत मठ के स्वामी शिवमूर्ति गिरफ़्तार, यौन उत्पीड़न के आरोप

    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बेंगलुरू से बीबीसी हिंदी के लिए

कर्नाटक में सबसे ताकतवर लिंगायत मठों में से एक के प्रमुख डॉ. शिवमूर्ति मुरुगा शरणरु को दो किशोरियों के यौन उत्पीड़न के आरोपों के बाद गुरुवार को गिरफ्तार कर लिया गया. उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में चित्रदुर्ग ज़िला जेल भेज दिया गया है.

पुलिस के मुताबिक इस मामले में एससी एसटी एक्ट का भी उल्लंघन पाया गया है.

कर्नाटक के एडीजीपी, लॉ एंड ऑर्डर आलोक कुमार ने बीबीसी हिंदी को बताया, "डॉ. शिवमूर्ति को कोर्ट के सामने सीआरपीसी की धारा 164 के तहत बयान दर्ज किए जाने के बाद गिरफ़्तार किया गया."

पुलिस ने मामले में मठ छात्रावास की वार्डन रश्मि को भी कई घंटों तक पूछताछ के बाद गिरफ़्तार कर लिया. उनके बाद स्वामी शिवमूर्ति को भी गिरफ़्तार किया गया.

डॉ. शिवमूर्ति की अग्रिम ज़मानत याचिका पर शुक्रवार को सुनवाई शुरू होनी थी.

इस बीच, मठ से बर्खास्त अधिकारी एसके बसवराजन को दोपहर में अग्रिम जमानत मिल गई.

मठ हॉस्टल की वार्डन रश्मि ने जनता दल सेक्युलर (जेडीएस) के पूर्व विधायक बसवराजन पर यौन शोषण और डराने-धमकाने का आरोप लगाया था. उनकी पत्नी पर भी उनके कथित अपराध में साथ देने का आरोप लगाया गया था.

उन्होंने संवाददाताओं से कहा कि वह "साज़िश में शामिल नहीं थे".

उन्होंने कहा, "अब ये कानूनी लड़ाई है और मैं ये ज़रूर साबित करूंगा कि मैंने कुछ गलत नहीं किया."

स्वामी शिवमूर्ति पर पोक्सो के तहत मैसुरू में एफआईआर दर्ज कराई गई थी. इसके बाद मंगलवार को कथित यौन हिंसा के शिकार दो लड़कियों ने उनके खिलाफ सीआरपीसी की धारा 164 तहत मजिस्ट्रेट के सामने बयान दर्ज कराए.

रश्मि ने अपने बचाव में कहा था कि बसवराजन 27 जुलाई को लड़कियों के हॉस्टल आए थे और इस दौरान उन्होंने रेप करने की कोशिश की. जब उन्हें रोकने की कोशिश की गई तो "बसवराजन ने मुझे जान से मारने की धमकी दी."

वहीं, पूर्व ज़िला पंचायत अध्यक्ष और बसवराजन की पत्नी सौभाग्य ने मीडिया को बताया कि वो और उनके पति उत्पीड़न का शिकार हो रहीं लड़कियों को बचाने के लिए हॉस्टल गए थे.

बसवराजन ने मीडिया से कहा, "हम उन लड़कियों को अपने घर ले गए लेकिन बाद में पुलिस ने हमें सुझाव दिया कि हम लड़कियों को अपने घर पर न रखें. इसलिए, अगले दिन हमने उनके माता-पिता से बच्चियों को ले जाने के लिए कहा."

क्या है मामला?

कर्नाटक के दूसरे मठों की तरह ही मुरुगा मठ भी अपने चित्रदुर्ग स्थित मुख्यालय से 150 आध्यात्मिक और शैक्षणिक संस्थाएं चलाता है.

लिंगायत 12वीं सदी के समाज सुधारक वासवन्ना के अनुयायी हैं. कर्नाटक की कुल आबादी में लिंगायत 17 फीसदी हैं.

बीते सप्ताह स्वामी शिवमूर्ति पर मैसुरू में पोक्सो कानून के तहत एफ़आईआर दर्ज कराई गई थी.

इसके बाद बीते मंगलवार को कथित यौन हिंसा के शिकार दो लड़कियों ने स्वामी शिवमूर्ति के खिलाफ सीआरपीसी की धारा 164 तहत मजिस्ट्रेट के सामने बयान दर्ज कराए.

स्वामीजी के खिलाफ जो शिकायत दर्ज कराई गई है उसमें कहा गया है कि वह अपने मठ के होस्टल में रहने वाली हाई स्कूल की छात्राओं का यौन शोषण करते थे.

कथित यौन शोषण की शिकार एक लड़की ने महिला और बाल कल्याण विभाग से कहा कि वह अनुसूचित जाति समुदाय से आती है.

इसलिए इस मामले में अनुसूचित जाति, जनजाति अत्याचार निरोधक कानून के तहत भी केस दर्ज किया गया.

शिकायत दर्ज कराने में इतना समय क्यों लगा?

मैसुरू के एनजीओ ओडांडी सेवा समस्ते के मुताबिक कथित यौन शोषण की शिकार दोनों नाबालिग लड़कियों ने पहले चित्रदुर्ग में शिकायत दर्ज कराने की कोशिश की और फिर वे बेंगलुरू की ओर चल पड़ीं.

ओडांडी सेवा समस्ते के संस्थापकों में से एक परशुराम एमएल ने बीबीसी हिंदी को बताया, '' लेकिन दोनों जगह उनकी कोशिश नाकाम रही. इसके बाद दोनों अपने-अपने घर लौट गईं. लेकिन उनके माता-पिता को उनका दर्द तब समझ में आया जब वे रात को नींद में चिल्ला कर उठने लगीं. इसके बाद उन्होंने स्कूल लौटने से मना कर दिया. ''

इसके बाद मैसुरू के नज़ाराबाद पुलिस को बाल विकास और संरक्षण अधिकारी ने शिकायत की.

इस शिकायत के बाद मठ के स्वामीजी और अन्य के खिलाफ पोक्सो एक्ट की धारा 5 (सहवास की कोशिश) के अलावा आईपीसी की धारा 376 (सी) (एन) (एक ही महिला से बार-बार बलात्कार) धारा 376 (3) (16 से कम उम्र की लड़की से रेप) और धारा 149 (गैरकानूनी जमावड़ा) केस दर्ज किया गया.

मामले में हॉस्टल वार्डन रश्मि समेत पांच लोगों के खिलाफ एफआईआर की गई है. केस को मैसुरू ट्रांसफर कर दिया गया क्योंकि कथित घटना चित्रदुर्ग में हुई थी.

कथित यौन हिंसा मामले में केस दर्ज किए जाने के बाद चित्रदुर्ग पुलिस ने मठ के प्रशासनिक अधिकारी एसके बासवराजन के खिलाफ यौन हिंसा दुर्व्यवहार के आरोप में शिकायत दर्ज की.

लड़की की शिकायत में कहा गया है, '' बासवराजन ने मेरा बलात्कार करने की कोशिश की, मैंने इसका विरोध किया. इससे वो बेहद गुस्सा हो गए और उन्होंने मुझे मार डालने की धमकी दी. ''

लड़की ने आरोप लगाया कि बासवराजन ने उनका यौन उत्पीड़न इसलिए किया क्योंकि वो दोनों लड़कियों को हॉस्टल से बाहर ले जाने की कोशिश कर रहे थे और लड़की ने इस पर सवाल उठाए थे.

इस मामले में आईपीसी की धारा 354ए ( महिला की गरिमा के साथ छेड़छाड़) धारा 506 (अपराध की नीयत से रोकना) और धारा 504 (व्यक्ति का जानबूझ कर अपमान करना) के तहत भी मामला दर्ज कराया गया है.

स्वामीजी और राजनीति

इस मामले के सामने आने के फ़ौरन बाद पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने स्वामीजी ने खुलकर स्वामी का समर्थन किया. उन्होंने कहा, '' ये स्वामीजी के खिलाफ साज़िश है. उनके खिलाफ लगाए गए आरोप में कोई सच्चाई नहीं है. जांच के बाद सच सामने आ जाएगा. ''

हालांकि मुख्यमंत्री बासवराज बोम्मई ने कहा है कि सच का पता जांच के बाद ही चलेगा.

उधर, डॉ. शिवमूर्ति मुरुगा शरणरु ने मठ के अनुयायियों से कहा है कि वे इन आरोपों से घबराएं नहीं. उन्होंने कहा, '' ये मेरी छवि धूमिल करने के लिए रची गई साजिश है''. उन्होंने कहा कि वो जांच में पुलिस का पूरा सहयोग करेंगे.

स्वामीजी ने कांग्रेस सरकार का उस वक्त समर्थन किया था जब उसने लिंगायतों के धर्म को अलग धर्म घोषित करने का प्रस्ताव किया था. पिछले महीने उन्होंने राहुल गांधी को दीक्षा दी थी.

मुरुगा मठ उन मठों में से एक है जो समाज सुधारक संत भगवान बसवेश्वर के सुधारवादी आंदोलन के बताए मार्गों पर चलता है. बसवेश्वर ब्राह्मणवाद और वैदिक कर्मकांडों के खिलाफ विद्रोह किया था.

लिंगायत कौन होते हैं?

लिंगायतों का मानना है कि वो हिंदू नहीं हैं क्योंकि उनका पूजा करने का तरीका हिंदुओं से बिलकुल अलग है. वो निराकार शिव की आराधना करते हैं. वो मंदिर नहीं जाते और ना ही मूर्ति की पूजा करते हैं.

लिंगायतों में ही एक पंथ वीरेशैव लिंगायत का है जो शिव की मूर्ति की पूजा भी करता है और अपने गले में लिंग धारण भी करता है. वीरेशैवा पंथ के लिंगायत हिंदू धर्म से अलग होने का विरोध करते आ रहे हैं.

वीरेशैवा पंथ की शुरुआत जगत गुरू रेनुकाचार्य ने की. उन्होंने पांच पीठों की स्थापना की जैसे आदि शंकराचार्य ने की थी. इन पांच पीठों में से सबसे महत्वपूर्ण मठ चिकमंगलूर का रंभापूरी मठ है.

इतिहासकार संगमेश सवादातीमठ ने 13वीं शताब्दी के कन्नड़ कवि हरिहर के हवाले से बताया कि वीरेशैवा पंथ काफ़ी प्राचीन है.

उन्होंने बीबीसी से कहा था कि पंथ के संस्थापक जगतगुरु रेनुकाचार्य का उदय आंध्रप्रदेश के कोल्लिपक्का गावं में सोमेश्वर लिंग से हुआ था.

जगत गुरु रेनुकाचार्य के बारे में शिवयोगी शिवाचार्य ने भी लिखा है और संस्कृत में लिखे कई दस्तावेज़ मौजूद हैं जिससे पता चलता है कि वीरेशैवा पंथ के मानने वाले लोग किस तरह उपासना करते हैं.

वो लिंग धारण भी करते हैं और शिव की मूर्ति की पूजा भी करते हैं. वीरेशैवा वैदिक धर्मों में से एक है. मगर 12वीं शताब्दी में बस्वाचार्य का उदय हुआ जो जगतगुरु रेनुकाचार्य के अनुयायी थे.

काम को पूजा मानता है ये पंथ

हालांकि, बाद में बस्वाचार्य यानी बासवन्ना ने सनातन धर्म के विकल्प में एक पंथ खड़ा किया जिसने निराकार शिव की परिकल्पना की.

बासवन्ना ने जाति और लिंग भेद के खिलाफ़ काम करना शुरू किया. उनके वचनों में काम को ही पूजा कहा गया है.

जगतगुरु शिवमूर्ति ने बीबीसी से बताया था, ''बस्वन्ना के वचनों से प्रभावित होकर सभी जाति के लोगों ने लिंगायत धर्म को अपनाया जिसमे जाति और काम को लेकर कोई मतभेद नहीं था.''

उन्होंने कहा था, "बस इतना कि निराकार शिव की उपासना और आडंबर के खिलाफ़ काम करना ही लिंगायत का कर्म और धर्म है."

जहां वीरेशैवा पंथ को मानने वाले जनेऊ धारण करते हैं. लिंगायत जनेऊ धारण तो नहीं करते हैं लेकिन इष्ट शिवलिंग को अपनाते हैं. उसे धारण करते हैं और उसकी उपासना करते हैं.

जहाँ वीरेशैवा वेद और पुरानों पर आस्था रखते हैं लिंगायत बासवन्ना के 'शरण' यानी वचनों पर चलते हैं जो संस्कृत में नहीं बल्कि स्थानीय भाषा कन्नड़ में हैं.

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