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भारत में लगातार बढ़ रहे बच्चों से रेप के मामले, क्यों नहीं रुक रहे अपराध
- Author, राघवेंद्र राव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
साल 2021 में भारत में नाबालिग़ों के साथ बलात्कार की घटनाओं में एक बड़ा उछाल देखा गया है.
नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) की नवीनतम रिपोर्ट के मुताबिक 2021 में जहां 18 साल से ज़्यादा आयु की महिलाओं के साथ बलात्कार के कुल 28,644 मामले दर्ज हुए, वहीं नाबालिग़ों के साथ बलात्कार की कुल 36,069 घटनाएं हुईं.
इन 36,069 घटनाओं का एक बड़ा हिस्सा प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्शुअल ऑफेंसिस एक्ट (पॉक्सो) के तहत दर्ज हुआ जबकि बाकि मामले इंडियन पीनल कोड या भारतीय दंड संहिता की धारा के तहत दर्ज किए गए.
पिछले पांच साल के आँकड़े बताते हैं कि 18 साल से ज़्यादा उम्र की महिलाओं के साथ बलात्कार के मामलों की तुलना में नाबालिग़ों के साथ बलात्कार की घटनाएं लगातार बढ़ती दिखी हैं (ग्राफ देखें).
क्या हैं इन आँकड़ों के मायने?
एनसीआरबी की रिपोर्ट में प्रकाशित आँकड़ों को समझने के बारे में एक चेतावनी दी गई है.इसमें कहा गया है कि ये धारणा भ्रामक है कि आँकड़ों का ऊपर की ओर बढ़ना अपराध में वृद्धि की तरफ इशारा करता है और ये दिखाता है कि पुलिस प्रभावी नहीं है.
तो नाबालिग़ों के साथ बलात्कार के बढ़ते मामलों को कैसे देखा जाए?
वकील अनंत अस्थाना बच्चों के अधिकारों से जुड़े मामलों पर काम करते हैं. उनका कहना है कि इन मामलों की रिपोर्टिंग में जो उछाल देखने को मिल रहा है उसकी वजह ना केवल पॉक्सो कानून (का लागू होना) है, बल्कि इसका बेहतर क्रियान्वयन भी है.
प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्शुअल ऑफेंसिस एक्ट (पॉक्सो) साल 2012 में लागू किया गया था जिसका मक़सद बच्चों को यौन उत्पीड़न और अश्लीलता से जुड़े अपराधों से बचाना है.
इस कानून के तहत 18 साल से कम उम्र के व्यक्ति को बच्चा माना गया है और बच्चों के खिलाफ अपराधों के लिए कड़ी सजा का प्रावधान है. ये कानून बच्चों के खिलाफ अपराधों को 'जेंडर न्यूट्रल' भी बनाता है जिसका मतलब है कि ये कानून लड़कियों और लड़कों दोनों के खिलाफ हुए अपराधों का संज्ञान लेता है.
पॉक्सो एक्ट के लागू होने से पहले नाबालिग़ों के साथ होने वाले बलात्कार आईपीसी की धारा 376 के तहत ही दर्ज किये जाते थे.
वकील अनंत अस्थाना कहते हैं, "पिछले पांच सालों में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट्स ने जूडिशल और प्रशासनिक स्तर पर जितने प्रयास वो कर सकते हैं वो किए हैं ताकि ये कानून लागू हों. उसका असर ये है कि पहले जिन बहुत सारे मामलों में कोई सोचता भी नहीं था कि ये रिपोर्ट किए जा सकते हैं, वो अब रिपोर्ट होते हैं. उसकी वजह ये है कि सिस्टम पहले की अपेक्षा बेहतर तरीके से काम कर रहा है और समाज में जागरूकता बढ़ी है. कुछ साल पहले तक पॉक्सो जैसे कानून के बारे में लोग जानते ही नहीं थे."
अनंत अस्थाना कहते हैं कि पॉक्सो कानून को लेकर बहुत सारे एनजीओ जागरूकता अभियान चलाते रहते हैं. वो कहते हैं, "इन कानूनों के बारे में जागरूकता फैली है और भरोसा पैदा हुआ है कि पुलिस के पास जाएंगे तो न्याय मिलेगा."
'आसान ऑनलाइन पहुँच, पॉर्नोग्राफी चिंता के विषय'
भारती अली एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और हक़ सेंटर फॉर चाइल्ड राइट्स नाम की एक संस्था कि सह-संस्थापक हैं.
भारती अली कहती हैं, "यह नहीं कहा जा सकता है कि आँकड़े सिर्फ इसलिए बढ़ गए हैं क्यूंकि मामलों को ज़्यादा रिपोर्ट किया गया न कि इसलिए कि घटनाएं बढ़ी हैं. ये शायद दोनों ही बातों का मिश्रण है."
उनके मुताबिक इस मसले के कई पहलू हैं जिनमें से एक महत्वपूर्ण पहलू बच्चों के पास उपलब्ध वो ऑनलाइन पहुँच है जिसका दुरूपयोग होने का डर बना रहता है.
भारती अली कहती हैं, "बच्चों की सोशल मीडिया तक पहुंच और जिस तरह से वे दोस्त बनाते हैं उससे जुड़े कई तरह के मुद्दे हैं. तथ्य यह है कि हमारे बच्चे बहुत सारी संदिग्ध सामग्री और रिश्तों के संपर्क में आते हैं जो ऑनलाइन शुरू होते हैं और अपमानजनक स्थितियों में बदल जाते हैं."
उनका ये भी मानना है कि इस तरह के मामलों के बढ़ने के पीछे बच्चों की पॉर्नोग्राफी तक आसान पहुंच भी एक कारण हैं. भारती अली का कहना है कि कोविड-19 महामारी के दौरान भी ऐसी घटनाओं का बढ़ना एक चिंता की बात है.
वे कहती हैं, "आप ये सोचेंगे की महामारी के दौरान लॉकडाउन के समय ज़्यादातर लोग अपने घरों में थे इसलिए घटनाएं कम हुई होंगी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. जब बच्चे घर पर थे तब भी यौन शोषण की घटनाएं जारी रहीं. और इस बात की भी पर्याप्त जानकारी है जो हमें बताती है कि बहुत सारे दुर्व्यवहार ऐसे लोग करते हैं जो बच्चों के करीबी जानकार होते हैं और अक्सर उनके अपने परिवारों से ही होते हैं."
सहमति की उम्र का बढ़ाया जाना भी वजह?
चूंकि पॉक्सो कानून 18 साल से कम उम्र के लोगों को बच्चा मानता है इसलिए इस कानून में सहमति की उम्र 16 साल से बढाकर 18 साल कर दी गई थी.
भारती अली कहती हैं कि सहमति की उम्र को 16 साल से बढाकर 18 साल कर देना भी पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज हो रहे बलात्कार के मामलों की संख्या बढ़ने की एक वजह हो सकती है.
वे कहती हैं, "सहमति की उम्र बढ़ाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भारत में बाल विवाह के मामले भी पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज किए जाने हैं. आज के समय में युवा सहमति से सेक्स कर रहे हैं और बहुत से मामलों में युवाओं के बीच प्रेम संबंधों को माता-पिता अपराध के तौर पर रिपोर्ट कर देते हैं. तो इससे भी आँकड़े बढ़ते हैं."
भारती अली कहती हैं कि पॉक्सो अदालतों में करीब 25-30 फीसदी मामले रोमांटिक रिश्तों के ही होते हैं और अब इनमें बाल विवाह के मामले भी जुड़ने लगे हैं.
चाइल्ड रेप के कुछ मामले पॉक्सो के तहत दर्ज क्यों नहीं हो रहे?
आँकड़ों को गौर से देखने पर ये पता चलता है कि जहां एक तरफ नाबालिग़ों से बलात्कार के मामलों को पॉक्सो कानून के तहत दर्ज किया गया है वहीं दूसरी तरफ ऐसे मामलों को आईपीसी की धारा 376 के तहत भी दर्ज किया गया है.
साल 2021 में नाबालिग़ों के साथ बलात्कार की कुल 36,069 घटनाओं में से 33,036 मामले पॉक्सो के तहत दर्ज हुए और बाकी 3,033 मामले इंडियन पीनल कोड की धारा 376 के तहत दर्ज किए गए.
ऐसा क्यों है? एनसीआरबी के पूर्व निदेशक शारदा प्रसाद कहते हैं, "इस बात की एक वजह ये है कि इस जानकारी का अभाव है कि पॉक्सो एक्ट के प्रावधान लगा कर केस मज़बूत किया जा सकता है."
उनका कहना है कि आईपीसी की धारा 376 के तहत नाबालिग़ों के बलात्कार के मामले दर्ज करने पर कोई मनाही नहीं है लेकिन बहुत कुछ उस पर निर्भर करता है जो पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कर रहा है.
वे कहते हैं, "पॉक्सो के लगने से केस बहुत मज़बूत हो जाता है. तो कई मामलों में ये सम्भावना भी रहती है कि शिकायतकर्ता के ज़ोर देने पर पॉक्सो लगा दिया जाए या आरोपी के प्रभाव के चलते पॉक्सो के प्रावधान न लगाए जाएं." वकील अनंत कुमार अस्थाना शारदा प्रसाद की बात से इत्तेफ़ाक़ रखते हैं.
वे कहते हैं, "पॉक्सो एक्ट में पहले मृत्यदंड नहीं था. अब इसमें मृत्युदंड का प्रावधान है. और पॉक्सो की शब्दावली के मुताबिक जो उम्रकैद है वो दोषी की बची हुई ज़िन्दगी तक है. तो अगर पॉक्सो के तहत उम्रकैद हुई है तो दोषी ज़िंदा जेल से बाहर नहीं आएगा."
अस्थाना के मुताबिक पॉक्सो के प्रावधान लगाने या न लगाने के लिए इसलिए भी दबाव डाला जाता है क्यूंकि ये एक कानून है जिसमें ज़मानत मिलना मुश्किल है. "जब तक गवाही न हो जाए और जब तक जज को ये न लगे कि शिकायत झूठी है ज़मानत का सवाल ही नहीं उठता."
पुलिस की विश्वसनीयता पर सवाल?
अनुजा कपूर एक वकील और क्रिमिनल साइकॉलोजिस्ट हैं.वे कहती हैं, "अगर नाबालिग़ के साथ बलात्कार हुआ है और पॉक्सो एक्ट नहीं लगाया गया तो ये पुलिस की विश्वसनीयता पर सवाल है. पुलिस को इस बात का संज्ञान लेना होगा कि जब किसी बच्चे के साथ बलात्कार होता है तो पॉक्सो एक्ट लगाना ज़रूरी है."
साथ ही वे ये भी कहती हैं कि ज़्यादातर पुलिस थानों मे अधिकारियों को इतना ही पता होता है कि बलात्कार के मामले में आईपीसी की धारा 376 लगानी है. वे कहती हैं कि नाबालिग़ों से बलात्कार के मामले पॉक्सो एक्ट के तहत न दर्ज करने के लिए अक्सर अदालतों में पुलिस को फटकार सुननी पड़ती है.
अनंत कुमार अस्थाना भी मानते हैं कि नाबालिग़ों के बलात्कार के मामलों में पॉक्सो एक्ट के लगाए जाने या न लगाए जाने में एक बहुत बड़ी भूमिका पुलिस की होती है.
वे कहते हैं, "अगर पुलिस ने ये कह दिया कि शिकायतकर्ता नाबालिग़ है तो पॉक्सो लग जाएगा. अगर पुलिस ने कह दिया कि उन्हें नहीं लगता कि शिकायतकर्ता नाबालिग़ है तो मुक़दमा आईपीसी की धारा 376 के तहत दर्ज होगा लेकिन जब अदालत उम्र की जाँच करवा लेगी और अगर साबित होगा कि शिकायतकर्ता नाबालिग़ है तब पॉक्सो की धाराओं को जोड़ा जायेगा."
और क्या बताते हैं आँकड़े?
नाबालिग़ों से बलात्कार के वो मामले जो पॉक्सो कानून के तहत दर्ज किए गए उनमें सबसे ज़्यादा मामले मध्य प्रदेश (3,512 केस), महाराष्ट्र (3,480 केस), तमिलनाड (3,435 केस), उत्तर प्रदेश (2,747 केस), कर्नाटक (2,090 केस) और गुजरात (2,060 केस) से थे.
कुछ ऐसे भी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश हैं जहाँ पॉक्सो एक्ट के तहत बलात्कार का एक भी मामला दर्ज नहीं हुआ. इनमें गोवा, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, चंडीगढ़ और लदाख शामिल हैं.
लेकिन इन राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों में भी आईपीसी की धारा 376 के तहत बलात्कार के कई मामले दर्ज हुए.
दिलचस्प ये भी है कि राजस्थान में पॉक्सो कानून के तहत बलात्कार का एक भी मामला दर्ज नहीं हुआ लेकिन आईपीसी सेक्शन 376 के तहत दर्ज होने वाले सबसे ज़्यादा मामले (6,337 केस) इस राज्य में दर्ज हुए.
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