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हिन्दी दिवस: जानिए हिन्दी क्यों नहीं है राष्ट्रभाषा
- Author, अशोक पांडे
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
हिन्दी दिवस की ख़ास बातें
- 14 सितंबर 1949 को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 से अनुच्छेद 351 के रूप में जो क़ानून बना उसमें हिन्दी को राष्ट्रभाषा नहीं राजभाषा का दर्जा दिया
- तभी से 14 सितंबर को हिन्दी दिवस मनाये जाने की शुरुआत हुई
- 1960 के दशक में ग़ैर-हिन्दी भाषी राज्यों में हुई कई हिंसक झड़पों के बाद देश की संसद ने एक राष्ट्रभाषा के विचार को त्याग दिया
- पिछली जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि भारत के 43.63 प्रतिशत लोग हिंदी बोलते हैं
उत्तराखंड के एक छोटे से क़स्बे रामनगर में बिताया अपना शुरुआती लड़कपन याद करता हूँ तो दो तरह के बच्चे याद आते हैं.
एक मेरे जैसे वे जो टाई पहन कर प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने जाते थे जबकि दूसरी तरह के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते थे और उनकी पोशाक से उनका ग़रीब होना टपकता था.
प्राइवेट स्कूल के बच्चों को नर्सरी क्लास से अंग्रेज़ी पढ़ाई जाती जबकि सरकारी स्कूलों में एबीसीडी सिखाए जाने की शुरुआत छठी कक्षा से होती थी.
उन दिनों प्राइवेट स्कूल अक्सर पांचवीं तक के होते थे. हर छोटे शहर-क़स्बे में आबादी के हिसाब से एक या दो सरकारी इंटर कॉलेज हुआ करते. पाँचवीं पढ़ने के बाद सरकारी और प्राइवेट, दोनों तरह के स्कूलों के बच्चे इन इंटर कॉलेजों की छठी कक्षाओं में साथ पढ़ने लगते थे.
बच्चों की पृष्ठभूमि की पहचान अंग्रेज़ी की पहली ही कक्षा में हो जाती थी. छठी कक्षा में एबीसीडी से शुरू करना प्राइवेट स्कूलों से आए बच्चों को मनोरंजक लगता था क्योंकि वे तब तक अंग्रेज़ी में कविता-कहानी समझने लायक़ हो चुके होते थे.
सरकारी स्कूलों से आए बच्चों के लिए वह एक नई भाषा को सीखने का अनुभव होता था जिसके लिए चार नीली-लाल लाइनों वाली लिखने की कॉपी अलग से ख़रीदनी पड़ती थी.
एचएमटी यानी 'हिंदी मीडियम टाइप'
प्राइवेट स्कूलों से आए बच्चों के भीतर श्रेष्ठता का भाव जगता था और वे सरकारी स्कूल वालों की एचएमटी कह कर खिल्ली उड़ाया करते थे.
एचएमटी मतलब 'हिन्दी मीडियम टाइप'. हालांकि यह बात आज से कोई 42-45 साल पुरानी है. हिंदी माध्यम से पढ़कर आने वाले के लिए मज़ाक़ में बनाया गया यह सम्बोधन रामनगर में आज भी चलता है.
रामनगर से अपनी शुरुआती पढ़ाई तथाकथित अंग्रेज़ी माध्यम में पूरी करने और थोड़ा समय वहीं के इंटर कॉलेज में बिताने के बाद जब मुझे नैनीताल के एक बोर्डिंग स्कूल में भेजा गया. वहाँ पहले से पढ़ रहे बच्चों के पास मेरे लिए 'एचएमटी' जैसा ही एक दूसरा संबोधन था- वरनैक्युलर.
भाषाई व्यवहार में पाई जाने वाली इस वर्ण-व्यवस्था से मेरा साक्षात्कार जब हुआ था, उस समय देश को स्वतंत्र हुए कोई 30 बरस बीत चुके थे.
स्वतंत्रता हासिल करने के दो साल बाद भारतीय संविधान में हिंदी को देश की राजभाषा के तौर पर अंगीकार कर लिया गया था तब भी हिन्दी में पढ़ना-लिखना-बोलना अंग्रेज़ी के मुक़ाबले दोयम दर्जे की चीज़ था. कमोबेश यही हालात आज भी बने हुए हैं.
इस बात की कल्पना ही की जा सकती है कि भारत जैसे बड़े और विविधतापूर्ण देश के लिए ऐसा संविधान बनाना कितनी बड़ी चुनौती रही होगी जो सभी को स्वीकार्य हो. भाषा के मामले में तो यह विविधता और भी जटिल रही होगी क्योंकि यहाँ कोस-कोस पर बदले पानी और चार कोस पर बानी वाली बात मुहावरे की नहीं ठोस वास्तविकता की थी.
राष्ट्रभाषा नहीं राजभाषा
बाबा साहब आम्बेडकर की अध्यक्षता वाली समिति में भाषा संबंधी क़ानून बनाने का ज़िम्मा नितांत अलग-अलग भाषाई पृष्ठभूमियों से आए दो विद्वानों को शामिल किया गया था.
एक थे बंबई की सरकार में गृह मंत्री रह चुके कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी जबकि दूसरे तमिलभाषी नरसिम्हा गोपालस्वामी आयंगर इन्डियन सिविल सर्विस में अफ़सर होने के अलावा 1937 से 1943 के दरम्यान जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री भी थे.
इनकी अगुआई में भारत की राष्ट्रभाषा को तय किए जाने के मुद्दे पर हिन्दी के पक्ष और विपक्ष में तीन साल तक गहन वाद-विवाद चला.
अंततः मुंशी-आयंगर फ़ॉर्मूला कहे जाने वाले एक समझौते पर मुहर लगी और 14 सितंबर 1949 को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 से अनुच्छेद 351 के रूप में जो क़ानून बना उसमें हिन्दी को राष्ट्रभाषा नहीं राजभाषा का दर्जा दिया गया. तभी से 14 सितंबर को हिन्दी दिवस मनाये जाने की शुरुआत भी हुई.
अनुच्छेद 343 अपनी शुरुआत में कहता है - "संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी", उसके आगे और बाद के आठ अनुच्छेदों में बताया गया था हालांकि हिन्दी भारत की राजभाषा होगी, सभी आधिकारिक कार्यों का निष्पादन अंग्रेज़ी में किया जाता रहेगा.
यह व्यवस्था 15 सालों के लिए बनाई गई थी जिसके दौरान यह प्रयास लिए जाने थे कि देश भर में धीरे-धीरे हिंदी को सरकारी कामकाज़ की भाषा बनाए जाने का चरणबद्ध कार्य किया जाएगा. इस अंतरिम समय के बीतने के बाद क्या होगा, उस बारे में कुछ नहीं कहा गया.
इस विषय की जांच करने के लिए भविष्य में एक संसदीय समिति बनाए जाने का फ़ैसला किया गया. इसके अलावा संविधान में 14 अन्य भाषाओं को मान्यता दी गई. पंद्रह सालों के बीत जाने पर भी केन्द्र सरकार के कामकाज़ में हिंदी का काफ़ी कम प्रसार हो सका था.
अंग्रेज़ी ही सरकारी कामकाज़ की भाषा क्यों बनी रही?
1960 के दशक में ग़ैर-हिन्दी भाषी राज्यों में हुई कई हिंसक झड़पों के बाद देश की संसद ने एक राष्ट्रभाषा के विचार को त्याग देना ही उचित समझा.
अंतरिम 15 वर्ष बीत जाने पर संविधान में हिन्दी की स्थिति को लेकर नए प्रावधान जोड़े तो गए लेकिन वास्तविकता में अंग्रेज़ी ही सरकारी कामकाज़ की भाषा बनी रही.
देश की भाषाई विविधता को ध्यान में रखते हुए संविधान में क्षेत्रीय भाषाओं के विकास और संवर्धन के लिए अलग से एक खुली अनुसूची बनाई गई. इसमें 14 भाषाएं शामिल थीं. धीरे-धीरे यह संख्या 22 हो गई.
अभी की स्थिति यह है कि इस सूची में शामिल होने के लिए 38 और भाषाओं की मांग सरकार के सम्मुख विचाराधीन है.
देखा जाए तो हमारे देश में भाषा का मसला ख़ासा पेचीदा रहा है लेकिन तथ्य यह है कि हिन्दी देश में सबसे अधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है. पिछली जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि भारत के 43.63 प्रतिशत लोग हिंदी बोलते हैं.
हमारे संविधान निर्माता इस बात को अच्छी तरह जानते थे कि भाषा की औपनिवेशिक दासता से बाहर आने के लिए बहुत मेहनत करनी होगी इसलिए राजभाषा क़ानून के आख़िरी अनुच्छेद में उन्होंने सरकार के कर्तव्य निर्धारित करते हुए लिखा- "संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिन्दी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे जिससे वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके."
आगे यह भी बताया गया है कि किस तरह हिंदी का शब्द भंडार समृद्ध किया जाना चाहिए.
तमाम सरकारी योजनाओं और मंसूबों की तरह इस मामले का क्या हश्र हुआ इस पर लंबे तर्क-वितर्क किए जा सकते हैं लेकिन सच यही है कि इतने वर्षों बाद भी हिन्दी एक ऐसी भाषा नहीं बन सकी है जो देश के बड़े हिस्से को स्वीकार्य हो और अंतरराष्ट्रीय मानकों पर भी खरी उतर सके.
रोज़गार का रास्ता हिन्दी से नहीं गुजरता
हमने एक ऐसा हिंदी भाषी समाज रच डाला है, जिसे सार्वजनिक स्थानों पर लिखी गई ग़लत भाषा को उसकी त्रुटिपूर्ण वर्तनी और व्याकरण के साथ बर्दाश्त करने में कोई तकलीफ़ नहीं होती.
इस हिंदी को मशहूर कवि-संपादक रघुवीर सहाय एक ऐसे आदमी की बहुत बोलने वाली, बहुत खाने वाली और बहुत सोने वाली नई पत्नी बताते थे जिसने पहली के मरने पर दूसरा ब्याह किया हो.
अब भी इंटर के बाद की साइंस की पढ़ाई के लिए हिंदी में पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध नहीं हैं. उच्चतर अध्ययन और शोध जैसे क्षेत्रों को तो छोड़ ही दीजिये. प्रबंधन, इंजीनियरिंग और चिकित्सा जैसे महत्वपूर्ण विषयों की पढ़ाई आज भी अंग्रेज़ी में होती है. सूचना क्रांति के इस दौर में कम्प्यूटर विज्ञान की कोई मानक हिंदी शब्दावली अब तक नहीं बनी है. अच्छे रोज़गार हासिल करने के अधिकतर रास्ते आज भी अंग्रेज़ी से होकर गुज़रते हैं.
आज़ादी से पहले हिंदुस्तानी हमारे यहाँ आम बोलचाल की भाषा थी जिसमें संस्कृत और उर्दू के शब्दों की ख़ूबसूरत आवाजाही रहती थी.
स्वतंत्र होने के 75 वर्षों के बाद बोलचाल की जिस भाषा को देश भर में अघोषित मान्यता मिल चुकी है, उसमें हिन्दी और अंग्रेज़ी का एक ऐसा स्तरहीन घालमेल पाया जाता है, जिसे देख कर हमारे संविधान निर्माता तो हरगिज़ ख़ुश न होते.
बाज़ार की मांग और हिन्दी की ज़रूरत
यह नहीं भूलना चाहिए कि भाषा के प्रसार का काम उसे बरतने वाली जनता के हाथों संपन्न होता है. इस लिहाज़ से देखें तो हिन्दी ने व्यापक जनमानस में अपनी पैठ बनाई है. उसके इस व्यापक स्वरूप के दर्शन कला, संस्कृति, फ़िल्म, टेलीविज़न और संचार के तमाम इलाक़ों में उसकी बढ़ती धमक में किए जा सकते हैं.
हर हाथ में मोबाइल आ जाने के बाद वह किस-किस रूप में कहाँ-कहाँ तक पहुँच सकती है, इसका पूरा अनुमान नहीं लगाया जा सकता. हिंदी की इस ताक़त को बाज़ार भी समझता है और वह उसे अपनी ज़रूरतों के हिसाब से इस्तेमाल करने लगा है.
इसी में सबसे बड़ा पेंच है. हिन्दी समझने वालों को फ़क़त एक संख्या की तरह देखने वाले बाज़ार ने जिस तरह की हिन्दी को बड़े पैमाने पर दृश्य-श्रव्य माध्यमों में परोसना शुरू किया है, वह हमारी भाषा का प्रतिनिधि स्वरूप नहीं है. गाली-गलौज और हिंदी-अंग्रेज़ी के सस्ते मिश्रण से बनी यह भाषा भारत की उस 'सामासिक संस्कृति' का प्रतिबिम्ब तो हरगिज़ नहीं जिसका ज़िक्र संविधान में किया गया था.
किसी भी भाषा की समृद्धि का काम उसके साहित्यकारों और विद्वानों का होता है. दुर्भाग्यवश हमारे देश का यह वर्ग बड़े पैमाने पर गुटबाज़ी और आपसी मतभेदों का शिकार रहा है, जिससे हिन्दी का बड़ा नुक़सान हुआ है.
इस वर्ग का उद्देश्य भाषा को विकसित करना कभी नहीं रहा. उसकी दिलचस्पी महज़ अपने लिखे को प्रकाशित कराने भर में थी. इस स्थिति का लाभ प्रकाशकों ने जम कर उठाया और साहित्य को सरकारी ख़रीद तक सीमित कर डाला.
हिन्दी में अनुवाद क्रांति क्यों नहीं?
हैरानी की बात है कि 40-50 करोड़ लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा में लिखे जाने वाले साहित्य की किताबों के पाँच-छः सौ प्रतियों के संस्करण छापे जाते रहे हैं. नतीजतन आम जन तक स्तरीय हिन्दी की पहुँच कम होती गई और उसका स्थान फ़िल्मों और लुगदी साहित्य जैसी चीज़ों के लिए खुला छूट गया.
ऐसी परिस्थितियों में बच्चों के साहित्य के लिए कैसे जगह बनती? इक्का-दुक्का पत्रिकाओं को छोड़ दिया जाए तो हमारी भाषा में न बच्चों के लिए अच्छी किताबें हैं न कॉमिक्स. ज़्यादातर कॉमिक्स और किताबें पश्चिमी स्रोतों से उठाई गई चीज़ों की नक़ल होते हैं या अनुवाद.
भाषा की समृद्धि और विकास के लिए अनुवाद हमेशा एक बड़ा माध्यम रहा है लेकिन हमारे यहाँ उसकी भी कोई परंपरा न बन सकी.
विशेष रूप से चीन और रूस के शासकों ने इस बात को पहचाना और उनकी अगुआई में वहाँ अनुवाद क्रांतियाँ हुईं जिनके फलस्वरूप दुनिया भर के साहित्य का उनकी भाषाओं में अनुवाद करवा कर उसे आम जनता को बहुत सस्ते दामों पर मुहैया कराया गया.
औपनिवेशिक दासता से बाहर निकले हमारे शासकवर्ग की यह ज़िम्मेदारी बनती थी कि वह भी ऐसी ही किसी क्रांति का सूत्रपात करते और विश्व-साहित्य को हिंदी में उपलब्ध करवाते ताकि जनता भाषाई औपनिवेशिकता से भी बाहर निकल सके.
दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं हुआ और अनुवादों के मामले में हिन्दी अपने ही देश की कई अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के मुक़ाबले काफ़ी दरिद्र रह गई है.
बांग्ला, मराठी और मलयालम जैसी भाषाओं में स्थिति यह है कि किसी भी लेखक को साहित्य का नोबेल मिलने के महीने भर के भीतर उसकी अधिकतर किताबें उनके अनुवादों में उपलब्ध हो जाती हैं. वैश्विक साहित्य का हिंदी में उपलब्ध न होना एक बड़ा कारण है कि हिन्दी में लिखने वाले अधिकतर लोगों के पास समकालीनता की दृष्टि ही नहीं है.
साहित्यिक और अकादमिक अनुवाद को न किसी तरह का राजकीय संरक्षण हासिल है न उसकी किसी को आवश्यकता महसूस होती है.
प्रकाशक जो अनुवाद करवाते हैं उसके पीछे उनकी मंशा विशुद्ध रूप से व्यावसायिक होती है. उसके एवज़ में दिया जाने वाला पारिश्रमिक हास्यापद रूप से कम होता है. इस कारण अनुवाद की गुणवत्ता प्रभावित होती है और पाठक का नुक़सान होता है.
हिन्दी की ज़रूरत किसे है?
लंबे समय से महसूस की जा रही मानक हिन्दी की ज़रूरत को कोई भी सरकारी हिन्दी शब्दकोष पूरा नहीं कर सकता. उसके लिए हिंदी को और स्वच्छंद होकर दूसरी भाषाओं में आवाजाही करने की आवश्यकता है जैसा कि अंग्रेज़ी कई शताब्दियों से कर रही है.
दुनिया की कोई ऐसी बोली-भाषा नहीं, अंग्रेज़ी शब्दकोष ने जिस से शब्द न लिए हों. उसके पास पूर्वी अफ्ऱीका की स्वाहिली के भी शब्द हैं और तमिल के भी. अंग्रेज़ी के शब्दकोष में हर साल औसतन 1000 नए शब्द जोड़े जाते हैं.
यूरोपियन यूनियन में कुल 27 सदस्य देश हैं जिनमें 22 भाषाएं बोली जाती हैं. इंग्लैंड इस संघ का सदस्य नहीं है लेकिन उसकी भाषा अंग्रेज़ी यूरोपियन यूनियन की आधिकारिक भाषा है. एक बड़ी भाषा का ऐसा प्रभाव होता है.
दुनिया भर के विदेशी विश्वविद्यालयों में वर्षों से हिन्दी विभाग खुले हुए हैं लेकिन सच्चाई यह है कि इन विभागों में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या नगण्य होती है. तीन-चार साल तक हिंदी पढ़-सीख लेने के बाद इन छात्रों में से किसी ने हिन्दी के विकास के लिए कोई बड़ा काम किया हो, सुनने में नहीं आता. अधिकतर छात्र इस नीयत से हिन्दी में प्रवेश लेते हैं कि उससे उन्हें रोज़गार हासिल होगा.
इस सन्दर्भ में कोरिया के सियोल विश्वविद्यालय का उदाहरण देना अप्रासंगिक न होगा. 1991 में आये वैश्विक उदारवाद के दौर में जब भारत और कोरिया के बीच व्यापार में बढ़ोत्तरी हुई तो सियोल में हिंदी पढ़ने वालों की संख्या बढ़ने लगी. उन्हें लगता था कि सैमसंग जैसी कोरिया की बड़ी कम्पनियां उन्हें भारत में नौकरी पर रखेंगी क्योंकि उन्हें स्थानीय भाषा की जानकारी होगी.
इन कंपनियों ने शुरू में ऐसा किया भी लेकिन जल्दी ही उन्हें यह बात समझ में आ गई कि भारत में उनका मतलब जिस तरह के लोगों से पड़ता था वे सब अंग्रेज़ी जानते, बोलते और लिखते थे. इन कंपनियों को भारत में अपना माल बेचने के लिए हिन्दी की कोई ज़रूरत नहीं थी. कुछ ही महीनों में हिन्दी के ये छात्र नौकरियों से हाथ धो बैठे.
ऐसा नहीं कि विदेशियों ने हिन्दी के लिए कुछ नहीं किया. फ़ादर कामिल बुल्के, एस. डब्लू. फैलन और लोथार लुत्ज़े जैसे मनीषियों का वर्षों की साधना से किया गया उल्लेखनीय कार्य इस बात का प्रमाण है.
हर दिन हो हिंदी दिवस
वर्तमान समय में जब संचार और कंप्यूटर के क्षेत्रों में हर दिन नए प्रयोग हो रहे हैं और नई शब्दावलियां बन रही हैं. हिन्दी पर और अधिक काम किए जाने की आवश्यकता है. कम्प्यूटर शब्दावली तो छोड़िये, अभी हिन्दी का मानक कीबोर्ड भी नहीं बना है.
हिन्दी में अनेक तरह के फ़ॉन्ट उपलब्ध हैं लेकिन एक से दूसरे में बदलते समय उनमें बहुत गड्डमड्ड हो जाती है. हाल के वर्षों में यूनीकोड फ़ॉन्ट्स पर काफ़ी काम हुआ है लेकिन सरकारी कामकाज़ और प्रकाशन व्यवसाय उनका इस्तेमाल करने में हिचकता दिखाई देता है.
हिन्दी को यूनीकोड में लिखने की सुविधा के चलते एक बड़ा काम यह हुआ कि पिछले आठ-दस सालों में हिन्दी ने इंटरनेट पर अपनी धाकड़ उपस्थिति दर्ज कराई है. युवाओं के बहुत सारे समर्पित संगठन हैं जो इंटरनेट पर लगातार हिन्दी कॉन्टेंट अपलोड कर रहे हैं जिसके कारण अंग्रेज़ी विकीपीडिया के समानांतर हिन्दी विकीपीडिया तैयार हो रहा है.
ट्विटर, फ़ेसबुक, यूट्यूब और व्हाट्सएप जैसे सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स पर युवाओं में हिन्दी में लिखने, बोलने, सुनने और सुनाने की होड़ लगी हुई है. ध्यान रहे यह वही युवा वर्ग है कुछ समय पहले तक 'एचएमटी' कह कर जिसका मज़ाक़ बनाया जाता था.
यह हिंदी का सबसे महत्वपूर्ण संक्रमण काल है जिसमें उसके व्याकरण और भाषिक मूल्यों को तकनीक और विज्ञान की सान पर लगातार परखा और तराशा जा रहा है. इस काम में भी युवाओं ने बागडोर संभाली हुई है.
वे जानते हैं कि आज का संसार यथार्थ और व्यवहार की बुनियाद पर टिका हुआ है और यह भी कि समकालीन संसार के बरअक्स भारत के विकास का सम्बन्ध सीधा-सीधा हिंदी भाषा के विकास से जुड़ा है.
वे यह भी जानते हैं कि उनकी भाषा की उन्नति का प्रश्न सीधे-सीधे आर्थिक-सांस्कृतिक मुद्दों से जुड़ा हुआ है. उन्हें इस बात का इल्म है कि केवल सरकारी प्रचार और नारों से इसे हल नहीं किया जा सकता.
इसके लिए 14 सितम्बर को ही नहीं साल के हर दिन को हिंदी दिवस के रूप में मनाये जाने की दरकार है.
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