मुंबई की 'गुमशुदा नंबर-166' नौ साल बाद अपनी माँ तक कैसे पहुंचीं?

    • Author, दिपाली जगताप
    • पदनाम, बीबीसी मराठी सेवा

"मैंने नौ सालों बाद अपनी माँ को देखा और मैं उनकी गोद में सिर रखकर सो पायी. मैं आख़िरकार बच निकलने में कामयाब हो गयी. मैं बहुत ख़ुश हूं. बस सोचती हूं कि काश पापा भी होते. मैं जब वापस आई तो मैं उन्हें तलाश रही थी लेकिन मुझे वो नहीं मिले."

ये कहना था 16 वर्षीय पूजा का, जिन्हें मुंबई की गुमशुदा बच्चियों की लिस्ट में 'गुमशुदा नंबर-166' नाम दिया गया था.

मुंबई के अंधेरी उपनगर में रहने वालीं पूजा गौड़ का साल 2013 में अपहरण हो गया था. उस वक़्त पूजा की उम्र सिर्फ़ सात साल थी. वह पहली कक्षा में पढ़ रही थीं.

साल 2013 की 22 जनवरी को पूजा स्कूल में जा ही रही थीं कि उन्हें एक शख़्स ने आइसक्रीम का लालच देकर अगवा कर लिया.

इसके नौ साल बाद इस महीने की शुरुआत में पूजा की अपनी माँ और दो भाइयों से मुलाकात हुई है.

पूजा को अपने घरवालों से मिलाने में प्रमिला देवेंद्र ने अहम भूमिका निभाई है.

पूजा ने आख़िरकार कही मन की बात

सात महीने पहले फ़रवरी 2022 तक पूजा गौड़ अपना अपहरण करने वालों के साथ रह रही थीं. वह मुंबई के समृद्ध इलाके पश्चिमी उपनगर में एक बच्चे की देखरेख करने का काम कर रही थीं.

यहां उनकी मुलाक़ात 35 वर्षीय महिला प्रमिला देवेंद्र से हुई जो इसी घर में काम किया करती थीं. यहीं काम करते हुए दोनों के बीच दोस्ती हो गयी.

लेकिन प्रमिला अक्सर पूजा को रोता हुआ देखती थीं और उनका चेहरा उतरा हुआ रहता था.

प्रमिला देवेंद्र बीबीसी को बताती हैं, "मैंने सोचा कि उनके घर की स्थिति ठीक नहीं होगी. और शायद उनकी अपने माता-पिता से जमती नहीं होगी तो मैं हमेशा उससे पूछा करती थी कि तुम लगातार रोती क्यों रहती हो. क्या हुआ है तुम्हें? उसने बताया कि उसके घर वाले उसे प्रताड़ित करते हैं. मैंने सोचा कि उसके घर का माहौल ठीक नहीं होगा."

लेकिन इस घटना के सात महीने बाद 2 अगस्त को पूजा ने हिम्मत करके प्रमिला को सब कुछ बता दिया.

पूजा कहती हैं, "मैंने प्रमिला दीदी को सब कुछ बता दिया कि मैं जिन लोगों के साथ रह रही हूं वो मेरे असली माता-पिता नहीं हैं. उन्होंने मुझे बचपन में अगवा कर लिया था, जब मैं अपने स्कूल जा रही थी. मैंने अपना नाम यूट्यूब पर खोजा जिससे मुझे इस ख़बर से जुड़े कुछ वीडियोज़ मिले. मुझे तलाश करने के लिए पोस्टर छपवाए गए थे. इन पोस्टर में मोबाइल नंबर लिखे थे."

पूजा की परेशानी का असल कारण जानकर प्रमिला हैरान रह गईं. तब उन्होंने पूजा की मदद करने के बारे में सोचा.

प्रमिला कहती हैं, "मैंने ये वीडियो अपने मोहल्ले में रहने वाली एक लड़की को भेजा. उसने गूगल पर जानकारी निकालकर मुझे तीन-चार फ़ोन नंबर भेजे जिसके बाद हमारी बात रफ़ीक़ नाम के शख़्स से हुई."

प्रमिला का साहसिक क़दम

पूजा का परिवार मुंबई के अंधेरी की झुग्गी बस्ती में रहता है और रफ़ीक़ उनके पड़ोसी हैं.

रफ़ीक़ बीबीसी को बताते हैं, "पूजा के पिता और मैंने उसे तलाशने में बहुत मेहनत की है. हम मुंबई के कोने-कोने में गए. पड़ोसी राज्यों में भी तलाशा. पूजा के पिता गोवा, पंजाब, राजस्थान, और जम्मू-कश्मीर तक गए लेकिन वो नहीं मिली.''

''मुझे 3 अगस्त 2022 को प्रमिला का फोन आया. उसने कहा कि वह गुमशुदा बच्ची पूजा की मां से बात करना चाहती है. मैं काफ़ी बेसब्र सा हो गया क्योंकि पिछले सालों में कई लोगों ने ऐसे दावों के साथ हमसे संपर्क किया था. लेकिन असल में हमारी मुलाक़ात पूजा की जगह दूसरी लड़कियों से होती थी. इस वजह से मैंने तुरंत पूजा के परिवार को इस बारे में नहीं बताया. मैंने प्रमिला से कहा कि वह अगले दिन वीडियो कॉल करें."

इसके बाद चार अगस्त, 2022 की सुबह पूजा काम पर पहुंची तो प्रमिला ने उन्हें बताया, "हमें आपकी मां को वीडियो कॉल करनी है."

नौ साल बाद दिखा चेहरा

इसके बाद प्रमिला ने लगभग 10 बजे रफ़ीक़ को वीडियो कॉल किया.

रफ़ीक़ बताते हैं, "जैसे ही मेरे पास वीडियो कॉल आया, मैं भागते हुए पूजा की मां के पास पहुंचा. मैंने कॉल उठाते हुए पूजा की मां को बताया कि पूजा नाम की एक लड़की का फोन आया है."

पूजा की मां पूनम गौड़ बताती हैं, "मुझे समझ नहीं आया कि क्या करूं, क्या न करूं. मैं डर सी गयी. मुझे समझ ही नहीं आया कि मैं रोऊं या हंसू. पूजा नाम वाली ये लड़की दावा कर रही थी कि वो मेरी बेटी है."

रफ़ीक़ ने एक दूसरे फोन से ये कॉल रिकॉर्ड किया.

हमने भी ये वीडियो कॉल देखी जिसमें सात साल की उम्र में गुमशुदा होने वाली पूजा ने इतने सालों बाद अपनी मां को देखा था. अब वो छोटी बच्ची नहीं थीं. वह अपनी मां से बात करते हुए रोने लगीं. पूनम गौड़ भी अपनी बेटी को देखने के बाद अपने आंसू नहीं रोक पाईं.

इस वीडियो कॉल के बाद एक तय जगह पर मिलने की बात हुई.

प्रमिला ने पूजा की उनकी मां से मुलाक़ात करवाने के लिए अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को भी बुला लिया.

वहीं, पूजा की मां के साथ उनके दो बेटे, चाचा-चाची, और पड़ोसी रफ़ीक़ आए.

जब मां-बेटी मिले

पूजा नौ साल के बाद अपनी मां से मिलने जा रही थीं. दूसरी ओर पूनम भी काफ़ी चिंतित थीं.

और जब वे मिले तो, दोनों एक-दूसरे को देखकर बुरी तरह रोने लगे.

पूनम गौड़ ने पूजा से मिलते ही उनके शरीर पर जन्म के समय वाला निशान देखा.

वह कहती हैं, "इस जन्म के समय वाले निशान के बारे में सिर्फ़ मुझे पता था. मैंने इसे किसी को नहीं बताया था. मैंने जैसे ही वो निशान देखा तो मेरे सारे शक दूर हो गए."

पूनम गौड़ बताती हैं, "मुझे पहले पूजा के मिलने की उम्मीद थी लेकिन फिर पूजा के पिता की मौत के बाद मेरी उम्मीदें टूट गयीं. क्योंकि ऐसा कोई नहीं बचा था जो उसे तलाशने जा सकता. लेकिन मुझे लगता है कि ये भगवान का करम है. शायद मरने के बाद वह हमारी बेटी को वापस लाने के लिए भगवान से लड़े हों और बोले हों कि मेरी पत्नी अकेली है. हम प्रमिला दीदी के भी शुक्रगुज़ार हैं."

वह कहती हैं, "पूजा मेरी हीरे जैसी बेटी है. मुझे इतनी ख़ुशी हो रही है जितनी किसी को खोया हुआ हीरा मिलने पर होती है. मैं उसमें उसके पिता की झलक देख सकती हूं. वह बिल्कुल अपने पिता जैसी लगती है. वह उसे याद किए बगैर एक कौर भी नहीं खा पाते थे. लेकिन वो पूजा से मिले बग़ैर ही हमें छोड़कर चले गए."

पुलिस में की शिकायत

पूजा से मिलने के बाद प्रमिला और उसके घरवालों ने पुलिस स्टेशन जाकर इस मामले में क़ानूनी कार्रवाई शुरू की है.

पूजा कहती हैं, "मैंने पुलिस को सब कुछ बता दिया. मैं पुलिस को उस घर तक ले गयी जहां मुझे पकड़कर रखा गया था. मेरे अपहरणकर्ताओं की पहचान हुई और पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया."

इसके बाद पूजा अपनी मां की गोद में सो सकीं लेकिन अभी भी पूजा और उनके परिवार के कष्ट ख़त्म नहीं हुए हैं.

पूजा कहती हैं, "अगवा करने वाली महिला मुझे पीटा करती थी. मैं रात में ठीक से बैठ या सो भी नहीं पाती थी. मेरी पीठ में बहुत दर्द होता है. मेरी नाक में भी चोट है क्योंकि वे मुझे नाक पर मारा करते थे."

सालों तक हुए शारीरिक और मानसिक शोषण से उबरने में पूजा को अभी लंबा वक़्त लगेगा.

पुलिस और उनके परिवार वाले पूजा को पिछले नौ सालों से तलाश रहे थे. लेकिन आख़िरकार प्रमिला देवेंद्र के एक हिम्मत भरे क़दम ने पूजा की ज़िंदगी बदल दी.

प्रमिला काफ़ी भावुक होकर कहती हैं, "इससे ज़्यादा ख़ुशी की बात क्या हो सकती है कि वो अपनी मां से मिल गईं. हम दोनों ने मां-बेटी की तरह सात महीने साथ काम किया. मैंने बस उसकी मदद की. मैं इस बात से थोड़ी दुखी हूं कि अब वो काम पर नहीं आएगी और मुझे उसकी याद आएगी. लेकिन मुझे लगता है कि अगर लड़के-लड़कियां अपनी समस्याएं लेकर आएं तो हर मां को उनकी मदद करनी चाहिए. हम उनकी असली मां नहीं हैं लेकिन हम भी मां जैसी हैं."

क्या कुछ हुआ नौ सालों में

पूजा के दो भाई हैं. एक पूजा से बड़ा और एक छोटा.

जिस दिन पूजा का अपहरण हुआ, उस दिन (22 जनवरी 2013) को पूजा अपने स्कूल जा रही थीं. उनके साथ उनके बड़े भाई भी थे. वो भाई के पीछे-पीछे स्कूल के गेट से अंदर प्रवेश करने ही वाली थीं कि तभी कुछ लोगों ने उन्हें आइसक्रीम दिलाने के बहाने बाहर बुला लिया और पूजा को लेकर चले गए.

पूजा बताती हैं, "मैं उनसे कहती रही कि मुझे मेरे घर जाना है. मुझे छोड़ दो. वो मुझे एक पहाड़ी इलाके़ में ले गए. मैं लगातार रो रही थी. मैं उनके आगे गिड़गिड़ा रही थी कि वो मुझे मेरे माता-पिता के पास छोड़ आएं. लेकिन वो मेरी कुछ भी सुन नहीं रहे थे. उन्होंने कहा कि अगर मैंने रोना बंद नहीं किया तो वे मुझे पहाड़ से नीचे फेंक देंगे. मैं बहुत डर गई थी और फिर चुप हो गई. मुझे याद है कि हम वहां 2-3 दिन रहे थे."

वह आगे कहती हैं, "इसके बाद वे मुझे लेकर गोवा चले गए. वो दो लोग थे. एक आदमी और एक औरत. वहां उनका एक रिश्तेदार भी रहता था. मैं बहुत रोया करती थी. वहां मौजूद औरत हमेशा यही कहती थी कि अगर मैं रोई तो वो मेरी जीभ जला देगी. मैं अपनी मां को बहुत बुरी तरह याद किया करती थी. उन्होंने मेरा नाम पूजा से एनी कर दिया. इसके बाद वो मुझे रायचूर लेकर आ गए. मैं वहां होस्टल में रहती थी. वहां मैंने कक्षा दो तक पढ़ाई की."

पूजा कहती हैं, "साल 2015 में उनके यहां एक बेटी का जन्म हुआ और उसके बाद मेरे प्रति उनका व्यवहार एकदम से बदल गया. मुझे हॉस्टल से वापस बुला लिया गया और फिर मैं मुंबई आ गई. उस समय मैं नौ साल की थी.''

''उन्होंने मुझे मारना शुरू कर दिया था. वो मुझे लगातार गालियां दिया करते थे. वो कभी मुझे बेल्ट से मारते थे, कभी मुक्के से तो कभी लात से. वो मेरा सिर दे मारते थे. एक दिन उन्होंने निर्दयता की सारी हदें तोड़ते हुए मुझे बेलन से इस क़दर मारा कि मेरी पूरी पीठ खून से लाल हो गई. बावजूद इसके वो मुझे किसी क्लिनिक तक नहीं ले गए. उस औरत ने मेरे घावों पर चूना मल दिया था."

पूजा बताती हैं कि अपहरणकर्ता उनसे पूरे घर का काम करवाया करते थे.

वो बताती हैं, "वो हमेशा ताज़ा बना हुआ खाना खाया करते थे. मैं उनके लिए रोटियां सेंकती थी, भले ही मेरे हाथ जल जाएं लेकिन फिर भी मुझे रोटियां सेंकनी होती थीं. साल 2020 में मुझे बाहर जाकर काम करने को कहा गया. मैं क़रीब पूरे 24 घंटे ही काम करती रहती थी.''

''वहां मैं कपड़े धोती थी, खाना बनाती थी और घर से जुड़े सारे छोटे-बड़े काम किया करती थी. कुछ समय बाद मैंने वो काम छोड़ दिया. इसके बाद मैंने 12 घंटे वाली नौकरी कर ली. मुझे ये सब काम करके जो भी पगार मिलती थी वो मुझसे पूरी की पूरी ले ली जाती थी. मेरे पास एक रुपया भी नहीं होता था."

क्या पूजा ने भागने की कोशिश की?

उस समय पूजा की उम्र सिर्फ़ सात साल थी. पूजा बताती हैं कि कोई ना कोई हमेशा उनके साथ होता था और शुरुआत में उन्हें बाहर जाने की इजाज़त नहीं होती थी.

पूजा कहती हैं, ''एक दिन जब सभी सो रहे थे तो मैंने फोन लेकर अपना नाम टाइप किया. तब मेरे बचपन की बहुत सारी फोटो और ख़बरें दिखने लगीं. तब मैंने सही समय पर किसी मदद लेने और यहां से निकलने का फ़ैसला किया.''

कहां तक पहुंची क़ानूनी कार्रवाई

डी.एन. नगर पुलिस ने अपहरणकर्ताओं हैरी और सोनी डिसूज़ा के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कर लिया है. वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक मिलिंद कुर्डे बताते हैं कि अपहरण, धमकी, शारीरिक हिंसा, बाल श्रम सहित कई धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है.

पुलिस ने हैरी डिसूजा को गिरफ़्तार कर लिया है. लेकिन पूजा का परिवार चाहता है कि सोनी डिसूज़ा को भी गिरफ़्तार किया जाए जो पूजा को मारा-पीटा करती थीं.

पुलिस ने पूजा का बयान दर्ज कर लिया है. लेकिन बायन की जांच के लिए उन्हें कई बार पुलिस थाने भी बुलाया जाता है.

पूजा की नई ज़िंदगी

पूजा अपनी मां और दो भाइयों के साथ मुंबई उपनगर में 10x10 के एक कमरे में रहती हैं. ये एक स्लम इलाक़ा है.

उनके पिता की कैंसर के चलते चार महीने पहले मौत हो गई. पूजा लौटने के बाद से अपने पिता को याद कर रही हैं. उन्होंने आख़िरी बार सात साल की उम्र में अपने पिता को देखा था.

पूजा कहती हैं, ''पापा को उनके साथ होना चाहिए था. मैंने सोचा था कि मैं उनसे मिलूंगी. उनके ना होने का मुझे बहुत दुख है.''

फिलहाल पूजा के लिए अपने इलाक़े की कई चीज़ें नई हैं. बचपन में उन्हें जानने वाले कई लोग मिलने आ रहे हैं.

जब से पूजा लौटी हैं तो उनके परिवार ने छोले बेचने वाली अपनी स्टॉल नहीं लगाई है. उनकी आर्थिक स्थिति ऐसी है कि अगर वो आज काम नहीं करते तो कल उनके पास खाने के लिए कुछ नहीं होगा. ऐसे में पूजा खुद छोले बेचने निकल पड़ीं.

पहले पूजा के पिता संतोष रेलवे स्टेशन के पास छोले बेचा करते थे. उनकी मौत के बाद पूजा की मां ने ये काम संभाला. परिवार का खर्च इसी से होने वाली आय से चलता है.

पूजा मानती हैं कि उन्हें भी काम करके परिवार की मदद करनी चाहिए. वह पहले ही दूसरी जगहों पर घर का और बच्चों को संभालने का काम कर रही थीं. लेकिन, वो नाबालिग हैं और उन्हें काम करने की इजाज़त नहीं है.

पूजा अधिकतर समय अपनी मां के साथ गुज़ारती हैं. उनकी मां पूजा के लिए बहुत कुछ करना चाहती हैं.

पूजा अपनी मां के साथ घर के कामों में मदद करती हैं. जब मां घर पर नहीं रहतीं तो छोटा भाई और आंटी उनके साथ रहते हैं. वह किसी के साथ ही बाहर जाती हैं.

ये सच है कि कोई भी पूजा और उनके परिवार के वो नौ साल वापस नहीं ला सकता. वो खालीपन कभी नहीं भरेगा लेकिन फिर भी पूजा और उनकी मां ने नई उम्मीदों के साथ एक नई ज़िंदगी शुरू की है.

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