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अमरनाथ गुफ़ा के पास बादल फटने की घटना के चश्मदीदों ने क्या देखा
- Author, शहबाज़ अनवर
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
"शाम लगभग साढ़े पांच बजे थे.मैं अपने 65 नम्बर के टेंट में आकर बैठा ही था कि तभी लोगों का शोर सुनाई दिया. पता चला कि पहाड़ों से सैलाब आ गया है. बारिश भी तेज़ हो गई. मैं अपने जूते भी नहीं उतार पाया था कि वहां भगदड़ मच गई. मैंने मोज़ों को अपनी जेब में रखा और जूते पहनकर बाहर की तरफ दौड़ पड़ा."
अमरनाथ गुफ़ा के पास बादल फटने की घटना के चश्मदीद उत्तर प्रदेश के बिजनौर के अफ़ज़लगढ़ के रहने वाले अशोक कुमार रुहेला ने बीबीसी हिंदी को बताया.
अशोक कुमार उन ख़ुशकिस्मत लोगों में से एक हैं जो बादल फटने की इस घटना के समय गुफ़ा के निकट स्थित भवन के ही पास मौजूद थे और बाढ़ में बहने से बाल-बाल बचे.
उन्होंने कहा, "जब मैं बाहर निकल कर आया तो पीछे की तरफ से सैलाब आया. मेरे पैर कीचड़ में धंस गए, लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी और मैं किसी तरह से नीचे की ओर भागता गया. मेरी सांसे लंबी-लंबी चल रही थी और दिल तेज़-तेज़ धड़क रहा था. समझ में नहीं आ रहा था कि आख़िर अचानक ये क्या हो गया."
उन्होंने बताया, "हम टेंट नंबर 65 में थे तो हमने टेंट नंबर 66, 67, 68 की ओर नीचे दौड़ लगाई. थोड़ा आगे आने के बाद मैं रुक गया. मेरे साथी प्रमोद कुमार क़रीब आधा किलोमीटर दूर रह गए थे. अच्छी बात यह रही कि सैलाब मुझसे पहले ही थम गया था. हालांकि मेरे साथी प्रमोद रो रहे थे, वो काफ़ी घबरा गए थे. हमने अपनी आंखों से बड़े-बड़े पत्थरों और टेंटों में रखे सामानों को बहते हुए देखा है."
"मैं तो नज़ारा देख रो ही पड़ा"
अशोक कुमार के साथी प्रमोद भी घटना के समय वहीं थे.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "वो जितना भयावह दृश्य था, उसे देख कर तो कोई भी रो सकता था. मैं भी रो पड़ा."
वे बोले, "मैंने अपनी आंखों से देखा है कि किस तरह पानी का सैलाब तेज़ आवाज़ के साथ सबकुछ अपने साथ बहा ले जा रहा था. टेंटों में रखे प्रसाद और मूर्तियां बह रहीं थीं. हम जब सुरक्षित ज़ोन में पहुंचे और वापस गुफ़ा के निकट भवन से गुज़रे तो देखा कि किस तरह शवों को प्लास्टिक के स्ट्रेचर्स पर डालकर ले जाया जा रहा था."
"क़िस्मत थी कि भगवान ने हमें बचा लिया"
इस पूरे मामले में सबसे दिलचस्प बात यही है कि अशोक कुमार और प्रमोद कुमार इस घटना में शायद अपनी क़िस्मत की वजह से बच गए.
अशोक कुमार ने बताया, "गुफ़ा के निकट टेंट नम्बर 65 से नीचे की तरफ़ टेंट नम्बर 66, 67 तक, पहाड़ों से अलग-अलग जगह से पत्थर और पानी गिर रहा था. संयोग से हम जिस जगह पहुंचे वहां बाढ़ पहले ही तबाही मचा चुकी थी, इसलिए और नीचे जाने से हमें सुरक्षाकर्मियों ने रोक दिया था."
उन्होंने बताया, "जब हम नीचे पहुंचे तो अंधेरा घिर आया था. सुरक्षाकर्मियों ने हमसे कहा कि आप गुफ़ा की तरफ़ जाएं, वहां से बाहर निकलने का रास्ता है. नीचे की तरफ़ रास्ता नहीं है. हम जब वापस गुफ़ा की तरफ़ पहुंचे तो रास्ते में बाढ़ की तबाही दिखाई दे रही थी. जिन टेंटों में पहले इंसान रह रहे थे, अब वहां बड़े-बड़े पत्थर पड़े हुए थे. बचाव दल दबे लोगों को बाहर निकाल रहा था, कईं शव स्ट्रेचरों पर ले जाए जा रहे थे."
"टेंट में जागकर गुज़ारी रात"
अशोक कुमार और प्रमोद कुमार की मानें तो नीचे से ऊपर की ओर टेंट नम्बर 47 वाला स्थान थोड़ा सुरक्षित था, लेकिन पुलिस ने साफ़ कह दिया था कि रात में किसी भी वक़्त यहां फ़िर से ख़तरा पैदा हो सकता है तो आप लोग रात में पंचतरणी के लिए निकल जाएं. कश्मीरी लोग वहां से बचे-खुचे टेंट उखाड़ रहे थे.
प्रमोद कुमार ने कहा, "हमने एक कश्मीरी की मान-मनव्वल कर रात भर के लिए टेंट नहीं उखाड़ने का अनुरोध किया. वो काफी मुश्किल में तैयार हुआ, हालांकि, डर ये था कि पुलिस ने इस क्षेत्र को ख़ाली करने की चेतावनी दी है. पर इतनी रात में हम जाते भी तो कहां, इसलिए वहीं रुक गए. अब रात के दस बजे थे."
अशोक कुमार ने बताया कि हमने पूरी रात वहां जागकर गुज़ारी. ख़ौफ़ के वजह से सो नहीं पाए, हां, लेकिन कश्मीरी व्यक्ति ने उन्हें चाय पिलाई. अगली सुबह यानी शनिवार की सुबह यूपी के ये दोनों दोस्त पंचतरणी पहुंचे.
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