You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
शिवसेना: उद्धव ठाकरे अपने पिता की विरासत और पार्टी को बचा पाएँगे?
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवादाता
बुधवार की रात शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़े के बाद सवाल ये है कि अब उनका और उस पार्टी का भविष्य क्या होगा जिसे उनके पिता ने बनाया था.
उनके अधिकतर विधायकों के विद्रोह के बाद उनके पास 55 में से केवल 13 विधायक बचे हैं. विद्रोही विधायकों का आरोप था कि उद्धव ठाकरे पर उन्हें भरोसा नहीं रहा था क्योंकि उन्होंने हिंदुत्व की विचारधारा को त्यागकर और हिंदू राष्ट्रवाद की उनकी मूल विचारधारा की अनदेखी करके शरद पवार की एनसीपी और कांग्रेस पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनाई थी.
विद्रोह करने वाले 39 शिवसेना विधायक अपने राज्य महाराष्ट्र से हज़ारों किलोमीटर दूर असम के गुवाहाटी शहर के एक होटल में कई दिनों तक छिपे रहे थे. वरिष्ठ मंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में विद्रोही अब मुंबई लौट आए हैं और उम्मीद है कि वो भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनाने की कोशिश करेंगे.
शिवसेना और बीजेपी 30 सालों तक भागीदार रहने के बाद 2019 में अलग हुए थे.
शिवसेना मुंबई और राज्य में कुछ अन्य हिस्सों में एक असाधारण शक्तिशाली पार्टी रही है लेकिन अपने दो-तिहाई विधायकों की बग़ावत और सत्ता से कई साल के बाद पहली बार बाहर होने पर उसे अपने अस्तित्व के लिए जूझना पड़ सकता है.
शिवसेना को बड़े झटके कई बार अतीत में भी लग चुके हैं लेकिन सियासी विश्लेषकों का कहना है कि इस बार विद्रोह से इसे काफ़ी बड़ा झटका लगा है.
राजनीतिक विश्लेषक सुहास पल्शिकर का कहना है कि पार्टी में विद्रोह ने ''शिवसेना के पतन की शुरुआत है.''
पार्टी को नुकसान
पार्टी के पूर्व सांसद भरत कुमार राउत का मानना है कि विद्रोह ने पार्टी को बुरी तरह से नुकसान पहुंचाया है, ''पार्टी को इस तरह के संकट का कभी भी सामना नहीं करना पड़ा है. कई शहरों में ज़मीनी स्तर के समर्थकों और कार्यकर्ताओं ने भी पार्टी छोड़ दी है.''
उन्होंने कहा कि इससे 'उद्धव ठाकरे और पार्टी दोनों के लिए 'अभी नहीं, तो कभी नहीं' वाली स्थिति पैदा हो गई है.
शिवसेना की स्थापना 1966 में उद्धव ठाकरे के करिश्माई पिता बाल ठाकरे ने की थी, शिवसेना पहली बार 1991 में विभाजित हुई थी जब वरिष्ठ नेता छगन भुजबल ने कई विधायकों और ज़मीनी सतह के कार्यकर्ताओं के साथ पार्टी छोड़ दी थी.
एक अन्य नेता नारायण राणे ने 2005 में पार्टी छोड़ दी और कुछ विधायकों को अपने साथ ले गए थे.
उद्धव ठाकरे के चचेरे भाई राज ठाकरे ने 2006 में कई विधायकों और कार्यकर्ताओं के साथ पार्टी छोड़ दी थी जिसे उस समय एक बड़ा झटका माना जा रहा था क्योंकि पार्टी में कई लोग उद्धव की जगह उस समय के लोकप्रिय नेता राज ठाकरे को बाल ठाकरे का राजनीतिक वारिस मानते थे.
भारत के बहुदलीय लोकतंत्र में, शिवसेना जैसे क्षेत्रीय दल, काफ़ी राजनीतिक दबदबा रखते हैं और अक्सर राज्य विधानसभा चुनावों में राष्ट्रीय दलों को हराते हैं. यदि एक पार्टी आम चुनाव में बहुमत हासिल करने में विफल रहती है तो शिवसेना जैसी क्षेत्रीय पार्टियाँ एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं.
राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करने की शिवसेना की क्षमता के कारण पार्टी अक्सर सुर्खियों में रही है. पार्टी के दिवंगत नेता, बाल ठाकरे एक राजनीतिक कार्टूनिस्ट थे.
आंदोलन से निकली पार्टी
उन्होंने 1960 के दशक में अन्य राज्यों से आकर मुंबई में नौकरी करने वालों के ख़िलाफ़ मराठियों के हिमायत करते हुए एक आंदोलन खड़ा किया था, उनका कहना था कि मुंबई पर पहला अधिकार स्थानीय लोगों का है.
बाल ठाकरे की उग्र बयानबाज़ी ने उन्हें भारत के सबसे विवादास्पद राजनेताओं में से एक बना दिया था, जब वो अपने सियासी करियर के शिखर पर थे तो उनकी एक आवाज़ पर मुंबई और महाराष्ट्र चक्का जाम हो जाता था.
बाबरी मस्जिद के गिराए जाने के बाद 1992-93 में मुंबई में हुए दंगों की एक सरकारी जांच में शिवसेना के सदस्यों और इसके कई पार्टी नेताओं को मुसलमानों पर हमलों की साज़िश रचने का दोषी ठहराया गया था. लेकिन बाल ठाकरे को दंगों से संबंधित किसी भी अपराध के लिए कभी भी दोषी नहीं ठहराया गया.
पार्टी 2014-15 में काफ़ी सुर्ख़ियों में रही. पार्टी भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट संबंधों को बहाल करने के लिए शुरू हुई बातचीत को रद्द कराने में सफल रही, इसने पाकिस्तानी गायक ग़ुलाम अली के एक संगीत कार्यक्रम को भी रद्द करा दिया था, एक पूर्व पाकिस्तानी विदेश मंत्री की किताब का विमोचन भी नहीं होने दिया था.
विश्लेषकों का कहना है कि शिवसेना को अब अपने आधार को मज़बूत करना और उन्हें यह विश्वास दिलाना मुश्किल होगा कि उसमें अभी भी वही उग्रता है जिसने इसे अतीत में लोकप्रियता दिलाई थी और जिसके लिए उसे बदनामी का भी सामना करना पड़ा था.
उद्धव ठाकरे की जीवनी लिखने वाले मुंबई के एक वरिष्ठ विश्लेषक का कहना है कि शिवसेना गंभीर संकट में है और उसके प्रमुख को अब अपनी पार्टी को नए सिरे से बनाने की ज़रुरत है.
वो कहते हैं, "शिवसेना ने 1960 के दशक में मराठियों की अस्तित्व संबंधी चिंताओं से जन्म लिया था, यह बाद में दक्षिणपंथी हिंदुत्व विचारधारा में चली गई, लेकिन आज यह एक बार फिर अस्तित्व संबंधी चिंताओं का सामना कर रही है."
उनका कहना है कि शिवसेना को अपने ज़मीनी कार्यकर्ताओं के पास वापस जाने की ज़रुरत है. उन्होंने कहा, "इससे पार्टी को दोबारा खड़ा करने में मदद मिलेगी, लेकिन इसमें कुछ साल लगेंगे."
यदि पार्टी के 39 बाग़ी विधायक भाजपा के साथ मिलकर अगली सरकार बनाते हैं तो उद्धव ठाकरे वाले धड़े को राजनीतिक गुमनामी में कुछ समय बिताना पड़ सकता है, अगर उनके कार्यकर्ता भी विद्रोहियों का समर्थन करना शुरू कर दें तो ठाकरे की मुश्किलें और बढ़ जाएंगी.
विद्रोह का पार्टी पर असर?
फ़िलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि विद्रोह ने उन्हें ज़मीनी सतह पर कितना नुकसान पहुंचाया है.
पार्टी के सोलापुर ज़िले के प्रमुख गुरुशांत धत्तगांवकर कहते हैं कि पार्टी कार्यकर्ताओं की वफ़ादारी ठाकरे परिवार के साथ है लेकिन वह मानते हैं कि कुछ ज़िलों और क़स्बों में शिवसेना कार्यकर्ताओं ने बाग़ी नेताओं के प्रति अपनी वफ़ादारी दिखाई है.
विधायक राहुल पाटिल उन चंद विधायकों में से हैं जो अपने नेता उद्धव ठाकरे के प्रति अब तक वफ़ादार रहे हैं. उनका कहना है कि कार्यकर्ता अब भी उद्धव ठाकरे के प्रति वफ़ादार हैं. वो कहते हैं, "शिवसेना एक विचार है, एक आंदोलन है, किसी विचार को कोई नहीं मार सकता. हम बालासाहेब की संतान हैं. हम अपनी मृत्यु तक उनके प्रति वफ़ादार रहेंगे."
ठाकरे परिवार को इस बात से राहत मिल सकती है कि पार्टी अतीत में हमेशा इस तरह के झटके से उभरने में सफल रही है.
पार्टी के नेता गुरुशांत धत्तगांवकर का मानना है कि पार्टी हर झटके के बाद मजबूत होकर उभरी है, "हम भाजपा के साथ साझेदारी में सत्ता में थे" लेकिन वह साझेदारी और शक्ति अब मौजूद नहीं है, वह मानते हैं कि शिवसेना के सामने यह अब तक की सबसे बड़ी चुनौती है.
वे कहते हैं, "जब आप सत्ता में होते हैं, तो गांवों में हम जो काम करते हैं, उसके लिए नियमित रूप से फंड आता है, यदि विधायक आपकी पार्टी से हैं, तो फंड अधिक आसानी से उपलब्ध हो जाता है, यदि हम काम करने में असमर्थ हैं, तो हम अपने मतदाताओं को खो देते हैं."
बाग़ियों को मिलेगा दंड
लेकिन विधायक राहुल पाटिल को विश्वास है कि मतदाता अगले विधानसभा चुनाव में विद्रोहियों को दंडित करेंगे, अगला चुनाव ढाई साल बाद होगा. वो आगे कहते हैं, "मतदाता विद्रोहियों से नाराज़ हैं, उन्हें चुनाव में सबक सिखाया जाएगा."
कुछ लोगों का मानना है कि शिवसेना की पहचान ठाकरे परिवार से जुड़ी हुई है और इससे उसे वापसी करने में मदद मिलेगी, पल्शिकर का कहना है कि ठाकरे परिवार के बिना पार्टी का अस्तित्व नहीं है. उद्धव ठाकरे और उनके बेटे आदित्य ठाकरे बाल ठाकरे की विरासत के उत्तराधिकारी हैं.
जानकारों का कहना है कि उन्हें अपनी पार्टी का पुनर्निर्माण शुरू करने के लिए बाल ठाकरे की विरासत पर दावा करने के लिए दोगुनी मेहनत करनी पड़ेगी, और यही वजह है कि एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट बार-बार बालासाहेब ठाकरे के नाम की कसमें खाई हैं.
अभी ऐसा लग रहा है कि उद्धव ठाकरे के विरोधी उनके पिता की विरासत उनसे छीन ले गए हैं, सवाल यही है कि क्या उद्धव अगले विधानसभा चुनाव तक मज़बूत और असली शिवसेना कहलाने लायक हालत में लौट पाएँगे, यही देखना बाक़ी है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)