कानपुर दंगा मामले में पुलिस पर एकतरफ़ा कार्रवाई के आरोप में कितना दम है? - ग्राउंड रिपोर्ट

- Author, अनंत झणाणे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कानपुर में 3 जून को जुमे की नमाज़ के बाद हुई हिंसा के मामले में सोमवार को पुलिस ने '40 संदिग्ध दंगाइयों' की तस्वीरों वाला पोस्टर जारी किया. पोस्टर चौराहों पर लगाए गए हैं. पुलिस का दावा है कि गिरफ़्तारियां भी की गई हैं.
प्रशासन की तरफ से लगातार कड़ी कार्रवाई के बयान आ रहे हैं. शहर के बेकनगंज और आसपास के इलाक़ों में भारी पुलिस और अर्धसैनिक बल अभी भी तैनात हैं.
लेकिन, सवाल ये बना हुआ है कि जिस दिन देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति कानपुर में मौजूद थे, उस दिन शहर के बीचों-बीच दंगा कैसे भड़क उठा और क्या पुलिस ने अब तक उसमें निष्पक्ष कार्रवाई की है?
पुलिस ने अब तक 4 एफ़आईआर दर्ज की हैं और कुल 54 लोगों को गिरफ़्तार किया है. पुलिस का कहना है, "किसी भी निर्दोष के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है."
साथ ही पुलिस ने ये भी कहा है, "अगर किसी को लगता है कि पुलिस ने किसी निर्दोष को गिरफ़्तार किया है, तो उसे पुलिस के संज्ञान में लाएं. ऐसे लोगों की जांच करके उन्हें तत्काल छोड़ा जाएगा."

'हमारे लोग बेकसूर हैं, पुलिस ने उन्हें उठा लिया'
बीबीसी ने तीन परिवारों से मुलाक़ात की जिन्होंने यह कहा कि उनके घर के पुरुषों को पुलिस ने ग़लत उठाया है और जब दंगा हो रहा था तो वो लोग अपने घरों में थे.
सना ख़ातून कहती हैं कि उनके पति मोहम्मद नासिर और उनके जेठ आसिफ़ अली को 3 जून की देर रात पुलिस ने उठाया और जेल भेज दिया. उनके मुताबिक़ वो दोनों फ्रेम बनाने का काम करते हैं और रोज़ाना मज़दूरी करते हैं.
हिंसा कानपुर के बेकनगंज में हुई और नासिर और आसिफ़ शहर के बकरमंडी के रहने वाले हैं. सना और उनकी जेठानी चाँद बी कहती हैं कि नासिर और आसिफ़ दोनों बकरमंडी स्थित नूरी मस्जिद में जुमे की नमाज़ अदा करने के लिए गए थे जिसके बाद वापस घर लौट आए.
तो सना और चाँद बी अपने पतियों की बेगुनाही कैसे साबित करेंगी? सना कहती हैं, "उनके मोबाइल से उनकी लोकेशन मिल जाएगी तो पता चल जाएगा कि वो कहाँ थे."
उनका दावा है कि नासिर और आसिफ़ का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है.
ज़मानत के सवाल पर नासिर की पत्नी सना कहती हैं, "हम ग़रीब हैं. वकील कहां से करेंगे. रोज़ कमाते और खाते हैं. इतनी हैसियत नहीं है कि हम वकील कर पाएं."

चाँद बी अपने घर का टूटा दरवाज़ा दिखाते हुए कहती हैं, "जब पुलिस आई तो हमने कहा कि कपड़े तो पहनने दो लेकिन कपड़े भी नहीं पहनने दिए और ऐसे ही ले गए. दरवाज़ा तोड़ दिया मेरा. हम क़ानूनी लड़ाई कैसे लड़ सकते हैं. आप मेरा घर जाकर देख लीजिए, आप ख़ुद ही समझ जाएंगे. जो बेकसूर हैं, बेगुनाह हैं. उनको छोड़ दीजिए."
चाँद बी और सना दोनों आखिरी बार नासिर और आसिफ़ से कानपुर के उर्सुला अस्पताल में मिली थीं जब उनका मेडिकल कराया जा रहा था. चाँद बी कहती हैं, "वो दोनों कुछ नहीं कह रहे थे. बस रो रहे थे. बात ही नहीं करने दी पुलिस वालों ने और हमें भगा रहे थे. आसिफ़ और नासिर कह रहे थे कि हम लोग बेकसूर हैं, हमें छुड़ा लो."
'हमारे भाई बीच-बचाव करने गए थे, गिरफ़्तार कर लिए गए'
दंगे से जुड़े कुछ और वीडियो वायरल हैं जिसमें हाजी मोहम्मद नासिर नाम के एक शख़्स के चेहरे पर ख़ून लगा हुआ है.
एक वायरल वीडियो में नासिर अपने फटे और ख़ून से सने कपड़े दिखाते हुए कहते हैं, "मैं भीड़ को हटा रहा था, यह सब पुलिस ने किया है. आपसे कह रहा हूँ, हमारी पुलिस ने. मैं कोई पार्टी से नहीं हूँ भाई. शहर मुफ़्ती मौलाना क़ुद्दूस ने मुझे भेजा था कि आप जाकर भीड़ को हटाइए. यह प्रशासन ने पत्थर चलाए हैं. मेरे पास मूवी है, मेरा मोबाइल छीन लिया गया है."
दूसरे वायरल वीडियो में नासिर पुलिस के साथ चल रहे हैं और पुलिस पर आरोप लगा रहे हैं, "आप दंगा भड़का रहे हो, आप यहाँ से गुम्मे (ईंटें) चला रहे हो. मैं देख रहा हूँ."
वीडियो में ऑडियो आ रहा है, "आपसे क्षमा मांग रहे हैं." लेकिन साफ़ नहीं है कि यह माफ़ी वाली बात कौन कह रहा है.
नासिर कहते हैं, "किसी को पीट दो और बाद में क्षमा मांग लो." इस वीडियो में उनके साथ कानपुर के जॉइंट सीपी एपी तिवारी भी दिख रहे हैं.
एक तीसरे वीडियो में वो कह रहे हैं, "हमारा नाम हाजी मोहम्मद नासिर है और मुझे प्रशासन ले जा रहा है." इस वीडियो में वो मौलाना क़ुद्दूस की ओर से भीड़ को रोकने के लिए भेजे जाने का फिर से ज़िक्र करते हैं और कहते हैं की मैं भीड़ को किनारे कर रहा था.
अपने बड़े भाई नासिर की गिरफ़्तारी के बारे में हाजी मोहम्मद नज़ीर कहते हैं, "नासिर तो उग्र भीड़ को समझाने गए थे. मौलाना शहर क़ाज़ी हज़रत क़ुद्दूस ने कहा कि जाइए देखिये आपकी तरफ़ दादा मियां चौराहे के पास में कुछ हो रहा है तो आप भीड़ को शांत कराइए. भीड़ ने और प्रशासन ने उनको मारा. और उन्हें यह कहकर ले गए की हम आपका मेडिकल करवा देते हैं. इस बहाने ले गए और अनवरगंज थाने में बंद कर दिया. वे डायबिटीज़ और हार्ट के मरीज़ हैं, उन्हें दवा नहीं पहुंचाने दी. कुछ भी नहीं करने दिया. मैं सोमवार को उनसे जेल में मिलने गया. वो निर्दोष हैं और उनको प्रशासन ने फंसाया है."
नज़ीर ने कहा, "हम तो यही कहते हैं कि जो बेगुनाह हैं उनको छोड़ दिया जाये. अगर उन्होंने हरकत की होती तो वो भाग गए होते वहां से. वो तो पुलिस के साथ थे."
नज़ीर का कहना है कि एक वीडियो में, "पुलिस प्रशासन उनसे क्षमा मांग रही है. गुनेहगार आदमी तो भाग जाता है. वो यह सब नहीं करता है. वो तो अलर्ट रहता है. वो प्रशासन से बात नहीं करेगा. बेगुनाही का सबूत एक और यह भी है कि पुलिस के पास सारे वीडियो हैं, अगर कोई एक्शन में हो तो फिर देखिए."
तो क्या नज़ीर अपने बड़े भाई नासिर के लिए बेल की अर्ज़ी डालेंगे? नज़ीर कहते हैं, "हम इसलिए कोशिश नहीं कर रहे हैं क्योंकि हमें मालूम है कि मेरा भाई बेकसूर है. आज कमिश्नर साहब ने कहा कि जो बेकसूर हैं वो हमसे आकर मिलें तो उनको छोड़ा जायेगा. हम उनसे जाकर मिलेंगे, अपने भाई की बेगुनाही का सबूत देंगे. हम चाहेंगे कि हमारा भाई ऐसे ही छूटे. हम बेल क्यों करें? गुनहगार आदमी बेल करवाए."
कानपुर शहर के मुफ़्ती हाफ़िज़ क़ुद्दूस ने इस बात की पुष्टि की, कि हाजी मोहम्मद नासिर उनके कहने पर मौके पर बीच बचाव करने के लिए गए थे. मुफ़्ती हाफ़िज कुद्दूस कहते हैं, "जब भी हम ऐसे मौके पर जाते हैं तो 10-20 लोगों को हम फ़ोन करके, इत्तिल्ला करके पहुँचते हैं. उनमें से एक शख़्स हाजी मोहम्मद नासिर हैं जिसे मैंने भीड़ को काबू करने के लिए भेजा था. अब वो अपनी कोशिश कर रहा था, लेकिन पता नहीं क्या मसाला बना और पुलिस ने उसे गिरफ़्तार कर लिया. मैंने अपनी बात प्रशासन के सामने रखी भी है. तो मानो वो एक-दो दिन में छूट भी जाएगा."
हमने जब हाजी मोहम्मद नासिर, और सना खातून और चाँद बी के पतियों की गिरफ़्तारी के बारे में कानपुर के पुलिस कमिश्नर विजय सिंह मीणा से पूछा तो उन्होंने कहा कि, "हमने सुनिश्चित किया कि हमारी ट्रांसपेरेंट एप्रोच रहे. मैंने जॉइंट सीपी के नेतृत्व में एक समिति का गठन किया. जो प्रार्थना पत्र देंगे और उनके पास कोई सबूत होंगे कि वो शहर में नहीं थे या जो भी सबूत उनके पास होंगे, उसके आधार पर ऐसा लगता है कि किसी को ग़लत जेल भेज दिया है तो निर्दोष को निकाला जाएगा. अगर कोई निर्दोष व्यक्ति है तो निश्चित हमारी समिति उसे चेक करेगी और अगर कोई त्रुटि हुई है तो उसको सही किया जायेगा."

पुलिस की कार्रवाई पर क्या कहते हैं स्थानीय बीजेपी नेता?
हिंसा की शुरुआत बेकनगंज के चंद्रेश्वर हाता के आसपास हुई. हाते के दरवाज़े पर भारतीय जनता युवा मोर्चा के नेता अमित बाथम का पोस्टर लगा है और उसके मुताबिक़ वो पार्टी के कानपुर और बुंदेलखंड क्षेत्र के महामंत्री हैं.
अमित बाथम हमें घटना से जुड़ा वीडियो दिखाते हैं जिसमें वो यह दावा करते हैं कि हमला जुमे की नमाज़ अदा कर बाहर निकली भीड़ ने शुरू किया.
वीडियो में कोई ऑडियो नहीं है और वो चंद्रेश्वर हाते की तरफ़ से खींचा गया है. उसमें जुमे की नमाज़ के बाद मस्जिदों से निकली भीड़ को साफ़ देखा जा सकता है. कुछ मुस्लिम समुदाय के लोग भीड़ को आगे बढ़ने का हाथ से इशारा करते हुए नज़र आ रहे हैं और एक युवक दौड़ कर फिर रुमाल से इशारा करने वाले को रोकने लगता है. उसके पीछे भीड़ आती है, फिर अफरा-तफरी शुरू हो जाती है. दोनों पक्ष के लोग एक-दूसरे से भिड़ने लगते हैं. हाते पर मौजूद पुलिस भीड़ को खदेड़ देती है.
भाजपा नेता अमित बाथम का दावा है कि रुमाल से इशारा करके भीड़ को बुलाया गया, न कि आगे बढ़ने को कहा गया.
इस वीडियो में चीज़ें दिख तो साफ़ रही हैं लेकिन इसमें ऑडियो नहीं है तो यह साफ़ नहीं है कि क्या किसी पक्ष की तरफ़ से कुछ कहा गया जिसकी वजह से हिंसा भड़की.
दूसरे वायरल वीडियो में ये दिख रहा है कि कैसे लोग ठेले पर रखे हुए पत्थरों को उठाकर हाते और उसके आसपास दुकानों पर पत्थरबाज़ी कर रहे हैं.
हालांकि, मुस्लिम पक्ष का कहना है कि पत्थर फेंकने की घटना की शुरुआत दूसरे समुदाय की तरफ़ से हुई.

भाजपा नेता अमित बाथम ने कुछ तस्वीरें भी दिखाईं जिसमें एक समुदाय के युवक पत्थरबाज़ी करते हए नज़र आ रहे हैं. गली से खींचे गए एक अन्य वायरल वीडियो में भीड़ पत्थरबाज़ी करते हुए नज़र आ रही है.
भाजपा नेता अमित बाथम कहते हैं कि वो पुलिस की कार्रवाई से संतुष्ट हैं. वो कहते हैं, "यहाँ पर उस दिन सिर्फ़ सात पुलिस वाले थे. तो इतना कंट्रोल नहीं हो पाया. पुलिस ने भी कंट्रोल किया और हाते के लोगों ने भी अपनी सुरक्षा में कंट्रोल किया. 15 से 20 मिनट में पूरा प्रशासन आ गया. हम उनकी कार्रवाई से पूरी तरह संतुष्ट हैं."
संदिग्ध दंगाइयों के पोस्टर लगाने पर अमित बाथम कहते हैं, "यहाँ पर जो कैमरे हमारी और उनकी दुकानों में लगे हुए थे, उसकी रिकॉर्डिंग के आधार पर जो फ़ुटेज आई है, उसे ही चिपकाया जा रहा है."
तो उनको कैसे ढूंढा जाएगा? इस पर वो कहते हैं, "ढूंढने के लिए और पब्लिक को अलर्ट करने के लिए फ़ोटो चिपका दिए गए हैं. बहुत अच्छी कार्रवाई है, इसे लगातार जारी रखना चाहिए."
एक मुक़दमा चंद्रेश्वर हाता के निवासी मुकेश बाथम की तहरीर पर भी लिखा गया है जिसमें उन्होंने कहा है कि हाता पर मौजूद 8-10 लोगों ने, "प्राइवेट डिफेंस में (फेंके गए) पत्थरों को फेंकना शुरू किया. हाता के अंदर से कुछ लोग दिवाली के पटाखे भी डराने के उद्देश्य से लेकर आए और भीड़ की तरफ़ फेंके."

वायरल वीडियो में बम फटते और धुआं उठते हुए नज़र आ रहा है.
भाजपा नेता अमित बाथम कहते हैं कि हाता के आस-पास दूसरे समुदाय की ऊंची-ऊंची बिल्डिंग हैं जिससे उन्होंने हाते पर पथराव किया.
एकतरफ़ा कार्रवाई के आरोप के बारे में वो कहते हैं, "बिल्कुल होनी चाहिए क्योंकि हमला उन्होंने किया. आप कोई ऐसी फ़ुटेज दिखा दीजिए कि चंद्रेश्वर हाते के लोग कहीं गए हों. वो अपनी जगह पर थे. दूसरे समुदाय के लोग आकर विवाद करके गए हैं तो उन पर ही मुक़दमा लिखा जाना चाहिए. कार्रवाई एकतरफ़ा हो रही है क्योंकि आप लोग विवाद कर रहे हैं, हम नहीं."
लेकिन जिस विवादित बयान को लेकर बंद की मांग उठी और बयान देने के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग की गयी उस बारे में भाजपा के अमित बाथम कहते हैं, "वो एक बड़ी पॉलिटिक्स का हिस्सा है. उसे हम लोग क्यों झेलें. किसी ने कुछ बोला, वो निष्कासित हो गयीं, उसको हम लोग क्यों झेलें. हम तो छोटे तबके के लोग हैं, इस पॉलिटिक्स में हम लोगों को क्यों डालना है. हम सुरक्षा की मांग करते हैं और कार्रवाई से पूरी तरह संतुष्ट हैं."
और क्या दंगे के वक़्त हाते की तरफ़ मौजूद भीड़ ने बम लाने को कहा, जैसा एक वायरल वीडियो में दिखाई और सुनाई पड़ रहा है?
इस बारे में अमित बाथम कहते हैं, "ऐसे यहाँ कुछ नहीं हुआ. हम बता रहे हैं, उस वक़्त यहाँ लोग ही नहीं थे. जो भी पब्लिक और भीड़ थी वो दूसरे समुदाय के लोगों की थी."
क्या पुलिस एकतरफ़ा कार्रवाई कर रही है?

दंगे में दो पक्ष भिड़े लेकिन उससे जुड़ी तीन एफ़आईआर में सभी नामजद आरोपी एक ही समुदाय के हैं. और अभी तक किसी संदिग्ध की गिरफ़्तारी भी एक ही समुदाय के लोगों की हुई है.
बंद का पोस्टर छापने वाली दुकान रोमा प्रिंटर को सील कर दिया गया है और उसके मालिक को गिरफ़्तार कर लिया गया है.
घटना से जुड़े तमाम वायरल वीडियो में एक समुदाय के लोग साफ़ पत्थरबाज़ी करते हुए दिख रहे हैं और पुलिस के मुताबिक़ वो घटना से जुड़े 40 वायरल वीडियो के आधार पर अपनी कार्रवाई कर रही है.
लेकिन कुछ ऐसी भी वायरल वीडियो हैं जिसमें दूसरा पक्ष पत्थरबाज़ी करते हुए नज़र आ रहा है. मसलन एक वायरल वीडियो में पुलिस की तरफ़ खड़ी हुई भीड़ में एक आदमी, "बम लाओ" कह रहा है. एक और वायरल वीडियो में छतों पर खड़े लोग पत्थरबाज़ी करते हुए नज़र आ रहे हैं.
तो सवाल उठता है कि क्या ये छतों से पत्थरबाज़ी के वायरल वीडियो भी 3 जून के हैं, और उसी मौके के हैं जहाँ दंगा भड़का? क्या पुलिस इसकी पुष्टि कर सकती है और क्या ये उसी घटना से जुड़े हुए हैं? तो क्या पुलिस संज्ञान लेकर इसमें कोई कार्रवाई करेगी?
क्या 3 जून को हुई हिंसा को रोका जा सकता था?

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पुलिस द्वारा इस मामले में बनाए गए मुख्य अभियुक्त ज़फर हयात हाश्मी का एक बयान वायरल हुआ था जिसमें वे सयाहक पुलिस आयुक्त अनवरगंज मोहम्मद अकमल ख़ान के दफ़्तर के बहार खड़े होकर कह रहे हैं कि, "तीन तारीख़ को हमारा आह्वान दुकानों की बंदी का था. तीन तारीख़ को यहां प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति आने वाले थे. तो प्रशासन ने कहा कि तीन तारीख़ को आप रद्द कर दें और 5 तारीख़ के कार्यक्रम पर प्रशासन पूर्ण रूप से सहयोग करेगा. हमने प्रशासन की बातों पर यकीन करते हुए पांच तारीख़ का कार्यक्रम रखा है."
ज़फर हयात हाश्मी एमएमए जौहर फैंस एसोसिएशन नाम के संगठन के अध्यक्ष हैं और उन्होंने ही तीन तारीख़ के बंद का आह्वान किया था. अब पुलिस ने उन्हें इस मामले में मुख्य अभियुक्त बनाया है और उन पर षड्यंत्र का आरोप लगाया है.

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कानपुर के वरिष्ठ पत्रकार हैदर नक़वी कहते हैं, "एक जून को ज़फर हयात हाश्मी की पुलिस से मीटिंग हुई थी. इनसे इस बंद को 3 तारीख़ की जगह पांच को आयोजित करने की गुज़ारिश की गई थी. इसे ख़त्म करन को नहीं कहा गया था. इन्होंने सिर्फ़ अपना एक बयान जारी किया और एक फ़ेसबुक पोस्ट लिखी जिसे उन्होंने कई बार शेयर किया. लेकिन जो चीज़ें 9 दिनों से तैयार हो रही थीं उसे एक फ़ेसबुक या व्हाट्सएप्प पोस्ट से अचानक ख़त्म नहीं किया जा सकता था. साथ ही अगर इस पैमाने पर तैयारियां हो रही थीं तो प्रशासन को भी अपने स्तर से मैसेज भेजना चाहिए था और लोगों तक यह बात पहुंचानी चाहिए थी. पैग़म्बर मुहम्मद का मामला ऐसा है कि वो लोगों को आहत करता है. मुझे लगता है कि पुलिस हालात को थोड़ा परख नहीं पाई."
तो ज़फर हयात हाशमी ने क्या बंद को वापस लिया था? क्या उसने उसका संदेश लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की थी और क्या पुलिस ने भी उस संदेश को लोगों तक पहुँचाने की कोशिश की थी? इस बारे में पुलिस कमिश्नर विजय सिंह मीणा कहते हैं कि, "उसने बंद का आह्वान किया था. पुलिस ने उसे कांटेक्ट करके कहा कि क्योंकि विज़िट है बंद को कैंसिल कर दिया जाए. उसने ऐलान किया. लेकिन अंत में उसकी ज़िम्मेदारी थी कि वो नीचे तक इस संदेश को पहुंचवाता. जब यह घटना घटित हुई तो अभी तक की जाँच में सीधे सीधे उसकी ज़िम्मेदारी निकल कर आ रही है. उसी हिसाब से करवाई की जा रही है. मैं आपको आश्वस्त करता हूँ की किसी भी निर्दोष को इसमें नहीं फंसाया जायेगा."
कानपुर में एनआरसी और सीएए के मुक़दमे लड़ चुके वकीलों का क्या है कहना?
कानपुर के वकील फ़रान जावेद और उनकी टीम ने 2019 के एनआरसी और सीएए विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा के मामले में कुल 58 लोगों को अदालत से ज़मानत दिलवाई. उन पर भी दंगा करने के मुक़दमे थे. फ़रान के मुताबिक इससे जुड़ी बाबूपुरवा थाने में जो मुक़दमा दर्ज़ हुआ उसमें जांच अभी भी जारी है.
3 जून की हुई हिंसा में पुलिस ने ने जिन 54 लोगों को गिरफ़्तार किया है, फ़रान इनमें से चार को ज़मानत दिलाने की कोशिश कर रहे हैं.
फ़रान जावेद कहते हैं कि एनआरसी और सीएए में हुई हिंसा के अभियुक्तों के पोस्टर लगाए गए थे जिसमें सिविल सोसाइटी के सदस्य भी शामिल थे लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उसे राइट टू प्राइवेसी का उल्लंघन मानते हुए हटाने का आदेश दिया था.
फ़रान जावेद कहते हैं, "एक बार फिर सरकार ने पोस्टर लगाने शुरू कर दिए हैं. और यह सिर्फ़ फ़ुटेज वाले पोस्टर हैं जिसमे लोगों की शक्लें भी समझ नहीं आ रही हैं. न वो किसी अथॉरिटी ने सर्टिफाई किए हैं, न किसी लैब ने. उसमें कोई शक्ल नहीं समझ आ रही है. सिर्फ़ शक की बुनियाद पर किसी को भी उठा लेंगे. सभी एफ़आईआर में 1,000 से ज़्यादा अज्ञात लिखे हैं तो किसी को भी उठा लेंगे."
लेकिन इस पोस्टर में नाम नहीं लिखे हैं और 'नेम और शेम' नहीं किया जा रहा हैं. इस तर्क के बारे में फ़रान जावेद कहते हैं, "ठीक है आपने 40 लोगों के फ़ोटो जारी किए, अब 40 उठा लीजिये. 40 से ज़्यादा न उठाइये. तभी हम पुलिस का यह एक्शन मान लेंगे."
क्या संदिग्धों के पोस्टर प्राइवेसी का हनन है? इस बारे में पुलिस कमिश्नर विजय सिंह मीणा कहते हैं, "यह प्राइवेसी का हनन इसलिए नहीं है कि क्योंकि वीडियो सोशल मीडिया पर उपलब्ध हैं. यूट्यूब पर उपलब्ध हैं. और आम जनता के पास हैं. व्हाट्सऐप से यह पास हुए हैं. हमने सिर्फ उन वीडियोज़ से जिन लोगों के हाथ में पत्थर हैं, जो उपद्रवी हैं उनके फोटो फोटो छांटे हैं, और लगाए है. हमारा उद्देश्य सिर्फ इतना है कि कोई आदमी उनको पहचानता है वो हमें बता दे ताकि उनकी शिनाख्त हो सके."
लेकिन क्योंकि यह एक आगे चलते रहने वाली जांच है तो क्या शिनाख़्त और गिरफ़्तारियां आगे भी जारी रहेंगी?
इसमें तीसरा मुक़दमा चंद्रेश्वर हाता निवासी मुकेश बाथम की तहरीर पर दर्ज हुआ है. वे घायल हैं, उनका इलाज चल रहा है. दूसरे समुदाय की तरफ़ से अभी तक कोई तहरीर क्यों नहीं आई है?
तो क्या निष्पक्ष कार्रवाई के लिए लिखित शिकायत की ज़रूरत हैं?
वकील फरान जावेद कहते हैं, "इसमें दो मुक़दमें पुलिसवालों की तहरीर पर हुए हैं. जब आपने अज्ञात भीड़ के ख़िलाफ़ एफआईआर की तो फिर अज्ञात में तो दोनों पक्ष हो गए न. तो आप दोनों पक्षों के लोगों को उठाइए. उनकी भी शिनाख्त करिए. उन्होंने भी ईंट-पत्थर चलाए. आप सिर्फ़ एक ही पक्ष को क्यों टारगेट कर रहे हैं. सीसीटीवी फ़ुटेज तो वहां के भी हैं, तो उनके भी पोस्टर लगाइए. उनकी भी शिनाख्त करके जेल भेजिए. उनको क्यों नहीं कर रहे हैं?"
क़ानूनी तर्क रखते हुए फ़रान जावेद कहते हैं. "एक ही घटना में तीन एफ़आईआर हो रही हैं. यह संवैधानिक अधिकारों का भी हनन है. सविधान में आर्टिकल 20 क्लॉज़ 2 में साफ़ लिखा है कि एक ही अभियोग में, एक ही घटना में एक ही बार सज़ा मिलेगी."
क्या चलेगा बुलडोज़र और होगी कुर्की?
मीडिया में कानपुर की पूर्व डीएम नेहा शर्मा का बयान आया था. समाचार चैनल आज तक को दिए इंटरव्यू में उन्होंने जिस इलाके में दंगा हुआ था उस पर बयान दिया था कि "उसमें पहले से ही कानपुर डेवलपमेंट अथॉरिटी कार्रवाई करते आ रही है. इस घटना के बाद बहुत ही सघन रूप से कानपुर डेवलपमेंट अथॉरिटी काम करेगी. और निश्चित ही रूप से जो ग़ैरक़ानूनी एन्क्रॉचर्स हैं उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाएगी."
डीएम नेहा शर्मा का तबादला हो चुका है और उसके बाद इस तरह की कार्रवाई का प्रशासन की तरफ़ से कोई औपचारिक बयान नहीं आया है.
कानपुर के अख़बार दैनिक अनवार ए क़ौम के एडिटर ज़ुबैर अहमद फारूकी कहते हैं, "छतों पर झंडे लगे हैं, वहां से पथराव किया जा रहा है. हर तरीके का दबाव एक ही तबके के लोगों पर किया जा रहा है. आपके यहाँ बुलडोज़र चला दिया जाएगा. मैं कहता हूँ ग़लतियां तो सबकी हैं."

ज़ुबैर अहमद फारूकी बंद का कार्यक्रम बदलने का मैसेज आम लोगों तक नहीं पहुँच पाने के बारे में कहते हैं, "यह तो ज़िम्मेदारी बनती है कि इस बात को भी ज़ोर से कहा जाए की तीन तारीख़ बाज़ार बंद का कार्यक्रम नहीं होगा. कुछ चूक तो हुई है. कुछ कमियां तो हुई हैं, जिन लोगों ने पथराव किया, उधर से इधर और इधर से उधर उनको धैर्य से काम लेना चाहिए था अपने बड़ों को बीच में लाकर. यह काम इधर से भी नहीं हुआ और यह काम उधर से भी नहीं हुआ. और जब शहर क़ाज़ी जैसे लोग आए तो उनकी बेइज़्ज़ती की गयी, उनका मोबाइल छीन लिया गया."
पत्रकार ज़ुबैर अहमद फारूकी इस घटना की वजह से कानपुर शहर में बदले हुए हालात के बारे में कहते हैं, "जिस समाज कि, यानी हम पूरे समाज की बात कर रहे हैं, सिर्फ हिन्दू मुस्लिम की अलग अलग बात नहीं कर रहे. तो जिस समाज की मानसिकता यह हो की वो हकीकत को समझे बग़ैर कार्रवाई कर दे तो उस समाज में यही तो होगा, जो हुआ है. लेकिन इसमें प्रशासन ने जो कार्रवाई की है वो एक तरफ़ा है. दोनों तरफ़ के लोग कह रहे हैं कि हमने पत्थरबाज़ी अपनी आत्म रक्षा में की. इस तरफ के लोग कह रहे हैं कि ऊपर से पत्थर आ रहे हैं तो हम क्या करें? अब जब दोनों ने डिफेंस में किया, दोनों ने ग़लती की तो दोनों को पकड़ो, दोनों को जेल भेजो, दोनों के ख़िलाफ़ मुक़दमा कायम करो."
जब बीबीसी ने पुलिस कमिश्नर से एकतरफ़ा कार्रवाई के आरोपों के बारे में सवाल किया तो उन्होंने कहा कि, "यह भ्रामक सूचनाएँ दी जा रही हैं, वो ग़लत हैं. पुलिस के ऊपर पथराव हुआ है. शुरूआती क्लैश की जो आप बात कर रहे हैं वो एक इन्वेस्टीगेशन का बिंदु है. लेकिन खुद जब हम गलियों में गए थे तो पुलिस पर पथराव हुआ है. और वीडियोज़ में स्पष्ट है कि कौन हम पर पथराव कर रहा है. हम इस वक्त उन लोगों को आयडेंटीफाय कर रहे हैं जिन्होंने पुलिस पर पथराव किया है. और उन पर कार्रवाई की जा रही है. एकतरफ़ा कार्रवाई की बात बेबुनियाद हैं."
अंत में ज़ुबैर अहमद फारूकी कहते हैं कि जो कुसूरवार हैं उनके ख़िलाफ़ ज़रूर कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन बेकसूरों को परेशान नहीं करना चाहिए और दहशत का माहौल नहीं बनाना चाहिए.
कैसे संभाल रही है कानपुर में पुलिस हालात?

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बीबीसी से बातचीत में कानपुर कमिश्नर विजय सिंह मीणा ने कहा कि तीन जून को दस मिनट के अंदर वे खुद ही घटनास्थल पर पहुंच गए थे और पुलिस ने एक से दो घंटे के अंदर हालात को क़ाबू में कर लिया. उनके मुताबिक अभी तक गैंगस्टर एक्ट नहीं लगाया गया है लेकिन पुलिस ने चार एसआईटी गठित की हैं जो इस बारे में निर्णय लेगी. उसके बाद तय होगा कि किन किन पर गैंगस्टर और एनएसए की कार्रवाई की जाएगी.
पिछले दो-तीन दिनों में कानपुर में कुछ और घटनाएं हुईं जिसमे पुलिस का कहना है कि उन्होंने तुरंत कार्रवाई कर अभियुक्तों को जेल भेजा. कानपुर पुलिस ने भाजपा युवा मोर्चा के स्थानीय नेता हर्षित श्रीवास्तव लाला को सोशल मीडिया पर पैगम्बर मुहम्मद पर आपत्तिज़नक टिपण्णी करने के आरोप में एफआईआर दर्ज कर जेल भेजा है. कानपुर पुलिस कमिश्नर विजय सिंह मीणा ने बताया, "उनके द्वारा एक पोस्ट किया गया जो आपत्तिनजक था. पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए मुक़दमा दर्ज किया और गिरफ्तारी की. सरकार की नीति साफ़ है कि कोई भी उन्माद फैलाने का प्रयास करेगा, कोई भी माहौल को खराब करने के प्रयास करेगा, किसी भी वर्ग से क्यों ना हो, उसके खिलाफ निष्पक्ष कार्रवाई की जाएगी, सख्त कार्रवाई की जाएगी."
एक दूसरी घटना में सोशल मीडिया पर भड़काऊ वीडियो जारी करने वाले गौरव राजपूत नामक शख़्स को भी कानपुर पुलिस ने गिरफ़्तार किया है.
कानपुर पुलिस आयुक्त (पश्चिम) ने इस कार्रवाई की जानकारी दी है.
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तीसरी घटना में कानपुर पुलिस ने हिन्दू समन्वय समिति नाम के संगठन के युवा मोर्चा के अध्यक्ष तुषार शुक्ल के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई की है. उन पर आरोप है कि उन्होंने बाज़ार में कपड़े बेच रहे एक बुज़ुर्ग मुसलमान के साथ बदतमीज़ी की और उनकी दुकान हटवाने की कोशिश की.
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कानपुर पुलिस का दावा है कि वह हर तरह से से अमन चैन कायम करने की कोशिशों में लगी हुई है. कानपुर कमिश्नर ने कहा, "हमने जितनी भी पीस समिति थीं, शहर के सम्मानजनक नागरिकगण थे. उनके साथ तीन-चार स्तरों पर बैठक हुई. जिसमें सभी धर्मगुरु, सभी सम्मानज़नक नागरिकगण लोग आये और सभी लोगों को ज़िम्मेदारी दी गयी कि वो आगे आएं और अपने शहर को संभालें. शुक्रवार को जुमे की नमाज़ सकुशल संपन्न हुई. पुलिस की ड्यूटी अनवरत जारी रहेगी और कोशिश कर रहे हैं कि मामला फिर से उठे या बढे ना."
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