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नूपुर शर्मा की पैगंबर मोहम्मद पर टिप्पणी मामले में बीजेपी से कहाँ चूक हुई?
- Author, अनंत प्रकाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारतीय जनता पार्टी पैग़ंबर मोहम्मद के ख़िलाफ़ आपत्तिजनक टिप्पणी के मामले में कड़ी कार्रवाई करती हुई दिखने की कोशिश कर रही है.
सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, क़तर, पाकिस्तान और ईरान जैसे कई अरब देश इस आपत्तिजनक टिप्पणी का विरोध कर रहे हैं. ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ़ इस्लामिक कोऑपरेशन ने भी बयान जारी इसकी आलोचना की है.
ऐसे में बीजेपी ने बीते रविवार अपनी राष्ट्रीय प्रवक्ता नूपुर शर्मा को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निलंबित कर दिया है और एक अन्य नेता नवीन जिंदल को पार्टी से निष्कासित कर दिया है.
लेकिन इसके बाद भी अरब देशों में विरोध थमता हुआ नज़र नहीं आ रहा है. इसके साथ ही बीजेपी नूपुर शर्मा के निलंबन पर अपने समर्थकों की ओर से भी विरोध का सामना भी कर रही है.
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या बीजेपी ने इस मामले को संभालने में किसी तरह की ग़लती की है.
टीवी बयान से सांप्रदायिक हिंसा तक
बीजेपी नेता नूपुर शर्मा ने बीती 26 मई को निजी टीवी चैनल टाइम्स नाउ के एक डिबेट कार्यक्रम में इस्लाम के आखिरी पैगंबर मोहम्मद के ख़िलाफ़ आपत्तिजनक टिप्पणी की थी.
इसके बाद पेशे से पत्रकार मोहम्मद जुबैर और राणा अयूब समेत कई लोगों ने ट्विटर पर शर्मा की टिप्पणी साझा करते हुए इसका विरोध किया. जब ये सब हो रहा था लगभग उसी वक़्त नूपुर शर्मा दावा कर रही थीं कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व उनके साथ है.
उन्होंने बीती 31 मई को ऑप-इंडिया को दिए इंटरव्यू में कहा है कि "देवेंद्र फडणवीस जी ने फोन करके मुझसे कहा है कि बेटा आप चिंता न करें, हम सब आपके साथ हैं. और पार्टी का वरिष्ठ नेतृत्व चाहें प्रधानमंत्री कार्यालय हो, गृह मंत्रालय कार्यालय या पार्टी अध्यक्ष का दफ़्तर हो, सब मेरा समर्थन कर रहे हैं."
इसी बीच, उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में इस टिप्पणी की वजह से सांप्रदायिक हिंसा के हालात पैदा हुए जिसमें कई लोगों को गिरफ़्तार किया जा चुका है.
इस मामले में दर्ज एफ़आईआर में कहा गया है कि हिंसा के तार नूपुर शर्मा की आपत्तिजनक टिप्पणी से जुड़े हैं. एफ़आईआर के मुताबिक़, कुछ अराजक तत्वों द्वारा नूपुर शर्मा के बयान, पैग़ंबर मोहम्मद पर की गई टिप्पणी को लेकर बाज़ार बंद का आह्वान किया गया था.
लेकिन बीजेपी ने इसके बाद भी चार जून तक नूपुर शर्मा के ख़िलाफ़ किसी तरह की कार्रवाई नहीं की.
इसके बाद अरब देशों की ओर से इस मामले में विरोध दर्ज कराया गया जिसके बाद बीजेपी ने कल यानी पांच जून को नूपुर शर्मा और नवीन जिंदल के ख़िलाफ़ कार्रवाई की.
क़तर में भारतीय राजदूत दीपक मित्तल ने इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि ये ट्वीट किसी भी तरह से भारत सरकार के विचारों को नहीं दर्शाते, ये 'शरारती तत्वों' के विचार हैं.
लेकिन बीजेपी के समर्थकों का एक तबका शर्मा के निलंबन का विरोध कर रहा है. ट्विटर पर शेम ऑन बीजेपी गवर्नमेंट हैशटैग ट्रेंड कर रहा है जिसके तहत लोग पार्टी के इस फ़ैसले का विरोध कर रहे हैं.
ट्विटर यूज़र पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ ने लिखा है, "जो संगठन/दल अपने घर की महिलाओं का सौदा कर उन्हें भेड़ियों को सौंप कर शत्रु से महान होने का प्रमाण पत्र प्राप्त करने की दौड़ में लग जाए, उसे समाज समाप्त कर देता है."
क्या सरकार ने देर कर दी?
अरब देशों की ओर से दर्ज कराए जा रहे विरोध का असर आर्थिक नुकसान के रूप में भी सामने आने लगा है. समाचार एजेंसी एएफ़पी के मुताबिक़, क़ुवैत के सुपर मार्केट विरोध दर्ज कराते हुए भारतीय उत्पादों को बाज़ार से हटा रहे हैं.
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत सरकार और पार्टी ने इस मामले में कार्रवाई करने में किसी तरह की देर कर दी.
वरिष्ठ पत्रकार मधुसूदन आनंद मानते हैं कि अगर सरकार और पार्टी ने इस मामले में समय रहते कदम उठा लिए होते तो मामला यहां तक नहीं पहुंचता.
वे कहते हैं, "इस मामले में बिना सोचे-समझे जुनून में आकर बयान दिया गया. इस तरह का बयान देते वक़्त सोचा जाना चाहिए था कि भारत के तमाम लोग अलग-अलग स्तरों पर अरब देशों में काम करते हैं. लेकिन बिना सोचे-समझे बयान दे दिया गया जो कि निंदनीय था. और सरकार पहले ही कदम उठा लेती तो सरकार और मुल्क की फजीहत होने से बच जाती."
अरब देशों का विरोध
पिछले कुछ सालों में सऊदी अरब से लेकर संयुक्त अरब अमीरात समेत तमाम अरब देशों के साथ भारत के व्यापारिक और राजनीतिक संबंधों में मज़बूती आई है.
इन देशों में तमाम भारतीय काम करते हैं जो भारत में रहने वाले अपने परिवारों को तनख़्वाह के रूप में धनराशि भेजते हैं. ऐसे में इन देशों की ओर से भारत के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन काफ़ी अहम था.
लेकिन सवाल उठता है कि क्या भारत सरकार की कार्रवाई के लिए अरब देशों का विरोध ज़िम्मेदार है.
बीजेपी की राजनीतिक शैली को समझने वाली वरिष्ठ पत्रकार राधिका रामाशेषन मानती हैं कि नूपुर शर्मा और ज़िंदल के ख़िलाफ़ जो कार्रवाई हुई है, उसके लिए अरब देशों द्वारा दर्ज कराया गया विरोध ज़िम्मेदार है.
वे कहती हैं, "अगर अरब देशों की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया न आती तो ये कदम नहीं उठाया जाता क्योंकि नूपुर शर्मा को किस आधार पर फ्रिंज एलिमेंट कहा जा सकता है. वे बीजेपी की राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं. साल 2015 में दिल्ली के चुनाव में बीजेपी ने उन्हें अरविंद केजरीवाल के ख़िलाफ़ खड़ा किया था. नूपुर शर्मा बीजेपी के शीर्ष नेताओं के पसंदीदा प्रवक्ताओं में शामिल हैं. बीजेपी अहम मुद्दों पर हो रही बहस में पार्टी का पक्ष रखने की ज़िम्मेदारी उन्हें देती है. ऐसे में उन्हें फ्रिंज एलिमेंट नहीं कहा जा सकता है."
"अगर अरब देशों की ओर से लगातार इस मुद्दे पर विरोध दर्ज नहीं कराया जाता तो इस मामले में कोई कदम नहीं उठाया जाता. संयुक्त अरब अमीरात आदि के साथ भारत के अच्छे राजनयिक संबंध हैं. वहां से भारत में निवेश किया जा रहा है. ये देश भारत के बेहद महत्वपूर्ण आर्थिक आर्थिक सहयोगी हैं. ऐसे में जब इन देशों की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया आई तो मौजूदा सरकार उसे नज़रअंदाज़ नहीं कर सकी."
कार्रवाई करने में क्या बीजेपी ने देरी की ?
मोदी और शाह के नेतृत्व वाली बीजेपी को अलग-अलग मुद्दों पर एक तय रणनीति के साथ सोशल मीडिया और टीवी डिबेट में भाग लेने के लिए जाना जाता है.
ऐसे मौक़े कम ही आए हैं जब अपने किसी प्रवक्ता की वजह से बीजेपी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस तरह की आलोचना का सामना करना पड़ा हो. फिर वो क्या वजह है जिसके चलते बीजेपी को नूपुर शर्मा के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने में इतना वक़्त लगा?
राधिका रामाशेषन कहती हैं, "बीजेपी इस मसले को लेकर समय रहते कदम नहीं उठा पाई क्योंकि उसके मुख्य आधार और उसके इर्द-गिर्द बने सपोर्ट सिस्टम में इसे लेकर काफ़ी अच्छी प्रतिक्रिया आ रही थी. पार्टी का फ़ैसला आने से पहले तक सोशल मीडिया में पार्टी के बड़े समर्थक नूपुर शर्मा के बयान की वाहवाही कर रहे थे. बीजेपी ने अभी हाल ही में पांच में से चार राज्यों में चुनावी जीत हासिल की है जिससे बीजेपी समर्थकों के मनोबल में वृद्धि हुई है."
"ऐसे में उनका कहना है कि इस तरह की बयानबाज़ी से हमारे वोट बैंक में 1-2 फीसदी की बढ़ोतरी होती है. और पार्टी ने अपनी वोट-बैंक राजनीति को ध्यान में रखते हुए कोई कदम नहीं उठाया. यही नहीं, इस तरह की बयानबाज़ी को प्रोत्साहन दिया जाता है. क्योंकि जब इस तरह के बयानों की वजह से ज़मीन पर कुछ होता है तो इससे हिंदू-मुसलमान के बीच ध्रुवीकरण होता है जिससे बीजेपी को राजनीतिक फायदा मिलता है. यही ध्यान में रखते हुए कोई कदम नहीं उठाया गया था."
"लेकिन अब जब अरब देशों की वजह से बीजेपी ने नूपुर शर्मा को बाहर का रास्ता दिखा दिया है तो बीजेपी समर्थक इसका विरोध कर रहे हैं. लेकिन बीजेपी के लिए अपने समर्थकों को संभालना एक बड़ी चुनौती बन गया है. क्योंकि पिछले कुछ सालों में समर्थकों का एक बड़ा तबका काफ़ी कट्टर हो गया है जिसे मॉडरेट करना बीजेपी के लिए काफ़ी मुश्किल होगा."
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