पीएम मोदी के 8 साल: नोटबंदी से लॉकडाउन तक 8 बड़े फैसले- कितने मारक कितने चूके?

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- Author, सिद्धनाथ गानू
- पदनाम, बीबीसी मराठी
नरेंद्र मोदी ने पहली बार 26 मई 2014 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी. पहली बार कांग्रेस के अलावा किसी अन्य दल को केंद्र में स्पष्ट बहुमत मिला और पहली बार कांग्रेस को इतनी करारी हार का सामना करना पड़ा. उनके केवल 44 सांसद चुने गए.
नरेंद्र मोदी को बतौर प्रधानमंत्री जितना स्थायित्व और काम करने की आज़ादी मिली है, वो बहुत कम ही प्रधानमंत्रियों को मिली है. इस लेख में, हम इन 8 वर्षों में मोदी सरकार के लिए गए 8 बड़े निर्णयों की समीक्षा करेंगे.
1. मेक इन इंडिया - स्वच्छ भारत
सत्ता में आने के बाद अपने पहले वर्ष में, प्रधानमंत्री मोदी ने दो बड़ी योजनाओं, 'मेक इन इंडिया' और 'स्वच्छ भारत' की शुरुआत की. पहली योजना का मक़सद उद्योग और निवेश को बढ़ावा देना और दूसरी का स्वच्छता के प्रति जागरूकता पैदा करना था.

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मेक इन इंडिया का मक़सद लालफीताशाही को कम करना, विदेशी उद्योगों को भारत में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करना और देश की जनशक्ति को रोज़गार प्रदान करने की अनुमति देने का था. सरकार ने आगे बढ़ते हुए, विभिन्न क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के द्वार भी खोल दिए.
प्रधानमंत्री मोदी ने स्वच्छ भारत के अपने अभियान में महिलाओं के लिए साफ़-सफाई और शौचालय को अहम मुद्दा बनाया था. उन्होंने कहा, "एक प्रधानमंत्री को शौचालय के बारे में बात करते देख दुनिया हैरान रह जाएगी." 2014 में, गांधी जयंती के दिन, मोदी ने स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की. प्रधानमंत्री से लेकर स्थानीय नेताओं तक कई लोगों ने झाड़ू उठाई.
हालाँकि, इसके बाद जिस तरह से राजनीतिक नेताओं की तस्वीरें आने लगीं, उसकी आलोचना भी की गई. लेकिन इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता है कि इस पहल ने एक बहुत ही बुनियादी मुद्दे पर ध्यान आकर्षित किया है.
2. नोटबंदी और जीएसटी
8 नवंबर 2016 की रात, नरेंद्र मोदी ने देश में 500 और 1000 रुपयों के नोटों का चलन बंद कर दिया. उन्होंने अपने भाषण में कहा कि यह क़दम देश में भारी मात्रा में काले धन और हवाला लेन-देन पर लगाम लगाने के लिए उठाया गया है.

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अगले कुछ महीनों में देश भर के बैंकों और डाकघरों के बाहर भारी कतारें देखी गईं. लोग घंटों नोट बदलने के लिए खड़े रहे.
मगर नोटबंदी के बाद बाज़ार में आए 2,000 रुपये के नोटों से लेनदेन आसान नहीं हुआ और इससे काले धन पर कितना नियंत्रण हुआ, इसका कोई निश्चित जवाब आज भी देना संभव नहीं है.
बीबीसी के लिए एक लेख में आर्थिक विश्लेषक विवेक कौल ने कहा: "RBI के आंकड़ों के अनुसार, नोटबंदी एक ऐतिहासिक विफलता है. मगर इस बात की संभावना कम है कि मोदी सरकार अपनी ग़लती को स्वीकार करेगी, इसलिए वो इसे पॉज़िटिव स्पिन देना जारी रखेंगे."
मगर यह एक सच्चाई है कि नोटबंदी ने भारत में डिजिटल लेनदेन को प्रोत्साहन दिया है. सब्जी विक्रेताओं, रिक्शा चालकों से लेकर मॉल में ख़रीदारी तक यूपीआई भुगतान होने लगा. डेबिट और क्रेडिट कार्ड से लेनदेन में भी तेज़ी आई है. इस फ़ैसले को डिजिटल भुगतान क्रांति के रूप में भी देखा गया. मगर क्या यह निर्णय और अधिक समझदारी और तैयारी के साथ नहीं लिया जा सकता था? यह सवाल आज भी पूछा जाता है.

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मोदी सरकार ने साथ ही देश में टैक्स सिस्टम को सुव्यवस्थित करने के लिए जीएसटी (गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स) की शुरुआत की. इसका उद्देश्य विभिन्न क़िस्म के करों के बदले एक ही कर को लागू करना था.
मगर इसे लेकर राज्यों और केंद्र के बीच काफ़ी तनाव रहा. राहुल गांधी ने तुरंत इसे 'गब्बर सिंह टैक्स' कहकर खारिज कर दिया. अंत में, जीएसटी में केंद्र और राज्यों के लिए अलग-अलग स्लैब बना दिए गए.
लेकिन आज भी महाराष्ट्र जैसे कई राज्यों का दावा है कि उन्हें अर्थव्यवस्था में उनके योगदान का फल नहीं मिलता है. केंद्र सरकार राज्यों को जीएसटी के बकाए हिस्से का भुगतान नहीं करती है और इससे राज्य को वित्तीय नुकसान होता है.

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जीएसटी को 'एक देश, एक कर' के नारे के साथ पेश किया गया था. मगर इसमें कई स्लैब होने और मौजूदा वैट के जारी रहने से जीएसटी की मूल घोषणा पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
विवेक कौल कहते हैं , ''अगर जीएसटी काउंसिल की हर महीने दरों में बदलाव के लिए बैठक होती है, तो कारोबारी समुदाय को यह संदेश जाता है कि नेताओं की पैरवी कर जीएसटी दरों को अपने हिसाब से बदला जा सकता है. भारत को जीएसटी ढांचे में संशोधन की ज़रूरत है, ताकि उसमें लगातार बदलाव करने की ज़रूरत ना रहे.''
3. ट्रिपल तलाक बन गया अपराध
मुसलमान व्यक्तियों के 'तलाक, तलाक, तलाक' कह कर अपनी पत्नी को छोड़ देने की प्रथा को अदालत ने अवैध क़रार दिया. मगर मोदी सरकार ने ट्रिपल तलाक को अपराध घोषित करने वाला क़ानून बनाया.
प्रधानमंत्री मोदी ने तब कहा था कि इस कानून का बनना देश के लिए ऐतिहासिक घटना है. वहीं गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि इस फ़ैसले से 'मुस्लिम महिलाओं की एक पिछड़ी परंपरा से मुक्ति हुई है'.

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तृणमूल कांग्रेस जैसे विपक्षी दलों ने तर्क दिया है कि अदालत के फैसले के बाद इस क़ानून की कोई ज़रूरत नहीं थी. वहीं एआईएमआईएम ने आरोप लगाया कि इससे मुस्लिम महिलाओं को कोई फ़ायदा नहीं होगा.
वकील और महिला अधिकार कार्यकर्ता फ्लाविया एग्नेस ने ट्रिपल तलाक अधिनियम की समीक्षा में कहा , "अध्यादेश केवल मुस्लिम महिलाओं की स्थिति को और खराब कर देगा, क्योंकि अगर कोई पति जेल जाता है, तो वह उसकी पत्नी और बच्चों को पैसे और अन्य साधन कैसे प्रदान करेगा? "
इसके बाद मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाने के लिए भाजपा की आलोचना की गई, लेकिन साथ ही इसकी व्यापक रूप से प्रशंसा की गई कि मोदी ने वह किया जो कांग्रेस अपनी तुष्टीकरण की राजनीति के कारण नहीं कर सकी.
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4. अनुच्छेद 370 और सीएए-एनआरसी
कश्मीर को स्वतंत्र दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 और 35ए को खत्म करना लंबे समय से बीजेपी के एजेंडे में था. 5 अगस्त, 2019 को, गृह मंत्री अमित शाह ने अनुच्छेद 370 को निरस्त करने की घोषणा की और बाद में जम्मू और कश्मीर को दो अलग केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित कर दिया.

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हालाँकि, कहा जाने लगा कि केंद्र के इस फ़ैसले से स्थानीय लोगों में कट्टरता का ख़तरा बढ़ा है. लेकिन साथ ही ये भी कहा गया कि मोदी सरकार जम्मू-कश्मीर में शांति लाने में सफल रही है.
वहीं मोदी सरकार की ओर से लाए गए नागरिकता संशोधन विधेयक का पूर्वोत्तर भारत में गंभीर असर पड़ा. असम में हिंसा भड़क उठी. इस क़ानून में तीन पड़ोसी देशों पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के ऐसे हिंदुओं, सिखों, बौद्धों, जैनियों, पारसियों और ईसाइयों को नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान है, जो धार्मिक उत्पीड़न या भय के कारण 31 दिसंबर 2014 से पहले भारत आए थे. मगर इसमें मुसलमानों को शामिल नहीं किए जाने के कारण इसे भेदभावपूर्ण क़ानून कहकर इसकी आलोचना की गई.

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सीएए के साथ एक और मुद्दा एनआरसी था. नागरिकता सूची भारत के कानूनी नागरिकों की सूची है.
यह केवल असम में लागू था लेकिन अमित शाह ने कहा कि इसे पूरे देश में लागू किया जाएगा और फिर इस मुद्दे पर आगे बढ़े.
हालाँकि, असम चुनाव से पहले राजनीतिक लाभ के लिए यह कदम उठाने का आरोप लगाकर मोदी सरकार की व्यापक रूप से आलोचना की गई थी.
5. कोविड लॉकडाउन और टीकाकरण
2020 तक कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया है. चूंकि शुरुआती दिनों में इसका कोई इलाज नहीं था, इसलिए संक्रमण को रोकने का एकमात्र तरीका लॉकडाउन लगाना था.

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लेकिन, बीबीसी की जांच में पाया गया कि देश के प्रमुख संस्थानों के साथ-साथ सरकार और प्रशासन के लोगों को भी लॉकडाउन के फैसले के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. इस फैसले में प्रधानमंत्री मोदी ने वास्तव में किससे सलाह ली? आप इसके बारे में यहाँ पढ़ सकते हैं.
दुनिया के कई हिस्सों में कोरोना की वैक्सीन को लेकर रिसर्च चल रही है. दुनिया में कई टीकों के उत्पादन में भारतीय वैक्सीन निर्माताओं की अहम भूमिका रही है. इन कंपनियों ने खुले तौर पर कहा था कि सरकार ने समय-समय पर सीरम, भारत बायोटेक जैसी कंपनियों को वैक्सीन उत्पादन के लिए जरूरी उपकरण आयात करने में मदद की है. प्रधानमंत्री मोदी ने अक्सर गर्व के साथ कहा है कि उन्होंने कोविड काल में भारत को 'दुनिया का औषधालय' बनाया.
इस लेख में आप कोविड के समय में भारत में हुई मौतों को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन और केंद्र सरकार के बीच अनबन के बारे में पढ़ सकते हैं.
6. नीति आयोग और सेंट्रल विस्टा
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने कार्यकाल के दौरान कई नई चीज़ों की शुरुआत की, कई पुरानी चीज़ों को बंद किया और कुछ पुरानी चीज़ों को नए रूप में सामने लाया. इनमें से दो उदाहरण सबसे महत्वपूर्ण हैं.
1950 में जवाहरलाल नेहरू ने योजना आयोग बनवाया जो देश में आर्थिक निर्णय लेने वाले सबसे बड़े सरकारी संस्थानों में से एक बन गया.
1 जनवरी, 2015 से योजना आयोग की जगह नीति आयोग यानी नेशनल इंस्टीट्यूशन फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (NITI) ने ले ली.
नीति आयोग को केंद्र सरकार का सर्वोच्च थिंक टैंक माना जाता है.
वहीं 'सेंट्रल विस्टा' 20,000 करोड़ रुपये की पीएम मोदी की सबसे महत्वाकांक्षी और विवादास्पद परियोजना है. दिल्ली में वर्तमान संसद, राजपथ और इस इलाक़े का निर्माण अंग्रेज़ों ने किया था. मोदी सरकार इनके स्थान पर अब एक नया संसद भवन, एक नया सचिवालय और अन्य नई इमारतें बना रही है.
हालाँकि, इस परियोजना पर कई पर्यावरण मानकों के साथ छेड़छाड़, नियमों में बदलाव, प्रस्तावित लागत से ज़्यादा ख़र्च और कोविड काल में भी काम नहीं रोकने के आरोप लगाए गए हैं.
विरोधियों ने बार-बार सवाल किया है कि ऐसे समय जब देश को अस्पतालों और अन्य चीजों की ज़रूरत थी, मोदी सरकार ऐसा क्यों कर रही थी. लेकिन सरकार का तर्क है कि एक नई संसद और नए भारत के प्रतीक के तौर पर एक नए सेंट्रल विस्टा की ज़रूरत है.
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7. कृषि क़ानून - घोषणा और वापसी
प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी के 8 साल के कार्यकाल में छोटे-बड़े कई आंदोलन हुए हैं. लेकिन एक आंदोलन ने सरकार को अपने फैसले को उलटने पर मजबूर कर दिया. सरकार को तीन कृषि कानूनों को वापस लेना पड़ा जिन्हें बड़ी धूमधाम से पारित किया गया था.
मोदी सरकार ने कृषि क्षेत्र में सुधार और किसानों को सीधे बाज़ार से जोड़ने के लिए तीन कृषि कानून बनाए. इसका स्वागत उन लोगों ने किया जो वर्षों से कृषि के क्षेत्र में आधुनिकीकरण की मांग करते रहे हैं.
लेकिन उत्तर भारत के किसानों, खासकर पंजाब के किसानों ने इस क़ानून का कड़ा विरोध किया. किसान महीनों तक दिल्ली की अन्य राज्यों की तीनों सीमाओं पर बैठे रहे.

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सरकार ने किसानों की कुछ महत्वपूर्ण आपत्तियों को दूर करने का वादा किया, करीब 15 दौर की बातचीत हुई लेकिन कोई समाधान नहीं निकला. किसानों ने कानूनों और सरकार को उन्हें लागू करने को रद्द करने पर ज़ोर दिया.
अंत में, पंजाब और चार अन्य राज्यों के चुनावों से पहले, पीएम मोदी ने खुद घोषणा की कि वह इन कानूनों को वापस ले रहे हैं. उन्होंने खेद व्यक्त किया कि 'हम इन कानूनों के लाभों के बारे में किसानों को समझाने में विफल रहे'.
वहीं राजनीतिक विश्लेषकों की राय थी कि यह कदम चुनावी समीकरण था.
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8. उज्जवला, जन-धन, आयुष्मान भारत
अपने अब तक के 8 साल के कार्यकाल में प्रधानमंत्री मोदी ने कई योजनाएं शुरू की हैं.
इनमें मोदी सरकार ने 1 मई 2016 को उज्ज्वला योजना शुरू की जिसमें 3 साल में 5 करोड़ गैस कनेक्शन देने का वादा किया, महिलाओं को चूल्हे और जलावन की लकड़ी के धुएं से मुक्त किया.
सरकार ने 2021 के बजट में अतिरिक्त 1 करोड़ गैस कनेक्शन की घोषणा करते हुए फ्री गैस स्टोव और फ्री फर्स्ट सिलेंडर रीफिल की भी घोषणा की.
सरकार ने बैंकिंग प्रणाली में देश के प्रत्येक नागरिक को समायोजित करने के लिए जन-धन योजना की शुरुआत की.
सरकार की ओर से विभिन्न सब्सिडी के साथ-साथ अन्य लाभ, 1 लाख रुपये का मुफ्त बीमा इस खाते के माध्यम से सरकार द्वारा प्रदान किया गया.
सरकार ने कहा है कि उन खातों में 45 करोड़ से ज्यादा खाताधारक हैं और 1 लाख 67 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा जमा हैं.

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मोदी सरकार में आयुष्मान भारत नाम से एक योजना शुरू हुई जो उन ग़रीब लोगों की मदद के लिए है जो बीमा का खर्च नहीं उठा सकते.
सरकार ने कहा था कि योजना के कार्डधारक विभिन्न अस्पतालों में विभिन्न उपचारों का मुफ्त में लाभ उठा सकेंगे.
यह योजना कोविड काल में बहुत उपयोगी मानी जा रही थी, लेकिन तकनीकी दिक्कतों और अन्य समस्याओं के कारण कई लोगों ने इसके तहत इलाज न मिलने की शिकायत की.
ऐसा नहीं है कि सरकार की योजनाओं की आलोचना नहीं की गई , लेकिन इन योजनाओं की गिनती मुख्य रूप से मोदी सरकार की सफल योजनाओं में होती है. राजनीतिक पर्यवेक्षक बताते हैं कि ये योजनाएं उनके नेतृत्व में मोदी और भाजपा के साथ-साथ आबादी के आर्थिक और सामाजिक रूप से कमज़ोर वर्गों के बीच समर्थन हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं.
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