हैदराबाद रेप अभियुक्तों का एनकाउंटर 'फ़र्ज़ी', 10 पुलिसवालों पर चले हत्या का मुक़दमा: सुप्रीम कोर्ट जाँच आयोग

हैदराबाद एनकाउंटर

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तेलंगाना के हैदराबाद में लगभग दो साल पहले गैंगरेप और हत्या के चार अभियुक्तों के पुलिस एनकाउंटर को सुप्रीम कोर्ट के गठित आयोग ने फ़र्ज़ी क़रार दिया है.

इस बहुचर्चित मामले के बारे में आयोग की रिपोर्ट ने हैदराबाद पुलिस पर कई गंभीर सवाल भी खड़े किए हैं.

मारे गए चार अभियुक्तों में से तीन नाबालिग थे. सुप्रीम कोर्ट को कवर करनेवाले बीबीसी के सहयोगी पत्रकार सुचित्र मोहंती के अनुसार आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पुलिस ने अभियुक्तों की जान लेने के इरादे से उन पर गोलियां चलाईं.

आयोग ने एनकाउंटर में शामिल रहे 10 पुलिसवालों पर हत्या का मुक़दमा चलाने की सिफ़ारिश भी की है.

नवंबर 2019 में हुए एक वेटरनरी डॉक्टर के गैंगरेप और हत्या के मामले में पुलिस ने चार अभियुक्तों मोहम्मद आरिफ़, चिंताकुंता, चेन्नाकेशवल्लू और जोलू शिवा को गिरफ़्तार किया था. पुलिस ने इन चारों अभियुक्तों को एक संदिग्ध एनकाउंटर में मार दिया था.

वीडियो कैप्शन, हैदराबाद रेप केस: पुलिस ने कैसे किया एनकाउंटर?

आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि घटना के बाद इनमें से तीन अभियुक्त नाबालिग थे.

हैदराबाद के पास एनएच-44 पर इन चार अभियुक्तों को गोली मार दी गई थी. इसी हाइवे के पास 27 वर्षीय गैंगरेप का शिकार हुई डॉक्टर का जला हुआ शव भी मिला था.

घटना के बाद पुलिस ने कहा था कि 27 नवंबर 2019 को डॉक्टर का अपहरण किया गया, गैंगरेप किया गया और बाद में उनकी हत्या कर दी गई. हत्या के बाद अभियुक्तों ने शव को जला दिया था.

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पुलिस ने चार 06 दिसंबर 2019 को अभियुक्तों को गिरफ़्तार करके उनका एनकाउंटर कर दिया था.

पुलिस ने कहा था कि अभियुक्तों ने पिस्टल छीनकर भागने की कोशिश की और पुलिस एनकाउंटर में उनकी मौत हो गई.

आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, "पुलिस का ये कहना है कि अभियुक्तों ने पिस्टल छीनकर भागने की कोशिश की, विश्वस्नीय नहीं हैं और इसके समर्थन में कोई सबूत भी नहीं है."

"हमारी राय ये है कि अभियुक्तों पर जान बूझकर उनकी हत्या के इरादे से गोली चलाई गई और गोली चलाने वालों को ये पता था कि इसके नतीजे में संदिग्धों की मौत हो जाएगी."

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इमेज कैप्शन, इस एनकाउंटर के बाद लोगों ने पुलिस का समर्थन किया था और जश्न मनाया था

जांच आयोग ने ये भी कहा है कि शैक लाल माधर, मोहम्मद सिराजुद्दीन और कोचेरला रवि के ख़िलाफ़ आईपीसी की धारा 302 के तहत हत्या का मुक़दमा चलना चाहिए और उन्हें आईपीसी की धारा 76 के तहत राहत नहीं मिलनी चाहिए.

आयोग ने ये भी कहा है कि आईपीसी की धारा 300 के तहत अपवाद 3 की राहत भी इन्हें नहीं मिलनी चाहिए क्योंकि उनकी इस बात को अविश्वस्नीय पाया गया है कि उन्होंने सही इरादों से गोली चलाई थी.

आयोग का कहना है कि उसके समक्ष प्रस्तुत की गई सामग्री से पता चलता है कि घटना के वक़्त दस पुलिसकर्मी मौजूद थे.

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सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ़ जस्टिस एसए बोबडे की अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज वीएस सिरपुरकार की अध्यक्षता में चार अभियुक्तों के कथित एनकाउंटर की जांच के लिए आयोग गठित किया था.

आयोग के पैनल में जस्टिस सिरपुरकार के अलावा बांबे हाई कोर्ट की पूर्व जज रेखा बालदोता और सीबीआई के पूर्व निदेशक डॉ. कार्तिकेयन शामिल थे.

जांय आयोग ने सील बंद रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के समक्ष 28 जनवरी 2022 को पेश कर दी थी.

दो अधिवक्ताओं जीएस मणि और प्रदीप कुमार यादव ने कथित एनकाउंटर की स्वतंत्र जांच की मांग करते हुए याचिका दायर की थी. जस्टिस बोबडे ने इसी याचिका पर सुनवाई करते हुए जांच आयोग गठित किया था.

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तेलंगाना की तरफ़ से अदालत के समक्ष पेश होते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने रिपोर्ट को सीलबंद ही रखने की अपील की थी लेकिन अदालत सहमत नहीं हुई.

चीफ़ जस्टिस ने इससे इनकार करते हुए कहा, "यहां कुछ भी गोपनीय नहीं है. कोई दोषी पाया गया है और अब राज्य को ये मामला देखना है."

वहीं दीवान ने तर्क देते हुए कहा था, "कृपया रिपोर्ट को फिर से सील कर दें. यदि ये सीलबंद नहीं रही तो इसका असर न्याय के प्रशासन पर हो सकता है."

इस पर चीफ़ जस्टिस ने कहा, "किसी जांच का मतलब ही क्या है यदि उसे दूसरे पक्ष को ना दिया जाए."

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