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पैंगोग झील पर चीन बना रहा है एक और पुल- प्रेस रिव्यू
अंग्रेज़ी अख़बार हिंदुस्तान टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक़ चीन ने पैंगोंग झील के पार एक दूसरे पुल का निर्माण शुरू कर दिया है जो भारी बख्तरबंद वाहनों को आवाजाही के लिए इस्तेमाल किया जाएगा. ख़बर के मुताबिक इससे पहले भी चीन इस इलाके में एक पुल बना चुका है जिसे भारत अपना हिस्सा बताता है.
ऐसी ही रिपोर्ट ऑनलाइन न्यूजपोर्टल द प्रिंट ने भी छापी है.
दूसरे पुल का निर्माण पहले पुल के ठीक सामने ही किया जा रहा है. पहला पुल इसी साल अप्रैल में बनकर तैयार हुआ था. इस ख़बर पर अब तक भारत सरकार की ओर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है.
अख़बार लिखता है कि इस जगह के हाई-रिज़ॉल्यूशन सैटेलाइट तस्वीर का विश्लेषण करने वाले विशेषज्ञों के अनुसार, पहले पुल का इस्तेमाल क्रेन जैसे उपकरणों की आवाजाही के लिए किया जा रहा है, ये क्रेन दूसरे पुल को तैयार करने में सहायक हैं.
जब इस साल जनवरी में पैंगोंग झील के उत्तरी और दक्षिणी किनारों को जोड़ने वाले पहले पुल के निर्माण के बारे में रिपोर्ट सामने आई, तो विदेश मंत्रालय ने कहा कि ये संरचना 60 सालों से चीन के अवैध कब्जे वाले क्षेत्रों में स्थित है.
मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने कहा था कि भारत ने इस तरह के अवैध कब्जे को कभी स्वीकार नहीं किया है.
द इंटेल लैब के एक विश्लेषक डेमियन साइमन ने ट्वीट करते हुए लिखा है कि सैटेलाइट तस्वीर के विश्लेषण से पता चलता है कि अप्रैल में बने पहले पुल पर काम "सर्विस ब्रिज" के रूप में किया जा रहा है. इस पुल पर क्रेन को पहले भी देखा गया है.
दोनों पुल 134 किलोमीटर लंबी रणनीतिक झील के सबसे संकरे हिस्से में स्थित हैं.
पहला पुल पैंगोंग झील के उत्तरी तट पर पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के दक्षिण में स्थित है, दोनों पुल उत्तरी तट पर चीनी सैनिकों की स्थिति और पूर्वी छोर पर रुतोग में पीएलए बेस की दूरी लगभग 150 किमी तक कम कर देंगे.
ज्ञानवापी पर RSS ने क्या कहा
काशी विश्वनाथ और ज्ञानवापी विवाद पर कोर्ट में जारी बहस के बीच, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने बुधवार को कहा कि वक़्त आ गया है कि "ऐतिहासिक तथ्यों" को समाज के सामने "सही परिप्रेक्ष्य" में रखा जाए.
अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़ आरएसएस अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख (अखिल भारतीय प्रचार प्रभारी) सुनील आंबेकर ने आरएसएस के एक कार्यक्रम देवर्षि नारद पत्रकार सम्मान समारोह में कहा कि "अभी ज्ञानवापी का मसला चल रहा है. कुछ तथ्य ऐसे हैं जो खुलकर सामने आ रहे हैं. मेरा मानना है कि हमें तथ्यों को खुलकर सामने आने देना चाहिए. किसी भी मामले में, सच्चाई हमेशा बाहर आने का रास्ता तलाश ही लेता है. आप इसे कब तक छुपा सकते हैं? मेरा मानना है कि समाज के सामने ऐतिहासिक तथ्यों को सही परिप्रेक्ष्य में रखने का समय आ गया है."
भारत की समकालिक संस्कृति पर, आंबेकर ने कहा, "यह सच है कि भारत समावेशी है. लोग गंगा-जमुना संस्कृति की बात करते हैं लेकिन मेरा मानना है कि इसे एक हो जाना चाहिए तभी एक साथ चल सकेंगे. मुझे लगता है कि लोगों को जागृत करना एक ज़िम्मेदारी है."
इस आयोजन में केंद्रीय राज्य मंत्री संजीव बालियान मुख्य अतिथि के रूप मे मौजूद थे उन्होंने कहा कि ज्ञानवापी में शिवलिंग मिलने की ख़बर ने उन्हें भावुक कर दिया.
वह कहते हैं, "जब ज्ञानवापी को लेकर सर्वे चल रहा था उस वक़्त मैं वाराणसी में ही था. इस ख़बर ने मुझे भावुक कर दिया लेकि इससे भी ज़्यादा मुझे तब खुशी हुई जब एक पत्रकार ने कहा कि सैकड़ों सालों से नंदी भगवान शिव का इंतज़ार कर रही थीं, ये सुनकर मेरी आंखें आंसू से भर गईं."
इससे पहले सोमवार को वाराणसी की एक अदालत ने ज़िला प्रशासन को ज्ञानवापी मस्जिद परिसर की उस जगह को सील करने का आदेश दिया था जहाँ सर्वे करने वाली टीम को 'कथित शिवलिंग' मिला था.
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को ज्ञानवापी मामले पर सुनवाई करते हुए आदेश दिया है कि मस्जिद परिसर में जिस जगह 'शिवलिंग' मिलने की बात कही जा रही है, उस जगह को संरक्षित रखा जाए. लेकिन मुस्लिम पक्ष के वहाँ नमाज़ पढ़ने पर कोई रोक नहीं होगी.
कोर्ट ने ये भी स्पष्ट किया है कि मुसलमान वहां पर वजू भी कर सकेंगे क्योंकि ये उनकी धार्मिक प्रक्रिया का हिस्सा है.
कैसे बरी हुए पेरारीवलन?
अंग्रेज़ी अख़बार द हिंदू में छपी ख़बर के मुताबिक़ सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक अहम फैसला लेते हुए पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या मामले में सजा काट रहे दोषी एजी पेरारीवलन को रिहा करने का आदेश दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने रिहाई के लिए अनुच्छेद 142 के तहत विशेषाधिकार के तहत फैसला दिया है.
इस मामले में दया याचिका राज्यपाल और राष्ट्रपति के बीच लंबित रहने पर शीर्ष अदालत ने बड़ा कदम उठाया है.
पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या के दोषी पेरारीवलन के लिए वक़्त का पहिया 18 फरवरी 2014 को ही बदलने लगा था. जब सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की एक बेंच उनकी फांसी की सज़ा को उम्रकैद में तब्दील कर दिय था.
इस दौरान तत्कालीन मुख्य न्यायधीश पी. सदाशिवम ने मजबूत टिप्पणी करते हुए कहा था कि राष्ट्रपति और राज्यपाल जैसे 'शीर्ष संवैधानिक पद पर बैठे अधिकारियों' को अनुच्छेद 72 और 161 के अनुसार संवैधानिक की सीमा के भीतर रहते हुए 'अनुशासन' तहत अपनी क्षमादान शक्तियों का इस्तेमाल करना चाहिए.
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