ज़कात क्या है, इस्लाम के इस नियम के बारे में आप कितना जानते हैं?

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ज़कात इस्लाम के पांच स्तंभों में से एक है. इस्लाम धर्म को मानने वालों के अनुसार 622 ईस्वी में जब पैगंबर मोहम्मद मदीना गये और उन्होंने इस्लामिक राष्ट्र व्यवस्था की शुरुआत की, तब उस देश में ज़कात प्रणाली भी शुरू की गई थी.
लेकिन ज़कात यानी दान किस तरह और कितनी देनी चाहिए, इसको लेकर तरह-तरह के सवाल हैं.
इस्लामी विचारक कहते हैं कि मुसलमानों के पवित्र धर्मग्रंथ कुरान में ज़कात के बारे में दिशानिर्देश दिये गये हैं. फिर भी, कुरान के प्रावधानों को लेकर इसकी विस्तृत व्याख्या जानने की ज़रूरत पड़ती है.
इस्लामिक फाउंडेशन के मुफ्ती मुहम्मद अब्दुल्ला का कहना है कि ज़कात से संबंधित सवालों के जवाब पाने के लिये विभिन्न पहलुओं पर ध्यान देना पड़ता है.

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फिर भी, कयामत के दिन के फ़ैसले और ज़कात को लेकर कई लोगों के मन में तरह-तरह के सवाल आते हैं, जैसे कि ज़कात (दान) के लिए कितना भुगतान किया जाना चाहिए, इसका भुगतान कैसे करना है. यह तय करना भी महत्वपूर्ण सवाल होते हैं.
जैसा कि सभी जानते हैं कि एक साल से अधिक समय तक रखे सोने के गहने और नकदी के अलावा शेयर सर्टिफ़िकेट, प्राइज़ बॉन्ड और वित्तीय मूल्य वाले अन्य ऐसे सभी दस्तावेज़ आदि का कुल मूल्य अगर निसाब (संपत्ति) की मात्रा ज़कात अदा करने जितना हो और उनको एक साल से ऊपर हो गया है, तो इस्लामी क़ानून के अनुसार व्यक्ति के लिए ज़कात देना अनिवार्य है.
लेकिन किस मामले में ज़कात अदा करनी चाहिए और किसमें नहीं देनी चाहिए? आपसे ज़कात कौन ले सकता है? सरकारी प्रबंधन के बारे में क्या कहा जाता है? जानिए ज़कात से जुड़े आठ सवाल और उनके उत्तर:
1. अगर कोई बैंक से कर्ज लेता है तो क्या उसे ज़कात देना होगा?
मुफ्ती मोहम्मद अब्दुल्ला का कहना है कि अगर आप किसी बैंक से पर्सनल लोन लेते हैं तो अगले एक वर्ष की किस्त के बराबर की राशि को छोड़कर शेष राशि पर ज़कात लागू होगा.
कारोबार में रूपये न लगा कर अगर उसे ऐसे ही रख दिया जाता है, तो भी उस पर ज़कात लागू होगा. लेकिन अगर किसी का कर्ज इतना है कि उसे छोड़ देने के बाद, उसके पास निसाब की मात्रा के अनुरूप ज़कात की राशि नहीं है, तो उस पर ज़कात अनिवार्य नहीं है.

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2. ज़कात किस तरह की संपत्ति पर लागू होता है?
मोहम्मद अब्दुल्ला ने कहा कि व्यावसायिक उद्देश्यों के लिये रखी गई ज़मीन, फ्लैटों या खेत पर भी ज़कात देना होगा. लेकिन घर बनाने के लिये रखे गये ज़मीन पर ज़कात नहीं देना होगा.
अगर कोई अपने बच्चे के लिये या इस तरह के इस्तेमाल के लिये फ्लैट रखता है तो उस पर भी ज़कात लागू नहीं होगा.
अगर किसी की दुकान है तो वहां रखे सामान पर ज़कात अदा करना होगा, लेकिन दुकान की इमारत या ज़मीन पर ज़कात लागू नहीं होगा.

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कइयों को लगता है कि अगर उनके या उनके परिवार के पास सोने और चांदी के गहने, कीमती रत्न या ऐसी चीजें हों, केवल तभी उन्हें ज़कात देना होगा.
इस्लामिक फाउंडेशन के ज़कात फंड के निदेशक मोहम्मद हारुनूर रशीद कहते हैं कि ऐसा नहीं है.
वो कहते हैं, "हाथ में नकद राशि, शेयर प्रमाण पत्र, प्राइज़ बॉन्ड और सार्टिफिकेट, सोना-चांदी, कीमती धातु और सोने-चांदी के गहने, वाणिज्यिक संपत्ति और औद्योगिक व्यापार से प्राप्त लाभ, उत्पादित फसल, पशुधन संपदा — 40 से अधिक भेड़ या बकरी और 30 से ऊपर गाय भैंस और अन्य मवेशियों, खनिज पदार्थ, भविष्य निधि — इन सब पर भी ज़कात देना होगा, लेकिन ये सब भी निसाब की मात्रा के अनुसार होगा.
3. क्या धर्मार्थ संस्थाओं में दिये गये दान को ज़कात माना जाएगा?
मुफ्ती मोहम्मद अब्दुल्ला का कहना है कि ज़कात देना पवित्र हो, इसके लिये यह ज़रूरी होता है कि ज़कात प्राप्त करने वाले को उस पैसे का मालिक बना दिया जाये. ऐसा करने पर वह अपनी मर्जी से या स्वतंत्र रूप से अपनी ज़रूरत के अनुसार उसका इस्तेमाल कर सके.
उन्होंने कहा, "यदि आप संगठन को पैसा देते हैं, तो इसे खर्च करने का अधिकार पूरी तरह किसी ग़रीब या ज़रूरतमंद को नहीं होगा. उस पैसे का मालिक ग़रीब या ज़रूरतमंद नहीं होगा. इसलिये ज़कात के रूप में नगद राशि ही देना बेहतर है."

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4. पत्नी के सोने के गहनों पर ज़कात कौन देगा?
अब्दुल्ला ने कहा कि पत्नी और बेटी के ज़कात की ज़िम्मेदारी भी यानी पति या पिता की ही होती है.
लेकिन मान लीजिये कि किसी व्यक्ति की पत्नी के पास 11.66 ग्राम सोना है लेकिन नकदी नहीं है. ऐसे में वह सोना या उसका कुछ हिस्सा बेचकर भी क्या ज़कात अदा कर सकता है.
ये ज़कात पति भी अदा कर सकता है, लेकिन इसे ऋण के रूप में नहीं लिया जा सकता.
उन्होंने कहा कि सोने के गहनों का मतलब सोना और चांदी होता है. उन्होंने कहा, "हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि हीरे जवाहरात या किसी अन्य आभूषण के मामले में क्या होगा. वैसे, अगर ये व्यवसाय के लिए लाया सामान हैं, तो इन पर ज़कात का भुगतान करना होगा."
5. क्या कपड़ों से जकात दी जा सकती है?
मुफ्ती अब्दुल्ला ने कहा, "यह सही तो है, लेलिकन फिर भी अच्छा नहीं है." इसका कारण बताते हुए वे कहते हैं, जिसके लिये जो ज़रूरी है, उसे वही देकर ज़कात देना अच्छा है.
उन्होंने कहा, "हो सकता है कि किसी को कपड़ों की नहीं बल्कि खाने की ज़रूरत हो. किसी और को हो सकता है कि नगद राशि की ज़रूरत हो. इन सब पर विचार करके ही जिसे जो ज़रूरत है, उसे वह देकर ही मदद करनी चाहिये. और अगर ऐसा संभव नहीं है तो नगद राशि देना ही बेहतर है."

6. निसाब क्या है?
निसाब एक इस्लामिक शब्द है. इसका अर्थ होता है दैनिक आवश्यकताओं को पूरा करने के बाद और दैनिक आवश्यकता की चीजों को छोड़कर, अगर 52.2 तोला परिमाण की चांदी या 7.5 तोला सोना या इसके समकक्ष कोई व्यावसायिक वस्तु का मालिकाना हो तो उसे ज़कात का निसाब कहा जाता है.
धर्म के नियमों के अनुसार निसाब की मात्रा के बराबर संपत्ति अगर एक वर्ष से ज्यादा समय तक किसी व्यक्ति के पास है, तो उसे ज़कात देना होगा.
मान लीजिये कि किसी व्यक्ति के पास 7.5 तोला से थोड़ा अधिक सोना है. अगर मान लें कि वह उस सोने को बाज़ार में 4 लाख रूपये में बेच सकता है. तो यही निसाब परिमाण की राशि है. अब उसे इस निसाब के लिये ढाई फ़ीसदी के हिसाब से दस हजार रूपये की ज़कात राशि देनी होगी.
7. ज़कात किसे मिल सकती है?
ज़कात सिर्फ मुसलमानों को ही दी जा सकती है. इसे प्राप्त करने वाले मुसलमानों में से हैं:
- ग़रीब असहाय मुस्लिम
- ऋणबोझ में दबा व्यक्ति
- जिहादी और मुसाफिर
- ग़रीब धर्मउपासक
- ग़रीब असहाय रिश्तेदार
- मुस्लिम धर्म अपनाने वाले लोग
8. सरकार का ज़कात फंड कैसे काम करता है?
बांग्लादेश सरकार का एक ज़कात फंड है, जिसे 1982 में बनाया गया था. इसके माध्यम से देश के 64 जिलों में लोगों से ज़कात की वसूली की जाती है और सरकार के नियमों के अनुसार एकत्रित धन का 70 प्रतिशत संबंधित जिलों में खर्च किया जाता है.
इस्लामिक फाउंडेशन के ज़कात फंड के जरिए 1982 से वित्तीय वर्ष 2019-20 तक करीब साढ़े नौ लाख लोगों को करीब 35 करोड़ रुपये की ज़कात बांटी जा चुकी है.
व्यक्तियों को ज़कात देने के अलावा संस्थाओं को भी ज़कात दी जा सकती है.
इस मामले में, बांग्लादेश में सरकार द्वारा एकत्र की गई ज़कात को विभिन्न क्षेत्रों जैसे ज़कात बोर्ड बच्चों के अस्पताल, सिलाई प्रशिक्षण आदि पर खर्च किया जाता है.
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