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जहांगीरपुरी हिंसा: सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान क्या-क्या दलीलें दी गईं
- Author, सुचित्र मोहंती
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
दिल्ली के जहांगीरपुरी में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई हुई.
बुधवार सुबह नगर निगम ने जहांगीर पुरी में अतिक्रमण हटाने के लिए अभियान चलाया था जिसे रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की गईं.
जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने और अन्य ने इस मामले में याचिका दायर की थीं. कोर्ट ने अतिक्रमण हटाने पर रोक लगा दी थी और आज मामले पर सुनवाई थी.
न्यायाधीश एल नागेश्वर राव और बीआर गवई की सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय बेंच इस मामले पर सुनवाई कर रही थी.
सुनवाई के दौरान याचिककर्ताओं के वकीलों ने जहां अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई को किसी समुदाय विशेष पर निशाना बताया वहीं, नगर निगम ने इसे क़ानूनी तौर पर सही ठहराया.
आज की सुनवाई में याचिकाकर्ताओं के वक़ीलों और उत्तरी दिल्ली नगर निगम (एनडीएमसी) ने क्या-क्या दलीलें दीं, आपको बताते हैं.
याचिकाकर्ता के वकील दुष्यंत दवे ने कोर्ट से कहा-
अगर आप अवैध घर हटाना चाहते हैं तो सैनिक फार्म और गोल्फ़ लिंक जाएं जहां हर दूसरा घर अतिक्रमण करके बनाया गया है. एक विशेष समुदाय या इलाक़े को निशाना क्यों बनाया जा रहा है. वो लोग बहुत गरीब हैं.
प्रशासन ने लोगों के घर, दुकानें तोड़ने में इस तरह व्यवहार जिससे लगता है कि एक ही समुदाय को निशाना बनाया गया है.
पुलिस अवैध कार्यों में लिप्त है और ये बहुत ही महत्वपूर्ण मसला है. साल 1984 या 2002 में भी हमने पुलिस को ऐसा करते हुए नहीं देखा.
इस मामले में एक विशेष समुदाय को निशाना बनाया गया है. इससे देश के सामाजिक तानेबाने को नुक़सान होने वाला है. अगर कोर्ट इसमें दखल नहीं देता है तो कोई क़ानून व्यवस्था नहीं रह जाएगी. इस मामले में कोई नोटिस क्यों नहीं दिया गया?
दिल्ली में करीब 1731 अवैध कॉलोनियां हैं. लेकिन, एक विशेष इलाक़े में एक विशेष समुदाय को निशाना बनाना बहुत दुखदायी है. इसकी अनुमति कैसे दी जा सकती है. ये विवाद का विषय है. ये क़ानून के विपरीत है. ये जंगलराज है.
बीजेपी के नेता कैसे अतिक्रमण हटाने के लिए पत्र लिख सकते हैं और एनडीएमसी तोड़फोड़ कर सकती है. क़ानून के तहत नोटिस भेजने और अपील करने का प्रावधान है.
जहांगीरपुरी में सभी घर 30 साल से ज़्यादा पुराने हैं और दुकानें 50 साल पुरानी हैं. हम लोकतंत्र में रह रहे हैं और इस देश में इसकी कैसे अनुमति दी जा सकती है?
कोई नोटिस जारी नहीं किया गया और आपने उनके घर तोड़ दिए. इसके लिए किसे दोष देना चाहिए. पुलिस और प्रशासन संविधान को मानने के लिए बाध्य हैं ना कि पक्षों को.
कपिल सिब्बल की दलीलें
जमीयत उलेमा-ए-हिंद के वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि एक ही समुदाय के घरों को निशाना बनाया गया. ये क़ानूनी प्रक्रिया नहीं है. अगर कोई रेप मामले में अभियुक्त होता है तो क्या उसका घर गिराया जाता है. ये क्या है?
इस मंच पर क़ानून का शासन चलता है. मैं इस इलाक़े में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई को रोकना चाहता हूं.
पूरे भारत में अतिक्रमण एक गंभीर समस्या है लेकिन मुद्दा ये है कि मुसलमानों को अतिक्रमण से जोड़ा जा रहा है.
मैंने उन्हें कल सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद व्हाट्सएप मैसेज और ईमेल भेजने के लिए कहा था. लेकिन, फिर भी डेढ़ घंटे तक अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई चलती रही.
एनडीएमसी ने विशेष समुदाय को निशाना बनाने से किया इनकार
एनडीएमसी का पक्ष रख रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता का कहना था कि अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई सही थी. उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में नोटिस ना देने का प्रावधान है.
सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि दोनों ही याचिकाएं जमीयत उलेमा-ए-हिंद की थीं और जब कोई संगठन यहां आता है तो यही होता है.
जहांगीरपुरी में फुटपाथ से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई 19 जनवरी, फरवरी और मार्च में हुई थी. इसके बाद 19 अप्रैल को कचरा हटाया गया था.
मैं आपको ऐसे उदाहरण बता सकता हूं जब नोटिस की ज़रूरत नहीं होती और अवैध संरचनाओं को नोटिस दिया गया था. कारोबारियों ने पिछले साल हाईकोर्ट का रुख किया था और हाईकोर्ट ने खुद ही अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया था.
इसलिए संगठन यहां आते हैं ना कि कोई व्यक्ति क्योंकि तब उसे सूबत दिखाना पड़ता है और ये देखा गया है कि उन्हें नोटिस दिए गए थे. खारगोन में हटाए गए अतिक्रमण में जो लोग प्रभावित हुए थे उनमें 88 हिंदू थे और 26 मुसलमान.
करीब 45 मिनट तक की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में नया आदेश आने तक यथास्थिति बरकरार रखने का आदेश दिया है. सुनावई के लिए दो हफ़्ते बाद की तारीख़ तय की गई है.
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