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क़र्ज़ में डूबे भारत के राज्य क्या 'मिनी श्रीलंका' बन जाएंगे?
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कुछ समय से पंजाब एक बड़े आर्थिक संकट से गुज़र रहा है. इसकी तुलना श्रीलंका में जारी आर्थिक बदहाली से की जा रही है. इस आर्थिक संकट की वजह से अब ऐसे राज्यों को 'मिनी श्रीलंका' समझा जा रहा है.
पंजाब के आर्थिक हालात को अगर आंकड़ों के ज़रिए समझा जाए तो राज्य का ऋण, सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात में 53 फ़ीसद है. ये भारत के अन्य राज्यों की तुलना में सबसे ज़्यादा है.
राज्य पर तीन लाख करोड़ का क़र्ज़ है यानी तीन करोड़ की आबादी वाले इस राज्य का हर नागरिक एक लाख रुपए के क़र्ज़ के नीचे दबा हुआ है.
बेरोज़गारी की बात की जाए तो ये 25 फ़ीसद है. हालांकि राज्य ने साल 2021 में 75,000 करोड़ रुपए की कमाई की, लेकिन ये आंकड़ा भी लक्ष्य से 20,000 करोड़ रुपए से पीछे रह गया.
इसके बावजूद पंजाब में सत्ता में आई नई आम आदमी पार्टी की सरकार ने चुनावी वायदे को पूरा करने के उद्देश्य से ये घोषणा की कि एक जुलाई से राज्य सरकार लोगों को हर महीने 300 यूनिट बिजली मुफ़्त देगी. इससे सरकार पर हर साल 5,500 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा.
पंजाब:'फ़्रीबीज़ और सब्सिडी विकास का नहीं विनाश कर रास्ता'
पंजाब में काम कर रहे अर्थशास्त्री रंजीत घुमन कहते हैं कि सब्सिडी और चीज़ें फ़्री देने का रास्ता असल में विकास का नहीं विनाश का है.
बीबीसी से बातचीत में वो कहते हैं, "सब्सिडी आप ज़रूरतमंदों को दो. उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य इत्यादि के लिए सब्सिडी दी जानी चाहिए और उनका सशक्तीकरण किया जाना चाहिए. जो ज़रूरी वस्तु आम आदमी की पहुंच से बाहर है, उस पर सब्सिडी दी जानी चाहिए. लेकिन सभी को मुफ़्त बिजली देना ये मेरी समझ से बाहर है और किसी भी देश में सब्सिडी से विकास नहीं होता."
राज्य सरकार हर तरह की सब्सिडी और मुफ़्त स्कीम पर पहले से ही 17,000 करोड़ रुपए सालाना ख़र्च करती है.
रंजीत घुमन के मुताबिक़ अगर पंजाब सरकार ने अपने चुनावी वायदे के मुताबिक़ राज्य की हर महिला को 1,000 रुपए हर महीने देने का फ़ैसला किया तो इससे उसे अतिरिक्त 12,000 करोड़ रुपए सालाना ख़र्च करना होगा. यानी उसकी कमाई का 50 से 60 प्रतिशत हिस्सा मुफ़्त योजनाओं और सब्सिडी में ख़र्च हो जाएगा.
राज्य को अपने कर्ज़ को चुकाने के लिए अपनी कमाई का 45 प्रतिशत हिस्सा ख़र्च करना पड़ता है. इसके अलावा सरकारी कर्मचारियों को वेतन और पेंशन इसी कमाई से देना पड़ता है. विकास के काम के लिए पैसे बचते ही नहीं हैं. ज़ाहिर है सरकार को क़र्ज़ लेना पड़ता है और इस तरह राज्य सरकार का क़र्ज़ बढ़ता है और आर्थिक संकट भी.
रंजीत घुमन के अनुसार, एक ज़माने में अमीर राज्य कहा जाने वाला पंजाब अब अमीर नहीं रहा. वो कहते हैं, "हमारी प्रति व्यक्ति आय 28 राज्यों में 19वें नंबर पर है. हम अब अमीर नहीं हैं."
कई राज्यों की जीडीपी 'देशों' से भी ज़्यादा
भारत के कई राज्य ऐसे हैं जिनका सकल घरेलू उत्पाद कई देशों से भी ज़्यादा है. मिसाल के तौर पर महाराष्ट्र को लें. साल 2021 में राज्य की जीडीपी 32.24 लाख करोड़ रुपए यानी 430 अरब डॉलर थी जो पाकिस्तान की 310 अरब डॉलर की जीडीपी से कहीं अधिक है.
महाराष्ट्र की अर्थव्यवस्था भारत के सभी राज्यों में सबसे बड़ी है. वहीं दूसरे नंबर पर है तमिलनाडु जिसकी जीडीपी श्रीलंका से तीन गुना ज़्यादा है.
महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु जैसे भारतीय राज्य अगर अलग देश होते तो उनका सकल घरेलू उत्पाद दुनिया के कई देशों से ज़्यादा होता. क़र्ज़ के बोझ और घटते विकास दर ने कई राज्यों की अर्थव्यवस्था को आर्थिक संकट में डाल दिया है.
आर्थिक विशेषज्ञ इन राज्यों की ख़राब अर्थव्यवस्था पर चिंता ज़ाहिर करते हैं.
पंजाब के अलावा कर्नाटक, केरल, झारखंड, राजस्थान और पश्चिम बंगाल जैसे 20 से अधिक ऐसे राज्य हैं जो बढ़ते क़र्ज़ के बोझ तले दबे जा रहे हैं और इन राज्यों की अर्थव्यवस्था संकट के दौर से गुज़र रही है.
नरेंद मोदी सरकार ने साल 2016 में एन के सिंह की अध्यक्षता में राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (एफ़आरबीएम) अधिनियम की समीक्षा करने के लिए एक समिति का गठन किया था.
समिति ने 2017 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी जिसमें इसने सिफ़ारिश की थी कि राज्यों के सकल घरेलू उत्पाद का संयुक्त ऋण 2023 तक 20 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए.
लेकिन रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया की एक ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, राज्यों का संयुक्त ऋण-जीडीपी अनुपात में मार्च 2022 के अंत तक 31 प्रतिशत पर था जो 2022-23 तक हासिल किए जाने वाले 20 प्रतिशत के लक्ष्य से चिंताजनक रूप से अधिक है.
15वें वित्त आयोग के अनुमान के मुताबिक़, 2022-23 में ऋृण-जीडीपी अनुपात 33.3 प्रतिशत पर होगा और उसके बाद 2025-26 तक धीरे-धीरे गिरकर 32.5 प्रतिशत तक पहुंच जाएगा.
आरबीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, जम्मू कश्मीर की कुल बकाया देनदारियां (outstanding liabilities) सबसे अधिक यानी 56.6% हैं, जबकि पंजाब 53.3% के साथ दूसरे स्थान पर है. केवल गुजरात (21.4%) और महाराष्ट्र (20.4%) दो बड़े भारतीय राज्य हैं जो 20 प्रतिशत के लक्ष्य के क़रीब हैं.
क़र्ज़ संकट के कई कारण
महामारी
इंस्टीट्यूट फ़ॉर पॉलिसी रिसर्च स्टडीज़ के अर्थशास्त्री सुयश तिवारी और साकेत सूर्या ने नवंबर 2021 में अपने विशेष रिसर्च पेपर में बताया कि महामारी ने राज्य सरकारों की अर्थव्यवस्था को ख़ासा प्रभावित किया है.
इन अर्थशास्त्रियों के अनुसार, साल 2019-20 की आर्थिक मंदी ने राज्यों के राजस्व को प्रभावित किया. इसकी वजह से अधिक उधार लेने और साथ ही अपने ख़र्च में कटौती करने की आवश्यकता बनी.
इसके अगले वर्ष यानी 2020-21 में महामारी ने इस पैटर्न को और उजागर कर दिया. विशेषज्ञ बताते हैं कि केंद्र और राज्य, दोनों को यह भी योजना बनाने की ज़रूरत है कि अगर पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के तहत लाया जाता है तो राजस्व में संभावित नुक़सान को कैसे कम किया जाए इस बारे में सोचा जाना चाहिए.
इस बीच, राज्य बिजली वितरण कंपनियों की ख़राब वित्तीय स्थिति राज्य सरकारों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है.
15वें वित्त आयोग की सिफ़ारिश के अनुसार स्वास्थ्य के लिए आवंटन बढ़ाने और स्थानीय निकायों के वित्त में सुधार करने की भी आवश्यकता है.
सब्सिडी
पंजाब पर ही वापस लौटें तो रंजीत घुमन कहते हैं कि राज्य में सब्सिडी और मुफ़्त सुविधाओं का चलन एक दिन इसकी अर्थव्यवस्था के लिए घातक साबित हो सकता हैं.
आज कल सभी राजनीतिक दल चुनाव से पहले कई सुविधाओं को काफ़ी कम दाम पर या मुफ़्त में देने का वादा करते हैं. सत्ता में आने के बाद इन्हें अपने वादों को पूरा करना पड़ता है.
अर्थशास्त्री कहते हैं कि राज्यों की अर्थव्यवस्था में संकट की बड़ी वजह सब्सिडी और मुफ़्त सुविधाएं हैं जिसके बाद राज्यों के पास विकास के लिए पैसे ही नहीं बचते हैं.
मुंबई स्थति आर्थिक मामलों पर लिखने वाली साई पराड़कर कहती हैं कि सियासी पार्टियों के बीच मुफ़्त सुविधाएं और सब्सिडी देने को लेकर प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई है जिसका राज्यों की अर्थव्यवस्थाओं पर सीधा असर पड़ता है.
वो सवाल उठाते हुए कहती हैं, "मैं इन नेताओं से पूछती हूं कि आप जनता को मुफ़्त देने की आदत क्यों लगा रहे हो? ये सस्टेनेबल नहीं है.''
वॉशिंगटन में जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के भारतीय मूल के अर्थशास्त्री देवेश कपूर कहते हैं कि राज्यों के बुरे हाल के लिए राज्य स्वयं ज़िम्मेदार हैं.
बीबीसी से बाते करते हुए उन्होंने कहा, "अगर राज्य सरकारें वित्तीय स्तर पर दिवालिया नहीं हुई हैं तो भी उनका हाल बहुत बुरा है. वे राजस्व नहीं बढ़ाना चाहती हैं बल्कि सब्सिडी पर निर्भर करना चाहती हैं. उनके पास वास्तविक विकास परियोजनाओं के लिए पैसा नहीं है. महामारी की दूसरी लहर ने हमें हेल्थकेयर प्रणाली के बारे में क्या बताया?''
उनके अनुसार, ''ये संकट में हैं और ऐसा इसलिए है क्योंकि राज्यों ने स्वास्थ्य सेवा में निवेश नहीं किया था और हम सभी ये जानते हैं कि स्वास्थ्य राज्य का विषय है".
वे बताते हैं कि जब राज्य सरकारों के पास डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स के लिए पैसे नहीं होते तो वो वर्ल्ड बैंक और एशियन डेवलपमेंट बैंक के पास जाते हैं.
ताज़ा आंकडों के अनुसार, वर्ल्ड बैंक भारत के कई राज्यों में मदद कर रहा है जिसके मुताबिक़ 28 अरब डॉलर की मदद से 127 प्रोजेक्ट्स पर काम चल रहा है.
राज्यों द्वारा आर्थिक सुधार ज़रूरी
आरबीआई की रिपोर्ट के अनुसार, मध्यम अवधि में राज्य सरकारों की वित्तीय स्थिति में सुधार बिजली क्षेत्र में सुधारों पर निर्भर होगा. राज्यों को राजस्व सृजन के विभिन्न मॉडल और क्रिएटिव तरीके तलाशने होंगे.
अर्थशास्त्री रंजीत घुमन कहते हैं कि उन्होंने पंजाब सरकार को राजस्व सृजन के कई उपाय बताए हैं जिन से राज्य सरकार अपनी कमाई में हज़ारों करोड़ रुपए जोड़ सकती है.
वो कहते हैं, "पंजाब के राजकोष में 28,500 करोड़ रुपए बग़ैर अलग से टैक्स लगाए कमाया जा सकता है. ये सुझाव अब सरकारी डाक्यूमेंट्स का हिस्सा बन गए हैं. उसमे मैंने छह-सात ऐसे क्षेत्र बताए हैं जहाँ से अतिरिक्त रुपए कमाए जा सकते हैं."
केंद्र सरकार की अधिक सहायता
केंद्रीय सरकार को राज्य सरकारों की और भी मदद करनी चाहिए.
साई पराड़कर कहती हैं कि वीत्तीय आयोग को चाहिए कि वो वित्तीय विकेंद्रीकरण की तरफ़ ध्यान दे ताकि राज्य सरकारों के राजस्व को मज़बूत करने मदद हो.
रंजीत घुमन कहते हैं कि राज्यों को टैक्स कलेक्शन बेहतर करना चाहिए और इस पैसे को सही जगह इस्तेमाल करना चाहिए.
कई आर्थिक विशेषज्ञ ये तर्क देते हैं कि लोग अक्सर केंद्र सरकार की आर्थिक स्थिति और इसकी नीतियों पर ज़्यादा ध्यान देते हैं, लेकिन राज्य सरकारों की आर्थिक नीतियों पर लोगों की नज़र कम जाती है. ये भी एक हक़ीक़त है कि जहाँ तक सब्सिडी और मुफ़्त सुविधाएँ देने का सवाल है तो ये केंद्रीय सरकार भी सालों से करती आई है.
साल 2021 में भारत का राष्ट्रीय क़र्ज़, जीडीपी के अनुपात में 90.6 फ़ीसदी था.
देश का राष्ट्रीय ऋृण वह सारा धन होता है जो देश की सरकार ने उधार लिया है और अभी भी उसे चुकाया नहीं है.
राष्ट्रीय ऋण सरकारी ख़र्च के बढ़ने के कारण होता है जो बजट में घाटे की वजह होता है. दुनिया में कई विकसित देशों का राष्ट्रीय ऋृण चिंता का विषय है जैसे कि 2021 में अमेरिका का राष्ट्रीय ऋृण 31 ख़रब डॉलर से भी अधिक था.
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