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लियाक़त-नेहरू समझौता: जब पाकिस्तान और भारत ने अल्पसंख्यकों की रक्षा की ठानी
- Author, वक़ार मुस्तफ़ा
- पदनाम, पत्रकार व रिसर्चर, लाहौर
"साल 1947 में ब्रिटिश भारत के विभाजन से पहले, 30 प्रतिशत से भी अधिक मुस्लिम आबादी वाले पश्चिम बंगाल का प्रमुख शहर कलकत्ता (कोलकाता), उतना ही मुसलमानों का शहर था जितना हिन्दुओं का था."
अन्विषा सेन गुप्ता कोलकाता में इतिहास पढ़ाती हैं. वह लिखती हैं कि बंगाल की मुस्लिम लीग का मानना था कि कलकत्ता की शान पूर्वी बंगाल में बड़े पैमाने पर होने वाला पटसन का व्यापार है. इसलिए, उन्होंने बंगाल बॉउंड्री कमीशन से मांग की कि कलकत्ता को पूर्वी पाकिस्तान में शामिल किया जाए.
अगर यह संभव नहीं है, तो मुस्लिम लीग ने सुझाव दिया कि कलकत्ता को पूर्व और पश्चिम बंगाल का संयुक्त शहर बनाया जाए, यानी पाकिस्तान और भारत का संयुक्त शहर घोषित किया जाए.
कलकत्ता आग की चपेट में
15 अगस्त 1947 को कलकत्ता इतना शांतिपूर्ण था कि यह काल्पनिक सा लगता था. कलकत्ता में अख़बार गार्डियन के विशेष संवाददाता ने लिखा, "आज रात कलकत्ता में हिंदू और मुसलमान एक साथ आज़ादी का जश्न मना रहे हैं." हालांकि ये ख़ुशनुमा माहौल बहुत कम दिनों तक रहा और कुछ हफ़्तों के अंदर यह शहर आग की चपेट में आ गया.
नवंबर 1948 में मानिकतला में मुहर्रम के जुलूस पर ईंटों और तेज़ाब से हमला किया गया था. अन्विषा सेन गुप्ता के एक अध्ययन से पता चलता है कि पूर्वी बंगाली प्रवासियों ने जुलूस पर हमला करके अपना गुस्सा निकाला.
एनसी चटर्जी जैसे महासभा नेताओं के भड़काऊ भाषणों ने स्थिति को और ज़्यादा ख़राब कर दिया. उन्होंने तुरंत नागरिकों के तबादले की मांग की यानी पश्चिम बंगाल की मुस्लिम आबादी का पूर्वी बंगाल के हिंदुओं के साथ तबादला. इस मांग का मतलब था कि मुसलमानों के लिए कलकत्ता या पश्चिम बंगाल में कोई जगह नहीं, चाहे वे यहां रहना चाहते हों या पूर्वी बंगाल जाना चाहते हों."
पूर्वी बंगाल से बड़ी संख्या में हिंदू शरणार्थियों ने मुस्लिम संपत्तियों पर क़ब्ज़ा कर लिया. उन्होंने महासभा और अन्य दक्षिणपंथी दलों / संगठनों की मदद से मस्जिदों, क़ब्रिस्तानों, अन्य वक़्फ़ संपत्तियों और घरों पर जबरन क़ब्ज़ा कर लिया, जहां मुस्लिम परिवार रहते थे."
तबाही थी, ख़ून था और दीवारों पर गोलियों के निशान
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की सुभाश्री घोष लिखती हैं कि कलकत्ता से सटे हावड़ा शहर में दंगों की विस्तृत जानकारी पाना संभव नहीं है क्योंकि सरकार ने "ऐसी घटनाओं के प्रकाशन पर पाबंदी लगा दी थी जो लोगों को भड़का सकती हों."
केवल सरकारी ब्रीफ़िंग ही रिपोर्ट की जा सकती थी और निष्पक्ष जांच होना संभव नहीं थी. जो मिला वह यह कि 8 और 9 फरवरी, 1950 को, "कुछ क्षेत्रों में निकाली गई रैलियों में लोगों को हिंसा के लिए उकसाया गया था."
शहर का उत्तरी हिस्सा 9-10 फरवरी की आधी रात को दंगों की चपेट में था, जिसमें 24 लोग घायल हो गए थे, जिनमें से दो की बाद में मौत हो गई थी. तनाव कम नहीं हुआ, 56 लोग घायल हो गए और एक गंभीर रूप से घायल हो गया. वीरान दुकानों और कच्ची आबादियों में आग लगा दी गई.
फरवरी और मार्च में हावड़ा में हुए दंगों में भी कई मुसलमान मारे गए थे. एक ब्रिटिश पत्रकार ताया ज़िंकन ने लिखा है, कि "शव बिखरे हुए थे... इन शवों पर गंभीर घाव थे और ज़मीन पर ख़ून के थक्के जमे हुए थे. युवा और बूढ़ी महिलाएं, बच्चे, पुरुष, दुधमुहे बच्चे सब एक साथ... तीन सौ फ़ीट लंबी सड़क पर 342 शवों में से केवल बीस ही जीवित थे."
जब सेना ने कमान संभाली, तो कुछ दिनों के बाद, दो गाँव थे जहां आगज़नी की घटनाएं हुई थी.
ढाका सहित पूर्वी बंगाल में दंगे
दूसरी ओर, पूर्वी बंगाल में 28 प्रतिशत गैर-मुस्लिम आबादी थी, जिसमें अधिकांश बंगाली हिंदू थे. पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव सुकुमार सेन 10 फरवरी को सुबह करीब 10 बजे ढाका में अपने पूर्वी बंगाल के समकक्ष अज़ीज़ अहमद के साथ अल्पसंख्यकों के मुद्दे पर बातचीत कर रहे थे, उसी समय एक मुस्लिम महिला को सचिवालय की इमारत में लाया गया.
ख़बर आई कि कलकत्ता में उसके साथ बलात्कार किया गया है, इसके बाद सचिवालय के कर्मचारी तुरंत हड़ताल पर चले गए और हिंदू विरोधी नारे लगाते हुए एक जुलूस निकाला.
सुभाश्री घोष का कहना है कि ढाका में शुक्रवार 10 फरवरी 1950 को जुमे की नमाज़ के बाद हिंसा भड़क उठी. 12 फरवरी को, ढाका के पास क्रामतुला हवाई अड्डे पर एक सशस्त्र भीड़ ने हिंदू यात्रियों पर हमला किया, जिसमें महिलाओं और बच्चों सहित बड़ी संख्या में यात्री मारे गए या गंभीर रूप से घायल हो गए. घटना सशस्त्र गार्डों की मौजूदगी में हुई.
ऐसी ही हृदयविदारक घटना राजशाही के संथार स्टेशन पर हुई. सिलहट, राजशाही, बारिसाल, खुलना, कोमिला और नोआखली से हिंदुओं के ख़िलाफ़ व्यापक हिंसा की ख़बरें मिलीं.
पश्चिम बंगाल दंगों में आरएसएस और महासभा की भूमिका
घोष के अनुसार, पश्चिम बंगाल में महासभा और आरएसएस की गतिविधियों ने आग भड़काने में कोई कम भूमिका नहीं निभाई.
"कभी-कभी सरकार के ख़ुफ़िया समर्थन से दंगे किये गए. इसका मक़सद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाक़त अली ख़ान को शांति वार्ता के लिए दिल्ली आने के लिए मजबूर करना था."
हावड़ा में मुसलमानों की दुर्दशा से प्रभावित होकर लियाक़त ख़ान ने 29 मार्च को घोषणा की कि वह शांति वार्ता के लिए 2 अप्रैल को दिल्ली पहुंचेंगे. उस दिन पूरा हंगामा थम गया.
घोष के अनुसार, जांच आयोग के समक्ष साराभाई का बयान इस बात की पुष्टि करता है कि "इंटर डोमिनियन वार्ता के मौक़े पर, सरकार की नीति रातोंरात बदली हुई लग रही थी. हर जगह जिले के अफ़सर मुसलमानों को पाकिस्तान जाने के लिए उकसाने में लगे हुए थे.
उन्होंने लिखा कि राज्य सरकार का प्राथमिक उद्देश्य मुसलमानों को बेदख़ल करके हिंदू प्रवासियों का पुनर्वास करना और उनके मन में भय पैदा करना था, ताकि उनकी वापसी को हमेशा के लिए रोका जा सके.
साल 1950 पाकिस्तान और भारत के लिए एक महत्वपूर्ण वर्ष था. ऐसा लग रहा था कि तीन साल पहले स्वतंत्र हुए दोनों देशों के बीच युद्ध छिड़ने वाला है. कश्मीर विवाद पहले ही जन्म ले चुका था. द्विपक्षीय सहयोग के कई मुद्दे अनसुलझे थे.
युद्ध न करने का प्रस्तावित समझौता क्यों नहीं हो सका?
द्विपक्षीय तनाव के उस दौर में, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाक़त अली ख़ान और उनके भारतीय समकक्ष जवाहरलाल नेहरू के बीच युद्ध न करने के प्रस्तावित समझौते पर दो सौ से अधिक पत्रों और टेलीग्राम का आदान-प्रदान हुआ.
दोनों नेताओं ने अपनी-अपनी असेंबलियों को पत्रों के इस आदान-प्रदान के बारे में जानकारी दी.
नेहरू ने एक व्यापक युद्ध-विरोधी मौखिक समझौते का समर्थन किया, जबकि लियाक़त अली ख़ान ने कश्मीर विवाद को हल करने के लिए एक स्पष्ट समय सारिणी और तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप की मांग की.
इस असहमति के कारण, यह समझौता नहीं हो सका. हालांकि, दिल्ली में, लियाक़त अली ख़ान और जवाहरलाल नेहरू ने 8 अप्रैल, 1950 को अल्पसंख्यकों से संबंधित समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसे लियाक़त नेहरू समझौता भी कहा जाता है.
लियाक़त नेहरू समझौता: अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए गंभीर प्रयास
शोधकर्ता पल्लवी राघवन ने अपनी किताब, 'ऐनिमोसिटी ऐ़ट बे: ऐन अल्टर्नेटिव हिस्ट्री ऑफ़ द इंडिया-पाकिस्तान रिलेशनशिप, 1947-1952' में दोनों दक्षिण एशियाई देशों के बीच संबंधों के पहले पांच वर्षों पर शोध किया है.
कई विवादों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, राघवन की किताब उसी दौर में शांति के लिए लियाक़त नेहरू समझौते जैसे प्रयासों की समीक्षा करती है.
किताब में कहा गया है कि "दोनों देशों में शरणार्थी या अल्पसंख्यकों के अधिकार या पीछे छोड़ी गई संपत्ति जैसे, विभाजन की वजह से जन्म लेने वाले मुद्दों को हल करने के लिए एक बहुत ही अजीब तरह की निकटता और अविश्वसनीय रूप से गंभीर प्रयास किए गए थे. दक्षिण एशिया में इस तरह की तैयारी हैरान करने वाली थी."
इस समझौते में कहा गया कि अल्पसंख्यकों को उनके धर्म की परवाह किए बिना नागरिकता के समान अधिकार होंगे.
इन अल्पसंख्यकों की जान, माल, संपत्ति, संस्कृति और व्यक्तिगत गरिमा की रक्षा और सुरक्षा के साथ पूरे देश में आने जाने की स्वतंत्रता, रोज़गार की स्वतंत्रता, बोलने और लिखने की स्वतंत्रता, पूजा की स्वतंत्रता की गारंटी दी जाएगी.
यह भी तय किया गया कि दोनों देशों में अल्पसंख्यकों को राज्य के मामलों में भाग लेने के समान अवसर दिए जाएंगे, वे राजनीतिक पद धारण करने, नागरिक और सशस्त्र बलों में भर्ती हो कर देश की सेवा करने में सक्षम होंगे.
भारत के प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत के संविधान में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए ये प्रावधान पहले से ही शामिल हैं. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने कहा कि पाकिस्तान की संविधान सभा के संकल्प उद्देश्यों में भी इसी तरह के प्रस्तावों को मंज़ूर किया गया है.
पाकिस्तान और भारत में अल्पसंख्यकों के लिए नई उम्मीद
समझौते के तहत, दोनों सरकारें अपने अल्पसंख्यक नागरिकों के साथ बर्ताव के लिए एक-दूसरे को जवाबदेह ठहराएंगी. शरणार्थियों को उनकी संपत्ति के निपटान के लिए बिना रोक-टोक वापस जाने की अनुमति दी गई, अग़वा की गई महिलाओं और लूटी गई संपत्ति को वापस किया जाना था. जबरन धर्मांतरण को मान्यता नहीं दी गई थी और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की पुष्टि की गई थी. इन शर्तों को लागू करने के लिए अल्पसंख्यक आयोगों का गठन किया गया था.
लेखक सिद्धार्थ सिंह के अनुसार, यह समझौता दोनों देशों में लाखों हिंदू और मुस्लिम अल्पसंख्यकों के लिए सुरक्षा की एक नई उम्मीद थी. वो कहते हैं,"समझौते से पहले के महीनों में, उपमहाद्वीप में दूसरा प्रवास शुरू हो गया था, जो 1947 की तुलना में कम हिंसक नहीं था. जान, माल और संपत्ति का नुक़सान हुआ."
रिचर्ड लैम्बर्ट ने एक लेख में लिखा है कि इस समझौते ने दोनों तरफ़ के अल्पसंख्यकों की उम्मीदों को नई ज़िंदगी दी.
दरअसल, इस समझौते के बाद कुछ समय के लिए दोनों देशों के बीच विश्वास भी बहाल हो गया था, हालांकि ब्रिटैनिका एनसाइक्लोपीडिया के अनुसार, समझौते के बाद के महीनों में दस लाख से ज़्यादा अतिरिक्त शरणार्थियों ने पश्चिम बंगाल की तरफ़ प्रवास किया.
समझौते का विरोध
नेहरू के साथी और भारत के पहले गृह मंत्री सरदार पटेल ने शुरू में इस समझौते का विरोध किया था.
लेखिका रोशिना ज़हरा के मुताबिक़ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भी इस समझौते का विरोध किया था. जब प्रधानमंत्री ने इस समझौते को आगे बढ़ाने का फ़ैसला किया, तो आख़िर में उन्होंने एक मंत्री के रूप में नेहरू के मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया.
कैबिनेट छोड़ने के बाद मुखर्जी ने साल 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना की, जो बाद में साल 1980 में भारतीय जनता पार्टी या भाजपा बन गई.
पल्लवी राघवन लिखती हैं कि नेहरू और लियाक़त अली ख़ान अक्सर शिक़ायत करते थे कि उनके बयानों को सनसनीखेज बनाने के लिए प्रेस में ग़लत तरीक़े से पेश किया जाता है. दोनों तरफ़ के अख़बार और पत्रिका कूटनीतिक दुश्मनी और राजनीतिक झगड़े को हवा देते हैं.
फरवरी 1950 में, भारत और पाकिस्तान के विदेश मंत्रालयों ने एक-दूसरे देश के अख़बारों के बारे में लगभग एक ही जैसी शिक़ायतें कीं कि वे 'सीमा पार अल्पसंख्यकों के बारे में काल्पनिक ख़बरों के माध्यम से अपने-अपने देशों में अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ उत्तेजना पैदा कर रहे हैं.
राघवन के अनुसार, दोनों देशों में अल्पसंख्यकों के सामने जो समस्याएं थी उनकी अख़बारी कवरेज का ज़्यादातर हिस्सा वास्तव में ग़लत नहीं था, लेकिन सीमा के दोनों तरफ़ अल्पसंख्यकों के हालात कड़वी सच्चाई की कवरेज करने और इस जानकारी का इस्तेमाल करते हुए, दोनों देशों में एक युद्ध उन्माद बनाये रखने में फ़र्क़ था. सरकारों को रिलीफ़ देने और पुनर्वास करने में कठिनाई हो रही थी, क्योंकि राजनेता विरोध में इनका दुरुपयोग कर रहे थे.
प्रोपेगंडा के ख़िलाफ़ समझौता
इस समझौते मक़सद ये था कि अफवाहें और ग़लत सूचना फ़ैलाने वाले व्यक्तियों और संस्थानों पर कड़ी निगरानी रखी जाए और उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाए. अपने देश में पड़ोसी देश के ख़िलाफ़ आक्रामक प्रोपेगंडा की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए या दोनों देशों को युद्ध पर उकसाने या उनकी भौगोलिक सुरक्षा के ख़िलाफ़ प्रोपेगंडा करने पर कार्रवाई की जानी चाहिए.
समझौते के नतीजे में, हालात में सुधार के लिए एक दूसरे के मीडिया कवरेज में कुछ स्थायी परिवर्तन लाने के लिए दोनों तरफ़ गतिविधियां भी देखी गई.
लियाक़त नेहरू समझौते ने दोनों सरकारों को "आपत्तिजनक" फ़िल्मों, नाटकों और किताबों को एक-दूसरे के संज्ञान में लाने में भी सक्षम बनाया.
समझौते में एक संयुक्त प्रेस कोड की स्थापना का भी प्रावधान था, जिसका पालन दोनों देशों के प्रमुख पत्रकारों और संपादकों को करना था.
संयुक्त प्रेस कोड
संयुक्त प्रेस कोड जून 1950 में ऑल इंडिया न्यूज़ पेपर एडिटर्स कॉन्फ्रेंस और पाकिस्तान न्यूज़ पेपर एडिटर्स कॉन्फ्रेंस ने अपनाया. इस संहिता को लागू करने की निगरानी कांफ्रेंस के भारतीय और पाकिस्तानी सदस्यों को सौंपी गई, जिन्हें यह सुनिश्चित करने के लिए नियमित रूप से मिलना पड़ता था कि इसके उद्देश्यों को पूरा किया जाए.
सिंध ऑब्ज़र्वर के पीर अली मोहम्मद राशिदी, अमृत बाज़ार पत्रिका के टीके घोष और हिंदुस्तान टाइम्स के दुर्गादास जैसे संपादक सभी ने महसूस किया कि पाकिस्तान और भारत की समस्याओं की कड़वाहट को समन्वय से ही कम किया जा सकता है. समझौता तभी काम कर सकता था जब दोनों पक्ष इसका पालन करें.
राघवन कहती हैं कि सात दशक पुराने इस दस्तावेज़ के कई बिंदू आज भी आश्चर्यजनक रूप से प्रासंगिक लगते हैं.
उदाहरण के लिए, ऐसे व्यक्तियों या संगठनों के शरारती विचारों को बढ़ावा देने से इनकार करना जो सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काएं या अल्पसंख्यक समुदाय में असुरक्षा की भावना पैदा करें... हर देश के प्रेस से दूसरे देश की क्षेत्रीय संप्रभुता के ख़िलाफ़ या युद्ध भड़काने के इरादे के तहत किसी भी राय का सख़्ती से खंडन करना... सीमा पार अल्पसंख्यकों की शांति के लिए ख़तरा पैदा करने वाली जानकारी के प्रसार से बचना.
पल्लवी राघवन का कहना है कि पचास का दशक उत्साहपूर्ण सहयोग का समय था. उस पीढ़ी ने उपमहाद्वीप पर सबसे बुरे झटके देखे हैं. अगर उन परिस्थितियों में भारत और पाकिस्तान के नीति निर्माता इस निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं कि समस्या का सबसे अच्छा समाधान एक विस्तृत बातचीत है, तो आज भी पाकिस्तान-भारत संबंधों की भूल भुलैया में यही बातचीत एक रास्ता दिखा सकती है.
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