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महाराष्ट्र में आशा सेविकाओं को पुरुष जननांग के मॉडल देने पर विवाद क्यों
- Author, जाह्नवी मूले
- पदनाम, बीबीसी मराठी
महाराष्ट्र में आशा सेविकाओं के बीच रबर के बने पुरुष जननांग के मॉडल बांटे जाने से बड़ा विवाद पैदा हो गया है. यह घटना राज्य के बुलढाणा ज़िले की है.
यह मामला तब सामने आया जब इस ज़िले के 'मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता' यानी आशा (ASHA) सेविकाओं के बीच वहां के प्रशासन ने एक किट बांटी. यह किट लोगों को परिवार नियोजन पर जानकारी देने के लिए दी गई है. इस किट में रबर के बने पुरुष जननांग का मॉडल भी शामिल है.
इस वजह से यह मामला लोगों के बीच चर्चा और बहस की वजह बन गया है. कई लोग इस किट पर आपत्ति जता रहे हैं.
वहां के एक स्थानीय विधायक ने राज्य सरकार पर इस किट को लेकर निशाना साधते हुए आरोप लगाया है कि इसके ज़रिए महिलाओं का अपमान किया जा रहा है.
हालांकि महाराष्ट्र सरकार की ओर से राज्य के पब्लिक हेल्थ विभाग के निदेशक ने बीबीसी को बताया है कि सरकार ये किट पूरे राज्य में बांट रही है. उन्होंने कहा कि अभी तक केवल बुलढाणा से ही हमें इसे लेकर नकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है.
उन्होंने कहा, ''इन मॉडलों का उपयोग करने की कोई बाध्यता नहीं है. यदि स्वास्थ्य कर्मियों को इन मुद्दों पर खुलकर बात करने में अजीब लगता है, तो काम कैसे चलेगा?''
वहीं ज़्यादातर ग्रामीण स्वास्थ्यकर्मी इस मसले पर कैमरे के सामने मीडिया से बात करने को तैयार नहीं हो रहे. लेकिन कुछ ने लोगों को समझाने के लिए पुरुष जननांग के इस मॉडल का उपयोग करने में अपनी परेशानियों के बारे में बताया.
ऐसे लोगों में से कुछ ने कहा कि पुरुष जननांग और गर्भाशय के मॉडल को गांवों में ले जाना बहुत शर्म की बात है.
गांवों में लोग सेक्स और उससे जुड़े विषयों पर खुलकर बात करने से कतराते हैं. वहीं पुरुष जननांग का यह मॉडल उनकी समस्या और बढ़ा दे रहा है.
वैसे भी भारत में आम तौर पर सेक्स हेल्थ, प्रजनन या गर्भनिरोध से जुड़े मुद्दों पर बात करना बहुत मुश्किल होता है. अभी भी कई लोग इन मुद्दों पर बात करने को पूरी तरह ग़लत मानते हैं.
कई स्तरों पर जागरुकता अभियान चलाए जा रहे हैं. अक्सर यह काम 'आशा' कार्यकर्ताओं से करने को कहा जाता है, जो गांवों में महिला स्वास्थ्य सेवा की रीढ़ हैं.
गांव के लोगों और स्थानीय स्वास्थ्य प्रशासन के बीच आशा सेविकाएं मुख्य कड़ी हैं.
रबर का बना यह मॉडल किट में क्यों?
केंद्र सरकार ने आशा सेविकाओं के कामों की एक सूची जारी की है. उन कामों में गर्भ निरोधकों और यौन रोगों के बारे में लोगों को बताना और गर्भावस्था से जुड़े मुद्दों पर महिलाओं को जागरूक करना भी शामिल हैं.
जागरुकता के इस अभियान में मदद देने के लिए आशा कार्यकर्ताओं को यह किट दी गई है, ताकि वे लोगों को आसानी से बातें समझा सकें.
बुलढाणा ज़िले के चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर राजेंद्र सांगले इस बारे में कहते हैं, ''इस किट का इस्तेमाल जनसंख्या नियंत्रण और यौन रोगों के बारे में जागरुकता अभियान चलाने में किया जाएगा. ऐसा करने से हेपेटाइटिस-बी और सिफ़लिस जैसे यौन रोग कम करने में मदद मिलेगी. यह किट स्वच्छता बढ़ाने और बीमारियों को क़ाबू करने में भी उपयोगी है."
हालांकि विपक्षी भारतीय जनता पार्टी के कई नेताओं ने इसे लेकर राज्य सरकार पर निशाना साधा है. कइयों ने तो इस बारे में मुक़दमा दर्ज करने की भी मांग की है. उनका दावा है कि इस किट से आशा कार्यकर्ताओं का अपमान हुआ है.
बुलढाणा ज़िले के एक विधायक आकाश फुंडकर ने सरकार से मांग की है वो इन किटों को वापस ले और उन महिलाओं से माफ़ी मांगे. उन्होंने धमकी दी है कि यदि ऐसा नहीं हुआ तो भाजपा पूरे राज्य में आंदोलन करेगी.
भाजपा की नेता चित्रा वाघ ने भी सरकार की आलोचना करते हुए कहा है कि यह सरकार 'यौन आसक्ति को बढ़ावा दे रही है.' सोशल मीडिया साइट ट्विटर पर उन्होंने कहा कि इसके लिए आशा सेविकाएं राज्य सरकार को माफ़ नहीं करेंगी.
लोगों के सवाल
वहीं कई लोग यह सवाल भी कर रहे हैं कि आशा सेविकाएं गांवों में रबर के बने मर्द जननांग के इस मॉडल को किट में रखकर कैसे घूमेंगी?
इनका कहना है कि लोग जब पहले से ही यौन स्वास्थ्य पर चर्चा करने में असहज हैं, तो क्या जागरुकता फैलाने के लिए आशा सेविकाओं द्वारा ऐसी किट का उपयोग करना संभव होगा?
पुणे की एक आशा कार्यकर्ता ने इस बारे में बीबीसी मराठी से बात की. उन्होंने कहा कि इस तरह की किट का इस्तेमाल पहले भी होता था.
नाम न छापने की शर्त पर उन्होंने कहा, ''यह किट परिवार नियोजन कार्यक्रम के एलान के बाद से ही दिए जा रहे हैं. इस किट को लोगों को समझाने के लिए उपयोग में लाया जाता है. आम लोगों के उपयोग के लिए यह किट नहीं है. परिवार नियोजन के बारे में सलाह देने में इसका उपयोग केवल आशा सेविका और एएनएम (नर्स) ही करती हैं. इस किट की जानकारी हमें ट्रेनिंग के दौरान दी जाती है.''
उन्होंने यह भी कहा कि कम से कम पुणे ज़िले में तो इस किट को लेकर आशा कार्यकर्ताओं को कोई शिक़ायत नहीं है.
जानकारक्या कहते हैं
पब्लिक हेल्थ विभाग की निदेशक डॉक्टर अर्चना पाटिल ने इस बारे में बीबीसी मराठी से बातचीत की.
उन्होंने बताया, ''ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है. परिवार नियोजन को लेकर लोगों को जागरूक करने के लिए एक अभियान चलाया जा रहा है. अब तक राज्य भर में ऐसी 25 हज़ार किट बांटी जा चुकी है. आने वाले दिनों में ऐसी 40 हज़ार और किट बांटी जानी है. इन किटों का सार्वजनिक उपयोग नहीं किया जाना है.''
वो कहती हैं, ''स्वास्थ्यकर्मियों से उम्मीद की जाती है कि यौन स्वास्थ्य पर लोगों को सलाह देते समय वे इस किट का उपयोग करें. यदि आशा सेविकाएं किट का उपयोग करने में असहज महसूस करती हैं, तो वे इसका इस्तेमाल करने को बाध्य नहीं हैं."
इस किट को लेकर उठाई गई आपत्तियों पर डॉक्टर पाटिल कहती हैं, "झिझकने की कोई बात ही नहीं है. यदि मेडिकल क्षेत्र में काम करने वाले लोग ही हिचकिचाएंगे, तो हम इसके बारे में लोगों को कैसे जागरूक करेंगे?"
यौन रोगों और उससे बचने के उपायों के बारे में लोगों को जागरूक करना बहुत गंभीर और अहम चीज़ है.
इस किट की उपयोगिता के बारे में हमने कई जानकारों से बातचीत की.
सेक्स मामलों के जानकार डॉक्टर सागर मुंडाडा लोगों को समझाने के लिए ऐसे मॉडलों का उपयोग करने का समर्थन करते हैं.
वो कहते हैं, ''सिर्फ़ मॉडल उपलब्ध करा देने से मक़सद हासिल नहीं होगा. आशा कार्यकर्ताओं को जानकारों से प्रशिक्षण लेना चाहिए. ग्रामीण क्षेत्रों में पढ़े-लिखे लोग काफ़ी कम हैं, इसलिए प्रदर्शनों के ज़रिए लोगों को इन मुद्दों पर बेहतर तरीके से जागरूक किया जा सकता है."
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