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यूक्रेन में जंग का जर्मनी और रूस के रिश्तों पर क्या असर होगा
- Author, निक रॉबिनसन
- पदनाम, प्रेजेंटर, बीबीसी टुडे प्रोग्राम
तीन दशक से कुछ पहले की बात होगी, मैं बर्लिन दीवार के ऊपर खड़ा था, इससे तीन दशक पहले इस दीवार ने दोस्तों और परिवारों को अलग कर दिया था, एक देश को बांट दिया था और यूरोप का पक्का बंटवारा कर दिया था.
नवंबर 1989 की उस सर्द रात में मैंने और वहां मौजूद हज़ारों लोगों ने वो नज़ारा देखा जब एक युवा ने साहसिक क़दम उठाते हुए दीवार फांद दी और वो 'नो मैन्स लैंड' में जा गिरा.
अगर उसने कुछ दिन पहले ऐसा किया होता तो शायद उसे गोली मार दी गई होती. पूर्व और पश्चिम के बीच फासले को कम करने की कोशिश करने वाले उसके जैसे हज़ारों नौजवानों ने जान देकर इस को कोशिश की क़ीमत चुकाई थी. वो भी शायद उन लोगों के साथ जा मिलता. लेकिन उस रात वो दीवार गिरने जा रही थी. उस नौजवान ने एक फूल निकाला और पूर्वी जर्मनी के सैनिक की तरफ़ बढ़ा दिया, वो सैनिक कुछ ठहरा, मानों ये जीवन का सबसे बड़ा ठहराव हो, फिर उसने हाथ आगे बढ़ाया और शांति के इस संदेश को स्वीकार कर लिया. दीवार के किनारे खड़ी भीड़ उस समय जोशीले नारे लगा रही थी.
वे-हम- ख़्वाब देख रहे थे कि यूरोप अब आज़ाद होगा और समूचा होगा. जल्द ही लोग ये चुनने के लिए स्वतंत्र होंगे कि उन पर किसकी सत्ता होगी, भले ही वो बर्लिन में रहते हों या फिर प्राग में रहते हैं, वॉरसा या बुडापेस्ट में और शायद, हां शायद मॉस्को और सैंट पीटर्सबर्ग में भी.
अब मैं फिर से बर्लिन में हूं- वो शहर जो इस तथ्य का सामना कर रहा है कि अब वो सपना मर चुका है. भला हो पुतिन के यूक्रेन पर हमला करने और वहां के लोगों को झुकने पर मज़बूर करने का फ़ैसला का.
जर्मनी के चांसलर ओलाफ़ शुल्ज़ ने इसे ऐतिहासिक मोड़ बताया है. जर्मनी में इसके लिए भी एक शब्द है. वैसे जर्मन में हर चीज़ के लिए एक शब्द है. ज़ीतेनवेंडे.
शुल्ज़ ने घोषणा की है कि उनका देश अब यूक्रेन को वास्तविक सैन्य मदद देने जा रहा है.
कुछ सप्ताह पहले जब उनकी सरकार ने यूक्रेन की सेना के लिए पांच हज़ार हेलमेट भेजने का प्रस्ताव दिया था तो उनके देश की मज़ाक बनी थी.
जर्मनी की नौसेना के प्रमुख ने भारत में एक सेमिनार के दौरान कहा था कि पुतिन को सम्मान चाहिए और वो इसके हक़दार हैं. इस बयान के लिए उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा था.
जर्मनी के चांसलर ने अब रक्षा बजट पर सौ अरब यूरो से अधिक खर्च करने का वादा किया है. इसका मतलब ये है कि जर्मनी जल्द ही यूरोप की सबसे बड़ी और दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी सैन्य शक्ति बन जाएगा. उससे आगे सिर्फ़ चीन और अमेरिका होंगे.
अगर कुछ महीनों पहले भी जर्मनी ने ये ऐलान किया होता तो उसके ख़िलाफ़ देश के भीतर प्रदर्शन होते और बाहर इसे लेकर डर पैदा होता.
निल्स श्मिड ने युवावस्था में यूक्रेन में तब पढ़ाई की जब वो सोविय संघ का हिस्सा था. वो अपने आप को 1989 की पीढ़ि का हिस्सा बताते हैं. निल्स इन दिनों जर्मनी में सांसद हैं और सत्ताधारी सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी के विदेश मामलों के प्रवक्ता हैं.
वो मुझसे बताते हैं कि वो और उनके देश के पुरुष और महिलाएं अब ये स्वीकार करते हैं कि यूरोप को बांटने वाली 'लौह दीवार' सिर्फ़ खिसकी है.
एक समय यह उनके ऑफ़िस से कुछ सौ क़दमों की दूरी पर ही थी. अब, दीवार के गिरने के दशकों बाद, ये लौह दीवार नेटो देशों और रूस समर्थक देशों के बीच खड़ी है.
अमेरिका नेटो सदस्य देशों की सुरक्षा की गारंटी लेता है जबकि रूस समर्थक देश अपनी सुरक्षा के लिए रूस की तरफ़ देखते हैं.
उनके दफ़्तर के दूसरी तरफ़ विशाल रूसी दूतावास है. ये कभी पूर्वी बर्लिन का हिस्सा था. अब इस दूतावास के बाहर पुलिस बलों का पहरा है और यहां युद्ध विरोधी पोस्टर लगे हैं. ज़मीन पर चादरें बिछी हैं जिन पर बच्चों के नरम खिलौने हैं. आने-जाने वाले लोगों को संदेश दिया जा रहा है कि जो बच्चे यूक्रेन में मारे जा रहे हैं वो आपके अपने बच्चे भी हो सकते हैं.
यहां मेरी मुलाक़ात माइकल से होती है. वो दक्षिण-पश्चिमी जर्मनी के ब्लैक फॉरेस्ट इलाक़े के एक बाइकर हैं. वो अपनी यामाहा के पास खड़े होकर एक वीडियो रिकॉर्ड कर रहे थे. उन्होंने अपनी बाइक को यूक्रेन के झंडे के नीले और पीले रंगों से रंग दिया है.
वो अपने दोस्तों, पड़ोसियों और रास्ते में मिलने वाले 600 से अधिक लोगों का पुतिन के लिए संदेश लेकर पहुंचे हैं. ये उन्होंने एक फोल्डर में रखे हैं. सभी ने पुतिन से युद्ध रोकने की अपील की है.
दूतावास के कर्मचारी इस फ़ोल्डर को स्वीकार नहीं कर रहे हैं. माइकल को अब अहसास हो रहा है कि रूस से सिर्फ़ बात करना पर्याप्त नहीं है. उनका मानना है कि जर्मनी को अब रूस का मुक़ाबला करने के लिए तैयार रहना चाहिए.
इसका मतलब ये है कि 1989 की पीढ़ि के लोगों के बच्चे अपने परिजनों की तरह आज़ादी का आनंद नहीं ले सकेंगे. वो ये यक़ीन करते हुए बढ़े नहीं होंगे कि युद्ध गुज़रे ज़माने की बात हैं.
हाल में हुए एक सर्वे में पता चला है कि अब दस में से सात जर्मन ये मानते हैं कि युद्ध दूसरे देशों में भी फैल सकता है.
इसमें कोई हैरत की बात नहीं है कि यूक्रेन में बेघर हुए शरणार्थी बड़ी तादाद में बर्लिन के स्टेशनों पर उतर रहे हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक बर्लिन में रोज़ाना दस हज़ार तक शरणार्थी पहुंच रहे हैं.
ये युद्ध यूरोप के सबसे शक्तिशाली देश की सोच बदल रहा है. इसके नाटकीय परीणाम हो सकते हैं, जिनके बारे में अभी सोचा जाना शुरू ही हुआ है.
आपकी उम्र कम से कम चालीस साल की होनी चाहिए उस पल को याद करने के लिए जब 1989 में बर्लिन की दीवार गिरा दी गई थी. फ़रवरी और मार्च 2022 के ये दिन उतने ही अहम साबित होने जा रहे हैं.
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