You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
यूक्रेन से पहले कब-कब विदेशों से भारतीयों को बचाने के लिए चले थे अभियान?
- Author, मुरलीथरन कासी विश्वनाथन
- पदनाम, बीबीसी तमिल सेवा
भारत सरकार यूक्रेन और रूस के बीच जारी जंग में फंसे भारतीय छात्रों को निकालने की कोशिश कर रही है. लेकिन इन तमाम प्रयासों के बीच सोशल मीडिया पर एक बहस छिड़ी हुई है कि क्या भारत सरकार ने अपने नागरिकों को बचाने की दिशा में सही समय पर सही कदम उठाए हैं?
इस मौके पर इससे पहले इस तरह की स्थितियों में भारतीय लोगों को बचाने के लिए चलाए गए अभियानों की भी चर्चा की जा रही है.
यूक्रेन युद्ध से पहले भारत सरकार ने तीन मौकों पर विदेशों से भारतीय नागरिकों को निकालने के लिए बचाव अभियान चलाए हैं.
इनमें पहला मौका साल 1990 के अगस्त महीने में आया जब इराक़ ने कुवैत पर कब्ज़ा किया था. इसके बाद साल 2006 के लेबनान युद्ध में भारत ने भारतीय और श्रीलंकाई नागरिकों को बचाने के लिए "ऑपरेशन सुकून" चलाया था. साल 2011 में हुए लीबियाई युद्ध के दौरान भारत ने 1,10,000 नागरिकों को "ऑपरेशन सेफ़ होम कमिंग" के तहत बचाया था.
कुवैत से कैसे बचाए गए थे भारतीय
इराक़ ने साल 1990 के अगस्त महीने की दो तारीख़ को अपनी दक्षिण पूर्व सीमा से कुवैत पर हमला बोला था. उस वक़्त लगभग दो लाख भारतीय कुवैत में रह रहे थे. इस दौर में भारत के इराक़ के साथ अच्छे संबंध थे. ऐसे में भारतीय नागरिकों को इराक़ी सेना से किसी तरह का जोखिम नहीं था.
लेकिन पैसे, खाने और दवाइयों की कमी के चलते भारतीय नागरिक अपने मुल्क भारत लौटना चाहते थे. उस समय वीपी सिंह भारत के प्रधानमंत्री हुआ करते थे और उनकी सरकार में विदेश मंत्री इंद्र कुमार गुजराल थे.
ये समस्या खड़ी होने के बाद इंद्र कुमार गुजराल ने इराक़ी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन से मुलाक़ात की. इस बैठक में सद्दाम हुसैन ने भारतीय नागरिकों को कुवैत से निकालने की इजाज़त दे दी.
लेकिन अमेरिका ने कुवैत के आसपास वाले जलक्षेत्र में किसी भी तरह की गतिविधि पर प्रतिबंध लगाया हुआ था. वहीं, दूसरी ओर इराक़ ने विमानों की लैंडिंग पर प्रतिबंध लगाया हुआ था. सिर्फ ज़रूरी सामान लाने वाले विमानों को बग़दाद और कुवैत में उतरने की इजाज़त थी.
चूंकि भारत सरकार समुद्री रास्ते से भारतीय नागरिकों को बचाना चाहती थी, ऐसे में अमेरिकी प्रतिबंध एक बड़ी समस्या थी.
लेकिन इसके बावजूद भारत ने एक योजना बनाई जिसके तहत 1.20 लाख से ज़्यादा भारतीयों को बसों के ज़रिए रेगिस्तानी इलाकों में 1120 किलोमीटर का सफर तय कराकर जॉर्डन लाया गया.
इन लोगों को जॉर्डन में तात्कालिक रूप से रुकने दिया गया जिसके बाद उन्हें अम्मान और फिर मुंबई लाया गया.
ये उन दिनों की बात है जब एयर इंडिया के पास कमर्शियल इस्तेमाल के लिए सिर्फ बोइंग 747 विमान थे. ऐसे में इंडियन एयरलाइंस द्वारा खरीदे गए एयरबस ए320 विमानों को इस्तेमाल करने का फ़ैसला किया गया.
लेकिन इंडियन एयरलाइंस ने जिन दो एयरबस ए 320 विमानों को ख़रीदा था, उनमें से एक विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया था. ऐसे में बचे हुए एक विमान से ये बचाव अभियान चलाया गया.
इसके बाद अगले दो महीनों तक एयरबस ए320 ने लगातार प्रतिदिन 16-17 घंटों की उड़ान भरी. अक्टूबर के अंत तक 448 चक्कर लगाए गए. और खाड़ी क्षेत्र से 1,11,000 भारतीय नागरिकों को निकाला गया.
उस दौर में यह सबसे बड़ा हवाई बचाव अभियान था जिसमें हज़ारों डॉलर का ख़र्च आया था. इस मिशन को वीपी सिंह, आईके गुजराल और नागरिक उड्डयन मंत्री आरिफ़ ख़ान ने मिलकर चलाया था.
लेकिन प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने कहा था कि "पूरा श्रेय इंद्र कुमार गुजराल को जाता है."
ये भी पढ़ें -
ऑपरेशन सुकून - लेबनान युद्ध
साल 2016 की 12 जुलाई को हिज़बुल्लाह ने ज़ारित गांव के पास स्थित एक इसराइली सैन्य अड्डे पर हमला बोल दिया. इसे ज़ारित-शतुला घटना के नाम से जाना जाता है.
इसी बीच एक अन्य हिज़बुल्लाह ग्रुप ने इसराइल में घुसकर दो सैन्य वाहनों पर हमला बोल दिया और तीन इसराइली सैनिकों को बंदी बना लिया. हिज़बुल्लाह ने इन तीनों सैनिकों के बदले समीर कुंतर को छोड़ने की मांग उठाई.
और इस घटना के साथ ही लेबनान युद्ध शुरू हो गया.
जैसे-जैसे युद्ध आगे बढ़ रहा था, वैसे-वैसे दोनों पक्षों की भारी जनहानि हो रही थी. उस समय पर लेबनान में लगभग 10,000 भारतीय नागरिक थे. और लगभग 2000 भारतीय लोग बुरी हालत में थे.
नेपाल और श्रीलंका जैसे देशों ने भी अपने लोगों को बचाने के लिए निवेदन किया. इस दौर में भारत के प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह थे. ऐसे में 18 जुलाई को विदेश सचिव और नेवी जनरल के साथ एक बैठक हुई.
लगभग इसी समय भारतीय नौसेना की 54वीं टास्क फोर्स भूमध्यसागर से भारत वापस आ रही थी. इस टास्क फोर्स में डिस्ट्रॉयर आईएनएस मुंबई, फ्रिगेट आईएनएस ब्रह्मपुत्र, आईएनएस बेतवा और फ्लीट टैंकर आईएनएस शक्ति शामिल था.
ये फ़्लीट स्वेज़ नहर के पास पहुंच रही थी. और स्वेज़ नहर के अंदर जाने के बाद उसे लेबनान पहुंचने में काफ़ी वक़्त लगता. ऐसे में तत्काल फैसले लिए गए, फ़्लीट से संपर्क किया गया और लेबनान जाने के आदेश जारी किए गए ताकि भारतीय नागरिकों को बचाया जा सके.
इन लोगों को जहाज़ के ज़रिए साइप्रस लाने की योजना बनाई गई ताकि वहां से विमानों की मदद से उन्हें भारत लाया जा सके. उस समय तक एयर इंडिया की फ़्लाइट साइप्रस नहीं जाती थी. ऐसे में साइप्रस एयरपोर्ट पर एयर इंडिया के विमान को उतरने की इजाज़त नहीं मिली. साइप्रस के साथ बातचीत शुरू की गयी जिसके बाद भारतीय विमानों के लिए एक विशेष एयर स्ट्रिप दी गयी.
आईएनएस मुंबई ने 20, 23 और 26 जुलाई को तीन चक्करों में 1495 लोगों को बचाया. और 23 जुलाई को आईएनएस ब्रह्मपुत्र ने 188 लोगों और आईएनएस बेतवा ने 254 लोगों को बचाया. आईएनएस शक्ति ने इन जहाजों को ईंधन उपलब्ध कराया.
कुल मिलाकर 2280 लोगों को बचाया गया जिनमें 1794 भारतीय, 112 श्रीलंकाई और 64 नेपाली नागरिक थे. भारतीयों से शादी करने वाले लेबनानी लोगों को भी बचाया गया.
जब अन्य सहयोगी देशों ने अपने नागरिकों को बचाने के लिए निवेदन किया तो उन्हें भी बचाया गया. यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद भारतीय नौसेना द्वारा चलाया गया सबसे बड़ा बचाव अभियान था.
ये अभियान पूरा होने के बाद भी टास्क फोर्स फ़्लीट युद्ध ख़त्म होने तक लेबनानी जलक्षेत्र में रुकी रही ताकि भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके. इसे भारत का सबसे बेहतरीन बचाव अभियान माना जाता है.
ये भी पढ़ें -
ऑपरेशन होम कमिंग- 2011 का लीबियाई गृह युद्ध
साल 2011 की 15 फरवरी को उत्तरी अफ़्रीका के देश लीबिया में राष्ट्रपति मुअम्मर गद्दाफ़ी के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन शुरू हुए जिन्होंने गृह युद्ध की शक्ल अख़्तियार कर ली.
इस गृह युद्ध के दौरान लगभग 18000 भारतीय लीबिया में रह रहे थे. और त्रिपोली एयरपोर्ट में काफ़ी ज़्यादा असमंजस और अफ़रा-तफ़री का माहौल था. एक अन्य अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट बेनिना में रनवे क्षतिग्रस्त हो गया था.
ऐसे में 26 फरवरी को दो डिस्ट्रॉयर जहाज़ आईएनएस मैसूर और आईएनएस आदित्य एवं आईएनएस जलाश्व को भारतीय लोगों को बचाने भेजा गया.
भारत सरकार ने दो कमर्शियल जहाज़ों स्कोटिया प्रिंस और 1600 सीटों वाले ला सुपर्बा की भी सेवाएं लीं, और दो दिनों के अंदर स्कोटिया प्रिंस लीबियाई बंदरगाह बेंगाज़ी पहुंच गया.
इन जहाजों ने बेनगाज़ी और त्रिपोली से भारतीय लोगों को निकालकर अलेक्ज़ेंड्रिया पहुंचाया जहां से एयर इंडिया की फ़्लाइट से उन्हें भारत लाया गया.
इस पूरे अभियान का ख़र्च भारत सरकार ने उठाया और यात्रियों से किसी तरह का किराया नहीं लिया गया.
त्रिपोली एयरपोर्ट पर विमान उतारने की इजाज़त मिलने के बाद 500 यात्रियों को बचाया गया. और सभा एवं सिर्ते एयरपोर्ट से एक-एक हज़ार भारतीय लोगों को निकाला गया.
कुछ अन्य भारतीय मिस्र की सीमा तक पैदल चलकर पहुंचे जिसके बाद भारतीय अधिकारियों ने उन्हें हवाई यात्रा के माध्यम से मुंबई पहुंचने में मदद की.
और 15000 भारतीय लोगों को बचाने के बाद 11 मार्च को ये अभियान पूरा हुआ.
ऑपरेशन राहत- यमन युद्ध
साल 2015 में 27 मार्च को अरब देशों के सैन्य गठबंधन ने यमन में घुसकर हूती विद्रोहियों पर हमला बोल दिया. इससे पहले ही यमन के बड़े हिस्से पर विद्रोहियों ने कब्ज़ा कर लिया था.
हालांकि, विदेश मंत्रालय ने 21 जनवरी को ही भारतीय नागरिकों से यमन छोड़ने का आग्रह किया था. लेकिन अरब सेनाओं के हमले के दौरान यमन में 5000 भारतीय मौजूद थे.
चूंकि ये एक नो-फ़्लाई ज़ोन था, ऐसे में बचाव अभियान समुद्री रास्ते से चलाया गया. इस अभियान की शुरुआत मे नौसेना के पांच जहाज़ों को लगाया गया था.
लेकिन लोगों के जिबूती पहुंचने के बाद यात्रियों को भारतीय वायु सेना के कारगो एयरक्राफ़्ट से भारत लाया गया.
इसके बाद ऑपरेशन के अगले कुछ दिनों में 4640 भारतीय और 960 विदेशी नागरिकों को बचाया गया. यह ऑपरेशन 11 अप्रैल को पूरा हुआ.
इस दौरान 200 भारतीय नागरिक यमन नहीं छोड़ना चाहते थे. इस बचाव अभियान पर एक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म भी बनाई गई है.
ये भी पढ़ें -
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)