अनीरा कबीर: एक ट्रांसजेंडर महिला जिन्होंने सिस्टम को झुकने पर किया मजबूर

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पिछले साल नवंबर में अनीरा कबीर नौकरी के लिए इंटरव्यू देने गई थीं. यह पिछले दो महीने में उनका 14वाँ इंटरव्यू था. अनीरा ने एक टोपी और मास्क पहना था जिनसे उनके चेहरे का ज़्यादातर हिस्सा छुप गया था.
35 साल की अनीरा ट्रांसजेंडर महिला हैं. उन्होंने कहा कि इंटरव्यू में ऐसा उन्होंने ट्रांसजेंडर महिलाओं के साथ होने वाली दिक़्क़तों से बचने के लिए किया था. इससे पहले के इंटरव्यू में अनीरा कई परेशानियां झेल चुकी थीं.
अनीरा को दक्षिण भारतीय राज्य केरल के एक सरकारी स्कूल में अस्थायी नौकरी मिली. लेकिन उनका आरोप है कि उन्हें दो महीने से भी कम समय में ग़लत तरीक़े से हटा दिया गया.
स्कूल के प्रिंसिपल ने इस मामले में कोई भी टिप्पणी से इनकार किया है. ज़िला अधिकारी पी कृष्णन का कहना है कि प्रिंसिपल ने उन्हें सूचित किया है कि अनीरा कबीर को हटाया नहीं गया है बल्कि वह चीज़ों को ग़लत समझ बैठीं.

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अनीरा कबीर ने जनवरी में सरकार से क़ानूनी मदद के लिए संपर्क किया. वह एक वकील चाहती थीं ताकि इच्छामृत्यु के लिए वो याचिका दायर कर सकें. अनीरा कबीर कहती हैं, ''मैं काम कर अपना गुज़र-बसर करना चाहती हूँ, लेकिन ये भी नामुमकिन हो गया है.''
अनीरा कबीर ने उन देशों के बारे में पढ़ा है जहाँ इच्छामृत्यु की अनुमति है, लेकिन भारत में केवल पैसिव यूथेनेसिया (इच्छामृत्यु) की अनुमति है. पैसिव यूथेनेसिया का मतलब है कि एक मरीज़ ऐसी बीमारी से पीड़ित है कि उसे बचाया नहीं जा सकता और उसे कृत्रिम सपोर्ट जैसे वेंटिलेटर या फ़ीडिंग ट्यूब के सहारे रखा गया है. इस हालत में लाइफ़ सपोर्ट हटाने पर और उसे जारी रखने पर बहस होती है. ऐसे में मरीज़ के पास अधिकार होता है कि वह मशीन हटाने के लिए सहमति दे. इसे ही पैसिव यूथेनेसिया कहते हैं.
अनीरा कहती हैं, ''मुझे पता है कि इच्छामृत्यु के लिए क़ानून से अनुमति नहीं मिलेगी. लेकिन मैं इस मामले में एक संदेश देना चाहती थी.''

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अनीरा का संघर्ष
अनीरा कबीर चाहती थीं कि इस मामले में सरकार का ध्यान जाए और उन्हें यह करने में सफलता मिली. सरकार ने तत्काल प्रतिक्रिया दी और अनीरा को दूसरी नौकरी मिली.
अनीरा कबीर इस मामले में बिल्कुल स्पष्ट थीं. वह अपना जीवन नष्ट नहीं करना चाहती थीं. उन्होंने जो किया वह न केवल दूसरों के लिए मिसाल है बल्कि इस तरह का विरोध भारत में सामान्य बात नहीं है.
सालों से भारतीय लोग इंसाफ़ और व्यवस्था में बदलाव के लिए भूख हड़ताल, कई दिनों तक कमर से ऊपर पानी में खड़ा रहना और ज़िंदा चूहों को मुँह से पकड़ने जैसा विरोध करते रहे हैं.
समाज विज्ञानियों का कहना है कि महात्मा गांधी की अहिंसात्मक सविनय अवज्ञा की विरासत में लंबी भूख हड़ताल शामिल है, लेकिन भारत जैसे देश में सरकारें इसकी उपेक्षा करती हैं. हैदराबाद यूनिवर्सिटी में अनघा इंगोला राजनीतिक विज्ञान पढ़ाती हैं. वह कहती हैं कि अनीरा कबीर का इरादा सरकार को ये बताना था कि वह अपने वादे पूरे करने में नाकाम रही है.
वह कहती हैं, ''इस मामले में सरकार किसी के काम करने के अधिकार को सुरक्षा देने में नाकाम रही.'' इंगोला ने सामाजिक भेदभाव को लेकर कई काम किए हैं.

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भारत में एक अनुमान के अनुसार, क़रीब 20 लाख ट्रांसजेंडर लोग हैं. हालांकि एक्टिविस्टों का कहना है कि यह तादाद और ज़्यादा है. 2014 में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला दिया था कि ट्रांसजेंडर लोगों के अधिकार भी बाक़ियों की तरह ही हैं.
हालाँकि भारत में ट्रांसजेंडर अब भी शिक्षा और स्वास्थ्य तक अपनी पहुँच के लिए संघर्ष कर रहे हैं. इनमें से ज़्यादातर को भिखारी और यौनकर्मी बनने पर मजबूर किया जाता है.
अनीरा कबीर कहती हैं कि ट्रांसजेंडर समुदाय को राजनीतिक प्रतिनिधित्व और नौकरियों में आरक्षण की ज़रूरत है.
वह कहती हैं, ''मैं कभी इच्छामृत्यु जैसा क़दम नहीं उठाना चाहती लेकिन हमारे पास विकल्प क्या है?'' सेंट्रल केरल के पलक्कड ज़िले में पली-बढ़ी अनीरा कबीर कहती हैं कि जन्म के आधार पर जो लैंगिक पहचान उन्हें दी गई, उसे लेकर वह सालों तक जूझती रहीं.

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झुकी सरकार
अनीरा अपने परिवार के बारे में बात नहीं करना चाहती हैं. उन्होंने कहा कि अभी उनके भाई की मौत हुई है और परिवार इस दुख से उबरा भी नहीं है.
पलक्कड़ ज़िले में अनीरा ने जब और ट्रांसजेंडर लोगों को खोजना शुरू किया तब वह टीनेजर ही थीं. लेकिन इसी कोशिश में उनकी गिरफ़्तारी हुई और तब से उन्होंने यह करना बंद कर दिया.
यहाँ तक कि एक अख़बार में ट्रांसजेंडर लोगों की तस्वीर देख वह बेंगलुरु के अपने घर से भाग गई थीं. तभी उनका संपर्क ट्रांसजेंडर समुदाय से हुआ. लेकिन ज़िंदगी की मुश्किलें तब भी कम नहीं हुईं. ट्रांसजेंडर समुदाय में से ज़्यादातर लोग सालों तक 'जेंडर रीअसाइनमेंट सर्जरी' के लिए भीख मांग पैसे जुटाते रहते हैं. जब कबीर वापस घर आईं तो काफ़ी निराश थीं.
वह कहती हैं, ''मेरा परिवार जैसा चाहता था, उस तरह से मैंने जीने की बहुत कोशिश की.''
अनीरा कहती हैं, ''मेरे आसपास के लोगों ने कहा कि सिगरेट पीने, जिम जाने और पर्सनैलिटी डिवेलपमेंट कोर्स के ज़रिए वो 'मर्दाना' बन जाएंगी.'' लेकिन यह सब दिखावा कर उन्होंने ख़ुद को दुखी नहीं किया.
अनीरा कबीर ने बहुत मुश्किल से पढ़ाई की. उन्हें बच्चों को पढ़ाने में अच्छा लगता था और जब वह स्टूडेंट थीं, तब से ही यह काम करती थीं. वह पड़ोस के बच्चों को पढ़ाती थीं. घर छोड़ने के बाद भी वह मनचाहा जीवन जीने के लिए संघर्ष करती रहीं.

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अनीरा कबीर के पास मास्टर की तीन डिग्रियाँ हैं. एक टीचिंग ट्रेनिंग की ड्रिग्री भी है. उन्होंने सीनियर स्कूल में बच्चों को पढ़ाने के लिए एक राज्य की परीक्षा भी निकाली. लेकिन इंटरव्यू के दौरान उनसे असहज करने वाले सवाल पूछे जाते थे.
इंटरव्यू के दौरान एक व्यक्ति ने उनसे पूछा था कि वह छात्रों को कामुक नज़रिए से नहीं देखेंगी, इसका क्या भरोसा है?
अनीरा कहती हैं, ''मैं नौकरियों के लिए होने वाली परीक्षा में पास हो गई थी और उनके लिए योग्य थी.'' उनकी नियुक्ति सामाजिक विज्ञान की एक जूनियर शिक्षक के तौर पर हुई. यह अस्थायी पद था. अनीरा ने बताया कि उन्होंने अपने ट्रांसजेंडर होने की बात स्कूल के एक अधिकारी को बताई.
अनीरा कहती हैं, ''मैंने उनसे कहा कि मैं एक ट्रांस वुमन हूँ और इंटरव्यू में इस तरह से आने के लिए माफ़ी मांगी. मैंने उनसे कहा कि बिना नौकरी के मैं घर का रेंट भी नहीं दे सकती हूँ.''

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जब अनीरा ने नवंबर 2021 में पढ़ाना शुरू किया तो उन्हें सहकर्मियों से उपेक्षा मिलनी शुरू हो गई. लेकिन वहाँ के स्टूडेंट अच्छे थे.अनीरा कबीर कहती हैं, ''मुझे अचानक से कहा गया कि मैं छह जनवरी से स्कूल ना आऊं. मुझे नौकरी से निकाल दिया गया. यह नियम के ख़िलाफ़ था.''
नौकरी जाने की वजह से अनीरा कबीर एकदम से घबरा गईं. वह स्कूल के पास दुकानों में गईं और उन्होंने सेल्सपर्सन का काम मांगा. लेकिन किसी ने काम नहीं दिया.
इसी दौरान उन्होंने क़ानूनी मदद के लिए संपर्क किया. यह ख़बर वायरल हो गई और केरल के शिक्षा मंत्री ने इस पर तत्काल प्रतिक्रिया दी. उन्होंने कहा, ''मैंने कबीर से मुलाक़ात की है और उन्होंने पलक्कड के एक सरकारी दफ़्तर में दूसरी अस्थायी नौकरी शुरू कर दी है.''
लेकिन अनीरा की तरह कई अब भी मदद के इंतज़ार में हैं.

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इंसाफ़ के लिए लंबी राह
2018 में शानवी पोन्नुसामी ने भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को पत्र लिखा था. उन्होंने भी इस पत्र में इच्छामृत्यु की अनुमति मांगी थी. पिछले साल उन्होंने भारत के सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाख़िल की थी.
उन्होंने आरोप लगाया था कि एयर इंडिया में नौकरी देने से इनकार कर दिया गया था. एयर इंडिया में ट्रांसजेंडर स्टाफ़ की नियुक्ति के लिए कोई नीति नहीं थी. महीनों तक सरकार और एयर इंडिया ने इस याचिका पर जवाब नहीं दिया था. बाद में एयर इंडिया ने शानवी की याचिका को झूठा बताया था और मानहानि का मुक़दमा दर्ज करने की धमकी दी थी.
यह मामला अदालत में खिंचता गया और इस दौरान वह अपनी बचत ख़र्च करती रहीं. बाद में उन्होंने राष्ट्रपति को पत्र लिखा. उनके लिए अब क्या बदला? शानवी कहती हैं- ''कुछ भी नहीं. उन्हें कोई जवाब नहीं मिला और एयर इंडिया को अब निजी कंपनी टाटा ने ख़रीद लिया है. इससे उनकी नौकरी की संभावना और कम हो गई है.''
लेकिन शानवी ने मद्रास हाई कोर्ट में एक याचिका दाख़िल की है और उन्होंने क़ानूनी लड़ाई में हुए ख़र्च के मुआवज़े की मांग की है. शानवी कहती हैं, ''अगर इस तरह का सिस्टम हो तो लोग कैसे गुज़र-बसर कर पाएंगे?''
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