गलवान को लेकर चीन इतना आक्रामक क्यों है?

    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली

भारत और चीन की सेना के बीच सीमा पर तनाव की शुरुआत वर्ष 2020 के मई महीने में हुई, जब पूरा विश्व कोरोना की पहली लहर की चपेट में आ चुका था.

इसके बाद तनाव और भी बढ़ता गया और उसे कम करने के प्रयासों के भी कई दौर अभी तक चलते ही आ रहे हैं.

लेकिन हाल में 'पैंगॉन्ग त्सो' में कथित निर्माण कार्य और गलवान घाटी में अपना झंडा फहराने को लेकर दोनों देशों की ओर से दावे प्रतिदावे किए जा रहे हैं.

इसको लेकर कूटनीतिक और राजनीतिक हलकों में चर्चा भी हो रही है.

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इन सब घटनाओं पर भारत में भी बहस छिड़ी हुई है. कांग्रेस और विपक्षी दल मोदी सरकार को घेरने की कोशिश कर रहे हैं.

'ऐतिहासिक तीसरे कार्यकाल' के लिए उतरेंगे जिनपिंग

चीन में 'नेशनल पीपल्स कांग्रेस' इसी वर्ष होनी है. जानकार कहते हैं कि ये साल, यानी 2022, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के लिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी साल वो 'ऐतिहासिक तीसरे कार्यकाल' के लिए मैदान में उतरेंगे.

हालांकि पिछले साल नवंबर में ही चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने अपने सौ साल पूरे होने पर सत्ता की कमान संभाले रखने के लिए निर्धारित दो कार्यकालों की सीमा को समाप्त तो किया ही था, साथ ही 'सेंट्रल मिलिट्री कमीशन' यानी देश की सेना की बागडोर भी जिनपिंग के हाथों में सौंप दी थी.

लेकिन लंदन स्थित 'किंग्स कॉलेज' में अंतरराष्ट्रीय मामलों के विभागाध्यक्ष हर्ष वी पंत ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि तीसरे कार्यकाल के लिए जाना शी जिनपिंग के लिए भी काफ़ी मायने रखता है.

वो कहते हैं, "ये उतना आसान भी नहीं है क्योंकि शी जिनपिंग पर पहले ही काफ़ी दबाव बन चुका है. कम्युनिस्ट पार्टी के अंदर भी और देश में भी. उन्हें अपने आलोचकों को शांत भी करना होगा और देश के लोगों के बीच भी अपनी छवि एक राष्ट्रवादी नेता के रूप में मज़बूत करनी होगी. ये 'नेशनल पीपल्स कांग्रेस' से पहले उनके सामने सबसे बड़ी चुनौतियाँ हैं."

पंत साथ ही बताते हैं कि न सिर्फ़ अपने देश, बल्कि शी जिनपिंग के सामने अपने अंतरराष्ट्रीय सहयोगी देशों के बीच भी अपनी पैठ बनाए रखने या उसे और भी ज़्यादा मज़बूत बनाने की चुनौती भी है.

क्या ठीक नहीं हैं चीन के घरेलू हालात?

विदेश और सामरिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेल्लानी ने अपना एक लेख ट्वीट किया है, जिसमें उनका कहना है कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी पहले से ही 'अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों को ताक पर' रखती आ रही है.

वो लिखते हैं कि 'शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीन ने कमज़ोर देशों की संप्रभुता को भी प्रभावित करने की कोशिश की है. यहाँ तक कि लिथुआनिया जैसे दशों को चीन में अपने दूतावासों को बंद' करने तक के लिए मजबूर कर दिया गया.

चेल्लानी के अनुसार चीन एकमात्र ऐसा देश है, जिसने व्यापार को भी 'वेपनाइज़' यानी उसका इस्तेमाल भी हथियार की तरह किया है. वो ताइवान की तरफ़ संकेत देते हुए कहते हैं कि जिन देशों ने ताइवान के साथ बेहतर सबंध या व्यापारिक संबंध बनाए रखे, चीन ने उन देशों को भी अपने निशाने पर रखा हुआ है.

भारत का रुख़

इस बीच भारत में चुनावी माहौल के बीच राजनीतिक हलकों में भी चीन की चर्चा हो रही है. कांग्रेस सहित विपक्ष की पार्टियाँ सवाल उठा रहीं कि चीन वर्ष 2020 के मई महीने से लगातार आक्रामक तेवर अपनाए हुए है, लेकिन सरकार की तरफ़ से कड़ी प्रतिक्रिया क्यों हैं आ रही है?

उस पर पंत कहते हैं कि भारत का जो अब तक का रुख है वो सामरिक रूप से ठीक ही है. हालांकि, वो ये तो मानते हैं कि गलवान और पैंगॉन्ग त्सो की घटनाएँ ऐसी थीं, जिन पर कड़ी प्रतिक्रिया होनी चाहिए थीं.

पंत ये भी कहते हैं कि अगर चीन सरहद के पास अपने इलाक़ों में पुल या हेलीपैड बना रहा है, तो भारत उसमें क्या कर सकता है.

वो कहते हैं, "अभी तक भारत अपनी सैन्य क्षमताओं के हिसाब से ही कार्रवाई करता रहा है जो इसलिए भी ठीक है कि चीन के साथ सरहद पर माहौल ज़्यादा ख़राब नहीं हो रहा है और इसी बीच भारत चीन के साथ पैदा होने वाले तनाव को कम भी कर रहा है."

हालांकि भारत में विपक्षी दल इसको लेकर सरकार की आलोचना कर रहे हैं और उनका आरोप है कि भारत सरकार चीन के आक्रामक क़दमों का जवाब नहीं दे रही.

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