गीतांजलि एल्बम: परवीन शाकिर का शायरी संग्रह, जिसके छपने से पहले उनकी मौत हो गई

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- Author, अक़ील अब्बास जाफ़री
- पदनाम, शोधकर्ता और इतिहासकार, कराची
यह साल 1982 की बात है जब भारत की 16 साल की एक लड़की गीतांजलि की कविताओं का एक संग्रह लंदन से प्रकाशित हुआ.
गीतांजलि का जन्म 12 जून, 1961 को मेरठ में हुआ था. बहुत ही कम उम्र में, उन्हें पता चला कि उन्हें कैंसर है, जिसका तब कोई इलाज नहीं था.
गीतांजलि ने इस बीमारी से लड़ना शुरू किया, लेकिन दिन-ब-दिन उन्हें एहसास होता गया कि उनकी ज़िंदगी के अब थोड़े ही दिन बचे हैं.
इस सच्चाई का पता चलने के बाद, उन्होंने अपनी भावनाओं को कविता के रूप में लिखना शुरू कर दिया. उन्होंने इन कविताओं के लिए अंग्रेज़ी भाषा को चुना. बहुत ही कम समय में उन्होंने 100-150 कविताएं लिख दीं.
इसी बीमारी के चलते 11 अगस्त, 1977 को गीतांजलि की मृत्यु हो गई. गीतांजलि की मृत्यु के बाद, उनकी माँ ख़ुशी बदरुद्दीन ने 'इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ़ इंडिया' के संपादक एमवी कामत से संपर्क किया और गीतांजलि की ये कविताएं उन्हें सौंप दीं.
एमवी कामत ने ये कविताएं पत्रिका के कविता विभाग के निर्देशक प्रीतीश नंदी को भेज दीं.
प्रीतीश नंदी कहते हैं कि "मैं कलकत्ता में रहा करता था, जहां मुझे गीतांजलि की ये कविताएं मिलीं. इन कविताओं को देखकर मैं हैरान रह गया. मैंने इन कविताओं को इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ़ इंडिया में बहुत ही ज़िम्मेदारी से प्रकाशित किया. इनके छपने के बाद पाठकों की चिट्ठियों का ढेर लग गया."

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उन पाठकों में एक चाय व्यापारी गॉर्डन फ़ॉक्स भी थे, जिन्होंने प्रीतीश नंदी से संपर्क किया और गीतांजलि की कविताओं को क़िताब के रूप में प्रकाशित करने की पेशकश की.
गॉर्डन फ़ॉक्स तो इस क़िताब को प्रकाशित नहीं कर सके, लेकिन 1982 में एक ब्रिटिश प्रकाशक इस क़िताब को प्रकाशित करने में सफल रहे. इस क़िताब में गीतांजलि की 110 कविताएं थीं. कुछ समय बाद यह किताब भारत से भी प्रकाशित हुई.
भारत से प्रकाशित होने वाली ये क़िताब 'पोएम्स ऑफ़ गीतांजलि' पाकिस्तान के एक प्रमुख शोधकर्ता और विद्वान अहमद सलीम तक जा पहुंची. यह 90 के दशक के शुरू की बात थी. उस समय इमरान ख़ान ने शौक़त ख़ानम कैंसर अस्पताल की आधारशिला रखी थी. अहमद सलीम ने इन कविताओं का उर्दू में गद्य अनुवाद किया.
उन्होंने फ़ैसला किया कि इस गद्य अनुवाद को शायरी की शक्ल दी जाए और क़िताब के प्रकाशन से जो कमाई होगी, उसे शौक़त ख़ानम कैंसर अस्पताल के फ़ंड में दान कर दिया जाए.
इसके अनुवाद को शायरी में ढालने के लिए अहमद सलीम ने परवीन शाकिर से संपर्क किया. अहमद सलीम कहते हैं कि "जब मैंने उन्हें गीतांजलि की कविताओं का भारतीय संस्करण भेजा, तो कुछ दिनों बाद उनका फ़ोन आया कि वो इन कविताओं का अनुवाद ज़रूर करेंगी. यह मौत के ख़िलाफ़ जीवन का एक मोर्चा था. परवीन शाकिर ने कैंसर से मरने वालों के लिए गीतांजलि के लिखे मौत के ख़िलाफ़ जीवन के ज्ञान को लोगों तक पहुंचाने का ज़िम्मा अपने हाथों में ले लिया था."
अहमद सलीम ने लिखा, "हम दोनों इस बात पर सहमत थे कि सभी कविताओं का अनुवाद न किया जाए, बल्कि उर्दू में एक ऐसा चयन प्रकाशित होना चाहिए, जो पूरे संग्रह की भावना को व्यक्त करे. ज़्यादातर कविताओं के चयन पर हमारे बीच कोई मतभेद नहीं हुआ. मैंने भी कुछ कविताओं का अनुवाद किया था. परवीन की इच्छा थी कि इन अनुवादों को इस संग्रह में शामिल न किया जाए बल्कि मैं गीतांजलि की डायरी और क़िताब के अन्य गद्य भागों का अनुवाद कर लूं."

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गीतांजलि की अंग्रेज़ी कविताओं का एक संग्रह
अहमद सलीम ने गीतांजलि की माँ ख़ुशी बदरुद्दीन से भी संपर्क किया, जिन्होंने यह सुनकर कि क़िताब से होने वाली पूरी कमाई शौक़त ख़ानम कैंसर अस्पताल को दान कर दी जाएगी, ख़ुशी-ख़ुशी इसके प्रकाशन की अनुमति दे दी.
परवीन शाकिर ने जल्द ही कविताओं के अनुवाद का और अहमद सलीम ने गद्य भागों के अनुवाद का काम पूरा कर लिया. जब क़िताब की कंपोज़िंग शुरू हुई, तो अचानक ही 26 दिसंबर, 1994 को परवीन शाकिर की एक सड़क दुर्घटना में मौत हो गई.
परवीन शाकिर की मृत्यु के बाद, उनकी क़िताब के सारे अधिकार 'परवीन शाकिर ट्रस्ट' के पास आ गए. उस ट्रस्ट ने उनकी पहली बरसी पर 'गीतांजलि एल्बम' के नाम से इस किताब को प्रकाशित किया.
क़िताब के कवर पेज पर गीतांजलि और परवीन शाकिर की तस्वीरें छापी गईं. गीतांजलि का निधन 16 साल की उम्र में हुआ था, इसलिए परवीन शाकिर की भी ऐसी ही तस्वीर ली गई, जो 16 साल की उम्र में ली गई थी. इस कवर को जमाल शाह ने डिज़ाइन किया था.
अहमद सलीम ने क़िताब के परिचय में लिखा, "जब परवीन शाकिर इन कविताओं का अनुवाद कर रही थीं, तो यह ज़िंदगी से मुलाक़ात का एक नया रोज़नामा था. परवीन के दिमाग़ में और मेरे दिमाग़ में भी एक बात साफ़ थी कि यह क़िताब मौत के ख़िलाफ़ ज़िंदगी के संघर्ष पर लिखी गई है. परवीन शाकिर की तमन्ना थी कि ये कविताएं एक सैनिक की तरह, एक ज्ञान की तरह मौत के सामने आएं और उसे हराएं. मौत के ख़ौफ़, उसके दबदबे, उसकी ख़ूनी रात के लिए एक चुनौती बन जाएं."
"परवीन शाकिर ने क्रांति की शायरी नहीं की, लेकिन उनकी शायरी में भी और इन अनुवादों में भी जीवन के समर्थन में उनका लहज़ा फ़ीका नहीं पड़ता. यही वो अहसास था, जिसने मुझे इस क़िताब को छापने के लिए प्रेरित किया. परवीन ने एक बार इन कविताओं के बारे में कहा था कि उन्होंने इतनी कम उम्र में जीवन की इतनी तड़प पहले कभी नहीं देखी."
गीतांजलि एल्बम की एक कविता:
हर शाम
जब दोनों वक़्त मिलते हैं
मैं अपनी खिड़की से
डूबते हुए सूरज को देखती हूँ!
जब रौशनी
धीरे-धीरे मद्धम पड़ जाती है
और लम्हे ख़ामोश और तन्हा होने लगते हैं
मेरा दिल भी
मेरी रूह के अंदर
डूब जाता है!
क्योंकि मैं नहीं जानती
कि सूरज की यह सज-धज
मैं दोबारा देख भी सकूंगी या नहीं!
डॉक्टर सुल्ताना बख़्श ने भी अपनी क़िताब 'परवीन शाकिर: शख़्सियत और फ़न' में परवीन शाकिर के इन अनुवादों की समीक्षा की है.
उन्होंने लिखा कि अनुवाद करना बहुत कठिन है, अनुवादक को दोनों भाषाओं में महारत होनी चाहिए. एक वो भाषा, जिससे अनुवाद किया जा रहा है, दूसरी जिस भाषा में अनुवाद किया जा रहा हो.
ख़ुशक़िस्मती से, परवीन शाकिर को अंग्रेज़ी और उर्दू दोनों में महारत हासिल थी. उनकी उच्च शिक्षा और पश्चिमी साहित्य और भाषा के व्यापक अध्ययन ने इसमें उनकी मदद की. वह ख़ुद भी एक महान शायरा थीं.
"परवीन शाकिर के लिए गीतांजलि की अंग्रेज़ी कविताओं का उर्दू में अनुवाद करना आसान था. परवीन शाकिर द्वारा अनूदित कविताओं की ख़ूबी यह है कि वे अनूदित नहीं लगती बल्कि बिल्कुल ऐसी लगती हैं जैसे कि वो इसी भाषा में पहली बार लिखी गई हों. परवीन शाकिर ने गीतांजलि की 37 कविताओं का अनुवाद किया, जिनका विषय मौत या तन्हाई में मौत का इंतज़ार है."

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परवीन की मौत की भविष्यवाणी
रफ़ाक़त जावेद ने परवीन शाकिर पर लिखी अपनी क़िताब 'परवीन शाकिर जैसा मैंने देखा' में लिखा है कि "मृत्यु से कुछ समय पहले जब परवीन शाकिर मुंबई गई थीं, तो उन्होंने रफ़ाक़त जावेद के साथ चौहान नाम से एक मशहूर ज्योतिषी से मुलाक़ात की थी. उन्होंने परवीन शाकिर का हाथ देखकर उनके अतीत की कुछ बातें बताईं जो बिल्कुल सच थीं."
"उन्होंने भविष्यवाणी की थी कि उनका एक बहुत बड़ा एक्सीडेंट होगा, जिसमें उनका ड्राइवर मौक़े पर ही मारा जाएगा और यदि वो बच गईं तो अपने पैर खो देंगी. इस मुलाक़ात के बाद परवीन शाकिर ज़िंदगी को लेकर काफ़ी सीरियस हो गई थीं."
उन्होंने लिखा:
मौत की आहट सुनाई दे रही है दिल में क्यों,
क्या मोहब्बत से बहुत ख़ाली ये घर होने को है.
साल 1994 में जब परवीन शाकिर का संग्रह 'माह-ए-तमाम' प्रकाशित हुआ, तो लोगों ने इसके शीर्षक को अशुभ बताया और कहा कि माह-ए-तमाम के बाद तो ख़त्म होने की शुरुआत हो जाती है. यह वही समय था, जब परवीन शाकिर गीतांजलि की कविताओं का उर्दू में अनुवाद कर रही थीं.
अफ़सोस की बात ये है कि जब 'गीतांजलि एलबम' का मसौदा पूरा हुआ और क़िताब पूरी हुई, तो परवीन ज़िंदगी की जंग हार चुकी थी.
इस क़िताब का विमोचन परवीन शाकिर की पहली बरसी पर हुआ.
अहमद सलीम ने क़िताब की प्रस्तावना में लिखा कि "यदि यह क़िताब परवीन के जीवन में प्रकाशित होती, तो मैं इसे मौत के तारों से छेड़ा हुआ ज़िंदगी का गीत कहता. अब यह किताब ज़िंदगी के तारों से छेड़ा हुआ मौत का काला गीत बन गया है."
शायद गीतांजलि एलबम का दूसरा संस्करण अभी तक प्रकाशित नहीं हुआ और परवीन शाकिर के बहुत से प्रशंसक भी उनके इस शायरी के कारनामे से अनजान हैं.
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