आधार को वोटर आईडी से लिंक करने वाले बिल पर क्यों हो रहा है हंगामा, इससे क्या बदलेगा?

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- Author, कीर्ति दुबे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
मंगलवार को चुनाव कानून (संशोधन) बिल, 2021 राज्यसभा में पास हो गया. इस बिल में सबसे बड़ा बदलाव ये था कि आधार को वोटर आईडी से लिंक किया जाए, विपक्ष के जबरदस्त विरोध के बावजूद ये संशोधित बिल संसद के दोनों सदनों से पास हो चुका है.
सोमवार को इस बिल को क़ानून मंत्री किरेन रिजीजू ने लोकसभा में पेश किया महज 20 मिनट में ये बिल ध्वनिमत के साथ पारित कर दिया गया. दोपहर 2 बजकर 47 मिनट पर ये बिल पेश हुआ और 3:10 पर इसे परित कर दिया गया.
विपक्ष की मांग थी कि इस बिल को संसद की स्टैंडिंग कमेटी के पास भेजा जाए जहां इस बात की स्क्रूटनी की जाए कि क्या इस तरह आधार को वोटर आईडी से जोड़ना सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के मुताबिक़ निजता का हनन नहीं है.
लेकिन विरोध में उठ रही इन तमाम आवाज़ों के बावजूद ये बिल अब दोनों ही सदनों में पारित हो चुका है और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के साथ संशोधित कानून बन जाएगा.
क्या है ये विधेयक?
चुनाव कानून (संशोधन) बिल 2021 के तहत लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 में 'चुनाव सुधार' लाने के लिए कुछ संशोधन प्रस्तव रखे गए है. इनमें कुल चार बदलावों की बात कही गई है जिनमें सबस अहम है आधार को वोटर आईडी से लिंक करना.
पहला- अब मतदाता सूची में अपना नाम शामिल करने के लिए कोई भी व्यक्ति निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी के पास आवेदन करने जाता है तो अब निर्वाचन अधिकारी व्यक्ति से उसकी पहचान को वेरिफ़ाई करने के लिए उसका आधार मांग सकता है. अगर नाम पहले से ही मतदाता सूची में है तो भी अधिकारी आधार नंबर मांग सकता है ताकि व्यक्ति की एंट्री सत्यापित की जा सके.
हालांकि अगर कोई व्यक्ति आधार नहीं देता है तो उसका नाम मतदाता सूची से हटाया नहीं जाएगा, वह व्यक्ति केंद्र सरकार की ओर से जारी किए गए अन्य दस्तावेज या पहचान पत्र दिखा सकता है.

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जिसका मतलब है अब आपके आधार को वोटर आईडी के साथ लिंक कर दिया जाएगा. ताकि आपके बायोमेट्रिक डिटेल से आपकी मतदाता सूची में पहचान वेरिफ़ाई की जा सके.
इसके अलावा दूसरा संशोधन मतदान केंद्रों के परिसर को लेकर है, अब इन परिसर का इस्तेमाल मतगणना, मतदान मशीनों और मतदान संबंधी सामग्री को रखने और सुरक्षा बलों और कर्मियों के आवास के रूप में किया जा सकेगा.
तीसरे संशोधन में मतदाता सूची में नामांकन के लिए योग्यता तारीख को लेकर बदलाव किया गया है. अब तक अगर कोई शख़्स किसी साल के 1 जनवरी के बाद 18 साल का हो रहा है तो उसे मतदाता सूची में अपना नाम शामिल करनवाने के लिए अलगे साल की 1 जनवरी का इंतज़ार करना पड़ता है. अब साल में चार तारीख़ मतदाता सूची में नाम शामिल करने के लिए तय की गई हैं- 1 जनवरी (जो पहले से है), 1 अप्रैल, 1 जुलाई और 1 अक्टूबर. यानी साल में चार बार लोग मतदाता सूची में अपना नाम जुड़वा सकते हैं.
चौथा है जेंडर न्यूट्रल शब्द को लेकर किया गया बदलाव, संशोधन में जब 'वाइफ़' यानी पत्नी के जगह 'स्पाउस' शब्द का इस्तेमाल होगा.
ये हैं वो चार संशोधन हैं जो नए विधेयक में किए गए हैं. इनमें से पहले संशोधन यानी आधार को वोटर आईडी से लिंक करने का प्रावधान सबसे अहम है और विपक्षी पार्टियां और सामाजिक कार्यकर्ता इसका विरोध कर रहे हैं.

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विपक्ष को क्यों है आपत्ति?
विपक्ष मानता है कि इस बिल पर गहन चर्चा की ज़रूरत है इसलिए इसे संसद की स्टैंडिंग कमेटी के पास भेजा जाना चाहिए. जो इसके हर पहलू पर विस्तार से गंभीर चर्चा करे.
साथ ही इसके पारित किए जाने के तरीके पर भी आपत्ति जताई जा रही है. पर्टियों और कार्यकर्ताओं का मानना है कि इतने अहम बिल ध्वनिमत से पास कर देता कतई उचित नहीं है. ये ध्वनिमत तब हुआ जब वेल में खड़े होकर विपक्षी पार्टियों के सांसद नारेबाज़ी कर रहे थे.
लोकसभा में विपक्ष के नेता अधीर रंजन चौधरी ने इस बिल पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा, "हम इस बिल का विरोध करते हैं, इसे संबंधित स्टैंडिंग कमेटी को सौंपा जाए ताकि वो इसकी स्क्रूटनी करें. क्योंकि ये बिल लोगों के निजता के मौलिक अधिकार का हनन करता है. इससे मास डिसफ़्रैंचाइज़मेंट यानी बड़े स्तर पर वोटरों का नाम लिस्ट से गायब हो सकता है, इसलिए हम मांग करके हैं कि इसे स्टैंडिंग कमेटी को भेजा जाए."
वहीं कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने सदन में इसका विरोध करते हुए कहा कि आधार किसी के आवास का प्रमाण है ना कि नागरिकता का, हमारे देश में केवल नागरिकों को वोट देने का अधिकार है. अगर आप किसी से वोटर कार्ड के लिए आधार मांगेंगे तो किसी ग़ैर-नागरिक को भी मतदान का अधिकार देने का ख़तरा पैदा हो जाएगा.
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एआईएमआईएम नेता असदुद्दीन ओवैसी ने इसे सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लंघन बताते हुए कहा कि यह विधेयक इस सदन की विधायी क्षमता से बाहर है और पुट्टस्वामी केस में सुप्रीम कोर्ट की ओर से निर्धारित क़ानून की सीमाओं का उल्लंघन करता है. मतदाता पहचान पत्र को आधार से जोड़ने से पुट्टस्वामी केस में परिभाषित निजता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन होगा.
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संशोधन के पीछे सरकार का तर्क
लोकसभा में विधेयक पेश करते हुए किरेन रिजीजू ने कहा कि ये कानून सुप्रीम कोर्ट के आधार फैसले के अनुरूप है. नए संशोधन में विभिन्न चुनावी सुधारों को शामिल किया गया है जिन पर लंबे समय से चर्चा की जाती रही है.
इस विधेयक में एक प्रावधान है जिसके तहत वोटर लिस्ट में नए आवेदक से पहचान के लिए आधार नंबर मांगा जा सकता है, लेकिन ये वॉलेंटरी है, अगर व्यक्ति आधार नहीं देना चाहता तो दूसरे पहचानपत्र दे सकता है.
मतदाता सूची के साथ आधार को लिंक करने से चुनावी डेटाबेस की बड़ी समस्या का समाधान हो जाएगा. इससे डेटा का डुप्लिकेशन खत्म होगा. कई बार एक ही व्यक्ति का नाम एक से अधिक जगहों की वोटर लिस्ट में होता है.
सरकार का कहना है कि ये बिल अचानक नहीं लाया गया है बल्कि इस पर अतीत में विपक्षी पर्टियां चर्चा कर चुकी हैं.

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'बड़े स्तर पर वोटरों के नाम डिलीट होने का डर'
सरकार भले ही ये कह रही हो कि ये संशोधन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक़ है और इससे भविष्य में वोटर डेटा बेस बेहतर होगा लेकिन जानकार इस पर सरकार से अलग राय रखते हैं.
बीबीसी से बात करते हुए एसोशिएशन ऑफ़ डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्म के प्रमुख मेजर जनरल अनिल वर्मा कहते हैं, "वोटर लिस्ट में डुप्लिकेशन की परेशानी है, ये सही है. लेकिन इस बिल को अचानक से लाना और इसे जल्दी-जल्दी दोनों सदनों से पास करना परेशानी और बढ़ाता है. जिससे मैं सहमत नहीं हूं."
"सबसे बड़ा ख़तरा मास डिफ्रेंचाइज़मेंट का है. यानी बड़े स्तर पर आम लोगों का नाम वोटर लिस्ट से हट सकता है. जब सुप्रीम कोर्ट ने आधार पर फ़ैसला दिया था तभी वोटर आईडी और आधार की लिकिंग को अनिवार्य नहीं बताया था, क्योंकि सरकार ने तो साल 2015 से ही लिंक करना शुरू कर दिया था जिसे सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद रोका गया. यूआएडीएआई खुद मान चुका है कि आधार के डेटाबेस में भारी कमियां हैं."

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विपक्ष के नेता अधीर रंजन ने भी मास डिफ्रेंचाइज़मेंट को लेकर चिंता जताई है.
जनरल अनिल वर्मा इसे उदाहरण के साथ समझाते हैं, "साल 2018 में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना के चुनाव हुए यहां पहले से ही वोटर आईडी को आधार से लिंक किया जाने का काम शुरू हो गया था. लेकिन जब चुनाव हुए तो दोनों राज्यों में लगभग 50 लाख लोगों का वोटर लिस्ट से नाम गायब रहा और वो वोट नहीं दे पाए.''
उसी साल तेलंगाना के मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा था कि इस लिकिंग के लिए एक सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया गया था और हो सकता है वोटरों के नाम उसी वजह से गायब हुए हों.

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'कोर्ट के फैसले के अनुरूप नहीं है बिल'
बीबीसी से बात करते हुए जाने-माने वकील और इंटरनेट फ्रीडम फ़ाउंडेशन के एग्ज़ीक्यूटिव डायरेक्टर अपार गुप्ता से कहते हैं, "क़ानून मंत्री का ये कहना कि चुनाव क़ानून (संशोधन) बिल सुप्रीम कोर्ट के पुट्टास्वामी मामले में दिए गए फ़ैसले के अनुरूप है ये ग़लत है, सरकार ने इसे साबित करने के पर्याप्त प्रमाण नहीं दिए हैं."
"सरकार कह रही है कि इस बिल को लाने का उद्देश्य मतदाता सूची को बेहतर और सटीक करना है लेकिन इसके लिए वह आधार जो कि आवास के आधार पर तैयार की गई आईडी है उसे नागरिकता के आधार पर तैयार की गई आईडी, वोटर कार्ड से जोड़ रही है. इस दोनों को लिंक करने से फॉल्टी डेटाबेस तैयार होगा."
"हम अतीत में देख चुके हैं कि जिन राज्यों ने चुनाव में इसे लिंक किया वहां किस तरह की गड़बड़ियां सामने आईं, तेलंगाना के चुनाव में आधार को वोटर आईडी से लिंक करने के कारण लाखों लोगों का नाम मतदाता सूची से डिलीट हो गया और वे अपना वोटिंग का अधिकार इस्तेमाल ही नहीं कर सके."

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'वोटर्स की प़ॉलिटिकल प्रोफ़ाइलिंग का डर'
कुछ जानकार मानते हैं कि अगर आधार और वोटर आईडी जुड़े तो ये भी संभव है कि राजनितिक पार्टियां वोटर्स की प्रोफालिंग करें, जैस- वह किस क्षेत्र से आते हैं, धर्म, जाति और किस पार्टी के लिए उनका झुकाव है वगैरह-वगैरह. ये पार्टियों को उनकी चुनावी योजना में मदद करेगा.
अपार गुप्ता अतीत में हुए ऐसे ही वाकये के बारे में कहते हैं, "पुदुचेरी में इस लिंकिंग के कारण पॉलिटिकल प्रोफ़ाइलिंग का मामला भी सामने आया था जिसके बाद मद्रास हाईकोर्ट ने इस मामले में दख़ल दिया था."
आपको बता दें पुदुचेरी में हुए विधानसभा चुनाव में वोटर्स का डेटा लीक हुआ था और पार्टियों ने यहां से वोटर्स के नंबर के ज़रिए उन्हें व्हाट्सएप ग्रुप में जुड़ने के लिए लिंक भेजना शुरू कर दिया था. इसके बाद मद्रास हाईकोर्ट ने छह सप्ताह का वक्त दे कर यूआईडीएआई से सबकुछ ठीक करने को कहा था.
अपार का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में साफ़ किया गया था कि आधार को लाभकारी योजनाओं के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए और इसका इस्तेमाल बेहद सीमित रखा जाए. आधार एक्ट में भी इसे लोक कल्याणकारी सेवाओं के लिए ही बताया गया है जैसे- मुफ़्त राशन देना.
जनरल अनिल वर्मा अपार गुप्ता की बातों से इत्तेफ़ाक रखते हुए कहते हैं, "सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ किया था कि आधार को बैंक अकाउंट या मोबाइल नंबर से जोड़ना अनिवार्य नहीं है, जबकि सरकार ऐसा चाहती थी."
"साल 2019 में पता चला कि में तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में सात करोड़ मतदाताओं का डेटा लीक हुआ और तेलुगू देशम पार्टी ने इस डेटा का इस्तेमाल कर पॉलिटिकल प्रोफ़ाइलिंग की और अपना चुनावी कैंपेन तैयार किया. अब लिंक होने से चुनाव आयोग के पास जो डेटा बेस रहता है उसे राजनीतिक पार्टियां आसानी से एक्सेस कर लेंगी."

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'इसका असर चुनाव पर पड़ेगा'
अपार मानते हैं कि अगर अतीत के उदाहरण को देखें और अगर वोटरों के नाम लिस्ट से गायब हुए तो इसके परिणाम आगामी चुनावों पर पड़ेंगे.
वह कहते हैं, "देखिए मतदाता सूची में वोटरों के रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया अगर बदल दी जाए ये वोटरों के लिए रजिस्ट्रेशन कराना मुश्किल हो जाता है, खास कर सामाजिक और आर्थिक तौर पर पिछड़े लोग रजिस्ट्रेशन नहीं करा पाते."
"साल 2019 में नेशनल इकॉनमिक सर्वे की रिपोर्ट बताती है कि आधार से जुड़ी स्कीम, राशन और पीडीएस का लाभ कम से कम 12 फ़ीसदी योग्य लाभार्थियों तक नहीं पहुंच पाता."
"सोचिए गरीब और सामाजिक स्तर पर पिछड़े ये लोग जिनमें अल्पसंख्यक भी शामिल हैं, वो इस नए प्रावधान के साथ वोट नहीं दे पाए तो इससे किसी भी राज्य , विधानसभा क्षेत्र के चुनाव पर असर पड़ेगा. आम तौर पर जीतने वाले उम्मीदवार और दूसरे नंबर के उम्मीदवार के बीच 2-4% वोट शेयर का ही अंतर होता है, अगर लाखों लोगों का नाम चुनाव लिस्ट से बाहर हुआ तो यकीनन देश और राज्य के चुनावों पर असर पड़ेगा."
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