केरल में बीजेपी और एसडीपीआई नेताओं की हत्या- क्या बढ़ रही है कट्टरता?

    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

केरल में पिछले दिनों एसडीपीआई और बीजेपी के दो नेताओं की हत्या को अब राजनीतिक हत्या के बदले धार्मिक हत्या का रंग देने की कोशिश शुरू हो चुकी है. कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इससे राज्य में राजनीतिक कट्टरता का दौर आने वाले दिनों में बढ़ेगा.

मध्य केरल में 12 घंटे के अंदर दो राजनीतिक नेताओं की हत्या से केरल का राजनीतिक गलियारा सकते में है. राजनीतिक तौर पर एसडीपीआई और बीजेपी, दोनों एक दूसरे के विरोधी हैं लेकिन दोनों तरफ़ से इन हत्याओं को धार्मिक हत्याएं कहा जा रहा है.

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के प्रोफ़ेसर एमए बेबी ने बताया है कि इन दोनों घटनाओं में धार्मिक हिंसा का पता चला है. वहीं कांग्रेस के रमेश चेनीताला ने बताया, "आरएसएस और एसडीपीआई समाज को बांटने की कोशिश कर रही है."

इन हत्याओं में सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि ये मामले केरल के आलप्पुझा ज़िले में हुए हैं, जहां से पहले कभी इस तरह की घटनाएं नहीं हुई थीं. अब तक राजनीतिक हत्या का सिलसिला उत्तरी केरल के मलप्पुरम ज़िले में ही देखने को मिला था.

राजनीतिक विश्लेषक जोसेफ मैथ्यू ने बताया, "आलप्पुझा अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण इलाका है रहा है, इसलिए यहां इस तरह की घटना चौंकाने वाली है. अप्रैल में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान जो इस्लामोफोबिक अभियान चलाया गया था, मुझे लगता है कि वो अब भी जारी है."

आरएसएस और एसडीपीआई के बीच तनाव

बीते शनिवार को सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ इंडिया (एसडीपीआई) के राज्य सचिव केएस शान जब स्कूटर से अपने घर लौट रहे थे तब कथित तौर पर एक कार ने उन्हें टक्कर मार कर गिराया और बाद में कार सवार लोगों ने उन्हें पीटा जिसके चलते उनकी मौत हो गई. एसडीपीआई पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया (पीएफआई) की राजनीतिक ईकाई हैं.

इसके 12 घंटे के अंदर, रविवार की सुबह, बीजेपी ओबीसी मोर्चा के राज्य सचिव रंजीत श्रीनिवासन की हत्या उनके घर में उनकी मां के सामने हुई. इसके बाद कई लोगों को हिरासत में लिया गया और इलाके में निषेधाज्ञा लागू की गई.

कथित तौर पर कहा जा रहा कि शान की हत्या, आरएसएस कार्यकर्ता नंदू कृष्णन की हत्या का बदला था. कृष्णन की हत्या फरवरी में हुई थी. इस हत्या के बाद आरएसएस और एसडीपीआई के कार्यकर्ताओं के बीच कथित तौर पर चुनाव के दौरान संघर्ष भी हुआ था, राज्य में विधानसभा के चुनाव अप्रैल में हुए थे.

चुनाव के बाद आरएसएस और एसडीपीआई कार्यकर्ताओं के बीच झड़प देखने को मिली है, दिलचस्प यह है कि ये झड़प सीपीएम के दबदबे वाले इलाकों में देखने को मिली है. सीपीएम के नेतृत्व में ही राज्य में मौजूदा समय में लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) सरकार चल रही है.

अब तक राज्य में आरएसएस और सीपीएम के कार्यकर्ताओं की झड़प में दोनों तरफ़ से आम कार्यकर्ता ही निशाना बनते आए थे, यह पहली बार है कि दोनों तरफ़ के राज्य स्तरीय पदाधिकारी निशाना बनाए गए हैं.

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बढ़ती राजनीतिक कट्टरता

राजनीतिक विश्लेषक जोए सकारिया ने बीबीसी हिंदी को बताया, "केरल की राजनीति में अब कहीं ज़्यादा राजनीतिक कट्टरता देखने को मिल रही है. राज्य में हलाल फूड के नाम पर अभियान चलाया गया जिसमें कई रेस्टोरेंट को निशाना बनाया गया. यह निश्चित तौर पर चिंता की बात है."

राज्य में हलाल फूड के ख़िलाफ़ अभियान की शुरुआत, सबरीमला कर्मा समिति के संयोजक एसजेआर कुमार ने सबरीमला मंदिर में आपूर्ति किए जा रहे हलाल गुड़ पर आपत्ति जताते हुए हाईकोर्ट में याचिका दाखिल किया था.

इसके बाद बीजेपी कार्यकर्ताओं ने उन रेस्टोरेंट के ख़िलाफ़ अभियान छेड़ दिया जहां मैन्यू में हलाल फूड शामिल था. इसके बाद ये अभियान भी चलाया गया कि मुस्लिम रेस्टोरेंट में थूकने के बाद खाना सर्व किया जाता है.

मुस्लिम रेस्टोरेंट के मालिकों और मुसलमानों कई स्पष्टीकरण दिए कि खाने में कोई नहीं थूकता है और धर्म में इसकी मनाही है, लेकिन इसके बाद भी यह अभियान चलता रहा. केरल के रेस्टोरेंट एसोसिएशन ने मुख्यमंत्री पिनरई विजयन से मिलकर सोशल मीडिया पर चलाए जा रहे अभियान को रोकने का अनुरोध भी किया. इस अभियान के चलते छोटे और मंझोले कारोबारियों को काफ़ी नुकसान भी उठाना पड़ा.

शान के अंतिम संस्कार के बाद एसडीपीआई के पार्टी पदाधिकारी ने बताया, "शान शहीद हुआ है, हम उसकी मौत को शहादत के तौर पर मनाएंगे."

कितनी अहम है राजनीतिक लड़ाई

निजी बातचीत में सभी राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि स्वीकार करते हैं कि एसडीपीआई उन इलाकों में लगातार बढ़ रही है जहां इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) नहीं बढ़ सकी है. यानी दक्षिण और मध्य केरल में एसडीपीआई मज़बूत हो रही है जबकि इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग उत्तर केरल में मज़बूत है. पार्टी का आधार उत्तर केरल के मलप्पुरम ज़िले में स्थित है.

मैथ्यू कहते हैं, "जहां जहां इस्लामोफ़ोबिया कैंपेन मज़बूत है वहां एसडीपीआई बढ़ रही है."

पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया के प्रवक्ता प्रोफेसर पी कोया ने बीबीसी हिंदी को बताया, "एसडीपीआई दक्षिण और मध्य केरल में बढ़ रही है. एसडीपीआई कांग्रेस और सीपीएम, दोनों की नीतियों की आलोचक है. ये मध्यमार्गी राजनीति करती हैं. एसडीपीआई कोई अलगाववादी पार्टी नहीं है, यह समाज में विभाजन पैदा नहीं करती है."

लेकिन बीजेपी के केरल प्रदेश अध्यक्ष के सुरेंद्रन ने बीबीसी हिंदी से कहा, "सीपीएम की मदद से पीएफ़आई-एसडीपीआई मज़बूत हो रही है. पहले सीपीएम आरएसएस से लड़ रही थी और अब सीपीएम, एफ़पीआई को आरएसएस से लड़ने में मदद कर रही है. इसमें पुलिस भी सत्तारूढ़ पार्टी की मदद कर रही है."

सुरेंद्रन बताते हैं, "जो भी हो रहा है वो पूरी तरह से सांप्रदायिक है. पीएफ़आई सांप्रदायिक हिंसा फैलाने की कोशिश कर रही है. वे ध्रुवीकरण करना चाहते हैं क्योंकि राज्य में मुसलमानों की आबादी 30 प्रतिशत से ज़्यादा है. सत्तारूढ़ दल के साथ मिलकर इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग को कमजोर किया जा रहा है. इसके अलावा आरएसएस-बीजेपी पर हमलावर रुख़ अपनाकर मुस्लिम मतदाताओं को आकर्षित किया जा रहा है. यह पीएफ़आई की रणनीति है. "

हालांकि एसडीपीआई ने बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष के आरोपों को ख़ारिज किया है. एसडीपीआई के राष्ट्रीय महासचिव माजिद फ़ैज़ी ने बताया, "कोई यह कैसे कह सकता है कि हमलोगों ने स्थानीय निकाय चुनावों में सीपीएम की मदद की. सीपीएम ने हमसे मदद भी नहीं मांगी थी. हम पूरी तरह से न्यूट्रल हैं. हम ना तो कांग्रेस की मदद कर रहे हैं और ना ही सीपीएम की."

फ़ैज़ी ने एसडीपीआई को मुस्लिमों की पार्टी बताए जाने के आरोपों को भी ख़ारिज करते हुए कहा, "बीजेपी समाज को बांटने वाली राजनीति करती है. हमारे साथ मुसलमान, ईसाई और दलित हैं. दरअसल मुद्दा यह है कि बीजेपी और आरएसएस मुसलमानों को भड़का रही है. वे मुसलमानों को समाज से अलग थलग करना चाहते हैं और सामुदायिक सदस्यों पर हमले भी करना चाहते हैं. अगर आरएसएस यह सब बंद नहीं करती है तो हमले बढ़ेंगे ही."

वहीं के. सुरेंद्रन कहते हैं, "बीते विधानसभा चुनावों के दौरान मुसलमानों के अच्छे वोट सीपीएम को मिले थे क्योंकि पीएफ़आई और जमाते इस्लामी ने उनका समर्थन किया था."

सीपीएम के वरिष्ठ नेता और पोलित ब्यूरो के सदस्य प्रोफ़ेसर एमए बेबी ने बीबीसी हिंदी को बताया, "केरल में राजनीतिक ताक़त के तौर पर उभरने के लिए बीजेपी और एसडीपीआई सांप्रदायिक हिंसा का सहारा ले रही हैं. हम ऐसा नहीं होने देंगे. इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग मुसलमानों के बीच अपना दबदबा कायम रखने की कोशिश कर रही है लेकिन उनके अधिकांश लोग सीपीएम ज्वाइन कर चुके हैं. इसे रोकने के लिए वे भी हिंसा की राजनीति कर रहे हैं."

प्रोफ़ेसर बेबी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग पर कट्टरवादी लोगों को आगे बढ़ाने का आरोप लगाते हुए कहते हैं, "समुदाय में कट्टर ताक़तें उभर रही हैं. यह भी संभव है कि इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग और जमाते इस्लामी ने एसडीपीआई से हाथ मिला लिया हो."

इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग की फ़ातिमा थाहलिया ने बीबीसी हिंदी से कहा, "यह साफ़ दिख रहा है कि सरकार का पुलिस बल पर नियंत्रण नहीं है. सत्तारूढ़ सीपीएम को चरमपंथी ताक़तों से निपटने के लिए क़दम उठाने होंगे. हिंसा के चलते परिवार तबाह हो रहे हैं, इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती. वे अपनी विचारधारा के अलावा किसी को जगह नहीं देना चाहते और ना ही लोग दूसरों की विचारधारा को सुनना चाहते हैं."

राजनीतिक विश्लेषक जोसेफ़ मैथ्यू कहते हैं, "स्पष्ट तौर पर यह दिख रहा है कि कट्टरवादी ताक़तें राज्य की राजनीति की मुख्यधारा में आने के लिए रास्ता बना रही हैं."

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