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हिन्दू, हिन्दुत्व और हिन्दूवादः क्या है RSS और गांधीवादियों का नज़रिया?
हिंदू, हिंदुत्व और हिंदूवाद. आज इन शब्दों पर बहस हो रही है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने हाल ही में हिंदू को हिंदुत्व से अलग बताया है.
इन शब्दों या मान्यताओं में क्या समान है और क्या फ़र्क़ है? समझिए आरएएस विचारक राकेश सिन्हा और गांधीवादी विचारक तुषार गांधी से-
राकेश सिन्हा का नज़रिया
हिंदू अस्तित्व की पहचान है कि आप अपनी आस्था से, जन्म से, मन से हिंदू हैं. लेकिन अपनी पहचान के प्रति सजग होना और उसके प्रति चेतना का विकास होना हिंदुत्व है.
अर्थात पहचान से हिंदू होने का तात्पर्य है कि क्षमाभाव, प्रेमभाव और आचरण की शुद्धता होना, अहिंसा के रास्ते पर चलना और विविधता को महत्व देना.
हिंदू शब्द भाववाचक है. इसे हम संज्ञा नहीं मानते हैं. जब हम कहते हैं हिंदू तो उसका मतलब होता है विविधता को महत्व देना. ये विविधता कृत्रिम नहीं है, ये हिंदू के अंतरमन में बैठी हुई है. विविधता के बिना हिंदू शब्द की कल्पना करना अर्थहीन है.
हिंदू होने की इन सभी विशेषताओं के प्रति सजग होना, इनका क्षरण ना होने देना हिंदुत्व है. भले ही हिंदुत्व शब्द प्रचलित विनायक दामोदर सावरकर जी की पुस्तक से हुआ लेकिन सावरकर जी हिंदुत्व के पहले या अंतिम विचारक नहीं है. वो विचारकों की श्रृंखला में एक विशिष्ट समय के विचारक हैं.
हिंदुत्व का दूसरा तात्पर्य होता है हिंदू की विशेषताओं, हिंदू के अपने अस्तित्व के प्रति भीतरी और बाहरी चुनौतियों से लड़ना. जैसे जातिवाद या छुआछूत की समस्या भीतरी चुनौती है.
बाल विवाह, सती प्रथा ये सब भी भीतर की समस्याएं हैं. इनका निदान करना हिंदुत्व है. इसी तरह धर्म परिवर्तन, बाहरी आक्रमण जैसी बाहरी चुनौतियों से भी हिंदुत्व अलग-अलग समय में अलग-अलग तरह से निबटता है और अलग-अलग तरह से इनका निदान ढूंढता है.
हिंदुत्व की कोई एक स्थिर परिभाषा नहीं हैं. समय, परिस्थिति और चुनौतियों के हिसाब से हिंदुत्व का स्वरूप बदलता रहता है. इसी तरह से समर्थ रामदास (सत्रहवीं सदी के हिंदू कवि) एक हिंदुत्ववादी इसलिए थे क्योंकि उन्होंने धर्म और अध्यात्म के माध्यम से उस समय की चुनौतियों का हल खोजने और लोगों की चेतना को जागृत करने का काम किया. उन्होंने लोगों को बताया कि तुम हिंदू हो, नहीं रहोगे तो तुम्हारा अस्तित्व मिट जाएगा.
रविदास, जिन्होंने हिंदुओं को अपनी आंतरिक चुनौतियों का सामना करने का संदेश दिया, उसी तरह से बिपिन चंद्र पाल, बाल गंगाधर तिलक और लाला लाजपत राय जैसे समाज सुधारक, ये सभी हिंदुत्व को ही आगे बढ़ा रहे थे.
बिपिन चंद्र पाल ने सोल ऑफ़ इंडिया नाम की पुस्तक लिखी तब उनका मक़सद हिंदुओं की चेतना को जागृत करना ही था. उन्होंने कहा था कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है. लेकिन उनके कहने का मतलब ये था कि भारत अपने कृतित्व से हिंदू राष्ट्र है ना कि संविधान के द्वारा.
ठीक उसी तरह से सावरकर जी ने विशेष परिस्थितियों में हिंदुत्व के रूप में भू-सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात की. डॉ. हेडगेवार जी ने बाद में हिंदुत्व को सभ्यतायी परिवेश में रखा और उसे पूजा पद्धति और आस्था से ऊपर किया.
इसलिए हिंदुत्व के लिए उनका योगदान सबसे अहम है. सभ्यता की यात्रा में जो लोग भी भारत के प्रति आस्था रखते हैं, विविधता में विश्वास रखते हैं, इस संस्कृति से जुड़े हुए हैं, विभिन्न पूजा पद्धति के बावजूद सभी अपनी सभ्यतायी राष्ट्रीयता से वो भी हिंदू ही हैं.
हम मानते हैं कि हिंदूवाद या हिंदुइज़्म नाम की कोई चीज़ नहीं हैं. ये शब्द और विचार उपनिवेशवाद की देन है. जैसे यदि स्लामवाद या ईसाईवाद नहीं है. इस्लामिज़्म या क्रिश्चियनिज़्म नहीं है, ठीक उसी तरह से हिंदूवाद या हिंदुइज़्म नहीं हैं.
हिंदुओं को किसी एक वाद या किसी एकरूपी धर्म में बांधा नहीं जा सकता है. धर्म और अध्यात्म में बुनियादी अंतर होता है. धर्म व्यवस्थित होता है, उसका एक निर्धारित स्ट्रक्चर (ढांचा) होता है. धर्म अपने आंतरिक क़ानूनों से बंधा होता है और उस धर्म में बने रहने के लिए उनका पालन अनिवार्य होता है.
चाहे ये पुस्तक के रूप में हों या पैग़ंबर के रूप में हो या फिर कर्मकांड के रूप में हों. औपनिवेशिक या सामंती कारणों से हिंदू को एक धर्म का रूप देने की कोशिश हुई है लेकिन वास्तव में यह एक आध्यात्मिक यात्रा है. हिंदुओं की तुलना इस्लाम, ईसाई या यहूदी जैसे सामी धर्मों से करना उचित नहीं है. ये दोनों के ही साथ अन्याय है.
हिंदुत्व प्रयोगधर्मी है और प्रयोगधर्मिता के कारण भारत एक आध्यात्मिक प्रयोगशाला है. पूरी दुनिया में राजनीतिक लोकतंत्र हैं, सामाजिक लोकतंत्र हैं लेकिन आध्यात्मिक लोकतंत्र सिर्फ़ हिंदुओं के बीच है.
ये आध्यात्मिक बहुलवाद भी है. हम शंकराचार्य को भी चुनौती दे सकते हैं. आदि शंकराचार्य को भी मंडन मिश्र से चुनौती मिली. हम किसी को भी अंतिम शब्द या अंतिम व्यक्ति नहीं मानते हैं. ये आध्यात्मिक बहुलवाद सिर्फ़ हिंदुओं के बीच में है. बाक़ी कहीं भी किसी धार्मिक समुदाय के बीच में ये देखने को नहीं मिलता है.
हिंदुओं की तुलना एकरूपतावादी धर्मों से करने के लिए हिंदू को वाद में परिवर्तित करने का प्रयास किया गया. हम मानते हैं कि हिंदू वाद नहीं है. मेघालय के खासी या झारखंड के मुंडा आदिवासी जो तौर-तरीक़े अपनाते हैं, वो गंगा-यमुना के मैदानी इलाक़ों के लोग नहीं अपनाते. लेकिन अपनी विविधता के साथ ये सब लोग हिंदू ही हैं. इन सभी की परंपराओं, दृष्टिकोणों और अध्यात्म में अंतर है लेकिन फिर भी ये सब हिंदू हैं.
जहां तक आरएसएस और गांधीवाद का सवाल है, आरएसएस और गांधीवाद में समानता अधिक है अंतर कम है. गांधी ने भी कहा था कि रामराज्य ही स्वराज है. भारत के ज्ञान की समृद्धि से संसाधन लेकर उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन को परिभाषित किया. आधुनिक दुनिया में महात्मा गांधी पश्चिम और पूरब के बीच में जो संवाद होता है उसके अहम पात्र हैं.
गांधीजी की स्वराज के प्रति धारणा, हिंदू संस्कृति के प्रति धारणा उन्हें आरएसएस की विचारधारा के क़रीब लाती है. हिंदुत्व शब्द का प्रयोग उन्होंने किया हो या ना किया हो लेकिन उनके भाव संघ से मिलते थे. महात्मा गांधी की हत्या के बाद संघ ने 13 दिनों तक अपनी शाखाएं बंद रखीं थीं. संघ ने ऐसा कभी भी नहीं किया है.
गांधीजी की स्वदेशी, स्वराज और सत्याग्रह की भावना थी, वही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भी भावना है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 1925 से लेकर अब तक स्वदेशी और स्वराज का आग्रह करता रहा है. अपने वतन की जड़ों से जुड़े रहने की वकालत संघ करता रहा है.
तुषार गांधी का नज़रिया
हिंदू एक पहचान है जो हमें दी गई है, हिंदुवाद समाज का, धर्म का प्रतीक है और हिंदुत्व उस समाज और धर्म का राजनीतीकरण करने का एक राजनीतिक टूल है.
मैं ये मानता हूँ कि हिंदूवाद है. जो लोग हिंदू समाज के तौर-तरीकों को मानते हैं और उन्हें बढ़ावा देते हैं और उनका समर्थन करते हैं उन्हें हिंदूवादी कहा जा सकता है. लेकिन इसमें कोई लिखित रश्म-ओ-रिवाज़ नहीं है. यहां सब कुछ पारंपरिक है. जो लोग सदियों से चल आ रही इन परंपराओं को मानते हैं उन्हें भी हिंदूवादी कहा जा सकता है.
जहां तक हिंदू और हिंदुत्व में अंतर का सवाल है तो गांधी हिंदू थे और नाथूराम गोडसे हिंदुत्ववादी थे. इससे बेहतर फ़र्क़ हिंदू और हिंदुत्व के बीच नहीं हो सकता है.
हिंदू, हिंदुत्व और हिंदूवाद में एक दूसरे के अंश हैं. लेकिन मुझे लगता है कि हिंदुत्व को हिंदू या हिंदूवाद से कोई लेना देना नहीं है, क्योंकि वो सिर्फ़ राजनीति का एक औजार है, सत्ता पाने का ज़रिया है.
अगर हम हिंदू इंसानों की बात करें या हिंदूवादी इंसानों की बात करें तो उनसे भी हिंदुत्व का कोई लेना-देना नहीं है. हिंदुत्व महज़ एक राजनीतिक समूह का सत्ता पाने का हथियार है.
लेकिन कड़वा सत्य ये है कि हमारे आज के दौर में हिंदुत्व सबसे मज़बूत है. आज हिंदू धर्म भी मज़बूत नहीं है और हिंदूवाद तो है ही नहीं. अभी हम ऐसे दौर में हैं जहां हिंदुत्व सबसे ताक़तवर है और अगर हिंदुत्व ऐसे ही मज़बूत होता रहा तो हिंदू और भारत का भविष्य अंधेरे में पड़ जाएगा.
आज हिंदुत्ववादी ये दावा करते हैं कि वो धर्म का पुनर्जागरण कर रहे हैं और हिंदू धर्म के गौरव को बढ़ा रहे हैं लेकिन वो नहीं जानते कि हिंदू धर्म की उदारता ही उसका असली गौरव है.
अगर हम हिंदू धर्म की बात करें तो वो इतनी सदियों से टिका रहा है और प्रखर रहा है. ये लोग जो हिंदू धर्म के पुनर्निर्माण की बात करते हैं, ये अपने आप को हिंदू धर्म से भी बड़ा समझते हैं.
इन लोगों में घमंड है कि वो हिंदू धर्म से भी बड़े हैं. ये घमंड ही सबसे बड़ा पाप है. जब इंसान में ये भाव आ जाता है कि वो धर्म से भी बड़ा है तो इसके मूल में घमंड ही होता है और ये घमंड ही उसके विनाश का कारण भी बन जाता है.
गांधीवाद की ख़ूबी ये है कि जो लोग गांधी को मानते हैं वो सभी के विचारों का सम्मान करते हैं, भले ही हम उन विचारों के ख़िलाफ़ ही क्यों ना हों. एक हिंदू की असली पहचान ये है कि वो उन विचारों को भी जगह देता है, जिन्हें वो नहीं मानता. हर किसी की मान्यता का सम्मान करना ही हिंदू होना है.
हम जब किसी का विरोध भी करते हैं तो सम्मानपूर्वक करते हैं. हम हिंदू किसी को छोटा नहीं दिखाते हैं. हम सिर्फ़ सत्य और असत्य के बीच का फ़र्क़ करते हैं. झूठ को संख्या की ज़रूरत होती है, सत्य को संख्या की ज़रूरत नहीं होती है. यदि एक व्यक्ति भी सत्य बोले तो वो सत्य ही रहता है, लेकिन झूठ को मनवाने के लिए लाखों लोगों से गवाही दिलवानी पड़ती है. हिंदू सत्य का प्रतीक है और सत्याग्रह करता है.
आरएसएस और गांधीवादियों का हिंदुत्व को लेकर नज़रिया बिल्कुल अलग है और विपरीत है. आसएसएस का हिंदुत्व संकुचित है, वो चुनिंदा लोगों के लिए ही है, वो किसी और को उसमें शामिल नहीं करता है जबकि बापू का जो हिंदूवाद था वो वैश्विक था, वो सभी को अपने दिल में स्थान देता था, सबका सम्मान करता था, हर विविध जीवनशैली का सम्मान करता था, लोगों और उनके मज़हब का सम्मान करता था. एक तरह से सभी को अपने में शामिल करने की वो शक्ति रखता था.
लेकिन आरएसएस सिर्फ उन्हीं लोगों को शामिल करता है जो उसके हिंदुत्व को अपनाते हैं. जो लोग उसके हिंदुत्व की धारणा को मानते हैं वह उनमें भी फ़र्क़ करता है. आख़िर में ऊंच-नीच को बढ़ावा देने वाली परंपराओं को ही वो आगे रखता है. गांधी के हिंदूवाद और आरएसएस के हिंदुत्व में कोई समानता ही नहीं है.
आरएसएस की मजबूरी ये है कि वो जो मानते हैं उसके लिए उन्हें प्रमाणपत्र खोजने पड़ते हैं और गांधी से बड़ा प्रमाण पत्र उन्हें मिल नहीं सकता है. ऐसे में वो हमेशा लोगों का उपयोग करके अपने तत्वों को सही साबित करने की कोशिश करते हैं. गांधी का भी वो अपने हितों के लिए उपयोग करते हैं.
गांधी के हिंदूवाद और आरएसएस के हिंदुत्व में सबसे बड़ा फ़र्क़ यही है कि गांधी के हिंदूवाद में किसी को भी अलग नहीं किया जाता था, आरएसएस का जो हिंदुत्व है उसमें किसी को भी शामिल करने पर ही झिझक है.
लेकिन मेरा मानना है कि आज हम जिस दौर में हैं उसमें ना हमें हिंदू की ज़रूरत है, ना हिंदुत्व की ज़रूरत है और ना ही हिंदूवाद की ज़रूरत है. हमारी सबसे बड़ी ज़रूरत है कि हम सभी को अपनाएं, एक साथ रहने के लिए धर्म-निरपेक्ष विचारधारा को अपनाने की ज़रूरत है. मेरा निजी विचर ये है कि आज हमें किसी भी धार्मिक पहचान की ज़रूरत नहीं है.
आज भारत के सीने पर जो घृणा और हिंसा के ज़ख्म लगे हैं, अगर इनके घावों को भरना है तो हमें धर्म से परे जाकर सर्वधर्म सम्भाव की जो हमारी विचारधारा थी हमें फिर से उसे अपनाना पड़ेगा. इसके लिए हमें समाज से धार्मिक पहचान के लेबल हटाने होंगे.
(बीबीसी संवाददाता दिलनवाज़ पाशा से बातचीत पर आधारित)
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