कलमा न पढ़ पाने पर जब भारतीय पायलट बनाए गए क़ैदी- विवेचना

    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

पाँच दिसंबर, 1971 को करीब 9 बजकर 20 मिनट पर जब फ़्लाइट लेफ़्टिनेंट जवाहरलाल भार्गव के मारुत विमान ने पाकिस्तान के नयाछोर इलाके में बमबारी करने के लिए नीचे डाइव लगाई तो उनके विमान में एक विमानभेदी तोप का गोला लगा.

कॉकपिट में लाल बत्तियाँ जलने लगीं और विमान का बायां इंजन फ़ेल हो गया. उन्होंने तुरंत हमला छोड़ कर वापस भारत लौटने की कोशिश की. उनके नीचे सिंध का अथाह रेगिस्तान था.

जैसे ही उन्हें ज़मीन पास आती दिखाई दी युवा पायलट ने ईश्वर का नाम लेकर पूरी ताकत से इजेक्शन बटन दबाया.

1971 की लड़ाई पर हाल ही में प्रकाशित पुस्तक '1971 चार्ज ऑफ़ द गोरखाज़' लिखने वाली रचना बिष्ट रावत बताती हैं, "भार्गव के विमान के ऊपर की कनोपी खुली और एक सेकेंड से भी कम समय में वो हवा में थे. थोड़ी ही देर में फ़्लाइट लेफ़्टिनेंट जवाहरलाल भार्गव ने अपने आप को रेगिस्तान की बालू पर पड़े हुए पाया. उनके ज़मीन छूने से पहले पास ही में उनका विमान क्रैश कर चुका था."

"ये अंदाज़ा लगाते हुए कि उनके विमान में रखे हथियार कभी भी फट सकते हैं, उन्होंने अपने पैराशूट को बालू में गाड़ा और तेज़ी से उस जगह से हटने की कोशिश की. वो जगह छोड़ने से पहले उन्होंने अपनी पायलट सर्वाइवल किट उठा ली जिसमें एक स्लीपिंग बैग, स्टोव, चॉकलेट, चाकू, कम्पस और पानी की 100 मिलीलीटर की चार बोतलें थीं."

पटौदी के नाम पर नाम रखा मंसूर अली ख़ाँ

लेकिन भार्गव को उस किट में वो नक्शा नहीं मिला जिसकी उन्हें उस समय सख़्त ज़रूरत थी. उन्होंने तय किया कि वो अपने कम्पस की मदद से पूर्व की ओर पैदल चलेंगे और सीमा पार कर भारत पहुंचने की कोशिश करेंगे.

उन्होंने तुरंत अपनी घड़ी का समय पाकिस्तानी समय के अनुसार मिलाया और मन ही मन सोचा कि अगर वो पकड़े गए तो वो कहेंगे कि वो पाकिस्तानी वायुसेना के अफ़सर हैं और उनका नाम मंसूर अली ख़ाँ है.

इस समय पंचकुला में रह रहे एयर कॉमॉडोर जवाहरलाल भार्गव से मैंने पूछा कि मंसूर अली ख़ाँ नाम रखने के पीछे कोई ख़ास वजह थी? उनका जवाब था कि 'मेरे पिता पटौदी के नवाब इफ़्तिख़ार अली ख़ाँ पटौदी के यहाँ काम करते थे और मैंने उनके बेटे मंसूर अली ख़ाँ पटौदी (जो बाद में भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान बने ) के साथ क्रिकेट खेली थी. हम दोनों ने ही रणजी ट्रॉफ़ी में अपने-अपने राज्यों का प्रतिनिधित्व किया था. पटौदी दिल्ली के लिए खेलते थे और मैं पंजाब की तरफ़ से. मंसूर नाम रखने का विचार मुझे पटौदी के नाम से मिला था.'

भार्गव के पास 300 पाकिस्तानी रुपए भी थे जो उस समय पाकिस्तान पर हमला करने जाने वाले हर पायलट को दिए जाते थे.

ऊँटों के पीने वाला गंदा पानी पिया

भार्गव ने जब चलना शुरू किया तो दूर दूर तक एक भी आदमज़ात नहीं दिखाई पड़ रहा था. अभी वो तीन किलोमीटर ही चले होंगे कि गर्मी से उनका गला सूखने लगा. साथ चल रहा बोतलों में रखा पानी कब का ख़त्म हो गया. अब उनके पास एक बूँद पानी तक नहीं था. तभी उन्हें टीले के पास एक गाँव दिखाई दिया. वो एक सुनसान झोपड़ी के सामने जा खड़े हुए जहाँ धोती और कुर्ता पहने हुए एक दाढ़ी वाला शख़्स खड़ा हुआ था.

जवाहरलाल भार्गव याद करते हैं, "मैंने झुक कर उसे आदाब अर्ज़ किया लेकिन उसने उसका जवाब वालेकुम अस्सलाम से दिया. मैंने उससे बहुत आत्मविश्वास के साथ कहा मैं पाकिस्तान एयरफ़ोर्स का फ़्लाइट लेफ़्टिनेंट मंसूर अली ख़ाँ हूँ. मेरा जहाज़ क्रैश हो गया है. मुझे पीने का पानी चाहिए. उस बूढ़े शख़्स ने रूखेपन से जवाब दिया कि पानी तो नहीं है. मेरी नज़र पास ही बने सीमेंट के हौज़ पर गई जिसमें कुछ पानी भरा हुआ था. उस बूढ़े शख़्स ने कहा ये ऊँटों के पीने के लिए पानी है. अगर आप चाहें तो इसे पी सकते हैं. आजकल आरओ का ज़माना है. आपको यकीन नहीं होगा कि मैंने न सिर्फ़ वो गंदा काला पानी पिया बल्कि आगे पीने के लिए चार बोतलों में वो पानी भरा भी. मैंने उस शख़्स को इस हिदायत के साथ 20 रुपए दिए कि वो मेरे बारे में किसी को न बताए."

गाँव वाले भार्गव को गाँव ले गए

भार्गव ने जब उस गाँव वाले से पूछा कि उस गाँव का नाम क्या है तो उसने बताया कि ये पिरानी का पार है. ये सुनकर भार्गव के पैर से ज़मीन निकल गई क्योंकि वो समझ रहे थे कि ये भिटाला गाँव है.

इसका मतलब ये था कि वो विपरीत दिशा में भारत की तरफ़ न जाकर पाकिस्तान की तरफ़ जा रहे थे.

उन्होंने अपनी दिशा बदली और फिर चलने लगे. थोड़ी देर बाद वो थोड़ा आराम करने के लिए एक गड्ढे जैसी जगह पर लेट गए. उन्होंने तय किया कि वो वहाँ से अँधेरा होने के बाद ही आगे जाएंगे.

उन्होंने अभी अपनी आँखें बंद की ही थीं कि उन्हें लगा कि कुछ लोग उन्हें देख रहे हैं. उन्होंने जब आँखें खोली तो उन्होंने पाया कि तीन लोग और एक लड़का उन्हें घूर कर देख रहे हैं. उन्होंने उनसे पूछा कि आप कौन हैं?

भार्गव ने वही पुराना रटा रटाया जवाब दोहरा दिया कि मैं फ़्लाइट लेफ़्टिनेंट मंसूर अली ख़ाँ हूँ. भिटाला के पास भारतीय सेना ने मेरा जहाज़ गिरा दिया है. उन लोगों ने कहा कि आप हमारे साथ हमारे गाँव चलिए.

भार्गव ने लाख कहा कि मेरा हेलिकॉप्टर आने वाला है. वो मुझे कराची ले जाएगा, आप चलो. लेकिन वो गाँव वाले नहीं माने. उन्होंने कहा आप तो भारत की तरफ़ जा रहे थे. आप हमारे साथ हमारे गाँव चलो.

भार्गव ने पूछा हम सीमा से कितनी दूर हैं? उन्होंने कहा करीब 15 किलोमीटर. भार्गव को न चाहते हुए भी उनके साथ जाना पड़ा.

रिहाइश की जगह रावलपिंडी बताई

गाँव में भार्गव को एक जूट की चारपाई पर लिटाया गया. तब तक वहाँ गाँव के स्कूल का हेड मास्टर पहुंच गया. उसने उनसे सवाल पूछने शुरू कर दिए, "आप पाकिस्तान के किस इलाके से आते हैं?"

एयर कॉमॉडोर जवाहरलाल भार्गव याद करते हैं, "मैंने आत्मविश्वास के साथ जवाब दिया रावलपिंडी. उसने फिर पूछा रावलपिंडी में कहाँ रहते हैं? मुझे रावलपिंडी का कुछ भी अता-पता नहीं था. फिर भी मैंने कहा- मॉल रोड. इत्तेफ़ाक से रावलपिंडी में एक मॉल रोड था. मैंने उनसे पूछा कि यहाँ कोई पुलिस स्टेशन है. ये सुन कर मेरी जान में जान आई कि वहाँ दूर दूर तक पुलिस स्टेशन का नामोनिशान नहीं था."

"उन्होंने ये ज़रूर कहा कि उन्होंने मेरे बारे में रेंजर्स को इत्तला भिजवा दी है. मैंने पूछा कि उन्हें यहाँ आने में कितनी देर लगेगी? उन्होंने जब कहा कि उन्हें आने में तीन चार घंटे लगेंगे तो मैंने चैन की साँस ली. उन्होंने मेरे लिए चाय बनाई लेकिन तब तक मेरी पीठ में दर्द उठना शुरू हो चुका था."

अचानक पाकिस्तानी रेंजर्स गाँव में पहुंचे

तब तक शाम के 7 बजकर 40 मिनट हो चुके थे. फ़्लाइट लेफ़्टिनेंट भार्गव योजना बना रहे थे कि अब वो वहाँ से भागने की कोशिश करेंगे. उन्होंने अपने पास एक चाकू और पानी की चार बोतलें रख कर अपनी किट का सारा सामान गाँव के बच्चों में बाँट दिया.

तभी वहाँ चार पाकिस्तानी रेंजर्स ने उस झोपड़ी में प्रवेश किया. उनके लीडर थे नायक आवाज़ अली. एक बार फिर भार्गव ने वही पुरानी कहानी सुनाई कि वो फ़्लाइट लेफ़्टिनेंट मंसूर अली ख़ाँ हैं. उन्होंने कहा कि उन्हें बाथरूम जाना है.

आवाज़ अली ने उनके साथ दो हथियारबंद रेंजर भेज दिए. एक मिनट के लिए उन्होंने सोचा कि वो भाग निकलें लेकिन उस दिन पूर्णिमा थी. चाँद की रोशनी चारों तरफ़ फैली हुई थी.

उन दोनों के पास ऑटोमेटिक रायफ़लें थीं. उन्हें कोई शक नहीं था कि अगर वो भागते तो वो उन पर गोली चला देते. भार्गव झिझकते हुए वापस झोंपड़ी लौट आए.

रेंजर ने कलमा पढ़ने के लिए कहा

भार्गव याद करते हैं, "जब मैं लौटा तो मैंने देखा कि आवाज़ अली उन सब चीज़ों का मुआएना कर रहा था जो मैंने बच्चों में बाँटी थी. तभी उसे एक छोटे चाकू पर 'मेड इन इंडिया' लिखा दिख गया. उसने मेरी घड़ी देखी. उस पर पाकिस्तान का समय दिखाई दे रहा था. उसने मुझसे साफ़ कहा कि हमें आप पर शक है कि आप हिंदुस्तानी हैं. अब परेशान होने की बारी मेरी थी. फिर भी मैंने बहुत आत्मविश्वास से कहा कि तुम अपने अफ़सर को बुलाओ. उसने कहा कि मैं ही अफ़सर हूँ. मैंने भी कड़क कर जवाब दिया कि तुम अफ़सर नहीं नायक हो."

"आवाज़ अली ने मेरा आखिरी इम्तेहान लेते हुए पूछा ठीक है अगर आप मुसलमान हैं तो हमें कलमा पढ़ कर सुना दीजिए. मैंने तब तक सुना ही नहीं था कि कलमा क्या होता है. मैं तो सिर्फ़ कलम जानता था. मैंने उसे बेवकूफ़ बनाने की आखिरी कोशिश की. आवाज़ अली बहुत दिन हो गए मुझे कलमा पढ़े हुए. मुझे याद नहीं आ रहा है और मेरी पीठ में दर्द भी हो रहा है. आवाज़ अली ने कहा ठीक है मैं कलमा पढ़ रहा हूँ. आप उसे दोहरा भर दीजिए. मैंने कलमा पढ़ने से इंकार कर दिया. मैंने सोचा कि अगर मैं ग़लत कलमा पढ़ूँगा तो ये सारे गाँव वाले मिल कर मुझे पीटेंगे."

भार्गव ने स्वीकारा कि वो भारतीय पायलट हैं

अब आवाज़ अली को पूरा शक हो गया कि भार्गव उन्हें बेवकूफ़ बना रहें हैं. उसने अपनी राइफ़ल का बट ज़मीन पर ठोंकते हुए कहा, "बता दो आप कौन हो वर्ना हमें और भी तरीके आते हैं सच उगलवाने के."

भार्गव समझ गए कि उनका खेल ख़त्म हो गया है. उन्होंने कहा, "मैं भारतीय एयरफ़ोर्स का फ़्लाइट लेफ़्टिनेंट जवाहरलाल भार्गव हूँ. आप जो चाहें मेरे साथ कर लीजिए."

लेकिन तब तक गाँव वालों की सहानुभूति भार्गव के साथ हो चली थी. भार्गव बताते हैं, "उन्होंने रेंजर्स से कहा कि हम उन्हें खाना खाए बग़ैर नहीं जाने देंगे. उन्होंने मुझसे पूछा कि आप बड़े का गोश्त खाते हैं या छोटे का?"

"मुझे पता ही नहीं था कि ये बड़ा छोटा क्या होता है. जब उन्होंने समझाया तो मैंने कहा मैं बड़े का गोश्त नहीं खाता हूँ. तब उन्होंने ख़ास तौर से मेरे लिए चिकन करी और चावल बनाए. जब खाना बन रहा था तो इतनी परेशानी के बावजूद मैं वहीं पलंग पर सो गया."

"रात के 11 बजे किसी ने मुझे जगाकर कहा कि खाना तैयार है."

भार्गव को आखों में पट्टियाँ बाँध कर ऊँटों पर बैठाया गया

खाने के बाद रेंजर्स ने भार्गव को ऊँट पर बैठाया. उनकी आँखों पर पट्टी बाँध कर उनके दोनों हाथों में हथकड़ी लगा दी गई. वो भाग्य को कोस रहे थे कि भारतीय सीमा से सिर्फ़ 15 किलोमीटर पहले वो पाकिस्तानी रेंजर्स के हाथ पड़ गए थे.

तीन ऊँटों का काफ़िला रवाना हुआ. बीच के ऊँट पर फ़्लाइट लेफ़्टिनेंट भार्गव बैठे हुए थे. उसको रेंजर मोहब्बत अली चला रहे थे. अगले दिन दोपहर 12 बजे उन्हें अपने ऊपर विमानों की गर्जना सुनाई दी.

जवाहरलाल भार्गव ने पूरे काफ़िले को आगाह किया कि वो ऊँटों को बैठा दे वर्ना भारतीय विमान उन्हें अपना निशाना बना लेंगे. रेंजर्स ने उनका कहना माना. लेकिन तभी रेंजर्स का एक और दल वहाँ पहुंच गया. उनमें से एक ने भार्गव से पूछा कि वो सैनिक वर्दी में क्यों नहीं हैं. उन्होंने जवाब दिया कि उनका जी सूट भारी था इसलिए उन्होंने उसे उतार कर ज़मीन में गाड़ दिया.

जवाहरलाल भार्गव याद करते हैं, "उस रेंजर को मुझ पर शक हो गया कि मैं कोई जासूस हूँ. उसने आवाज़ अली से पंजाबी में कहा, 'गोली मार डल्ले नू.' मैंने घबरा कर कहा कि अगर वो मुझे गोली मारना चाहते हैं तो मेरी आँखों से पट्टी हटा लें. आवाज़ अली ने मुझे आश्वस्त किया कि उनका ऐसा करने का कोई इरादा नहीं है."

पाकिस्तानी अफ़सर की दरियादिली

पाँच दिन लगातार चलने के बाद फ़्लाइट लेफ़्टिनेंट भार्गव को कराची के पाकिस्तानी वायुसेना ठिकाने पर ले जाया गया. रास्ते में उनकी मुलाकात पाकिस्तानी सेना के कैप्टन मुर्तज़ा से हुई.

उन्होंने उनकी आँखों की पट्टी और हथकड़ियाँ खुलवा दीं. उन्होंने उन्हें पीने के लिए सिगरेट दी और दाढ़ी बनाने के लिए अपना खुद का शेविंग किट भी दिया. उन्होंने उन्हें एक बार भी ये आभास नहीं होने दिया कि वो उनके दुश्मन हैं और भार्गव उनके क़ैदी हैं.

आखिरकार 12 दिसंबर को भार्गव को विमान से रावलपिंडी के युद्धबंदी कैंप लाया गया जहाँ पहले से युद्धबंदी बनाए गए 12 भारतीय पायलट मौजूद थे.

क्रिसमस के दिन कैंप के कमाँडर ने उन सब के लिए एक केक मंगवाया जिसे सबसे वरिष्ठ भारतीय अधिकारी विंग कमाँडर कोएलहो ने काटा.

जब तक उन्हें ख़बर मिल चुकी थी कि पाकिस्तानी सैनिकों ने ढाका में भारतीय सैनिकों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है. भार्गव और उनके साथी पाकिस्तानी जेल में एक साल तक रहे.

अड़ंगे के बाद रिहाई

30 नवंबर, 1972 को लायलपुर जेल में रह रहे सभी भारतीय युद्धबंदियों से कहा गया कि वो उन्हें दी गई पाकिस्तानी सेना की ख़ाकी वर्दी पहन लें. उन्हें एक विशेष ट्रेन से लाहौर ले जाया गया.

1 दिसंबर को उन्हें बसों में सवार कर वाघा सीमा पर लाया गया. दूसरी तरफ़ भारत के इलाके में पाकिस्तानी युद्धबंदियों को लाया गया. दोनों देशों के युद्धबंदी अपने अपने देश लौट रहे थे. भारतीय युद्धबंदियों को वाघा सीमा से 100 मीटर पहले एक टेंट में रखा गया था.

सबसे पहले सैनिकों ने सीमा पार की. उनके बाद सेना के अफ़सरों का नंबर आया. सबसे आखिर में भारतीय पायलटों की बारी आई. तभी रंग में भंग हुआ और एक पाकिस्तानी अफ़सर ने आकर ऐलान किया कि भारतीय पायलटों का जाना रोक दिया गया है.

जवाहरलाल भार्गव को वो दिन अभी तक याद हैं, "उधर बैंड बज रहे थे, नाच हो रहा था और हमें बताया गया कि तुम वापस नहीं जाओगे. हम लोगों का दिल टूट गया. लेकिन उन्होंने हमसे कहा कि इस मामले में सीधे राष्ट्रपति भुट्टो से बात की जा रही है. हुआ ये था कि भारत ने पश्चिमी क्षेत्र में पकड़े गए सभी पाकिस्तानी युद्धबंदी तो लौटा दिए थे लेकिन पाकिस्तानी पायलटों को रिहा नहीं किया था. लेकिन भुट्टो ने भारतीय पायलटों को भारत भेजने का फ़ैसला किया."

"अगले दिन भारतीय थल सेनाध्यक्ष सैम मानेक शॉ खुद अपने विमान में पाकिस्तानी पायलटों को लेकर पाकिस्तान पहुंचे."

अमृतसर और दिल्ली में अभूतपूर्व स्वागत

साढ़े 11 बजे भारतीय पायलटों ने वाघा की सीमा पार की. वहाँ पर पंजाब के मुख्यमंत्री ज्ञानी ज़ैल सिंह ने गले लगा कर उनका स्वागत किया.

भारतीय सेना की काली एंबेसडर कार उन्हें भारतीय वायुसेना के अमृतसर बेस लेकर गई.

वहाँ इन लोगों ने साल भर बाद अच्छा गर्म खाना खाया और बियर पी. उसी शाम 5 बजे अमृतसर के कंपनी बाग में इन युद्धबंदियों का नागरिक अभिनंदन किया गया.

फिर इन पायलटों को एवरो जहाज़ में बैठा कर दिल्ली के पालम हवाई अड्डे लाया गया जहाँ वायु सेनाध्यक्ष पीसी लाल और उनके परिवारजनों ने उनका स्वागत किया.

जब भार्गव के चार साल के बेटे ने उन्हें अंकल कह कर संबोधित किया तो वो अपने आँसू नहीं रोक पाए.

एक साल के भीतर उसे अपने पिता की शक्ल याद नहीं रही थी. भार्गव को वो कलमा अब ज़ुबानी याद है जिसकी वजह से उन्हें पाकिस्तान में गिरफ़्तार होना पड़ा था- 'ला इलाहा इल्लल लाहू, मुहमद्दुर रसूलुल्लाह.'

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