You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
बाल दिवस: देश के अनाथालयों में लड़कों से 38 फ़ीसदी अधिक लड़कियां
- Author, अर्जुन परमार
- पदनाम, बीबीसी गुजराती सेवा
आज 14 नवंबर यानी 'बाल दिवस' है. वो दिन जिसे देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने बच्चों को समर्पित किया.
आज ही के दिन सूरत के सिविल अस्पताल में एक 15 दिन की बच्ची का इलाज चल रहा है. वह 28 अक्टूबर को सूरत के भेस्तान इलाके में कूड़े के एक ढेर से मिली थी.
भरतभाई बेल नाम के एक व्यक्ति को ये अनाथ बच्ची मिली जिसे वे सीधा अस्पताल ले आए. उनकी संवेदनशीलता और समय रहते हुए उठाए गए कदम ने बच्ची की जान बचाई.
उस घटना को याद करते हुए भरत भाई बेल कहते हैं, "मेरी आंखों में अब भी आंसू आ जाते हैं क्योंकि मुझे याद है कि वह वहां कैसे पड़ी हुई थी. वो बेहद पवित्र है, मुझे नहीं पता कि मेरे आंसू उसकी हालत के लिए थे या उसकी मासूमियत के लिए थे, या फिर उसके निर्दयी और क्रूर पिता की ऐसी हरक़त इसकी वजह थे.''
''उसे एक बैग में बंद करके कूड़े के ढेर पर रखा गया था और सड़कों पर रहने वाले कुत्ते उस बैग को नोच कर बच्ची को बाहर निकालने की कोशिश कर रहे थे.''
भरतभाई ने बच्ची को बैग से निकाला, वह बेहोश थी. उन्होंने बच्ची को साफ़ किया और मुंह में सांस दे कर उसकी जान बचाई.
महिलाओं को देवी माने जाने वाले देश भारत में ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है, बल्कि देश के कई राज्यों से ऐसी परेशान करने वाली घटनाएं सामने आती रहती हैं.
इस मुद्दे को समझने और बच्चियों की इस दयनीय स्थिति के पीछे की वजहों को समझने के लिए हमने जानकारों और इस क्षेत्र में काम कर रहे लोगों से बात की.
ये भी पढ़ें -
क्यों बच्चियों को छोड़े जाने के मामले ज़्यादा होते हैं?
पंजाब के जालंधर में ऐसे बच्चों के लिए 'यूनिक केयर' नाम से संस्था चलाने वाली प्रकाश कौर ने बीबीसी गुजराती से कहा कि आज के भारतीय समाज की सच्चाई यही है कि माता-पिता अपनी बेटियों को ज़्यादा छोड़ते हैं.
प्रकाश कौर को उनके काम के लिए साल 2018 में पद्म श्री पुरस्कार मिला. वह इसे "गंभीर सामाजिक समस्या" के रूप देखती हैं.
उन्होंने कहा, "लड़कों की तुलना में लड़कियों को छोड़ने की घटनाएं ज़्यादा होती है, यह मुख्य रूप से हमारे समाज की संरचना के कारण है, जहां बेटियों को एक ज़िम्मेदारी के रूप में देखा जाता है, समाज की अदूरदर्शिता, शिक्षा की कमी और शैक्षिक व्यवस्था में समस्याएं."
वह इस तरह की स्थिति के लिए समाज की मानसिकता को भी जिम्मेदार ठहराती हैं.
वह कहती हैं, "हमारे भारतीय समाज में आज भी बेटे को परिवार का वारिस माना जाता है, जबकि लड़कियों को बोझ माना जाता है. लेकिन यही सच्चाई है, हमारी दिनचर्या या रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा है ये सोच."
''इसके अलावा हम अपने बच्चों को यह नहीं सिखाते कि लड़के और लड़कियां एक समान होते हैं. स्कूल में भी हम उन्हें सही रवैया नहीं सिखाते. इसी कारण लोगों में इस तरह की उदासीनता आ जाती है."
प्रकाश कौर ने यह भी मांग की है कि बच्चों को इस तरह छोड़ने वालों के खिलाफ़ सख़्त कार्रवाई की जाए.
वह कहती हैं, "मौजूदा क़ानूनी प्रावधानों के तहत, बच्चों को छोड़ना ज़मानती अपराध है, इसलिए ऐसा करने वालों को आसानी से रिहा कर दिया जाता है. लेकिन इस कानून में एक बच्चे की ज़िंदगी पर पैदा हुए जोख़िम पर ध्यान नहीं दिया गया. लोगों के मन में डर पैदा करने के लिए सख़्त क़ानूनों की ज़रूरत है. वर्तमान प्रावधान इसे रोकने के लिए अपर्याप्त हैं."
सेंट्रल एडॉप्शन रिसोर्स अथॉरिटी की पूर्व अध्यक्ष एलोमा लोबो ने भी बच्चियों को छोड़ने को जघन्य अपराध बताया.
वह कहती हैं, "इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि लड़कों की तुलना में लड़कियां अधिक छोड़ी होती हैं. जब भी किसी की तीसरी-चौथी संतान लड़की होती है, तो वे उसे लेकर इस तरह विकल्पों के बारे में सोचना शुरू कर देते हैं. कई मामलों में ऐसा ही हुआ है."
ये भी पढ़ें -
अनाथ आश्रमों में 38 फ़ीसदी ज़्यादा लड़कियां
बीबीसी गुजराती ने सूचना के अधिकार के ज़रिए सेंट्रल एडॉप्शन रिसोर्स अथॉरिटी से जानकारी जुटाई और पाया कि देशभर के अनाथाश्रमों में 1032 लड़कों के मुक़ाबले 1432 लड़कियां गोद लेने के लिए उपलब्ध हैं.
इसे अगर प्रतिशत के आधार पर समझें तो बच्चियां लड़कों के मुक़ाबले 38% अधिक है.
0 से 2 वर्ष के आयु वर्ग में, देश भर में 188 लड़के अनाथाश्रमों में गोद लेने के लिए उपलब्ध हैं. वहीं, इस आयु वर्ग में लड़कियों की संख्या 241 है.
इन आंकड़ों को प्रतिशत के आधार पर समझें तो लड़कियां, लड़कों के मुकाबले 28 फ़ीसदी ज़्यादा हैं.
हर साल लड़कों की तुलना में लगभग 40 प्रतिशत अधिक लड़कियों को गोद लिया जाता है, फिर भी देश भर के बालगृहों में गोद लेने के लिए अधिक लड़कियां उपलब्ध हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की परिस्थिति के लिए बच्चियों को छोड़े जाने की बढ़ती घटनाएं ज़िम्मेदार हैं.
लोबो कहती हैं, "माता-पिता की पसंद के अलावा, लड़कियों की अधिक उपलब्धता भी उनके अधिक गोद लिए जाने का एक अहम कारण है. "
''हमारे समाज में बेटियों को कई कारणों से बोझ समझा जाता है. जिसके कारण माता-पिता लड़कियों को छोड़ देते हैं. यहां तक कि अगर कोई बच्चा विकलांग है, अगर वह एक बच्ची है तो उसके छोड़े जाने की संभावना अधिक है, जबकि लड़के के मामले में माता-पिता किसी भी तरह उसे परिवार के साथ ही रखते हैं. ये दुखद वास्तविकता है."
प्रकाश कौर आम लोगों से अपील करती हैं कि वे लड़कियों को स्वीकार करें और, अगर कोई शख़्स बच्चियों को छोड़ने पर मजबूर है तो उसे 'यूनीक केयर' को सौंप दें.
वह कहती है, "बेटियां प्यार का सागर हैं. उन्हें मत छोड़िए. उन्हें हमें दे दीजिए, हम आपके पास आएंगे और बच्ची को ले जाएंगे. लेकिन उन्हें फेंकिए या मारिए मत उन्हें जीने दीजिए."
ये भी पढ़ें -
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)