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चीन: इतिहास में शी जिनपिंग को मज़बूत बनाने वाला 'ऐतिहासिक प्रस्ताव' पारित
चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने राजनीतिक इतिहास में राष्ट्रपति शी जिनपिंग की स्थिति को मज़बूत करते हुए एक 'ऐतिहासिक प्रस्ताव' पारित किया है.
इस दस्तावेज़ में पार्टी के पिछले 100 सालों के इतिहास के सारांश के साथ पार्टी की प्रमुख उपलब्धियों और भविष्य की दिशाओं की चर्चा की गई है.
कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना के बाद से ये अपनी तरह का केवल तीसरा प्रस्ताव है. सबसे पहला प्रस्ताव, 1945 में माओत्से तुंग ने और फिर दूसरा प्रस्ताव देंग शियाओपिंग ने 1981 में पारित किया था.
इस ताज़ा प्रस्ताव को गुरुवार को पार्टी के छठे महाधिवेशन में पारित किया गया. इस अधिवेशन को चीन के सबसे अहम राजनीतिक बैठकों में से एक माना जाता है.
इस तरह ऐसे प्रस्ताव जारी करने वाले शी जिनपिंग चीन के केवल तीसरे नेता बन गए है. पार्टी के इस कदम का मकसद शी जिनपिंग को पार्टी के संस्थापक माओत्से तुंग और उनके उत्तराधिकारी देंग शियाओपिंग के बराबर खड़ा करना है.
कई पर्यवेक्षकों का मानना है कि ये प्रस्ताव देंग शियाओपिंग के समय में चीन द्वारा शुरू किए गए विकेंद्रीकरण के प्रयासों को वापस लेने की कोशिश है. पिछले क़रीब चार दशकों से देश में विकेंद्रीकरण का प्रयास होता रहा है. ताज़ा घटनाक्रम के बारे में बताया जा रहा है कि ये चीन की राजनीति के फिर से एक शख़्सियत के आसपास घूमने के संकेत हैं.
बंद दरवाजे में हो रहे चार दिन के इस अधिवेशन में पार्टी की 19वीं केंद्रीय समिति के 370 से अधिक पूर्ण और वैकल्पिक सदस्य इकट्ठे हुए. पार्टी की केंद्रीय समिति देश के शीर्ष नेताओं का समूह है.
अगले साल होने वाली राष्ट्रीय कांग्रेस से पहले पार्टी के नेताओं की ये आख़िरी बड़ी बैठक थी. और उम्मीद है कि उस कांग्रेस में शी जिनपिंग राष्ट्रपति के रूप में अपना तीसरा ऐतिहासिक कार्यकाल पाने की कोशिश करेंगे.
इससे पहले चीन ने 2018 में राष्ट्रपति पद के लिए दो कार्यकालों की सीमा ख़त्म कर दी थी. इससे शी आजीवन अपने पद पर बने रह सकते हैं.
ये प्रस्ताव इतना अहम क्यों?
बीबीसी से बातचीत में विशेषज्ञों ने बताया कि इस प्रस्ताव के पारित होने से चीन की सत्ता पर शी की पकड़ अनिवार्य रूप से मज़बूत हो जाएगी.
चीन की समसामयिक पत्रिका चाइन नीकन के संपादक एडम नी ने बताया, "वो राष्ट्र के रूप में चीन की यात्रा में शी जिनपिंग ख़ुद को नायक के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं."
उन्होंने कहा, "ऐतिहासिक प्रस्ताव को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने ख़ुद को पार्टी और आधुनिक चीन की भव्य गाथा के केंद्र में रखा है. शी अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहे हैं. ये दस्तावेज़ उन्हें ख़ुद को सत्ता में बनाए रखने का भी एक ज़रिया है."
सिंगापुर के नेशनल यूनिवर्सिटी के डॉ. चोंग जा इयान ने कहा कि इस ताज़ा घटनाक्रम ने शी जिनपिंग को पहले के बाक़ी नेताओं से अलग कर दिया है.
डॉ. चोंग ने कहा, "देश के पहले के नेताओं हू जिंताओ और जियांग जेमिन के पास शी जितना ठोस अधिकार कभी नहीं था. इसमें कोई दो राय नहीं कि वर्तमान में शी जिनपिंग पर बहुत ज़ोर है."
देंग शियाओपिंग और माओत्से तुंग दोनों नेताओं ने जब ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किए थे, तो उन्होंने उसका इस्तेमाल अतीत के साथ जुड़ाव ख़त्म करने के लिए किया था.
1945 के पहले प्रस्ताव ने माओ को अपने नेतृत्व को मजबूत बनाने में मदद की. इसका मकसद 1949 में पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के निर्माण की घोषणा करते समय उनके पास पूर्ण अधिकार रहे.
वहीं देंग शियाओपिंग ने 1978 में अपना पदभार संभालने के बाद 1981 में दूसरे ऐतिहासिक प्रस्ताव को पारित करवाया. इसमें उन्होंने 1966 से 1976 के बीच की सांस्कृतिक क्रांति के दौरान माओ की "ग़लतियों" की आलोचना की, जिसके चलते लाखों लोग मारे गए थे. उन्होंने चीन के आर्थिक सुधारों की नींव भी रखी.
लेकिन नी के अनुसार, पहले के प्रस्तावों के विपरीत शी जिनपिंग के ताज़ा प्रस्ताव का मकसद निरंतरता बनाए रखना है.
आख़िरकार, शी जिनपिंग का प्रस्ताव ऐसे समय में आया है, जब चीन दुनिया की एक महाशक्ति बन गया है. कुछ दशक पहले इस बात की शायद कल्पना ही की जा सकती थी.
वो कहते हैं, "कई मायनों में शी के नेतृत्व में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी और चीन उपलब्धियों के शिखर पर पहुंच गया है."
फिर भी जानकारों का मानना है कि राजनीति में कुछ भी "अजीब" हो सकता है. शी के अपना नेतृत्व बनाए रखने की सभी संभावनाओं के बावजूद कुछ भी हो सकता है.
नी कहते हैं, "चीन की कुलीन राजनीति पारदर्शी नहीं है. और बहुत कुछ ऐसा है जिसे हम नहीं जानते."
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