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अजय सोनकर की कहानी जिन्होंने मोती उगाने की दुनिया में जापानी वर्चस्व को दी थी चुनौती
- Author, प्रदीप कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
एक साधारण परिवार से निकले शख़्स की असाधारण उपलब्धियों को हासिल करने की ये एक ऐसी कहानी है जिस पर यक़ीन नहीं होता.
ये कहानी है इलाहाबाद से निकले और दुनिया भर में भारत का नाम रोशन करने वाले एक्वाकल्चरल साइंटिस्ट डॉक्टर अजय कुमार सोनकर की जिन्होंने क़रीब तीन दशक पहले कल्चर मोती बनाने वाले देशों में भारत का नाम शामिल कराने का करिश्मा कर दिखाया था.
बीते तीन दशक के अपने करियर में सोनकर ने मोती उगाने को लेकर अलग अलग तरह की उपलब्धियां हासिल की हैं. लेकिन सबसे पहले बात उनके नये काम की.
डॉक्टर सोनकर ने टिश्यू कल्चर के ज़रिए फ़्लास्क में मोती उगाने का काम कर दिखाया है. सरल शब्दों में कहें तो सीप के अंदर जो टिश्यू होते हैं उन्हें बाहर निकालकर कृत्रिम वातावरण में रखकर उसमें मोती उगाने का करिश्मा उन्होंने किया है. यानी मोती उगाने के लिए सीप पर से निर्भरता ख़त्म हो गई है और इसके साथ ही उस सीप के लिए ज़रूरी समुद्री वातावरण की भी कोई ज़रूरत नहीं रही.
समुद्री जीव जंतुओं की दुनिया पर केंद्रित साइंटिफ़िक जर्नल 'एक्वाक्लचर यूरोप सोसायटी' के सितंबर, 2021 के अंक में डॉक्टर अजय सोनकर के इस नए रिसर्च को प्रकाशित किया गया है. इस रिसर्च के मुताबिक डॉक्टर अजय सोनकर ने अंडमान निकोबार द्वीप समूह के सीपों के टिश्यू से मोती उगाने का काम प्रयागराज के अपने लैब में किया है.
मतलब सीप से निकाला गया टिश्यू क़रीब दो हज़ार किलोमीटर दूर भी नेचुरल तौर पर अपना काम करने में सक्षम रहा है जो समुद्र के प्राकृतिक वातावरण में वह करता है.
डॉक्टर अजय कुमार सोनकर ने शोध के बारे में बताया, "पिंकटाडा मार्गेरेटिफ़ेरा सीप बेहद खारे जल वाले समुद्र में होते हैं. उनके मेंटल को निकालकर मैं उन्हें दो हज़ार किलोमीटर दूर प्रयागराज के अपने लैब में ले आया. उस मेंटल को सुरक्षित रखने के तमाम उपाय किए और उसे प्रयागराज लाने में भी हमें 72 घंटे का वक्त लगा, लेकिन वह पूरी तरह जीवित और हेल्दी था. फिर उसे कल्चर करके उसमें इंजेक्ट किया, उसने ना केवल पर्ली कंपोनेंट बनाया बल्कि पर्ल भी तैयार हो गया."
उनके इस नई तकनीक को अहम बताते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की लखनऊ स्थित संस्था नेशनल ब्यूरो ऑफ़ फ़िश जेनेटिक रिसोर्सेज़ के निदेशक डॉक्टर कुलदीप के लाल ने कहा, "निश्चित तौर पर डॉक्टर सोनकर का नया काम बेहद अहम है. इससे मोती उगाने की तकनीक में आमूलचूल बदलाव आ सकता है. मोती उगाने की तकनीक से समुद्र पर निर्भरता नहीं रहेगी. यह अपने आप में अचरज में डालने वाला काम है."
अब तक कृत्रिम पर्ल उगाने की कल्पना समुद्र में पाए जाने वाले सीप और कौड़ियों के बिना नहीं की जाती है. शंख और कौड़ी की तरह मोती भी सीप या पानी में मिलने वाले मत्स्य समूह के दूसरे जीवों के जैविक उत्पाद हैं.
ये जीव सांस लेने के लिए जब मुंह खोलते हैं तो कभी-कभी बाहर की कोई चीज़ उनके अंदर चली जाती है, वे पहले तो उसको शरीर से बाहर निकालने की कोशिश करते हैं, लेकिन जब कामयाब नहीं होते तो अपनी तकलीफ़ को कम करने के लिए शरीर से एक ख़ास तरह का रसायन उस पर छोड़ते हैं. रसायन के प्रभाव से यह चीज़ समय के साथ मोती के रूप में तब्दील हो जाती है. हालांकि प्राकृतिक तौर पर मोती का बनना दस लाख सीप में से एक में हो पाता है.
लेकिन कृत्रिम मोती उगाने की तकनीक ने मोतियों की दुनिया को काफ़ी बदला है और अजय सोनकर का नया काम उसी दिशा में अहम क़दम माना जा रहा है. वैसे अजय सोनकर ने ये काम अपने करियर के सबसे मुश्किल भरे दौर में किया है. उनकी उस मुश्किल की कहानी जानने से पहले उनके सफ़र के बारे में जानना रोचक है.
प्रयागराज से दुनिया को चौंकाने वाले सोनकर
डॉक्टर अजय सोनकर का नया काम भले अचंभे में डालने वाला हो, लेकिन मोती उगाने की दुनिया में बीते तीन दशक में वे इसी तरह के नये नये कामों से दुनिया को चौंकाते आए हैं. मोती बनाने को लेकर उनकी दिलचस्पी इलाहाबाद के कटरा में 1991 में शुरू हुई थी.
भौतिकी, रसायन और गणित पढ़ने वाले सोनकर इंजीनियर बनना चाहते थे और वारंगल रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज से उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई भी पूरी की. लेकिन उन्हीं दिनों दूरदर्शन पर दोपहर में आने वाले यूजीसी के शैक्षणिक कार्यक्रम पर आधारित टीवी शो के एक एपिसोड में प्रसारित एक स्टोरी ने उनके जीवन को बदल दिया.
उस एपिसोड के बारे में सोनकर बताते हैं, "उस स्टोरी में जापानी पर्ल कल्चर के बारे में बता रहे थे, जब मैंने सीप में से उन लोगों को मोती निकालते देखा तो फिर तो मेरी दिलचस्पी उसमें हो गई. इसकी वजह ये थी कि हमारे पास एक तालाब था और उसमें सीप थे. तो आप कह सकते हैं कि मेरे दिमाग़ में ये धंस गया कि मैं भी मोती बना सकता हूं, हालांकि मुझे तकनीक के बारे में कुछ भी मालूम नहीं था और इंटरनेट का तब जन्म ही हुआ था और भारत में वह मौजूद नहीं था."
डॉक्टर अजय कुमार सोनकर अपने शुरुआती दिनों के बारे में बताते हैं, "मैं जेब में सीप डालकर इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के जंतु विभाग के एक प्रोफ़ेसर साहब से पूछने चला गया कि सर ये क्या होता है तो उन्होंने कहा इसे मसल्स कहते हैं. मैंने पूछा कि सर ये खुलता कैसे है तो उन्होंने कहा पानी में उबालो. तब मैं ने कहा कि सर ये तो मर जाएगा, तो बोले और नहीं तो क्या, मरने के बाद ही इसे खोलते हैं, यूनिवर्सिटी में जितने सीप हैं सब मरे हुए ही हैं."
अजय कुमार सोनकर को अंदाज़ा तो हो गया था कि मोती उगाना इतना आसान नहीं है. लेकिन उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी. उन्होंने बताया, "इलाहाबाद के दरंभगा कॉलोनी के पास मत्स्य विभाग का कार्यालय था. वहां के निदेशक से डरते-डरते पूछा कि मेरे पास तालाब है और मैं मोती उगाना चाहता हूं, कोई मदद मिलेगी. उन्होंने मुझे ऊपर से नीचे देखा और कहा कि यहां तो हमलोग मछली उगा नहीं पा रहे हैं, तुम्हें मोती सूझ रहा है. पढ़ो लिखो, पढ़ने-लिखने की उम्र है तु्म्हारी. मोती फ़्रेश वॉटर में नहीं होता है, किसी दिन समुद्र ले आओ मेरे पास तो फिर देखा जाएगा.
लेकिन सोनकर ने हार नहीं मानी. कल्चर मोती बनाने की जानकारी जुटाने की कवायद शुरू हुई. लेकिन तब की दुनिया में सूचनाओं को हासिल करने का कोई आसान तरीका उपलब्ध नहीं था. लेकिन कहते हैं कि लगन सच्ची हो तो फिर रास्ता बनने लगता है.
कहां से मोती बनाने की मिली प्रेरणा
इलाहाबाद स्टेशन पर एएच व्हीलर की दुकान पर संयोग से उन्हें नेशनल ज्योग्राफ़िक का पुराना अंक मिल गया, जो कल्चर मोती निर्माण के बारे में जानकारी पर आधारित विशेषांक था. सोनकर ने उसे ना केवल ख़रीदा बल्कि आज तक संभाल कर रखा है.
इन सबके साथ अपने तालाब के सीपों के साथ उन्होंने अपनी समझ से प्रयोग करना शुरू कर दिया. सीपों को पकड़ कर बड़े-बड़े बर्तनों में रखना और उसे टकटकी लगाए देखना, सोनकर का शगल बन गया था. मिडिल क्लास समाज में यह काम इतना भी आसान नहीं था.
जल्दी ही उन्हें पता चल गया कि ये सीप सांस लेने के लिए मुंह खोलते हैं और ये भी मालूम था कि कोई बाहरी चीज़ के अंदर जाने पर वह मोती बन सकता है. उन्होंने बताया, "जब मैंने पढ़ना शुरू किया तो मुझे पता चला कि दुनिया भर में मोती उगाने वाली तकनीक केवल जापान के पास थी, वे दूसरे देशों को बताते नहीं थे. और बेहतर मोती बनाने के लिए जो रॉ मैटेरियल यानी न्यूक्लियस इंजेक्ट करना पड़ता है वो अमेरिका के मिसीसिपी नदी में मिलता है. लेकिन अमेरिका में तकनीक नहीं थी. तो मोती बनाना है तो जापान से मदद लेनी होती थी."
लेकिन शुरुआती दिनों में सीप के मुंह खोलने पर सोनकर ने व्हाइट सीमेंट के छोटे-छोटे टुकड़े डालकर अपना प्रयोग शुरू किया था. उन दिनों को याद करके सोनकर बताते हैं, "क्या बताएं, जब भी कोई मिलता था तो पूछता भइया बन गया मोती. तंज़ में लोग कहते भइया आजकल मोती उगा रहे हैं. माता-पिता कहते कि पगला गया है. लेकिन मुझे इनसे फ़र्क़ नहीं पड़ रहा था."
ये थकाने वाला नाउम्मीदी से भरा प्रयोग सोनकर ने केवल अपनी ज़िद पर कायम रखा और महज़ डेढ़ साल के अंदर उन्होंने फ़्रेश वॉटर के अंदर कृत्रिम मोती बनाकर दुनिया भर को अचंभे में डाल दिया, वह भी बिना जापानी मदद के.
यह पहला मौका था जब कृत्रिम मोती उगाने की दुनिया में जापान को चुनौती मिली थी. 1993 में हासिल इस कामयाबी ने रातों रात अजय सोनकर को सुर्ख़ियों में ला दिया. सोनकर के मुताबिक पहली बार सैकड़ों सीपों में से 36 में मोती बना था, परिवार वाले तो अचरज में थे, लेकिन मैं सोच में डूबा था कि बाक़ी में क्यों नहीं बना.
उनकी इस उपलब्धि को तब दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले गिरीश कर्नाड के चर्चित कार्यक्रम 'टर्निंग प्वाइंट' में दिखाया गया था. आप उस एपिसोड की झलक यहां देख सकते हैं.
14 से 19 मई, 1994 में अमेरिका के हवाई द्वीप पर पर्ल कल्चर का पहला इंटरनेशनल कॉन्फ़्रेंस आयोजित हुआ और उस आयोजन में शामिल होने का निमंत्रण सोनकर को भी मिला. सोनकर याद करते हैं, "मैं वहां स्टेट गेस्ट था. उन लोगों ने हवाई यात्रा का टिकट भेजा था. पहली बार हवाई जहाज़ में चढ़ना था. हवाई द्वीप पहुंचा तो वहां तरह-तरह के लोगों को देखकर घबरा ही गया था. ऊपर से मैं सबसे कम उम्र का था. मैंने रास्ता निकाला. सोचा कि लोगों की तरफ़ देखूंगा ही नहीं, कॉन्फ़्रेंस हॉल में जब मैंने अपना पर्चा पढ़ा तो एक बार भी नज़र पर्चे से नहीं हटाया. जब पर्चा पूरा हुआ तो देखा लोग खड़े होकर ताली बजा रहे हैं. मैं आज भी उसको नहीं भूल पाया हूं."
हालांकि तब से शुरू हुआ सफ़र आज भी जारी है और दुनिया भर के कम से कम 68 देशों में पर्ल कल्चर के बारे में अजय सोनकर अपना व्याख्यान दे चुके हैं. उनके दर्जनों शोध पत्र कई एक्वाकल्चरल जर्नल में प्रकाशित हो चुके हैं.
इसके बाद दो साल के अंदर 1996 में अजय सोनकर ने 22 मिलीमीटर लंबा न्यूक्लियस बनाया, जो कृत्रिम मोती निर्माण की दुनिया में सबसे बड़ा न्यूक्लियस आंका गया है. इस न्यूक्लियस को अमेरिका में जांचा गया और कृत्रिम मोती बनाने की दुनिया में सबसे प्रतिष्ठित साइंटिस्ट डॉक्टर सी रिचर्ड फ़ॉस्लर ने इसकी अमेरिकी बाज़ार में क़ीमत 30 हज़ार डॉलर के क़रीब आंकी, जो जापान और अमेरिकी न्यूक्लियस की तुलना में पांच से छह गुना ज़्यादा थी.
सोनकर के काम की चर्चा जब दुनिया भर में फैली तब भारत सरकार की सेंट्रल मरीन फ़िशरीज रिसर्च इंस्टीट्यूट ने भी 1999 में उन्हें अपने काम करने का ऑफ़र दिया था. लेकिन तब तक अपने अध्ययन और रिसर्च के आधार पर सोनकर ने भारत के अंडमान निकोबार द्वीप समूह के समुद्री क्षेत्र में काम करने का फ़ैसला लिया और उन्होंने केंद्र सरकार और स्थानीय प्रशासन की अनुमति से 2003 से वहां काम शुरू किया.
दरअसल अंडमान के समुद्री क्षेत्र में सीप की पिंकटेडा मार्गेरेटिफ़ेरा नामक प्रजाति पायी जाती है, जिससे काला मोती बनाया जा सकता था. देखते-देखते सोनकर ने काले पानी के लिए जाने जाने वाले अंडमान को काले मोती के केंद्र के तौर पर स्थापित कर दिया.
अंडमान के गर्व से मुश्किलें झेलने तक
हालांकि वे अपना काम स्वतंत्र रूप से कर रहे थे, कृत्रिम मोती के बाज़ार में उनके मोतियों की मांग बढ़ने लगी थी. अंडमान प्रशासन उनके काम को अपनी उपलब्धियों के तौर पर पेश करता रहा.
उनके काम की सराहना भारत के राष्ट्रपति आर के नारायण से लेकर अब्दुल कलाम और रामनाथ कोविंद तक ने की. सोनकर इन लोगों से मिलकर अपने काम के बारे में जानकारी देते रहे. इसी क्रम में उन्होंने 43 एमएम का गणेश की प्रतिलिपि वाला मोती बनाकर भी दुनिया का ध्यान आकर्षित किया था.
लेकिन कहते हैं कि समय एक-सा नहीं रहता और सोनकर के लिए मुश्किलों का दौर शुरू हुआ. 2019 में अंडमान प्रशासन ने उन्हें समुद्र में काम बंद करने को कहा. इसके लिए प्रशासन ने सेंट्रल मरीन फ़िशरिज़ रिसर्च इंस्टीट्यूट के उस अध्ययन का हवाला दिया जिसमें कहा गया है कि अंडमान में पिंकटेडा मार्गेरेटिफ़ेरा की उपलब्धता इतनी अधिक नहीं है कि उसका कमर्शियल उत्पादन किया जा सके.
इसके बाद सोनकर का दावा है कि समुद्र तल के ऊपर बने प्रयोगशाला पर अज्ञात लोगों ने हमला किया और उसे तहस-नहस कर दिया गया. अजय सोनकर ने अंडमान एवं निकोबार के डीजीपी को इस घटना की पूरी शिकायत की, तत्कालीन डीजीपी ने जांच का भरोसा दिया लेकिन सोनकर का दावा है कि कुछ हुआ नहीं.
हालांकि लैब पर लगी रोक के ख़िलाफ़ डॉक्टर अजय सोनकर कलकत्ता हाईकोर्ट गए और कोर्ट ने प्रशासन के आदेश पर स्टे लगा दिया. यानी मौजूदा समय में कल्चर मोती तैयार करने के लिए सोनकर को वापस जगह मिल गई.
जिस सोनकर को अंडमान प्रशासन अपने गर्व के तौर पर पेश करता रहा है, वहां उनके साथ यह सब कैसे हुआ, पूछे जाने पर सोनकर कहते हैं, "सरकारी नौकरशाही के लोगों ने मुझे परेशान करना शुरू कर दिया. मामला न्यायालय के अधीन है और कोरोना लॉकडाउन भी आ गया था. ऐसे में मैंने इलाहाबाद में ही काम जारी रखा और इसके चलते ही टिश्यू कल्चर का काम सफल रहा. अब ये काम कहीं भी कर सकता हूं."
इस पूरे मामले पर अंडमान साउथ के डिप्टी कमिश्रनर सुनील अंचिपाका ने बताया, "मैं बीते एक साल से यहां पोस्टेड हूं. प्रकरण उससे पहले का है, अजय सोनकर अगर अपनी समस्या के बारे में मुझे जानकारी देंगे तो मैं उनकी शिकायतों को दूर करने की कोशिश करूंगा, या संबंधित अथॉरिटी तक उनकी शिकायतें भेजूंगा."
सोनकर का कहना है कि वे कोविड संकट का दौर बीतने के बाद एक बार फिर से अंडमान के अपने काम को संवारने की के बारे में सोच रहे हैं. हालांकि सरकारी नौकरशाही को लेकर उनके मन में टीस ज़रूर दिखती है. वे कहते हैं, "एक तरफ़ देश में मेड इन इंडिया की बात हो रही है, दूसरी तरफ़ निचले स्तर पर लोग इसको गंभीरता से नहीं ले रहे हैं. सरकारी दफ़्तरों में गैर ज़िम्मेदाराना रवैया दिखता है."
हालांकि अब तक अजय सोनकर ने अपना काम निजी उपक्रम के तौर पर ही किया है, लेकिन वे सरकार के साथ मिलकर अपने हुनर को दूसरे लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं. उन्होंने कहा, "सरकार पर्ल कल्चर के प्रति काफ़ी गंभीर है. सरकार इसे डिवेलप करना चाहती है. मैंने अब तक स्वतंत्र रूप से काम किया है. अगर सरकार चाहेगी तो मैं देश की आर्थिक उन्नति के लिए अपना योगदान देना चाहूंगा, यह मेरे लिए भी खुशी की बात होगी."
कुलदीप के लाल कहते हैं, "भारतीय पर्ल कल्चर को अजय सोनकर की तकनीक से फ़ायदा हो सकता है. लेकिन इसके लिए दोनों बातें हैं- एक तो सोनकर अपनी तकनीक कितने लोगों के साथ किस तरह शेयर करना चाहेंगे और दूसरी बात यह है कि ये इतना श्रम साध्य काम है कि हज़ारों में एक दो लोग ही इसे सीख पाते हैं."
भारतीय पर्ल कल्चर की संभावनाओं के बारे में सोनकर बताते हैं, "जापान के पास तकनीक तो है लेकिन उसके पास प्राकृतिक जलवायु नहीं है. वहां इतनी ठंड पड़ती है कि एक राउंड का पर्ल कल्चर कम से कम ढाई तीन साल का समय लेता है, हमारे यहां यह छह महीने से एक साल के बीच यह हो जाता है. यह फ़ायदा तो भारत के पास है. हमारे मोती की क्वालिटी भी बेहतर होती है."
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