Suicide Prevention Day: आत्महत्या से जुड़े सात सवालों के जवाब

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- Author, मयंक भागवत
- पदनाम, बीबीसी मराठी
दुनिया भर में हर साल 70 लाख लोग आत्महत्या करते हैं. इससे कई गुना अधिक लोग आत्महत्या की कोशिश करते हैं.
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, 15 से 19 साल के युवाओं के बीच मौत की चौथी सबसे बड़ी वजह आत्महत्या है.
लोग अवसाद, लाचारी और जीवन में कुछ नहीं कर पाने की हताशा के चलते आत्महत्या करते हैं. इसके अलावा आत्महत्या करने की मेडिकल वजहें भी हो सकती हैं.
आत्महत्या एक गंभीर मनोवैज्ञानिक और सामाजिक समस्या है. अगर आप भी तनाव से गुजर रहे हैं तो भारत सरकार की जीवनसाथी हेल्पलाइन 18002333330 से मदद ले सकते हैं. आपको अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से भी बात करनी चाहिए.
सही समय पर सलाह और परामर्श से आत्महत्याओं को काफ़ी हद तक रोका जा सकता है.
वर्ल्ड सुसाइड प्रीवेंशन डे (विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस) के मौक़े पर हमने कुछ विशेषज्ञों से बात करके आत्महत्या से जुड़े कुछ सवालों के जवाब तलाशे हैं.
1. लोग आत्महत्या के बारे में क्यों सोचते हैं?
जब कोई शख़्स आत्महत्या करने के बारे में सोचने लगता है तो इस स्थिति को मनोचिकित्सक सुसाइडल आइडिएशन (आत्महत्या का ख्याल) कहते हैं. ज़रूरी नहीं है कि किसी एक वजह से ऐसा हो. विशेषज्ञों की राय में जब व्यक्ति को किसी मुश्किल से निकलने का कोई रास्ता नहीं मिलता है, तो वो अपना जीवन ख़त्म करने के बारे में सोचता है.
मेंटल हेल्थ एम्पावर से जुड़ी मनोचिकित्सक दिलशाद खुराना इसे आत्महत्या की सबसे बड़ी वजह बताती हैं. वो कहती हैं, "ऐसे लोग ये सोचने लगते हैं कि अब जीवन में कुछ भी नहीं बचा है."
यही वजह है कि अवसादग्रस्त लोगों में आत्महत्या करने की दर सबसे ज़्यादा देखी गई है. एक सवाल यह भी उठता है कि क्या आत्महत्या का विचार अपने आप ही आने लगता है या फिर इसकी कोई मेडिकल वजह भी होती है?
मनोचिकित्सक डॉ. अंबरीश धर्माधिकारी बताते हैं, "आत्महत्या का विचार प्राकृतिक नहीं होता है. मस्तिष्क में बायो न्यूरोलॉजिकल बदलावों के चलते लोगों को लगने लगता है कि जीवन किसी काम का नहीं है. इसके बाद व्यक्ति आत्महत्या करने का विचार आता है. आत्महत्या के 90 प्रतिशत मामले मानसिक विकार के चलते होते हैं."
वो कहते हैं कि अवसादग्रस्त लोगों को दुनिया हमेशा नाकारात्मक नज़र आती है, वे हर चीज़ को निगेटिविटी से देखने लगते हैं.

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2. आत्महत्या का ख्याल आने के संकेत क्या-क्या हैं?
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़ 2019 में आत्महत्या करने वाले 77 प्रतिशत लोग निम्न और मध्य आय वर्ग वाले देशों के थे.
संगठन के अनुसार जिन लोगों के व्यवहार में इस तरह के संकेत मिलें उनमें आत्महत्या का विचार आ सकता है-
- अवसाद
- मानसिक स्थिति का एकसमान नहीं रहना
- बेचैनी और घबराहट का होना
- जिस चीज़ में पहले खुशी मिलती थी, अब उसमें दिलचस्पी ना होना
- हमेशा निगेटिव बातों का आना
- भविष्य को लेकर निगेटिव दृष्टिकोण का होना
3. मानसिक विकार की चपेट में आने पर लोगों में क्या बदलाव दिखते हैं?
विशेषज्ञों के मुताबिक, जो लोग हमेशा मुस्कुराते दिखते हों या आसानी से दूसरे लोगों से घुल-मिल जाते हों वो भी मानसिक विकार की चपेट में आने के बाद अचानक से अकेला महसूस करने लगते हैं.
मानसिक विकार से पीड़ित शख्स अधिक शराब पीने लगता है. वह नाकारात्मक ढंग से चीज़ों को देखने लगाता है, उस पर जीवन को लेकर निराशावादी दृष्टिकोण हावी होने लगता है. अगर आपके आसपास किसी के जीवन में ऐसे बदलाव हो रहे हों तो उन पर ध्यान देना ज़रूरी है.
डॉ. धर्माधिकारी बताते हैं, "ज़रूरी नहीं है कि आत्महत्या का विचार वाले सभी लोगों में इसके संकेत दिखे. वे जो बोलते हैं या करते हैं, उससे भी यह ज़ाहिर हो सकता है."
हालांकि, इन चीज़ों के बारे में लोग अमूमन बात नहीं करते हैं. लेकिन अगर ये बार-बार होने लगे तो इसे ख़तरे का संकेत मानना चाहिए.

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4. अगर आत्महत्या का ख्याल आए तो क्या करें?
व्यक्ति के मन में नकारात्मक ख्यालों का आना साधारण बात है. कई बार ऐसे ख्याल कुछ ही पलों के लिए आते है लेकिन कुछ लोगों में ये धीरे-धीरे बढ़ने लगता है.
मानसिक विकारों को लेकर अभी भी काफ़ी ग़लतफहमियां है, इसलिए लोग इस बारे में ज़्यादा बात नहीं करते. ऐसी स्थिति में मानसिक काउंसलिंग करने वाली हेल्पलाइन की भूमिका अहम होती है.
मुंबई का केईएम अस्पताल मानसिक काउंसलिंग के लिए 'हितगुज' नाम से हेल्पलाइन चलाता है. मानसिक स्वास्थ्य विभाग की प्रमुख डॉ. अजिता नायक हेल्पलाइन की अहमियत के बारे में बताती हैं, "ऐसी हेल्पलाइन ऐसे लोगों की मदद की दिशा में पहला क़दम है. अगर आत्महत्या के विचार मन में आए तो व्यक्ति के लिए तुरंत मनोचिकित्सक के पास जाना संभव नहीं होता है. कई लोग अपनी पहचान भी ज़ाहिर नहीं करना चाहते. ऐसे में हेल्पलाइन से संपर्क किया जा सकता है."
विशेषज्ञों के मुताबिक किसी व्यक्ति में आत्महत्या का विचार कितना गंभीर है, इसकी जांच ज़रूरी है और इसके लिए मेंटल हेल्थ काउंसलिंग हेल्पलाइन की मदद लेनी चाहिए या फिर डॉक्टर को दिखाना चाहिए.
डॉ. धर्माधिकारी बताते हैं, "मानसिक विकार वाले लोग आत्महत्या का ख्याल आने पर खुद को नुक़सान पहुंचा सकते हैं. इसलिए उनका तुरंत इलाज करना ज़रूरी है."
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5. अगर किसी और को आत्महत्या का ख्याल आता हो तो क्या करें?
आपका कोई क़रीबी कहे कि मैं आत्महत्या करना चाहता हूं तब आप क्या करेंगे? स्थिति को कैसे संभालेंगे? ये सवाल आपके मन भी आ रहा होगा.
मनोचिकित्सक दिलशाद खुराना इसको लेकर कुछ टिप्स सुझाती हैं-
- ऐसे लोगों के साथ बैठकर उनको चुपचाप सुनना चाहिए. वह खुल कर अपनी बात कह सकें इतनी आत्मीयता से बात करनी चाहिए.
- चुपचाप उनकी बातों को सुनें, किसी नतीजे तक नहीं पहुंचें.
- उनकी समस्या को समझें और उसे स्वीकार करें. यह न कहें कि ये तो कोई समस्या नहीं है.
- उनकी भावनाओं को समझने की कोशिश करें.
यहां ये समझना ज़रूरी है कि मानसिक विकार वाले लोगों के लिए परिवार की सहायता सबसे ज़रूरी पहलू है. पारिवार के सदस्यों को भी किसी नतीजे पर नहीं पहुंचना चाहिए. मानसिक विकार और आत्महत्या के ख्याल पर किशोरों के साथ भी बातचीत करनी चाहिए. उसको लेकर किसी तरह की हिचक नहीं होनी चाहिए.
विशेषज्ञों के मुताबिक़ परिवार के सदस्यों या दूसरों को आत्महत्या के विचारों से जूझ रहे किसी व्यक्ति को बिना सोचे समझे कोई सलाह भी नहीं देनी चाहिए.
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6. आत्महत्या के विचार से जुड़ी ग़लतफहमियां क्या-क्या हैं?
लोगों में आत्महत्या करने के विचार से जुड़ी कई ग़लतफहमियां होती हैं. एक ग़लतफहमी तो यही है कि लोग अमूमन ये सोचते हैं कि जब तक स्थिति गंभीर नहीं हो तब तक लोग आत्महत्या के बारे में नहीं सोचते हैं.
डॉ. अंबरीश धर्माधिकारी कहते हैं, "आत्महत्या का ख्याल कभी भी आ सकता है."
वे इससे जुड़ी ग़लतफहमियों के बारे में बताते हैं-
- आत्महत्या की बात केवल ध्यान खींचने करने के लिए की जा रही है.
- आत्महत्या की बात करने से दूसरे लोग प्रेरित हो सकते हैं.
- दूसरे लोग भी आत्महत्या करने के बारे में सोच सकते हैं.
- जो लोग पूरी तरह ठीक हैं वे आत्महत्या के बारे में नहीं सोच सकते.
दिलशाद खुराना बताती हैं, "अमूमन हेल्पलाइन पर लोग आत्महत्या के बारे में नहीं बात नहीं करते. ऐसे में हम लोग सीधा सवाल करते हैं कि क्या आपके मन में आत्महत्या करने का विचार आया है? इसका मतलब ये नहीं है कि हम उन्हें आत्महत्या करने का आइडिया दे रहे हैं."

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7. आत्महत्या के ख्याल को कैसे दूर कर सकते हैं?
सुसाइड हेल्पलाइन से मदद मिल सकती है. काउंसलिंग, सकारात्मक सोच और चिकित्सकीय मदद से आप नकारात्मक विचारों को दूर सकते हैं.
डॉ. धर्माधिकारी कहते हैं, "इलेक्ट्रोकनवल्सिव (ईसीटी) थेरेपी काफ़ी कारगर होती है. इसे आम तौर पर शॉक थेरेपी भी कहते हैं लेकिन इसमें कोई इलेक्ट्रिक शॉक नहीं दिया जाता और सुधार भी तेज़ी से होता है."
केईएम हॉस्पीटल की काउंसलर संगीता राव (बदला हुआ नाम) एक उदाहरण के साथ समझाती हैं, "एक महिला तलाक़ ले रही थीं, उनके अवसाद का भी इलाज चल रहा था. मैं इससे कैसे बाहर निकलूं? ये सोचते-सोचते वह आत्महत्या के बारे में सोचने लगी थीं. लेकिन सही सलाह के बाद वे आज एक बड़ी कंपनी में नौकरी कर रही हैं."
ऐसा उनके विचारों में बदलाव लाकर किया गया. संगीता राव ने बताया, "अगर आप किसी से कह नहीं सकते हैं तो उसके बारे में लिखना चाहिए."
जब कोई सेलिब्रेटी आत्महत्या करता है तो हेल्पलाइन में आने वाले फ़ोन कॉल्स की संख्या बढ़ जाती है. ऐसा क्यों?
डॉ. अजिता नायक बताती हैं, "जब कोई नामी शख़्स आत्महत्या करता है तो लोग मदद लेने के बारे में सोचते हैं. और फिर उनके मस्तिष्क में जब निगेटिविटी बढ़ती है तो वे मदद के लिए फ़ोन करते हैं."
बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद केईएम अस्पताल की 'हितगुज' हेल्पलाइन पर आने वाले फ़ोन कॉल्स की संख्या क़रीब चार गुनी बढ़ गई थी.
'हितजुग' हेल्पलाइन की काउंसलर संगीता राव बताती हैं, "सुशांत की मौत के बाद 15 दिन तक लगातार बहुत सारे फ़ोन कॉल्स आते रहे थे."
संगीता राव के मुताबिक़ सुशांत की मौत के बाद जिन लोगों ने फ़ोन किए उनमें 20 प्रतिशत लोगों को आत्महत्या के ख्याल आ रहे थे.
उन्होंने यह भी बताया, "कोविड महामारी के तीन चार महीनों के बाद भी ढेरों लोगों ने हेल्पलाएन में फ़ोन किया था. बिज़नेस नहीं चलने, घर में झगड़े और आर्थिक तंगी के चलते लोग आत्महत्या करना चाहते थे."
काउंसलर्स के मुताबिक़ आत्महत्या करने वालों में पुरुषों की संख्या ज़्यादा होती है. हृदय संबंधी गंभीर बीमारियों में भी लोग आत्महत्या करते हैं, वहीं पारिवारिक रिश्तों में मुश्किलों के चलते महिलाएं ज़्यादा आत्महत्या करती हैं.

महत्वपूर्ण जानकारी-
मानसिक समस्याओं का इलाज दवा और थेरेपी से संभव है. इसके लिए आपको मनोचिकित्सक से मदद लेनी चाहिए, आप इन हेल्पलाइन से भी संपर्क कर सकते हैं-
समाजिक न्याय एवं आधिकारिता मंत्रालय की हेल्पलाइन- 1800-599-0019 (13 भाषाओं में उपलब्ध)
इंस्टीट्यूट ऑफ़ ह्यमून बिहेवियर एंड एलाइड साइंसेज-9868396824, 9868396841, 011-22574820
हितगुज हेल्पलाइन, मुंबई- 022- 24131212
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंस-080 - 26995000
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