You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
राकेश टिकैत ने किसान महापंचायत के मंच से लगाया 'अल्लाहू अकबर' का नारा, जानिए क्या है पूरा मामला
- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, मुज़फ़्फ़रनगर से, बीबीसी हिंदी के लिए
उत्तर प्रदेश में मुज़फ़्फ़रनगर के राजकीय इंटर कॉलेज मैदान में पाँच सितंबर को संयुक्त किसान मोर्चा की ओर से हुई महापंचायत में किसानों की उमड़ी भीड़ के अलावा जिस एक बात पर सबसे ज़्यादा चर्चा हो रही है, वह है भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत के भाषण में उनकी ओर से लगाए गए "अल्लाहू-अकबर" के नारे.
राकेश टिकैत का कहना था कि उनके पिता चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के समय में भी ऐसे नारे लगाए जाते थे और ये अब भी लगाए जाएँगे.
राकेश टिकैत से मंच से कहा, "अल्लाहू अकबर" और नीचे से आवाज़ गूँजी- "हर हर महादेव". यह क्रम कई बार दोहराया गया.
महापंचायत ख़त्म होने के बाद से ही राकेश टिकैत के इस नारे की भरपूर चर्चा हो रही है और सोशल मीडिया में उनकी महज़ कुछ सेकंड की इसी क्लिप को साझा किया जा रहा है, जिसमें राकेश टिकैत "अल्लाहू-अकबर" कह रहे हैं.
इस नारे को लेकर राकेश टिकैत की आलोचना करने वाले सिर्फ़ इस क्लिप को चला रहे हैं, जबकि उनके समर्थक ऐसे आलोचकों को जवाब देते हुए उन्हें भाषण का पूरा वीडियो देखने की सलाह दे रहे हैं.
यही नहीं, ट्विटर पर #AllahuAkbar भी ट्रेंड कर रहा है और कई लोग इस पर चर्चा कर रहे हैं.
हालाँकि सांप्रदायिक सद्भाव की बात करते हुए राकेश टिकैत के इस भाषण की प्रशंसा भी हो रही है और उनके समर्थन में भी कई लोग बात कर रहे हैं.
बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती ने भी इसका समर्थन करते हुए दो ट्वीट किए हैं और बीजेपी और समाजवादी पार्टी को कथित तौर पर सांप्रदायिकता फैलाने के लिए आड़े हाथों लिया है.
दरअसल, राकेश टिकैत ने क़रीब 20 मिनट के भाषण में उस वक़्त इस नारे की चर्चा की, जब वो केंद्र की बीजेपी सरकार पर हमलावर थे और आरोप लगा रहे थे कि सरकार तमाम सरकारी संपत्तियों को निजी हाथों में बेच रही है.
उन्होंने कहा, "जब तक इन्हें वोट की चोट नहीं दोगे ये दोनों बाहरी लोग हैं, इऩ्हें यहाँ से जाना होगा. ये दंगा कराने वाले लोग हैं. यहाँ की जनता इन्हें बर्दाश्त नहीं करेगी."
'... तब ख़त्म हो जाता आंदोलन'
भाषण के लगभग 13वें मिनट में राकेश टिकैत ने किसानों को 28 जनवरी की याद दिलाई जब ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर बड़ी संख्या में पुलिस फ़ोर्स तैनात करके धरना ख़त्म करने की कोशिश की गई थी.
टिकैत का कहना था, "वो 28 तारीख़ की रात भी याद कर लेना. वहाँ न तो मुसलमान बचना था, न सरदार भाई बचना था और न ही देश का किसानी झंडा बचना था. उस रात को देश में आंदोलन का क़त्लेआम होता. उसके बाद देश में कोई आंदोलन नहीं हो सकता था."
राकेश टिकैत ने आगे कहा, "इस तरह की सरकारें यदि देश में होंगी तो ये दंगे करवाने का काम करेंगी. पहले भी नारे लगते थे जब टिकैत साहब थे. अल्लाहू अकबर....."
राकेश टिकैत के इस नारे के जवाब में नीचे से आवाज़ आई, "हर हर महादेव."
ये नारा कई बार गूँजा. राकेश टिकैत ने "अल्लाहू अकबर" कहा और भीड़ ने "हर हर महादेव".
उसके बाद टिकैत बोले, "ये नारे लगते थे. हर हर महादेव और अल्लाहू अकबर के नारे इसी धरती पर लगते थे. ये नारे हमेशा लगते रहेंगे. दंगा यहाँ पर नहीं होगा. ये तोड़ने का काम करेंगे, हम जोड़ने का काम करेंगे. किसी ग़लतफ़हमी में मत रहना."
भाषण का पूरा संदर्भ यह था, लेकिन राकेश टिकैत की उसी छह सेकंड की क्लिप को उनके आलोचक दिखाने की कोशिश कर रहे हैं जिसमें वो "अल्लाहू अकबर" बोल रहे हैं.
अपने को बीजेपी कार्यकर्ता कहने वाली प्रीति गांधी ने जब राकेश टिकैत का क्लिप शेयर किया, तो लोगों ने उसके जवाब में उनसे पूरा क्लिप शेयर करने की सलाह दे डाली.
पांचजन्य ने भी अल्लाहू अकबर नारे के बारे में ट्वीट किया है. लेकिन इसमें पूरा ब्यौरा नहीं दिया गया है.
जबकि शेफ़ाली वैद्य ने राकेश टिकैत की तुलना तालिबान तक से कर दी.
पश्चिमी उत्तर प्रदेश और किसान आंदोलन की राजनीति को जानने वालों का कहना है कि यहाँ के लिए यह कोई नई बात नहीं है बल्कि भारतीय किसान यूनियन के संस्थापक चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के समय में यह सामान्य परंपरा थी.
हवन और नमाज़ की परंपरा
वरिष्ठ पत्रकार और किसान महापंचायत में मौजूद रहे डॉक्टर अनिल चौधरी पिछले कई वर्षों से किसान आंदोलन और राजनीति को कवर कर रहे हैं. उन्होंने दिल्ली के बोट क्लब पर हुई ऐतिहासिक रैली के अलावा मुज़फ़्फ़रनगर में हुई अन्य किसान पंचायतों को भी कवर किया है.
अनिल चौधरी कहते हैं, "पंचायतों में ये नारा प्रमुख रूप से लगता रहा है. पूजा-पाठ, हवन और नमाज़ भी होती थी. जामा मस्जिद के इमाम अब्दुल्लाह बुख़ारी टिकैत साहब के मित्रों में थे और किसान पंचायतों के दौरान कई बार मंच पर भी रहते थे. पंचायतों का संचालन ग़ुलाम मोहम्मद जौला संचालन करते थे जो महेंद्र सिंह टिकैत के मित्र थे."
ग़ुलाम मोहम्मद जौला पांच सितंबर की महापंचायत में भी मौजूद थे और इससे पहले 29 जनवरी को हुई पंचायत में भी थे जो ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर राकेश टिकैत को धरने से हटाने की कथित कोशिशों के विरोध में आयोजित हुई थी.
कम होंगी दूरियाँ?
जानकारों के मुताबिक़, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच इतनी दूरियाँ पहले नहीं थीं, लेकिन साल 2013 में मुज़फ़्फ़रनगर में हुए सांप्रदायिक दंगों के बाद सामाजिक सद्भाव बिल्कुल बदल गया.
दंगों में मुख्य रूप से जाटों और मुसलमानों के बीच ख़ूनी संघर्ष हुआ, जिसमें कई लोगों की जान चली गई.
इसका असर राजनीति में भी देखने को मिला और भारतीय जनता पार्टी को साल 2014 और साल 2019 के लोकसभा चुनाव के अलावा साल 2017 के विधानसभा चुनाव में भी ज़बर्दस्त सफलता मिली.
लेकिन किसान आंदोलन और ख़ासकर 28 जनवरी को ग़ाज़ीपुर में हुई घटना के बाद स्थिति पूरी तरह से बदल गई. किसान आंदोलन में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुसलमानों ने जहाँ ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर धरने पर बैठे राकेश टिकैत को अपना पूरा समर्थन दिया वहीं 29 जनवरी को मुज़फ़्फ़रनगर में आयोजित पंचायत में ग़ुलाम मोहम्मद जौला जैसे पुराने लोगों की मौजूदगी से भारतीय किसान यूनियन में हिन्दू-मुस्लिम एकता दोबारा देखने को मिली.
पाँच सितंबर को हुई पंचायत में भी मुस्लिम समुदाय के लोग न सिर्फ़ भारी संख्या में मौजूद रहे, बल्कि महापंचायत को सफल बनाने में पिछले कई दिन से लगे हुए थे.
ये भी पढ़ें
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)