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तालिबान पर पाकिस्तान के रुख़ का भारत पर क्या असर हो सकता है? - प्रेस रिव्यू
"इस समय जब हम अफ़ग़ानिस्तान सरकार के इतनी तेज़ी से गिर जाने और तालिबान के सत्ता में आने पर विचार कर रहे हैं, तब हमें काबुल और दिल्ली के रिश्तों को लेकर के एम पणिक्कर (पूर्व भारतीय राजदूत) के विचारों पर एक बार फिर मनन करने की ज़रूरत है."
ये कहना है कि साउथ एशियन स्टडीज़ के निदेशक और पत्रकार सी राजामोहन का.
अंग्रेजी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस में छपे अपने लेख में राजामोहन लिखते हैं, "पणिक्कर ने बताया था कि काबुल घाटी में जो भी होता है, आख़िरकार वह गंगा के मैदानों के साम्राज्यों को प्रभावित करता है.'' ये कहते हुए वह उन तमाम हमलावरों की ओर इशारा कर रहे थे जिन्होंने उत्तर भारत के केंद्र पर हमला करने से पहले हेरात और काबुल की घाटी में ख़ुद को मज़बूत किया.
दक्षिण एशिया में ताज़ा घटनाक्रम भारत और अफ़ग़ानिस्तान के बीच बार-बार आने वाले एक समीकरण की ओर इशारा करता है. साल 1979 में अफ़ग़ानिस्तान पर हुए सोवियत हमले, 2001 में न्यूयॉर्क और वॉशिंगटन पर आतंकी हमले और उसके बाद अमेरिकी अभियान का इस उपमहाद्वीप की घरेलू, अंतर-क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर गहरा असर पड़ा है.
इसमें कोई शक़ नहीं है कि रविवार को काबुल में तालिबान के प्रवेश के बाद अफ़ग़ानिस्तान और भारत के बीच रिश्तों का एक नया अध्याय शुरू हुआ है. लेकिन ये पैटर्न तब और दिलचस्प हो जाता है जब 'इंडस राइडर' को 'पणिक्कर थीसिस' के साथ देखते हैं.
अपने इस लेख में सी राजामोहन बताते हैं कि सिंधु नदी पर बसे राज्यों में भारत के साम्राज्यों और बाहरी आक्रमणकारियों के बीच संघर्ष को शक्ल देने की शक्ति रही है.
वे इसे उदाहरण देते हुए समझाते हैं, "सिंधु नदी पर बसे राज्यों की बाहरी ताक़तों और आंतरिक साम्राज्यों के बीच संघर्षों को शक्ल देने में ताक़तवर भूमिका है. यह बात तब सच जान पड़ती है, जब आप विभाजन के बाद उपमहाद्वीप के अंतरराष्ट्रीय संबंधों में बाहरी शक्तियों की मदद से भारत के ख़िलाफ़ संतुलन बनाने की पाकिस्तान की सतत राजनीति देखते हैं. इसमें कोई शक नहीं है कि अफ़ग़ानिस्तान में पाकिस्तान के समर्थन वाला तालिबानी शासन भारतीय सुरक्षा के लिए बेहद गंभीर संभावित चुनौतियां पैदा करता है. लेकिन साल 2001 के बाद काबुल के राजनीतिक तंत्र के पतन के साथ भारत में जिस तरह की निराशा देखी जाती है, वह कुछ अधिक है.''
''भारत ने अपनी उत्तरी पश्चिमी सीमाओं पर इससे बहुत ख़राब स्थिति भी देखी है. इस समय जब अफ़ग़ानिस्तान में प्रतिकूल घटनाएं सामने आ रही हैं तब भारत सरकार रणनीतिक धैर्य के साथ आने वाले दिनों में अपने हितों की रक्षा के लिए मार्ग तलाश सकती है."
राजामोहन बताते हैं कि 1979 और 2001 के बीच जो समय बीता, उसने इस पूरे क्षेत्र को हमेशा के लिए बदलकर रख दिया.
वे कहते हैं, "साल 1979 के अंत में, सोवियत संघ ने काबुल में सरकार को बचाने के लिए बड़े पैमाने पर सैन्य आक्रमण शुरू किया. इसके बाद अमेरिका और पाकिस्तान ने सोवियत पहल के जवाब में धार्मिक जिहाद की शुरुआत की जिससे सोवियत संघ को इस कदर नुकसान हुआ कि उसे 1989 में इस क्षेत्र से वापसी करनी पड़ी. लेकिन 1980 के दशक ने इस क्षेत्र को हमेशा के लिए बदल दिया. सोवियत संघ का सामना करने के लिए शुरू किए गए जिहाद ने जनरल ज़िया उल हक़ को पाकिस्तान की राजनीति का तेजी से इस्लामीकरण करने में मदद की. इसने पूरे दक्षिण एशिया में हिंसक धार्मिक उग्रवाद को भी काफी प्रोत्साहन दिया. रूस के ख़िलाफ़ लड़े गए अफ़ग़ान युद्ध में पाकिस्तान की महत्वपूर्ण भूमिका ने ज़िया उल हक़ को परमाणु हथियारों के अधिग्रहण के लिए राजनीतिक बहाना दे दिया."
राजामोहन नब्बे के दशक में पाकिस्तान द्वारा भारत के ख़िलाफ़ चलाए गए छद्म युद्ध का ज़िक्र करते हैं. वे कहते हैं कि नब्बे के दशक ने विशेष तौर पर इस क्षेत्र और भारत और पाकिस्तान की खाई को और गहरा करने में अपनी भूमिका अदा की.
वे लिखते हैं, "1990 के दशक की अशांति ने भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष को गहरा किया. दोनों देशों ने परमाणु हथियारों का परीक्षण किया. और अफ़ग़ानिस्तान में पाकिस्तान के समर्थन वाली तालिबानी सरकार बनी. लेकिन अफ़ग़ानिस्तान में पाकिस्तान को मिली ये जीत ज़्यादा दिनों तक नहीं चल सकी. तालिबानी शासन की शरण में अल क़ायदा ने 11 सितंबर 2001 को अमेरिका पर आतंकी हमला किया. इसके बाद अमेरिकी सरकार की ओर से अचानक किए गए हमले में तालिबान शासन ख़त्म हो गया और पाकिस्तान को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करना पड़ा.
लेकिन दशक ख़त्म होते होते (पाकिस्तान के सैन्य शासक) मुशर्रफ़ को कुर्सी से उतार दिया गया. इसके बाद पाकिस्तानी सेना एक बार फिर अपनी पुरानी भूमिका में लौट गयी. अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के प्रति समर्थन दिखने लगा, काबुल सरकार पर हमले बढ़ने लगे और राजनेताओं को भारत के साथ रिश्ते बेहतर करने के प्रयासों को नुकसान पहुंचाया जाने लगा. पाकिस्तान ने भी युद्ध से थक चुके अमेरिका को तालिबान के साथ शांति समझौते का मौका दिया और पिछला हफ़्ता पाकिस्तान की अफ़ग़ान नीति के लिए एक बड़ी जीत लेकर आया. इस हफ़्ते ने न सिर्फ अफ़ग़ानिस्तान में तालिबानी गुटों के आक्रामक अभियान को सुनिश्चित किया बल्कि काबुल के शांतिपूर्ण आत्मसमर्पण को भी सुनिश्चित किया."
इसके साथ ही राजामोहन बताते हैं कि भारत अगर तालिबान के साथ रिश्ते बेहतर करने के बारे में सोचेगा तो वह किस शर्त पर ऐसा करने के बारे में सोचेगा.
वह लिखते हैं, "तालिबानी नेता भी इस समय विदेशियों को जाने देने, अफ़ग़ानी लोगों की जान-माल की रक्षा करने और महिला अधिकारों का सम्मान करने जैसी सारी अच्छी बातें कह रहे हैं. हालांकि, प्रांतों से आती ख़बरों में तालिबान द्वारा मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन की बात सामने आती है. अगर नया तालिबानी शासन काबुल में एक अच्छा प्रदर्शन करता है तो वह दुनिया को सकारात्मक प्रतिक्रिया देने के लिए प्रेरित करेगा. लेकिन ये एक बड़ा "अगर" है.
''भारत के लिए तालिबान को लेकर बड़ा सवाल ये है कि क्या वह एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद और पाकिस्तान द्वारा जेहादी संगठनों जिन्होंने तालिबान के साथ मिलकर भारत के ख़िलाफ़ संघर्ष किया है, को नई दिशा देने का समर्थन करेगा या नहीं और दिल्ली ज़ुबानी वादों की जगह सबूतों के आधार पर आगे बढ़ेगी या नहीं."
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रिलायंस में भारी निवेश करेगी अरामको
सऊदी अरामको भारत में रिलायंस इंडस्ट्रीज़ (आरआईएल) के ऑयल रिफ़ायनरी एवं केमिकल कारोबार में क़रीब 20 फ़ीसदी हिस्सेदारी ख़रीदने के लिए बातचीत कर रही है. दोनों दिग्गज कंपनियों के बीच यह सौदा 20 से 25 अरब डॉलर में हो सकता है.
अंग्रेज़ी अख़बार बिज़नेस स्टेंडर्ड में छपी ख़बर के मुताबिक़, ब्लूमबर्ग ने घटनाक्रम की जानकारी रखने वाले सूत्रों के हवाले से बताया कि अगले कुछ हफ़्तों में दोनों पक्ष इस सौदे पर समझौता कर सकते हैं. बताया जा रहा है कि पूरा सौदा शेयरों में होगा.
इससे पहले 2019 में रिलायंस इंडस्ट्रीज़ ने 2019 में अपने तेल से लेकर रसायन कारोबार में 20 फ़ीसदी हिस्सेदारी सऊदी अरामको को 15 अरब डॉलर में बेचने की घोषणा की थी.
लेकिन कोरोना महामारी के कारण तेल की क़ीमतें ज़मीन पर आने और दुनिया भर में तेल की मांग घट जाने के कारण सौदा अटक गया था. इस साल जून में रिलायंस इंडस्ट्रीज़ के चेयरमैन और अरबपति उद्योगपति मुकेश अंबानी ने उम्मीद जताई थी कि सऊदी अरामको के साथ साझेदारी को इस साल के अंत तक पूरा कर लिया जाएगा.
उन्होंने यह भी कहा था कि अरामको के चेयरमैन यासिर अल-रुमैयां स्वतंत्र निदेशक के तौर पर आरआईएल के बोर्ड का हिस्सा बन सकते हैं. हालांकि इस सौदे के बारे में अरामको से फ़िलहाल पुष्टि नहीं हो पाई.
रिलायंस इंडस्ट्रीज़ ने भी कोई प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया. बहरहाल जानकारों का कहना है कि इस सौदे से रिलायंस की रिफ़ाइनरी के लिए कच्चे तेल की बेरोकटोक आपूर्ति सुनिश्चित हो जाएगी.
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आरक्षण की उच्चतम सीमा बढ़ाने पर बोले शरद पवार
एनसीपी नेता शरद पवार ने सोमवार को एक प्रेस वार्ता के दौरान आरक्षण देने की उच्चतम सीमा 50 फ़ीसदी को बढ़ाने की ज़रूरत पर ध्यान आकर्षित किया है.
अंग्रेजी समाचार द हिंदू के मुताबिक़, "देश में महाराष्ट्र समेत सभी राज्य पहले ही 50 फ़ीसदी आरक्षण सीमा पार कर चुके हैं. ऐसे में राज्यों को ओबीसी की पहचान करने का अधिकार देने के कोई मायने नहीं हैं क्योंकि आरक्षण सीमा बढ़ाई नहीं गई है. सभी विपक्षी सदस्यों ने इस मुद्दे को संसद में उठाया था, लेकिन इस पर सरकार की ओर से किसी तरह का जवाब नहीं आया.''
पवार ने इस ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि जब तक इस उच्चतम सीमा को नहीं हटाया जाता है तब तक मराठा आरक्षण भी नहीं दिया जा सकता.
इसके साथ ही उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी सभी ओबीसी ताक़तों को साथ लेकर आएगी ताकि 50 फ़ीसदी रिज़र्वेशन लिमिट हटाने के लिए सामाजिक राय बनाई जा सके.
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उत्तर प्रदेश में एक बच्चे वाले परिवार को मिलेंगी ख़ास सुविधाएं
उत्तर प्रदेश राज्य विधि आयोग ने उत्तर प्रदेश जनसंख्या (नियंत्रण, स्थिरीकरण व कल्याण) विधेयक 2021 का प्रारूप सोमवार को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सौंप दिया जिसमें एक बच्चे वाले सीमित परिवार को अतिरिक्त लाभ दिए जाने की अहम सिफ़ारिशें भी शामिल हैं.
हिंदी अख़बार दैनिक जागरण के मुताबिक़, इस ड्राफ़्ट के तहत दो बच्चों वाले परिवार को सब्सिडी समेत अन्य योजनाओं के लाभ से लेकर पदोन्नति की पेशकश की गई है.
वहीं, दो से अधिक बच्चे पैदा करने वालों के लिए सरकारी नौकरी में आवेदन से लेकर पदोन्नति में प्रतिबंध होगा. इसके साथ ही ऐसे लोग स्थानीय निकाय का चुनाव भी नहीं लड़ सकेंगे.
उत्तर प्रदेश राज्य विधि आयोग का मानना है कि दो बच्चों के परिवार की नीति का पालन करने वालों को प्रोत्साहित करने के साथ ही नीति का पालन न करने वालों के लिए राज्य कल्याणकारी योजनाओं, ज़िला पंचायत व स्थानीय निकाय के चुनाव लडने पर प्रतिबंध ज़रूरी है.
इस संबंध में आए कई सुझावों पर मंथन के बाद आयोग के अध्यक्ष सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति एएन मित्तल के निर्देशन में प्रारूप को अंतिम रूप दिया गया है. राज्य सरकार मॉनसून सत्र में जनसंख्या नियंत्रण क़ानून के विधेयक को विधान मंडल में ला सकती है.
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