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स्विस बैंकों में कितना भारतीय काला धन, सरकार ने कहा नहीं मालूम
- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
जनवरी 2014. तालियों की गड़गड़ाहट के बीच प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी जोशीले अंदाज़ में चुनावी भाषण दे रहे हैं.
यूट्यूब पर मौजूद उस भाषण के वीडियो का शीर्षक है, 'श्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से वादा किया कि भाजपा काला धन वापस भारत लाएगी.'
ये वो वक्त था जब मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे थे.
अपने भाषण में काले धन पर नरेंद्र मोदी ने कहा, "एक बार ये जो चोर-लुटेरों के पैसे विदेशी बैंकों में जमा हैं ना, उतने भी हम रुपये ले आए ना, तो भी हिंदुस्तान के एक-एक ग़रीब आदमी को मुफ़्त में 15-20 लाख रुपये यूँ ही मिल जाएँगे."
इसके बाद उन्होंने कहा, "सरकार आप चलाते हो, पूछते मोदी को हो कि कैसे लाएँ? जिस दिन भारतीय जनता पार्टी को मौका मिलेगा एक-एक पाई हिंदुस्तान की वापस लाई जाएगी और हिंदुस्तान के ग़रीबों के लिए काम में लाई जाएगी. ये जनता के पैसे हैं, ग़रीब के पैसे हैं."
इस भाषण के सात साल बाद जुलाई 2021 में लोकसभा में काले धन पर पूछे गए एक सवाल के जबाव में वित्त मंत्रालय में राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने कहा है, "पिछले 10 वर्ष में स्विस बैंक में छिपाए गए काले धन का कोई आधिकारिक आँकड़ा नहीं है."
अपने जवाब में पंकज चौधरी ने दावा किया कि सरकार ने विदेश से काले धन को वापस लाने के लिए अनेक प्रयास किए हैं, लेकिन वायदे के मुताबिक क्या नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार विदेशों में जमा भारत का सारा काला धन वापस ला पाई है?
मामला जस का तस
सरकारी संस्था नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ पब्लिक पॉलिसी ऐंड फ़ाइनेंस के मुताबिक 1997-2009 के बीच भारत से बाहर जाने वाला ग़ैर-क़ानूनी पैसा भारत के सकल घरेलू उत्पाद का सात प्रतिशत तक हो सकता है.
नेशनल काउंसिल ऑफ़ अप्लाइड इकॉनॉमिक रिसर्च के मुताबिक साल 1980 से 2010 के बीच भारत के बाहर जमा होने वाला काला धन 384 अरब डॉलर से लेकर 490 अरब डॉलर के बीच था.
भारत में काले धन पर बहस दशकों पुरानी है.
काले धन से निपटने के लिए अब से पहले इनकम डिक्लेयेरेशन स्कीम, वॉलंट्री डिस्क्लोज़र स्कीम, टैक्स रेट को कम करना, 1991 के बाद व्यापार पर कंट्रोल हटाना, क़ानूनों में बदलाव जैसे कदम उठाए गए हैं लेकिन हम आज भी काले धन को वापस लाने की बात कर रहे हैं.
जाने-माने अर्थशास्त्री अरविंद विरमानी के मुताबिक केवल काले धन पर क़ानून पारित करने जैसे कदमों से काम नहीं चलने वाला.
वे कहते हैं, "आपको काले धन के स्रोत तक पहुंचना होगा और वो है लाइसेंस परमिट राज, अत्याधिक क़ानूनी प्रक्रिया, नीतियों का अत्याचार."
सवाल का जवाब नहीं
जब सरकार ये कहती है कि उसके पास स्विस बैंक में छिपाए गए काले धन का कोई आधिकारिक अनुमान नहीं है तो आखिर सरकार को क्या पता है?
जब सरकार को यही नहीं पता कि स्विस बैंकों में कितना काला धन छिपा है, तो ये भी शायद नहीं पता होगा कि वो काला धन किसका है, तो फिर उसे वापस लाने के लिए क्या किया जाए, ये कैसे तय होगा.
ये सवाल सुनने में आसान लगे लेकिन इनके जवाब शायद सीधे नहीं हैं.
अरविंद विरमानी वित्त मंत्रालय में प्रमुख आर्थिक सलाहकार रह चुके हैं और एक दौर में संसद में पूछे जाने वाले कई सवालों के जवाब उनकी निगरानी में दिए गए थे.
वे कहते हैं, "सरकार से हर तरह की जानकारी की मांग आती है जो सरकार के पास नहीं होती. अगर आप जवाब ध्यान से पढ़ें तो सरकार कह रही है कि उसके पास सवाल में पूछा गया डेटा नहीं है. और यही सही है. ऐसे बहुत से मुद्दे हैं जिनका डेटा हमारे पास नहीं है. हम कहाँ से लाएँगे. कभी-कभी सवाल ऐसे होते हैं मानो वित्त मंत्रालय किसी अनुसंधान की जगह हो. ये हमारा काम नहीं है."
भारत में काले धन की अर्थव्यवस्था पर किताब लिख चुके प्रोफ़ेसर अरुण कुमार भी मानते हैं कि इस सवाल का जवाब सरकार के पास नहीं होगा क्योंकि जिस तरह से पैसे के स्रोत को छिपाया जाता है, पैसा कहाँ से आ रहा है, ये पता नहीं होता, इसी तरह ये भी नहीं पता होता कि कितना पैसा कहाँ से चलकर कहाँ जा रहा है.
वे कहते हैं, मान लीजिए पैसा पहले केमन आइलैंड गया, फिर बरमुडा, वहाँ से उसे ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड भेजा गया, वहाँ से पैसा जमैका गया और फिर उसे स्विट्ज़रलैंड भेजा गया.
अरुण कुमार कहते हैं, "हमें साबित करना पड़ेगा कि जो पैसा आखिरकार स्विट्ज़रलैंड पहुँचा, वो किसी भारतीय का पैसा है और वो ग़लत तरीक़े से कमाया गया पैसा है. अगर भारत सरकार ये नहीं साबित कर सकती तो स्विट्ज़रलैंड की सरकार ये कैसे साबित करेगी?"
प्रोफ़ेसर कुमार कहते हैं, "ऐसे में स्विस सरकार अपने यहां जमा पैसे को क़ानूनी मानेगी, स्विट्ज़रलैंड की सरकार को मौका मिल जाता है कुछ नहीं करने का."
सरकार ने कई कदम उठाए लेकिन...
अरुण कुमार के मुताबिक भाजपा ने कांग्रेस को हराने के लिए काले धन के मुद्दे का राजनीतिक इस्तेमाल किया.
अपने कार्यकाल में प्रधानमंत्री मोदी ने काले धन का पता लगाने के लिए एक विशेष जांच टीम का गठन किया, नोटबंदी की घोषणा की, लोगों से कहा गया कि वो ख़ुद काले धन की घोषणा करें, क़ानूनों में बदलाव लाए गए, लेकिन काले धन की समस्या जारी है.
अरुण कुमार कहते हैं, "ब्लैक मनी बिल, इनकम डिक्लेरेशन स्कीम, बेनामी (प्रॉपर्टी के ख़िलाफ़ कदम), इन्होंने कदम तो बहुत उठाए लेकिन उसका कोई असर तो नहीं हो रहा है."
अरुण कुमार कहते हैं कि दरअसल काले धन का मुद्दा राजनीतिक है, और इसे निपटने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की ज़रूरत है.
वे कहते हैं, "ब्लैक मनी साँठगाँठ से पैदा होता है जिसमें नेता, कारोबारी, अफ़सर सब शामिल होते हैं. जो भी सत्ताधारी पार्टी होती है, उसे इसका फ़ायदा होता है. सत्ताधारी दल की काले धन को नियंत्रित करने में कोई रुचि नहीं रहती है. जब कुछ लीकआउट हो जाता है तो खानापूरी कर दी जाती है लेकिन कुछ ख़ास उसमें निकलता नहीं है."
पनामा पेपर्स लीक मीडिया के लिए बड़ी कहानी रही हो लेकिन काले धन का इकट्ठा होना आज भी जारी है.
अरुण कुमार याद दिलाते हैं, "टूजी स्पेक्ट्रम को लेकर इतना बड़ा बवाल चला लेकिन अभी तक कुछ नहीं निकला. कोयले मामले पर भी इतना बवाल हुआ. इतने साल हो गए हैं लेकिन उसका कुछ नहीं निकला. सत्ताधारी पार्टी काले धन के पैदा होने का फ़ायदा उठाती है. अपनी संपत्ति बढ़ाती है, राजनीतिक कंट्रोल बढ़ाती है."
हाल ही में समाचार एजेंसी पीटीआई के हवाले से ख़बर आई कि भारतीयों और उनकी कंपनियों के स्विस बैंक के खातों में 20 हज़ार करोड़ रुपये से ज़्यादा जमा हैं और ये राशि पिछले 13 सालों में सबसे ज़्यादा है.
इस पर सफ़ाई देते हुए वित्त मंत्रालय ने कहा कि उन्होंने स्विस अधिकारियों से इस बारे में जानकारी मंगाई है लेकिन स्विस बैंकों में राशि बढ़ने की दूसरी वजहें भी हो सकती हैं, जैसे हो सकता हो कि भारतीय कंपनियों ने बढ़ते व्यापार की वजह से स्विस बैंक में ज़्यादा राशि रखी हो, या फिर भारतीय और स्विस बैंकों के बीच लेन-देन बढ़ा हो.
यहाँ यह समझना ज़रूरी है कि स्विट्ज़रलैंड के बैंकों में भारतीय लोगों या कंपनियों का जमा धन ज़रूरी नहीं है कि काला धन ही हो.
अरविंद विरमानी के मुताबिक काले धन को खोजने के लिए चुस्त व्यवस्था ज़रूरी है, और ज़रूरी है कि क़ानून, व्यवस्था, न्याय व्यवस्था, पुलिस व्यवस्था में सुधार हों.
वे कहते हैं, "आपकी पुलिस अभी भी उन्नीसवीं सदी में जी रही है, वित्तीय मामलों में क्या अड़चने हैं, इस बारे में न्यायालयों को जानना ज़रूरी है. ये सब कुछ सीखे जाने की ज़रूरत है. ऐसा करने के लिए अभी बहुत काम करना होगा."
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