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उदारीकरण लाने में अहम भूमिका निभाने वाले सी रंगराजन 30 साल बाद अब क्या सोचते हैं?
प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद के पूर्व अध्यक्ष और भारतीय रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर डॉ. सी रंगराजन भारत के उदारीकरण नीति के प्रमुख वास्तुकारों में से एक थे.
आर्थिक उदारीकरण नीति के 30 साल पूरे होने के अवसर पर 50 सालों के सरकारी नियंत्रण से अर्थव्यवस्था को मुक्त करने में पीवी नरसिम्हा राव सरकार को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा और 1991 के उस महत्वपूर्ण बदलाव के बाद भारत कहाँ तक पहुँचा, इस पर बीबीसी संवाददाता निखिल इनामदार ने डॉ. सी रंगराजन से विस्तृत बात की.
पढ़ें डॉ. सी रंगराजन ने क्या बताया?
आप भारत की उदारीकरण नीति के शिल्पकारों में से एक थे. उन सुधारों से क्या हासिल करने का लक्ष्य था और हम उसे पाने में कहाँ तक पहुँचे हैं?
आज़ादी के बाद साल 1991 का देश के आर्थिक इतिहास में बेहद महत्वपूर्ण स्थान रहा है. तब बैलेंस ऑफ़ पेमेंट (भुगतान संतुलन) की बेहद गंभीर समस्या के कारण भारत को एक बड़े आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा था.
लेकिन भारत ने आपदा की इस घड़ी को अपनी आर्थिक नीति में मूलभूत बदलाव लाकर अवसर में बदल दिया.
तब तीन दिशाओं में बड़े आर्थिक बदलाव लाए गए.
1991 में अपनाई गई नई आर्थिक नीति ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर हावी रहे लाइसेंस और परमिट के विशाल नेटवर्क का ख़ात्मा कर दिया.
इससे बाज़ार में नए प्लेयर्स के आने का रास्ता साफ़ हो गया और पहले से अधिक प्रतिस्पर्धी माहौल की शुरुआत हुई.
दूसरा महत्वपूर्ण बदलाव राज्य और सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के प्रति मौजूद भारी पूर्वाग्रहों से दूर जाना था.
वास्तव में राज्य के लिए विशेष रूप से आरक्षित कई क्षेत्रों को निजी उद्यमों के लिए खोल दिया गया था.
और तीसरा, जो बेहद महत्वपूर्ण है उसका संबंध विदेश व्यापार से है. इसमें आयात नीति को और उदार बनाया गया, आयात प्रतिस्थापन (इम्पोर्ट सब्स्टिट्यूशन) की नीति बदली गई.
वास्तव में इस नीति का मतलब था कि कुछ वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंध लगाना या वस्तुओं के आयात पर बहुत अधिक शुल्क लेना.
कहें तो, हमने उस नीति की जगह विश्व व्यापार प्रणाली को अपनाया.
हम दुनिया के साथ प्रतिस्पर्धा करना चाहते थे. हमने हमारे उद्योगों से कहा कि वो अपने उत्पादों को लेकर प्रतिस्पर्धा करें और पूरी दुनिया में उसे बेचने में सक्षम बनें.
उदारीकरण नीति में घरेलू और बाहरी दोनों ही मोर्चे पर एक बेहद प्रतिस्पर्धी माहौल बनाने की मांग थी. इसका नतीजा यह हुआ कि देश की आर्थिक दक्षता में सुधार देखने के मिला.
ये वाकई बड़े और साहसिक सुधार थे जो अल्पमत वाली सरकार के नेतृत्व में शुरू हुए थे. प्रधानमंत्री नरसिंह राव और वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के साथ ये आप थे जो पहले रिज़र्व बैंक के डिप्टी गवर्नर और फिर गवर्नर के रूप में ये ऐतिहासिक निर्णय लिए थे.
ये वाक़ई बहुत साहसिक निर्णय थे और उनमें से कुछ के साथ जोखिम भी था. उदाहरण के लिए, रुपये के अवमूल्यन का निर्णय नई सरकार के सत्ता संभालने के एक हफ़्ते के भीतर लिया गया था. यह एक साहसिक फ़ैसला था. लेकिन अगर इसमें कुछ ग़लत हुआ होता तो इसका मतलब नई नीति का अंत भी था. तो जो भी नए उपाय हम ला रहे थे उससे जुड़ा जोखिम था और जाहिर तौर पर हम सभी जो इसके लिए ज़िम्मेदार थे, बेहद चिंतित थे.
साथ ही हम ये भी जानते थे कि तब वक़्त आ गया था उस तरह के बदलाव का.
जिस चीज़ ने उस बदलाव को गति दी, वो उस समय फैली हुई समस्याएं थीं, जिसका तब हम सामना कर रहे थे. हम एक ऐसे स्थिति में पहुंच गए थे जहां हमारे पास केवल तीन हफ़्ते आयात करने जितना विदेशी मुद्रा भंडार उपलब्ध था. सामने विदेशी कर्ज़ के भुगतान में चूक होने की पूरी संभावना दिख रही थी.
हमें बताया गया कि हमारा सामान्य कामकाज भी नहीं चल सकेगा. हमें कुछ बेहद परिवर्तनकारी करना था, जो हमने किया. हम जो बदलाव ला रहे थे उसके प्रति सचेत थे और हम इस तथ्य को भी जानते थे कि अगर कुछ ग़लत हुआ तो उसके परिणाम हमें भुगतने होंगे.
क्या आप लोगों के इन क़दमों का भारी राजनीतिक विरोध भी हुआ था?
विरोध कांग्रेस के पुराने नेताओं की ओर से हुआ. वाम दल निश्चित ही इसके ख़िलाफ़ थे, क्योंकि इसने राज्य की भूमिका को कुछ हद तक कमज़ोर कर दिया था, या उनकी राय में कम कर दिया था.
जब डॉ. मनमोहन सिंह ने 24 जुलाई 1991 को वो ऐतिहासिक बजट पेश किया तो संसद में बहुत शोर-शराबा और हंगामा हुआ. कई लोगों ने इसे आईएमएफ़ और वर्ल्ड बैंक के लिए पेश किया गया बजट बताया.
यह सच है कि आईएमएफ़ और वर्ल्ड बैंक भी तब इससे मिलती जुलती नीति की वकालत कर रहे थे. लेकिन वो हमारी ख़ुद की उस भावना की उपज थी जो बदलाव करने और वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी ख़ुद की जगह बनाने की ज़रूरत को देख रहा था.
रुपये के 20 फ़ीसद तक अवमूल्यन करने के फ़ैसले में आपकी ख़ासी भूमिका थी. और ज़ाहिर तौर पर, भारत में निजी और विदेशी बैंकों के आने के रास्ते को साफ़ करने में भी. तब क्या उपाय किए गए थे?
बैंकिंग प्रणाली के संबंध में हमने जो उपाय किए उनका उद्देश्य था कि इसे और व्यवहार कुशल और ग्राहकों के अनुकूल बनाया जाए.
बैंकों के राष्ट्रीयकरण से एक उद्देश्य प्राप्त किया गया था- बैंक ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे शहरों में पहुंच गए और बैंकिंग की सुविधाएं एक बड़े वर्ग के लिए उपलब्ध हुईं. राष्ट्रीयकरण से पहले केवल शहरी क्षेत्रों में ही बैंकिंग व्यवस्था उपलब्ध थी, तो इस लिहाज से यह सफल कहा जा सकता है. लेकिन इसी के साथ हमें इसमें उपयुक्त प्रतिस्पर्धा की कमी दिखी, लिहाजा, हमने इस व्यवस्था को और दुरुस्त बनाने के लिए एक के बाद एक कई कदम उठाए.
कैश रिज़र्व अनुपात और वैधानिक तरलता अनुपात जो बहुत अधिक थे, उन्हें नीचे लाया गया. हम जो लाए उसे बैंकों का प्रूडेंशियल रेगुलेशन कहा जाता है.
प्रतिस्पर्धा बढ़े इसके लिए हमने दो उपाय किए. हमने नए निजी बैंकों को आने की अनुमति दी. इसके लिए किसी विधायी बदलाव की ज़रूरत नहीं थी क्योंकि अधिनियम भारतीय रिजर्व बैंक को निजी क्षेत्र के बैंकों को आने की अनुमति देता था. लेकिन उस प्रावधान को कई दशकों तक ठंडे बस्ते में रखा गया. मैंने इसे वापस शुरू किया. हमने आने वाले बैंकों के लिए न्यूनतम शर्तें निर्धारित कीं.
दूसरा, हमने सार्वजनकि क्षेत्र के बैंकों को लेकर भी कुछ कार्रवाई की.
तब सरकार के पास उन बैंकों का 100 फ़ीसद स्वामित्व था, लेकिन हम जो बदलाव चाह रहे थे उसमें सरकार का स्वामित्व घट कर 51 फ़ीसद होना था. बैंकों के पर्यवेक्षण और ऑडिट में सुधार के लिए कुछ अन्य उपाय भी पेश किए गए थे.
जब पीछे मुड़ कर बीते 30 सालों पर नज़र दौड़ाते हैं तो भारतीय अर्थव्यवस्था की कहानी को आप कैसे देखते हैं?
जो आर्थिक सुधार किए गए थे, उसने एक विस्तृत क्षेत्र को कवर किया. यदि अर्थव्यवस्था के प्रदर्शन के संदर्भ में इसे देखें तो उदारीकरण के बाद से इसमें अच्छी वृद्धि देखने को मिली है. 1991 के बाद से अर्थव्यवस्था वृद्धि की औसत दर 6.4% है, जो कि एक अच्छी विकास दर है. वास्तव में 2005-06 और 2007-08 के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था की औसत विकास दर 9.2% थी. वह जबरदस्त तरक्की थी.
हालांकि 2016-17 के बाद से विकास दर में गिरावट को लेकर अब कुछ चिंता है. मुझे लगता है कि हमें इसे ध्यान से देखने की ज़रूरत है. आत्मनिरीक्षण करने की ज़रूरत है और यह पता लगाने की ज़रूरत है कि ऐसा क्यों हुआ. लेकिन तथ्य ये है कि अर्थव्यवस्था के विकास की सामान्य दर में काफ़ी वृद्धि हुई है.
दूसरा, भारत को 1991 से पहले और 1991 में भी बैलेंस ऑफ़ पेमेंट (भुगतान संतुलन) की कई परेशानियों का सामना करना पड़ा था.
लेकिन 1991 के बाद उस स्थिति में काफ़ी सुधार हुआ है. विदेशी मुद्रा भंडार अब 600 अरब डॉलर से अधिक है. 2008 और 2013 को छोड़ कर भुगतान संतुलन के मामले में स्थिति सामान्य रही है. मैं कहना चाहूंगा कि एक्सटर्नल सेक्टर का प्रबंधन उदारीकरण की सफलता की कहानी है.
विकास में गिरावट के अलावा, क्या आज आप बढ़ते संरक्षणवाद और शुल्कों में उलटफेर को एक चिंता का विषय मानते हैं?
विकास को लेकर मैं एक और टिप्पणी करना चाहूंगा. अपने आप में सुधार विकास की गारंटी नहीं देते हैं. आपको निवेश के माहौल को विकसित करना होगा. 2016 के बाद से अर्थव्यवस्था की निवेश दर में पांच फ़ीसद की गिरावट आई है. यह अच्छा नहीं है. मुझे लगता है कि कई क्षेत्रों में सुधार को आगे बढ़ाने की ज़रूरत है. आज हमारी अर्थव्यवस्था में 1991 के तरह बदलाव की ज़रूरत नहीं है.
आज हमें एक एक इंडस्ट्री या सेक्टर को देखने की ज़रूरत है, हमें ये देखना चाहिए कि कहां प्रतिस्पर्धा नहीं है और उसे कैसे बढ़ाया जाए इस पर ध्यान देना चाहिए. मुझे लगता है हमें इस तरह के दृष्टिकोण को अपनाना चाहिए.
आपने हाल के वर्षों में टैरिफ बढ़ाने का उल्लेख किया है. यह दुखद है और मैं व्यक्तिगत रूप से कहूंगा कि यह वो दिशा नहीं है जिसमें हमें आगे बढ़ना चाहिए.
कुछ लोगों को लगता है कि दुनिया में वैश्वीकरण का उलटा चल रहा है. भारत सही दिशा में आगे बढ़ सकता है अगर अन्य देश भी ऐसा करें. मुझे लगता है कि कुछ बड़े देश भी व्यापार को प्रतिबंधित करने के दोषी हैं. वास्तव में मैं कहूंगा कि मुक्त व्यापार (फ़्री ट्रेड) का माहौल उचित होने के साथ साथ ज़रूरी भी है.
उपभोक्ताओं की पसंद और उपलब्धता के मामले में 1991 बहुत बदलाव लाया. आप किस परिवर्तन को सबसे अधिक ख़ुश हैं?
मैं टेलीफ़ोन की उपलब्धता को मानता हू्ं. 1991 से पहले अगर आपने टेलीफ़ोन बुक किया तो वो तीन या चार साल बाद आता था. लेकिन अब यह अगले ही दिन आपको मिल जाता है.
मुझे याद है जब मैं पचास के दशक में अमेरिका पढ़ने गया था तब किसी ने आकर पूछा कि आपके कमरे में फ़ोन लगा दूं. मैं भारत के विषय में सोचने लगा. सोचने लगा कि न जाने कितने दिनों बाद ये लगेगा. लेकिन उस व्यक्ति ने कहा कि दोपहर तक लग जाएगा. तो यही वो दिशा है जिसमें हम जा रहे हैं. आर्थिक उदारीकरण ने उत्पादों और सेवाओं की अधिक उपलब्धता को बनाने में मदद की है.
मैं अपनी बात इस नोट पर ख़त्म करूंगा कि सुधारों की स्वीकार्यता के लिए विकास ऐसे होने चाहिए जिससे अधिकांश लोगों को लाभ हो.
अगर यह एकतरफा है और लोगों के एक बड़े वर्ग को इसका लाभ नहीं मिल रहा तो सुधारों की विश्वसनीयता ख़त्म हो जाती है.
अगर आप 2005 से 2011 के बीच की अवधि को देखें, जब अर्थव्यवस्था की विकास दर 8-9 फ़ीसद के बीच थी, तो आप पाते हैं कि ग़रीबी का अनुपात कहीं तेज़ी से गिर रहा है. और उस अवधि के दौरान भी हम ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना या विस्तृत खाद्य सुविधाओं जैसे विभिन्न सामाजिक सुरक्षा उपायों को शुरू करने में सक्षम थे.
विकास ही हमारी कई सामाजिक-आर्थिक समस्याओं का समाधान है.
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