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स्टैन स्वामी: ज़मानत के लिए तरसती रही एक 'बुलंद आवाज़'
- Author, रवि प्रकाश
- पदनाम, राँची से, बीबीसी हिन्दी के लिए
पीटर मार्टिन 'बगइचा' के उसी कमरे में रहते हैं, जो कभी फ़ादर स्टैन स्वामी का आशियाना था. यह बगइचा (स्टेन स्वामी का दफ़्तर) के पहले तल पर है.
बाहर से लाल और अंदर सफ़ेद रंग से पुती हुई दीवारों वाली यह दो मंज़िला बिल्डिंग स्टैन स्वामी का दफ़्तर और घर दोनों थी. यहीं काम करते हुए उनकी पहचान देश के मशहूर मानवाधिकार कार्यकर्ता के बतौर बनी. वे पूरी ज़िंदगी आदिवासियों और दलितों के हक़ की लड़ाई लड़ते रहे. यहीं रहते हुए उन्होंने क़रीब छह दर्जन किताबें और नोट्स लिखे.
साल 2020 के अक्तूबर महीने की आठ तारीख़ को राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) द्वारा गिरफ़्तार किए जाने तक वे यहीं रहे. अब यहाँ उनसे जुड़ी यादें हैं. 84 साल के स्टैन स्वामी भीमा कोरेगाँव मामले में न्यायिक हिरासत में थे. उन पर हिंसा भड़काने का मामला चल रहा था और यूएपीए के तहत मामला दर्ज था.
पीटर मार्टिन ये सारी बातें बताते हुए भावुक भी हुए और उनकी आवाज़ एकाध दफ़ा लड़खड़ाई भी.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "फ़ादर स्टैन स्वामी आदिवासियों के अधिकारों की बात करने वाली एक बुलंद आवाज़ थे, जो लोगों के आक्रोश को स्वर देते थे. जब कभी, जहाँ कहीं भी समाज में आम जनता के प्रताड़ना की बात सामने आई, वह आवाज़ मुखर रही. वे कभी किसी से डरे नहीं. जब तक वे थे, उनकी आवाज़ कभी नहीं डगमगाई. आने वाले वक़्त में लोग उन्हें इसी रूप में याद करेंगे. उनके जाने (निधन) से जो शून्यता आई है, उसकी भरपाई शायद नहीं हो सकेगी."
पीटर मार्टिन ने यह भी कहा, "साल 2017 में वे विचाराधीन क़ैदियों के अधिकारों और उनकी प्रताड़ना के मामले को लेकर अदालत में गए. अब उनका निधन भी एक विचाराधीन क़ैदी के रूप में सरकार से लड़ते हुए हुआ, यह अफ़सोसजनक है."
'फ़ादर की मौत नहीं, उनकी हत्या हुई'
फ़ादर स्टैन स्वामी के निधन की ख़बर फैलते ही झारखंड की राजधानी राँची समेत कई शहरों-क़स्बों में सामाजिक कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किए. राँची और बगोदर में इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पुतले फूँके गए. प्रदर्शनकारियों ने कहा कि फ़ादर स्टैन स्वामी की मौत को स्वाभाविक नहीं मान सकते. यह सुनियोजित हत्या जैसी घटना है.
फ़ादर स्टैन स्वामी की संस्था बगइचा के मौजूदा निदेशक पीएम टोनी ने बीबीसी से कहा कि फ़ादर स्टैन स्वामी की मौत के लिए केंद्र सरकार और उसकी एजेंसी एनआईए ज़िम्मेदार है. अगर उन्हें समय पर ज़मानत मिल गई होती, तो वे शायद कई और सालों तक जीवित रहते.
उन्होंने कहा, "भीमा-कोरेगाँव मामला पूरी तरह से बनाया हुआ केस है. फ़ादर स्टैन स्वामी को न्यायिक व्यवस्था पर भरोसा था, इसलिए उन्हें ज़मानत की उम्मीद थी. लेकिन, उनके मामले की सुनवाई टलती रही. तीन अक्तूबर को भी उनकी ज़मानत पर हियरिंग थी, लेकिन नहीं हो सकी. उन पर इसका बड़ा असर पड़ा. उनकी तबीयत ज़्यादा बिगड़ गई और वे कोमा में चले गए. अंततः उनका निधन हो गया."
"फ़ादर स्टैन स्वामी हमेशा अलर्ट रहते थे. उन्होंने आदिवासियों के अधिकारों के संरक्षण की लड़ाई लड़ी. उन्हें न केवल जागृत, बल्कि संगठित भी किया. उन्हें समझाया कि विकास के नाम पर सरकारें किस तरह से आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों का हनन करती हैं. वे मानते थे कि आदिवासी जब अपने अधिकारों को समझ जाएँगे, तो ख़ुद ही अपनी लड़ाई लड़ेंगे. इसलिए उन्होंने आदिवासियों को ही आंदोलनों की रूपरेखा तय करने दिया. आदिवासियों की तरह सादा जीवन और उनके मूल्यों को जिया."
'उम्मीद थी वे लौट आएँगे'
झारखंड जनाधिकार महासभा से जुड़े चर्चित सामाजिक कार्यकर्ता सिराज दत्ता फ़ादर स्टैन स्वामी के क़रीब रहे हैं.
उन्होंने कहा, "इस बात का शक तो था कि फ़ादर स्टैन स्वामी के साथ यह सलूक हो सकता है. उनकी गिरफ़्तारी के बाद से अब तक के 10 महीने आक्रोश और निराशा के भी रहे हैं. मुझे फिर भी उनकी वापसी की उम्मीद थी. सरकार उन्हें तोड़ नहीं सकी, तो मार दिया. लेकिन, इससे समानता और इंसाफ़ की लड़ाई कमज़ोर नहीं पड़ेगी. इस फ़ासिस्ट सरकार के ख़िलाफ़ फ़ादर स्टैन स्वामी ने जो संघर्ष शुरू किया, वो आगे भी जारी रहेगा."
इस बीच राँची के सीपीआई दफ़्तर में सोमवार की शाम हुई एक बैठक में कहा गया, "स्टैन स्वामी की मौत को हम प्राकृतिक मौत नहीं मानते. हमारी यह स्पष्ट धारणा है कि वे मोदी सरकार और भारतीय न्याय व्यवस्था की क्रूरता के शिकार हुए हैं. हमारी झारखंड सरकार से माँग है कि उनके पार्थिव शरीर को राँची लाने की व्यवस्था करे, जो स्टैन की कर्मभूमि रही है."
इस बैठक में शामिल रहीं आलोका कुजूर ने यह जानकारी दी. उन्होंने बताया कि सीपीआई दफ़्तर में हुई बैठक में कई जाने-माने बुद्धिजीवी, स्टैन के सहयोगी रहे कार्यकर्ता और सोशल एक्टिविस्ट शामिल हुए.
'मेरी ज़िंदगी का सबसे दुखद दिन'
मशहूर अर्थशास्त्री, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता ज्यां द्रेज़ और फ़ादर स्टैन स्वामी की सालों पुरानी पहचान रही है. दोनों ने तमाम आंदोलनो में साथ काम किया है. उन्होंने एक टीवी डिबेट में कहा कि स्टैन का निधन उनकी ज़िंदगी की सबसे दुथद घटनाओं में से एक है.
ज्यां द्रेज़ ने कहा, "84 साल का एक आदमी जो पार्किंसन जैसी बीमारी से ग्रसित हो, उनकी ज़मानत का विरोध करने के लिए एनआईए को कभी माफ़ नहीं किया जा सकता. मैं उन्हें पिछले 15-20 सालों से जानता था. वे शानदार शख़्सियत के मालिक और ज़िम्मेदार नागरिक थे. मैं नहीं मानता कि वे माओवादी थे. अगर वे थे भी, तो उन्हें ज़मानत और इलाज का अधिकार था."
"दरअसल, यूएपीए से जुड़े मामलों में इसके अभियुक्तों को बग़ैर सबूत सालों जेलों में विचाराधीन रखना नियमित प्रैक्टिस हो गई है. जबकि इसका कन्विक्शन रेट सिर्फ़ दो फ़ीसद है. फ़ादर स्टैन स्वामी को भी यूएपीए के तहत गिरफ़्तार किया गया था. अब इस पर तत्काल बहस की ज़रूरत है कि ऐसे मामलों में लोगों को कई-कई सालों तक अंडर ट्रायल रखना कितना उचित है. जबकि ऐसे अधिकतर मामलों में एजेंसियाँ कोई सबूत नहीं पेश कर पातीं और लोग बाद में रिहा हो जाते हैं."
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