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म्यांमार की शरणार्थी गर्भवती महिलाओं की भारत में बढ़तीं मुश्किलें
- Author, पॉलीन ज़ोनुनपुई
- पदनाम, बीबीसी के लिए
"उनकी डिलीवरी की तारीख़ बीत चुकी है. पेट में बच्चे की हलचल भी कम हुई है."
एक डॉक्टर, जो ख़ुद भी शरणार्थी हैं, उन्होंने निआंग (बदला हुआ नाम) की जांच करते हुए मुझे बताया जब 16 जून को मैं मिज़ोरम के एक शरणार्थी कैंप में पहुंची.
29 साल की निआंग तीन बच्चों की मां हैं. उन्हें लगा था कि डिलीवरी के लिए उनके पास कुछ दिन और बचे हैं.
"मैंने मार्च में बॉर्डर पार किया और अप्रैल में यहां पहुंची. मुझे लगता है तब मैं 6 महीने की गर्भवती थी. मैं एक डॉक्टर के पास गई, उन्होंने बताया कि जून के आख़िरी हफ़्ते में डिलीवरी होगी.
महामारी के कारण उनकी प्रसव पूर्व देखभाल ठीक से नहीं हो पाई. वो कहती हैं, "उन्होंने जांच के दौरान मेरे पेट को छुआ भी नहीं. अगले ही दिन अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया. मुझे डर है कि मैं बच्चे को खो दूंगी."
दूसरी गर्भवती महिलाएं भी परेशान
इस शरणार्थी कैंप में दूसरी गर्भवती महिलाएं भी ऐसी ही परेशानियों से जूझ रहीं हैं. निआंग के पति, तीन बच्चे और आठ दूसरे परिवार, जिनमें पांच और गर्भवती महिलाएं शामिल हैं, अब इसे ही अपना घर मानती हैं. यहां एक हॉल और कॉमन बाथरूम है. इसे एक एनजीओ ने मार्च में म्यांमार के शरणार्थियों के लिए बनाया था.
राज्य सीआईडी के आंकड़ों के मुताबिक निआंग और ये पांच गर्भवती महिलाएं उन 9036 पंजीकृत शरणार्थियों (911 से अधिक का पंजीकरण नहीं हुआ है) में से हैं जिन्होंने म्यांमार में सैन्य तख़्तापलट के बाद मिज़ोरम में शरण ली है. इनके जैसे कई और लोग भी हैं जो मिज़ोरम में कैंपों में रह रहे हैं.
लेकिन सरकार के पास गर्भवती महिलाओं को ट्रैक करने का कोई सिस्टम नहीं है. सरकार को इस बात की भी जानकारी नहीं है कि कितनी महिलाओं ने ऐसे कैंपों में बच्चों को जन्म दिया है.
सरकार के पास नहीं हैं आंकड़ें
एक सरकारी अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, "मिज़ोरम में शरणार्थी संकट अजीब सा है. यहां शरणार्थियों के लिए चिन्हित कैंप नहीं हैं. ये शरणार्थी एक जगह से दूसरी जगह जा रहे हैं, कुछ परिवार के साथ हैं. कई लोग हमें जानकारी नहीं देते, कई वापस जा चुके हैं. इसलिए इनका रिकॉर्ड रखना मुमकिन नहीं है."
मैंने ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क की मानवाधिकार वकील रोज़ालिन एल. हमर की मदद से कुछ गर्भवती महिलाओं को ट्रैक किया. मैं पांच ऐसी महिलाओं से एक शरणार्थी कैंप में मिली जिसे मिज़ोरम के सबसे ताक़तवर छात्र संगठन, मिज़ो जिरलाई पॉल और कई एनजीओ के एक संगठन 'यूनाइटेड फ़ॉर डेमोक्रेटिक म्यांमार' ने बनाया है.
यूनाइटेड फ़ॉर डेमोक्रेटिक म्यांमार के अध्यक्ष लालरामलावना ने बताया कि अइज़ोल में 1600 शरणार्थी हैं, इस एक कैंप में 258 महिलाएं हैं जिनमें पांच गर्भवती महिलाएं हैं. इनमें से तीन अपनी गर्भावस्था की तीसरी तिमाही में हैं.
लंबी यात्रा से बिगड़े हालात
इनमें 31 साल की तिन्माह (बदला हुआ नाम) शामिल हैं. उन्हें बताया गया है कि उनकी डिलीवरी का समय बीत चुका है. उनके बच्चे की पोज़िशन भी उल्टी है, आमतौर पर पहले सिर वाली स्थिति नहीं है.
वो पूछती हैं, "क्या ऐसा हमारे यहां तक यात्रा करने के तरीक़े से हुआ है?"
"हम एक मोटरसाइकिल पर आए थे. हमें जंगलों के रास्ते आना पड़ा था." उन्होंने बताया कि पांच मार्च को उन्हें म्यांमार से भागना पड़ा था क्योंकि उनके पति के ख़िलाफ़ गिरफ्तारी का वारंट जारी किया गया था.
वो पहले सीमा पर चापी गांव में पहुंचे और फिर वहां से 18 घंटे की यात्रा कर चांपाई में, "चांपाई में हम अपने एक दोस्त से मिले जिन्होंने अइज़ोल की एक सुरक्षित जगह के बारे में बताया. वहां से हमने एक सूमो लिया और 13 अप्रैल को हम यहां पहुंचे."
मिज़ोरम की सरकार शरणार्थियों को जगह देने के पक्ष में है. सीमा के दोनों तरफ़ की जनजातियां परंपरागत तौर पर एक दूसरे से जुड़ी हुईं हैं. मिज़ोरम-म्यांमार की 510 किलोमीटर सीमा पर फेंसिंग नहीं है, इसलिए लोगों का आना जाना रोकना मुश्किल होता है.
फ़रवरी में राज्य सरकार ने "म्यांमार से आने वाले शरणार्थियों और प्रवासियों की मदद के लिए" निर्देश जारी किए थे. तब से हज़ारों लोग सीमा पार कर चुके हैं.
तिन्माह की तरह की कई दूसरी महिलाएं भी तनावपूर्ण यात्रा के बच्चों पर होने वाले असर को लेकर चिंतित दिखीं. कई दूसरी महिलाएं इस बात को भी लेकर चिंतित थीं कि डिलीवरी रूम में डॉक्टरों से वो कैसे बात करेंगी क्योंकि उनकी भाषा अलग है.
एक महिला ने बताया, "एक बात मुझे रातभर जगाए रखती है कि मेरे परिवार में कोई दूसरी महिला नहीं है. मुझे हर वक्त रोना आता है. काश मेरे बच्चे के जन्म के समय मेरी मां यहां आ जाए."
कोरोना महामारी का भी डर
ज़ुआली, जो कि सात महीने की गर्भवती हैं, कहती हैं, "मैं तीसरी बार गर्भवती हूं, लेकिन इतना तनाव पहले कभी नहीं हुआ. दो बच्चों की मां और गर्भवती होने की सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि अपनी चार और छह साल की बेटियों की बहुत चिंता होती है. मैं ये सोचकर परेशान रहती हूं कि बच्चे को जन्म देने के बाद जब मुझे आराम की ज़रूरत होगी, तो इनका ध्यान कौन रखेगा."
एक डर और भी है. अप्रैल 2021 से अइज़ोल में कोविड के कारण तीन 'मैटरनल डेथ' हो चुकी हैं. इसलिए ये महिलाएं कैंप के बाहर बच्चों को जन्म देने से भी घबरा रही हैं.
27 साल की कोइमा (बदला हुआ नाम) कहती हैं, "यहां पर कोविड नहीं है. लेकिन मुझे नहीं पता कि अस्पताल में मैं अपनी सुरक्षा कैसे कर पाऊंगी, ख़ासकर डिलीवरी के समय."
केंद्र और राज्य सरकार की बंटी राय
19 जून को मैं मिज़ोरम के मुख्यमंत्री ज़ोरामथांगा से मिली और सरकार इन महिलाओं के लिए क्या क़दम उठा रही है, इससे जुड़े सवाल पूछे. उन्होंने कहा, "मैंने शरणार्थियों की मदद के लिए 30 लाख रुपये का प्रावधान किया है. मैं शुरुआत में ही एक बहुत बड़ी रक़म का प्रावधान नहीं करना चाहता, क्योंकि ये बड़ी संख्या में लोगों को यहां आने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है."
ज़ोरामथांगा केंद्र सरकार से भी मदद मांग रहे हैं. वो इन्हें राजनीतिक शरण देने की मांग कर रहे हैं. लेकिन केंद्रीय गृह मंत्रालय की राय अलग है.
भारत 1951 रिफ्यूजी कन्वेशन या इसके 1967 प्रोटोकाल का हिस्सा नहीं है. लेकिन भारत ने यूएन कन्वेंशन अगेंस्ट टॉर्चर (यूएनसीएटी) पर दस्तख़त किए हैं. इसके प्रवाधानों के मुताबिक किसी व्यक्ति को किसी ऐसे दूसरे देश में नहीं भेजा जा सकता जहां उन्हें ख़तरा हो या उन्हें यातना दी जाए.
ज़ोरामथांगा ने मुझे बताया कि शरणार्थी को लेकर कोई लंबे समय की प्लानिंग नहीं है लेकिन "फ़ैसले आवश्यकता के अनुसार" लिये जाएंगे. समुदाय के नेता और गांव के एनजीओ और शरणार्थियों को लाने के पक्ष में हैं.
म्यांमार में हिंसा जारी है,ऐसे में मिज़ोरम में रह रहे हज़ारों शरणार्थियों के वापस लौटने की उम्मीद कम ही है. कई मांएं जिन्होंने अपने लिए अस्थायी घर बना लिए हैं, कहती हैं, कि उनके परिवार बिछड़ गए हैं, लेकिन उन्हें पता है कि म्यांमार से दूर रहना ही बेहतर है.
कुछ लोगों को वापस लौटने की उम्मीद कम है, लेकिन कुछ की उम्मीद अभी भी बची है.
कोइमा कहती हैं, "ये कैंप हमारे घर नहीं हैं लेकिन हम सुरक्षित है, सो सकते हैं, खाना है, कपड़े हैं, दवाइयां हैं. जब स्थिति सामान्य हो जाएगी तो मुझे उम्मीद है मैं अपने बच्चों और होने वाले बच्चे के साथ वापस लौट पाऊंगी. मुझे उम्मीद है कि एक दिन फिर मैं पढ़ा सकूंगी."
(नाम अनुरोध के मुताबिक पहचान छुपाने के लिए बदले गए हैं)
(पॉलीन ज़ोनुनपुई मिज़ोरम की एक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)
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