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पीएम मोदी की कश्मीर पर बैठक में जम्मू के लोगों की 'मन की बात' को कितनी मिलेगी अहमियत?
- Author, मोहित कंधारी
- पदनाम, जम्मू से, बीबीसी हिन्दी के लिए
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में 24 जून को दिल्ली में होने वाली सर्वदलीय बैठक को लेकर केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक हलचल तेज़ हो गई है.
जहाँ एक ओर कश्मीर के सियासी दल अपनी-अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठ कर एक मज़बूत रणनीति बनाने में जुटे हैं, वहीं जम्मू के हित की बात करने वाले दलों के नेताओं ने केंद्र सरकार पर एक दफ़ा फिर उन्हें नज़रअंदाज़ करने का आरोप लगाया है.
उनका कहना है कि आख़िर क्यों केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर के मुद्दे को सिर्फ़ कश्मीरी नेताओं के चश्मे से ही देखने का प्रयास करती है, क्यों जम्मू के सियासी दलों को केंद्र के सामने अपनी बात रखने का ठीक से मौक़ा भी नहीं दिया जाता?
जम्मू के नेताओं का क्या है कहना?
ऐसा नहीं है कि जम्मू संभाग के नेताओं को बैठक में नहीं बुलाया गया है, लेकिन जिन नेताओं को निमंत्रण दिया गया है वो पैंथर्स पार्टी के प्रोफ़ेसर भीम सिंह को छोड़ सभी राष्ट्रीय दलों की प्रदेश इकाई के नेता हैं और उनकी राय पार्टी हाई कमान से अलग नहीं हो सकती.
जम्मू में मौजूद राजनीतिक विश्लेषक प्रोफ़ेसर हरिओम का कहना है कि भाजपा के नेता इस बैठक में वही भाषा बोलेंगे, जो भाषा उन्हें दिल्ली में बैठे अपने नेताओं की ओर से दी गई होगी. वहीं कांग्रेस भी एक राष्ट्रीय दल है, उसके नेता भी जम्मू के लोगों की भावनाओं को प्रधानमंत्री के सामने दोहरा नहीं सकते.
ऐसे में यह सवाल उठना लाज़मी है कि जम्मू संभाग के लोगों के 'मन की बात' आख़िर कौन और कैसे केंद्र सरकार के सामने रखेगा.
जम्मू में इक्कजुट पार्टी के प्रधान अंकुर शर्मा ने बीबीसी हिंदी से कहा, "केंद्र की भाजपा सरकार ने कश्मीर घाटी से ऐसी पार्टियों को निमंत्रण दिया है, जिनको अभी तक मान्यता प्राप्त नहीं हुई है. दूसरी तरफ़ जम्मू में जिन सियासी दलों ने चुनाव में हिस्सा लिया है, उन्हें अपनी बात केंद्र सरकार के सामने रखने का मौक़ा भी नहीं दिया गया है."
भेदभाव का आरोप
केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए अंकुर शर्मा कहते हैं, "देश के प्रधानमंत्री ने कश्मीर घाटी से ऐसे नेताओं के साथ बातचीत करने का मन बनाया है जिनके ख़िलाफ़ अलगाववादी नेताओं के साथ मिलकर देश विरोधी ताक़तों को मज़बूत करने के आरोप लगते रहे हैं. क्या वजह है कि जम्मू में काम कर रहे राष्ट्रवादी नेताओं को अपनी बात रखने के लिए निमंत्रण तक नहीं दिया गया है."
अंकुर शर्मा कहते हैं कि यह सब देख कर लगता है कि केंद्र सरकार के मानचित्र पर जम्मू संभाग कहीं मौजूद ही नहीं है.
जम्मू संभाग को अलग राज्य का दर्जा दिया जाने की माँग को लेकर अपनी राजनीति करने वाली इक्कजुट पार्टी के प्रधान ने बीबीसी हिंदी से कहा, "ऐसा लगता है कि केंद्र सरकार ने कश्मीर घाटी के किसी सियासी दल के साथ मिलकर सरकार बनाने का मन बना लिया है और यही वजह है कि वो कश्मीरी नेताओं के साथ मिलकर चुनाव से पहले माहौल तयार करने का काम कर रही है और जम्मू के हितों की अनदेखी कर रही है."
भाजपा के अलग सुर
दूसरी ओर भाजपा के वरिष्ठ नेता और प्रदेश के पूर्व उप मुख्यमंत्री रहे डॉ. निर्मल सिंह ने बीबीसी हिंदी से बातचीत में कहा, "यह बात सच है कि जम्मू संभाग के साथ लंबे समय तक भेदभाव होता रहा है लेकिन जबसे केंद्र में भाजपा की सरकार बनी है, उसने जम्मू संभाग को उसका हक़ दिलाया है."
डॉ. सिंह कहते हैं कि 24 जून को होने वाली सर्वदलीय बैठक में वो अपनी प्रदेश इकाई की तरफ़ से परिसीमन आयोग की कार्रवाई पर अपना पक्ष रखेंगे ताकि जम्मू संभाग के साथ कोई भेदभाव न होने पाए.
डॉ. सिंह ने कहा, "हमारी केंद्र सरकार से यही माँग रहेगी कि परिसीमन आयोग इस बात का ख़्याल रखे कि 2011 की सेन्सस रिपोर्ट में जो कमियाँ थीं, उसके कारण विधानसभा की सीटों का बँटवारा करते समय जम्मू संभाग के साथ भेदभाव न होने पाए. जनसंख्या, क्षेत्रफल, सूचना सेवाएँ, भौगोलिक स्थिति, सड़क मार्ग के अनुपात में असेंबली सीटों का बँटवारा हो सके और जम्मू संभाग का सही मायनों में राजनीतिक सशक्तिकरण किया जा सके."
डॉ. निर्मल सिंह ने कहा कि 24 जून को होने वाली बैठक में वो जम्मू कश्मीर असेंबली में ख़ाली पड़ी 24 सीटों में से पश्चिमी पाकिस्तान से आए शरणार्थियों के लिए कम से कम आठ सीटें आबंटित करने की माँग करेंगे ताकि उन्हें अपना नेता चुनने का हक़ मिल सके.
बैठक में शामिल होने वाले पैंथर्स पार्टी के नेता प्रोफ़ेसर भीम सिंह ने बीबीसी हिंदी से बातचीत के दौरान कहा कि वो बैठक में प्रधानमंत्री से यही कहेंगे कि जम्मू-कश्मीर को बिना समय नष्ट किए राज्य का दर्जा बहाल करें.
प्रोफ़ेसर भीम सिंह ने कहा कि वो चाहते हैं कि राज्य का दर्जा बहाल करने के बाद परिसीमन आयोग को अपना काम ठीक ढंग से करने दिया जाए, ताकि वो सीटों का बँटवारा कर सके और फिर प्रदेश में चुनाव घोषित कर जनता की चुनी हुई सरकार का गठन किया जा सके.
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