You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
क्या उद्धव ठाकरे सरकार पर ख़तरे के बादल मंडरा रहे हैं?
- Author, अनंत प्रकाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
महाराष्ट्र में बीते कुछ दिनों से जारी सियासी घटनाक्रम के बीच अटकलें लग रही हैं कि क्या महा विकास अघाड़ी सरकार पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं?
इन सबके बीच तीनों घटक दलों की ओर से रह-रहकर हो रही बयानबाज़ी का दौर जारी है.
हालिया विवाद शिवसेना नेता प्रताप सरनायक की चिट्ठी से खड़ा हुआ है जिसमें उन्होंने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को बीजेपी से हाथ मिलाने की सलाह दी है.
महाराष्ट्र की राजनीति में सरनायक को उन नेताओं में गिना जाता है जो उद्धव ठाकरे के बेहद करीब माने जाते हैं. ऐसे में सरनायक की चिट्ठी को एक असंतुष्ट विधायक की चिट्ठी के रूप में नहीं देखा जा सकता.
वहीं, इस गठबंधन के दूसरे घटक दल कांग्रेस के शीर्ष नेता नाना पटोले ने आगामी चुनावों को अपने दम पर लड़ने की बात कही है.
ऐसे में सवाल उठता है कि कांग्रेस, शिवसेना और एनसीपी के बीच हुए गठबंधन में दरार पड़ रही है?
आख़िर विवाद की वजह क्या है?
लगभग 18 महीने पहले जब शिव सेना, कांग्रेस और एनसीपी ने महाराष्ट्र में गठबंधन करके सरकार बनाई थी तो कई राजनीतिक विश्लेषकों के लिए ये गठबंधन एक अचंभे की तरह था.
इसकी वजह इन तीनों पार्टियों की विरोधाभासी विचारधाराएं हैं. इन तीनों दलों का इतिहास भी इन्हें एक बेमेल गठबंधन की संज्ञा दिए जाने में एक भूमिका अदा करता है.
महाराष्ट्र की राजनीति को समझने वाले राजनीतिक विश्लेषक अश्विन अघोर मानते हैं कि ये एक ऐसा गठबंधन है जिसका भविष्य चुनौती पूर्ण होना लाज़मी है क्योंकि इसके घटक दलों की विचारधाराएं एक दूसरे से काफ़ी अलग हैं
वे कहते हैं, “इस समय हालत ये है कि तीनों घटक दल ये चाहते हैं कि उन्हें किसी तरह इस बेमेल गठबंधन की सरकार से निजात मिले. लेकिन समस्या ये है कि कोई पहल नहीं करना चाहता. क्योंकि जो भी दल आगे बढ़कर अपना समर्थन वापस लेगा, उसे जनता के गुस्से का सामना करना पड़ेगा.”
अघोर मानते हैं कि बढ़ती दूरियों की वजह पवार के इंटरव्यू में भी स्पष्ट हो जाती है.
कुछ दिनों पहले शरद पवार ने शिव सेना के मुखपत्र सामना को दिए इंटरव्यू में कहा है कि सरकार को अगर पार्टी की तरह चलाया जाएगा तो तकलीफ़ होगी.
अघोर कहते हैं, “कुछ दिनों पहले कुछ ख़बरें आई थीं कि उद्धव ठाकरे अपने मंत्रियों के साथ बातचीत नहीं करते हैं. जब कोरोना का संकट चरम सीमा पर था तो यहां के स्वास्थ्य मंत्री राजेश टोपे ने मुख्यमंत्री से सलाह लेने के लिए कई बार फोन किया. ठाकरे से लेकर उनके पीए को फोन किया. लेकिन बात नहीं हो पायी. और ये एक तरह की आम शिकायत हैं कि मुख्यमंत्री नॉट – रीचेबल यानी पहुंच से बाहर हैं और सरकार अपने ढंग से चला रहे हैं.“
क्या ये ख़तरे की घंटी है?
शिव सेना नेता प्रताप सरनायक की चिट्ठी के बारे में अघोर कहते हैं कि इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता क्योंकि उन्होंने ये पत्र मुख्यमंत्री कार्यालय में भेजा, पार्टी मुख्यालय में नहीं.
वो कहते हैं,"इससे कई सवाल खड़े होते हैं कि क्या मुख्यमंत्री अपने ही विधायकों से मुलाक़ात नहीं कर रहे हैं. और सरनायक कोई छोटे नेता नहीं हैं. वे ठाकरे परिवार के बेहद क़रीबी लोगों में शामिल हैं. वह कभी भी मातोश्री जा सकते हैं. ऐसे में उनका इस तरह पत्र लिखना कई सवाल खड़े करता है.”
महाराष्ट्र की राजनीति को समझने वाली वरिष्ठ पत्रकार सुजाता आनंदन मानती हैं कि इस सियासी उठा-पटक को सरकार पर संकट के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि मौजूदा समय में अगर ये सरकार गिर जाती है तो घटक दलों को कुछ भी सकारात्मक परिणाम नहीं मिलेगा.
वो कहती हैं,"हमें समझना पड़ेगा कि ये बयानबाज़ी किस समय हो रहा है. अभी से कुछ महीनों बाद नगरपालिका के चुनाव होने जा रहे हैं. अब अगर इन चुनावों में ये पार्टियां मिलकर लड़ती हैं तो शिव सेना को कुछ सीटें छोड़नी पड़ सकती हैं. ऐसे में ये जो कुछ भी हो रहा है, इसे इस संदर्भ में देखने की ज़रूरत है कि तीनों पार्टियां एक दूसरे के साथ ज़ोर-आजमाइश कर रही हैं ताकि समझौता ठीक और संतुलित ढंग से हो सके.”
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)