एमएसपी में बढ़ोतरीः क्या यूपी चुनाव से पहले किसानों का असंतोष कम कर पाएगी सरकार?

    • Author, दिलनवाज़ पाशा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत सरकार ने बुधवार को खरीफ़ सत्र की फ़सलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने का एलान किया है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट करके कहा कि फ़सलों का दाम बढ़ने से किसानों की आमदनी बढ़ेगी और जीवन स्तर बेहतर होगा.

किसान संगठन इसे किसानों के साथ मज़ाक़ बता रहे हैं.

वहीं, कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि ये हर साल होने वाली सामान्य वृद्धि है जो किसानों की ज़रूरतों और नुक़सान को पूरा करने में नाकाफ़ी साबित होगी.

बुधवार को केंद्र सरकार ने धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य 72 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ाकर 1940 रुपये कर दिया है.

इसके अलावा दालों, तिलहन और मक्का के रेट भी बढ़ाए गए हैं. वहीं कपास की एमएसपी में 211 रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि की गई है.

सबसे कम बढ़ोतरी मक्का के लिए है जो सिर्फ़ 1.08 प्रतिशत की वृद्धि है. सबसे अधिक वृद्धि तिल की फ़सल के लिए की गई है जो 6.5 प्रतिशत है.

भारत में खरीफ़ सत्र में किसान सबसे ज़्यादा धान और कपास की खेती करते हैं. यदि प्रतिशत के लिहाज़ से देखें तो कपास के लिए एमएसपी 3.8 प्रतिशत जबकि धान के लिए 3.85 प्रतिशत बढ़ाई गई है.

"किसानों के साथ मज़ाक़"

राजस्थान के श्रीगंगानगर में 43 डिग्री सेल्सियस की गर्मी में खेत में काम कर रहे किसान हरविंदर सिंह बरार ने बीबीसी से कहा, "सरकार ने जो एमएसपी बढ़ाई है वो किसानों के साथ एक धोखा है. यदि पिछले एक साल की महंगाई दर को ही देखें तो वो सात प्रतिशत के आसपास है. ऐसे में फ़सलों के दाम तीन-साढ़े तीन प्रतिशत बढ़ाना अगर मज़ाक़ नहीं है तो क्या है?"

कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा कहते हैं कि सरकार की तरफ़ से बढ़ाई गई एमएसपी से किसानों को कोई वास्तविक लाभ नहीं होगा क्योंकि एक तरफ़ तो ये बहुत कम है और दूसरी तरफ़ किसानों के पास एमएसपी पर फ़सल बेचने की गारंटी नहीं है.

किसान आंदोलन के नेता भी एमएसपी में इस बढ़ोतरी को देश के किसानों के साथ मज़ाक़ बता रहे हैं.

कीर्ति किसान यूनियन के नेता राजिंदर सिंह दीपसिंहवाला ने बीबीसी से कहा, "एमएसपी में ये मामूली बढ़ोतरी आंदोलन कर रहे किसानों के साथ मज़ाक़ है. ऐसा लगता है कि सरकार ने किसानों को आंदोलन करने की सज़ा दी है."

बीजेपी ने इस तरह के सभी आरोपों को ख़ारिज करते हुए कहा है कि 'राज्य और केंद्र सरकार किसानों के हितों की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं.'

उत्तर प्रदेश बीजेपी के नेता और विधान परिषद के सदस्य गोविंद शुक्ला ने बीबीसी से कहा, "भाजपा सरकार किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है. एमएसपी में वृद्धि भी इसी दिशा में उठाया गया क़दम है."

सरकार ने ये क़दम ऐसे समय उठाया है जब किसान संगठन तीन कृषि क़ानूनों को रद्द करवाने और एमएसपी की क़ानूनी गारंटी हासिल करने के लिए आंदोलन कर रहे हैं. उत्तर प्रदेश समेत पाँच राज्यों में अगले एक साल के भीतर चुनाव भी होने वाले हैं. ऐसे में माना जा रहा है कि सरकार किसानों को साधने की कोशिश कर रही है.

हालांकि कृषि विश्लेषकों का कहना है कि एमएसपी बढ़ाए जाने का आंदोलन और चुनावों से मतलब नहीं है.

कृषि विशेषज्ञ सुधीर पंवार कहते हैं, "इस मामूली बढ़ोतरी से स्पष्ट है कि सरकार को किसानों के आर्थिक हितों की परवाह नहीं है."

वहीं देवेंद्र शर्मा कहते हैं, "खरीफ़ सत्र की फ़सलें, जिसमें धान भी शामिल है, का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाना एक सामान्य प्रक्रिया है जो सरकार हर साल बुआई से पहले करती है. इसे यूपी में चुनावों से पहले या कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ चल रहे प्रदर्शनों के दबाव में उठाए गए क़दम के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए."

लगातार बढ़ रही है कृषि की लागत

किसान हरविंदर सिंह बरार कहते हैं, "आजकल लागत बहुत ज़्यादा बढ़ गई है. डीज़ल, मशीनरी, बीज, खाद सब महंगा हो गया है. कृषि क्षेत्र को मज़दूर भी नहीं मिल रहे हैं. किसानों पर डीज़ल के ज़रिए टैक्स का बोझ भी बहुत ज़्यादा हो गया है."

पिछले एक साल के भीतर ही डीज़ल के दामों में 26 प्रतिशत की वृद्धि हो चुकी है. इसके अलावा खाद के दाम भी बढ़े हैं. ऐसे में किसानों और कृषि विश्लेषकों का कहना है कि सरकार ने एमएसपी बढ़ाते समय महंगाई और किसानों की लागत बढ़ने का ध्यान नहीं रखा है.

सुधीर पंवार कहते हैं, "रिज़र्व बैंक के आकलन के मुताबिक़ इस साल कंज़्यूमर प्राइस इंडेक्स 5.1 प्रतिशत रहने वाला है. सरकार ने जो एमएसपी बढ़ाई है उससे महंगाई की भी पूर्ति नहीं होती है, इससे साफ़ है कि किसानों को कोई आर्थिक लाभ नहीं होने वाला है."

वहीं गोविंद शुक्ला कहते हैं, "बीजेपी के शासन में किसानों को खाद और बीज आसानी से मिल रहे हैं. बिजली की उपलब्धता भी बेहतर हुई है. इससे पैदावार बढ़ी है और किसानों का जीवन स्तर बेहतर हो रहा है."

"किसान नुकसान में ही रहेंगे"

देवेंद्र शर्मा कहते हैं, "इस साल सरकार ने धान के लिए जो न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया है वो पिछले साल के मुक़ाबले 3.85 प्रतिशत अधिक है. सरकार का कहना है कि प्रति क्विंटल की गई 72 रुपये की बढ़ोतरी काफ़ी है जबकि वास्तव में ये महंगाई के मुक़ाबले कुछ भी नहीं है. यदि समर्थन मूल्य में हुई बढ़त महंगाई दर के बराबर भी नहीं है तो इसका सीधा मतलब ये है कि किसान नुक़सान में ही रहेंगे."

शर्मा कहते हैं, "भारत में किसान जब फ़सल बोते हैं तब उन्हें ये अहसास नहीं होता है कि वो नुक़सान उठाने जा रहे हैं. जो न्यूनतम समर्थन मूल्य सरकार घोषित करती है वो हमेशा ही फ़सल के वास्तविक मूल्य से कम होता है. हम हर साल इस बात को नज़रअंदाज़ कर देते हैं कि एमएसपी घोषित करते समय महंगाई दर का ख्याल नहीं रखा जाता है."

एमएसपी की मंहगाई भत्ते से तुलना करते हुए शर्मा कहते हैं, "जब देश में सातवें वेतन आयोग की घोषणा हुई थी तबसे हर साल दो बार महंगाई भत्ता बढ़ाया जाता है. सरकारी कर्मचारियों के लिए ये क़दम महंगाई के मद्देनज़र उठाया जाता है. यदि सरकारी कर्मचारियों को ये फ़ायदा दिया जा सकता है तो किसानों को क्यों नहीं."

वहीं किसान हरविंदर सिंह बरार कहते हैं, "सरकार जब भी एमएसपी की घोषणा करती है वो प्रतिशत में नहीं बताती है क्योंकि प्रतिशत का आंकड़ा बहुत शर्मनाक होता है. अभी मूंग की फ़सल का एमएसपी लगभग एक प्रतिशत बढ़ा है. जब वेतन भत्ते बढ़ाए जाते हैं तो प्रतिशत में बताया जाता है क्योंकि उसका प्रतिशत ज़्यादा होता है. सोचिए आपका एक प्रतिशत वेतन बढ़ेगा तो कैसा लगेगा? क्या सरकारी और निजी क्षेत्र के कर्मचारी एक प्रतिशत की बढ़ोत्तरी स्वीकार करेंगे. किसान की दुर्दशा ये है कि जो एमएसपी सरकार घोषित कर रही है वो उसे क़ानूनी अधिकार के तौर पर मांग भी नहीं सकता है."

"एमएसपी से आधी कीमतों पर फ़सलें बेचने को मजबूर किसान"

सरकार का तर्क है कि एमएसपी बढ़ाने से फ़सलों की विविधता बढ़ेगी. लेकिन कृषि विशेषज्ञ मानते हैं कि सरकार ने किसानों को बेहतर विकल्प नहीं दिए हैं.

मक्का को धान के विकल्प के तौर पर पेश किया जाता है. धान की फ़सल को अधिक पानी की ज़रूरत होती है और इससे भूजल का स्तर गिर रहा है. पराली जलाए जाने से प्रदूषण की समस्या भी होती है. सरकार चाहती है कि किसान धान के बजाए दूसरी फ़सलें भी बोएं.

देवेंद्र शर्मा कहते हैं, "किसान धान के अलावा दूसरी फ़सलें तब ही बोएंगे जब उन्हें दूसरी फ़सलें बोने में फ़ायदा मिलेगा. उदाहरण के तौर पर पिछले साल मक्का की एमएसपी 1850 रुपये प्रति क्विंटल था जिसमें अब 22 रुपये क्विंटल की बढ़ोतरी की गई है. कुछ दिन पहले ही पंजाब की मंडियों में मक्का 800 रुपये क्विंटल बिक रही थी, यानी किसानों को एक हज़ार रुपये क्विंटल का नुक़सान हो रहा था."

शर्मा कहते हैं, "बिहार में सबसे ज़्यादा मक्का बोई जाती है. वहां किसानों को मक्का के दाम एक हज़ार से लेकर 1100 रुपये प्रति क्विंटल तक मिल रहे हैं. 1850 रुपये की एमएसपी होने के बावजूद किसानों को भारी नुक़सान हो रहा है. जब हम किसानों को धान के विकल्प में कोई ऐसी फ़सल नहीं दे रहे हैं जिससे उनकी आमदनी बढ़े तो फिर किसान धान बोना कैसे कम करेंगे."

सुधीर पंवार कहते हैं, "सरकार ने एमएसपी घोषित तो की है लेकिन सरकार को एमएसपी पर ख़रीद की व्यवस्था भी करनी चाहिए. पिछले साल सरकार एमएसपी पर आधे किसानों का धान भी नहीं ख़रीद पाई थी. किसानों को अपनी फ़सल आधे दाम पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा था."

किसान आंदोलन का ये हुआ असर...

भारत में पिछले छह महीनों से बड़ा किसान आंदोलन चल रहा है. राजधानी दिल्ली की सरहदों पर बड़ी तादाद में किसान डटे हुए हैं. किसान नेताओं का मानना है कि सरकार आंदोलन से दबाव में है.

हालांकि बीजेपी का कहना है कि आंदोलन कर रहे किसान सभी किसानों का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं.

गोविंद शुक्ला कहते हैं, "केंद्र सरकार अपने स्तर पर किसान आंदोलन के नेताओं से बात कर रही है. लेकिन किसानों का ये आंदोलन सभी किसानों का प्रतिनिधित्व नहीं करता है. उत्तर प्रदेश में इसका कोई असर नहीं है."

शुक्ला कहते हैं, "सरकार के लिए किसान हमेशा से प्राथमिकता में थे. किसान सम्मान निधि आंदोलन से पहले ही शुरू की गई थी. सरकार का मक़सद किसानों के जीवन स्तर में सुधार करना है और इस दिशा में क़दम उठाए जा रहे हैं."

लेकिन राजिंदर सिंह कहते हैं, "केंद्र सरकार दबाव में है. इस आंदोलन ने केंद्र सरकार को राजनीतिक नुक़सान पहुँचाना शुरू कर दिया है. उदाहरण के तौर पर सरकार ने डीएपी के दाम बढ़ाए थे. एक बोरी पर सरकार ने 700 रुपये क़ीमत बढ़ाई थी लेकिन किसानों के आंदोलन की वजह से सरकार को ये बढ़ोतरी वापस लेनी पड़ी और पौने पंद्रह सौ करोड़ रुपये की सब्सिडी और देनी पड़ी. सरकार पूरी तरह कॉर्पोरेट के साथ खड़ी है."

वे कहते हैं, "बीजेपी को किसान आंदोलन की वजह से पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में राजनीतिक नुक़सान उठाना पड़ा है. किसान आंदोलन की वजह से बीजेपी में अंदरूनी कलह बन गया है. लेकिन फिर भी केंद्र सरकार कॉर्पोरेट हित छोड़कर किसानों के हित में बात करने को तैयार नहीं है."

वहीं सुधीर पंवार कहते हैं, "किसान आंदोलन का कम से कम ये असर तो रहा है कि इस साल सरकार ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एमएसपी पर गेहूं की फ़सल की अच्छी ख़रीद की है."

एमएसपी बढ़ाने को सरकार की किसानों को साधने की कोशिश के तौर पर भी देखा जाता है. चुनावी राज्य उत्तर प्रदेश में किसान बड़ा वोट बैंक हैं. ऐसे में माना जा रहा है कि सरकार किसानों को रिझाने के प्रयास कर सकती है.

लेकिन कृषि विशेषज्ञ सुधीर पंवार का कहना है कि सरकार को वोट बैंक के तौर पर किसानों की बहुत परवाह नहीं है.

पंवार कहते हैं, "उत्तर प्रदेश चुनावों की जहां तक बात है कि सरकार ने ये मान लिया है कि किसानों से किसी दूसरे मुद्दे पर वोट लिया जाएगा. यूपी में सरकार ने गन्ना का किसानों का तेरह हज़ार करोड़ रुपये अभी तक नहीं चुकाए हैं. इससे स्पष्ट है कि किसानों को साधने की सरकार की नीति में उन्हें आर्थिक लाभ पहुंचाना नहीं है. सरकार किसानों का वोट हासिल करने के लिए किसी और रणनीति पर काम कर रही होगी."

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत के किसानों की आमदनी दोगुनी करने का वादा किया है. लेकिन आंदोलनकारी किसान इसे भी एक मज़ाक़ ही मानते हैं.

किसान नेता राजिंदर सिंह दीपसिंहवाला कहते हैं, "जहां तक आमदनी दोगुनी करने का मामला हो वो सरकारी की बस एक नौटंकी है. उदाहरण के तौर पर यदि एक किसान पाँच हज़ार कमा रहा है तो उसकी दोगुनी आमदनी सिर्फ़ दस हज़ार ही होगी. सरकार के इस ढकोसले से किसान को कोई फ़ायदा नहीं होने जा रहा है."

क्या चाहते हैं आंदोलनकारी किसान?

हरविंदर सिंह बरार कहते हैं, "गेहूं और धान को छोड़कर बाक़ी किसी फ़सल की एमएसपी पर ख़रीद नहीं हो पाती है. एमएसपी का क़ानूनी अधिकार किसानों को मिलना चाहिए. यदि किसानों का वास्तव में हित चाहते हैं तो किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं बल्कि स्वामीनाथन आयोग के फ़ॉर्मूले के तहत लाभकारी मूल्य मिले."

भारत में खेती की सबसे बड़ी समस्या इस समय लागत का बहुत अधिक बढ़ जाना और मज़दूरों का न मिलना है. ग्रामीण क्षेत्र में रोज़गार के लिए लाई गई सरकारी योजना महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी योजना की वजह से कृषि क्षेत्र के लिए मज़दूरों की उपलब्धता भी कम हुई है.

बरार कहते हैं, "मनरेगा की वजह से कृषि क्षेत्र को मज़दूर नहीं मिल रहे हैं इसकी वजह से मशीनरी से अधिक काम करना पड़ रहा है. मनरेगा को कृषि से जोड़ा जाना चाहिए और पंचायतों को रोज़गार एजेंसी के तौर पर काम करना चाहिए. इससे मज़दूरों को अधिक काम मिलेगा और कृषि क्षेत्र मज़बूत होगा."

बरार कहते हैं, "भारत सरकार को विदेशों से दालों और दूसरे कृषि उत्पाद का आयात भी कम करना चाहिए ताकि भारतीय किसानों को उनकी फ़सल के सही दाम मिल सकें. अक्तूबर नवंबर में दालों का आयात होगा. किसानों की दाल की फ़सल भी उसी समय बाज़ार में आएगी. लेकिन आयात की वजह से स्थानीय दालों के दाम गिर जाएंगे और किसानों को नुक़सान उठाना पडे़गा."

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